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» » » कभी किसी का घर किया साफ तो कभी बने गार्ड:चार बार जान लेने की कोशिश, अब अपनी एक्टिंग के लिए जाने जाते हैं अमित साध

अक्सर हम सब सुनते हैं कि गुस्सा इंसान का दुश्मन होता है, लेकिन एक्टर अमित साध ने अपनी जिंदगी में इस लाइन को जिया है। इस गुस्से ने ना सिर्फ उनसे उनका बचपन छीना बल्कि स्कूल से भी निकाले गए। इंडस्ट्री में आए तो शो से निकाले गए और बैन हुए। पहले सीरियल से ही सफलता का स्वाद चखने वाले अमित का सफर इतना आसान नहीं रहा। उन्होंने कभी अपना गुजारा करने के लिए लोगों के घरों में झाड़ू-पोंछा किया, कभी जूते बेचे तो कभी सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी की। जीवन में आई हर चुनौतियों से लड़कर अमित ने अपनी एक पहचान बनाई। जिस गुस्से ने उनका बहुत कुछ छीन लिया, उस गुस्से से डील करना सीखा। आज वो हर दिन खुद को बेहतर बना रहे हैं और समाज को अपनी तरफ से बेहतर बनाने की कोशिश भी कर रहे हैं। सक्सेस स्टोरी में आज कहानी एक्टर अमित साध की ही जुबानी… बचपन में बात-बात पर लूजर बोला जाता था बचपन में जब फैमिली का प्यार नहीं मिले तो बच्चों को इससे बहुत फर्क पड़ता है। मेरा मेरे पेरेंट्स के साथ कोई रिश्ता ही नहीं था। मेरे घरवालों ने मुझे कभी गले नहीं लगाया। मैं देखता था दूसरे बच्चे को गले लगाया जा रहा है, लेकिन मेरे साथ ऐसा कुछ नहीं हो रहा था। बचपन में जब आपको फैमिली का प्यार नहीं मिलता है, तब अंदर बहुत गुस्सा भरने लगता है। मेरे पिताजी बहुत गुस्सैल थे। उन्होंने मुझे बहुत मारा है। मेरी पिटाई हॉकी स्टिक से होती थी। अगर मैं मार खाते वक्त रो देता तो और पिटाई होती थी। बात-बात पर लूजर कहा जाता था। तेरह का पहाड़ा ठीक से नहीं पढ़ पाया तो लूजर, औरंगजेब की कब्र कहां है, इसका जवाब नहीं दिया तो लूजर। किसी टीचर या दोस्त की बहन के साथ किसी ने बदतमीजी की और मैंने जाकर पीट दिया, तो भी लूजर सुनने को मिलता था। मुझे इतने लोगों ने लूजर बोल दिया था कि मुझ पर उसका असर हो गया था। मैं अपनी डायरी में खुद को लूजर लिखने लगा था। मैं भगवान से कहने लगा था कि आप प्रूव करो कि मैं लूजर नहीं हूं। मैं बहुत सेंसिटिव बच्चा था। इन सारी बातों से मुझे ठेस पहुंचती थी। गुंडा बोलकर मुझे बोर्डिंग स्कूल से निकाल दिया गया मैं बोर्डिंग स्कूल में पला-बढ़ा हूं। मेरी स्कूलिंग लखनऊ के ला मार्टिनियर स्कूल से हुई है। मैंने अपने आसपास वॉयलेंस वाला माहौल देखा था। मेरे अंदर भी हिंसा पनपने लगी थी, लेकिन मेरा गुस्सा सही जगह पर निकलता था। मैं लोगों के भले के लिए लड़ता था। जब मैं लखनऊ में पढ़ता था, उस वक्त यूपी में गुंडई बहुत ज्यादा थी। जैसे एक बार स्कूल में मेरे टीचर को कुछ लोग बंदूक लेकर धमकाने आए थे। उस वक्त मैं 15 साल का था। टीचर को बचाने के लिए मैं भी अपने दोस्तों के साथ हॉकी स्टिक लेकर खड़ा हो गया, लेकिन वो भी मेरे खिलाफ गया। उल्टा मुझसे ही कहा गया कि तुम क्यों खड़े हो गए थे। ऐसे ही मेरे एक दोस्त की बहन को छेड़ा गया। मैंने वहां भी लड़ाई की। मैं लोगों का भला करने के लिए हॉकी स्टिक लेकर खड़ा हो जाता था। स्कूल में मेरे ऊपर गुंडा का ठप्पा लग गया। बारहवीं क्लास में मुझे गुंडा बोलकर वहां से निकाल दिया गया। 16 साल की उम्र में जान लेने की कोशिश की मैं 16 साल का था, जब पापा की डेथ हो गई। मुझे अचानक लगा कि मुझे अपनी जिंदगी खत्म कर लेनी चाहिए। 16-18 साल के बीच में मैंने चार बार सुसाइड की कोशिश की। मैंने खुद को खत्म करने का चौथा प्रयास दिल्ली के सरोजिनी नगर मार्केट के पास रेलवे ट्रैक पर की थी, लेकिन मुझे उस वक्त एहसास हो गया था कि मैं ये करने के लिए नहीं बना हूं। उसके बाद आज तक मुझे कभी सुसाइड का ख्याल नहीं आया। मैंने अगर कभी किताब लिखी तो अपनी जिंदगी के उस फेज को मैं कोमा स्टेट लिखूंगा। उस दौरान मुझे कुछ पता ही नहीं था। अगर समझ होती तो मैं सुसाइड की कोशिश करता ही नहीं। कभी किसी का घर साफ किया तो कभी बना गार्ड मैं घर से भागकर अल्मोड़ा गया, वहां से फिर दिल्ली आ गया। यहां मैंने अपना गुजारा करने के लिए कई तरह के काम किए। जोर बाग के एक अमीर घर में मैं झाड़ू-पोंछा और बर्तन सफाई का काम करने लगा। वहां काम करते हुए मुझे सिर्फ एक हफ्ते हुए थे और इंग्लिश की वजह से मेरी नौकरी चली गई। मैंने लखनऊ के बहुत एलीट स्कूल में पढ़ाई की थी। इस वजह से मेरी इंग्लिश बहुत अच्छी थी। एक दिन उन्होंने मुझे ब्रायन एडम्स का गाना गाते सुन लिया और उन्हें लगा इस लड़के के साथ कुछ तो गड़बड़ है। इस तरह मेरी नौकरी चली गई। मैं जब उनके घर से निकल रहा था, तभी गेट पर मुझे गार्ड दिखा। मैंने उससे पूछा मुझे ये नौकरी कैसे मिलेगी। उसने अपनी कंपनी का पता बताया, जो खान मार्केट में थी। मैं जोर बाग से खान मार्केट पैदल चलकर गया। वहां जाकर मैंने नौकरी मांगी और मुझे बेनेटन के शोरूम में 900 रुपए की सैलरी पर सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी मिल गई। सुबह मेरी आंख पिटाई से खुली, मैं बुखार में था मुझे याद है कि इस दौरान मैं बाकी गार्ड, रिक्शे वालों के साथ कभी जोर बाग कम्युनिटी सेंटर में सोता था तो कभी लोधी गार्डन में। एक दिन कम्युनिटी सेंटर में पुलिस का छापा पड़ा और सारे लोग तितर-बितर हो गए। मुझे वायरल के साथ कंजंक्टिवाइटिस हो रखा था। उस रात बारिश भी हो रही थी और बीमार होने की वजह से मैं बहुत कमजोर हो गया था। कम्युनिटी सेंटर से भागने के बाद मुझे दूर एक लकड़ी का टेबल जैसा दिखा। मैं उस पर जाकर सो गया। सुबह लगभग 6 बजे मेरी नींद पिटाई से खुली। दो लोग मुझे बुरी तरह से पीट रहे थे। वहां धीरे-धीरे भीड़ इकट्ठा होने लगी। वो मुझे मारते हुए कह रहे थे कि ये हमारी रोजी-रोटी पर सो गया। जोर बाग का इलाका अमीरों का इलाका है। उस भीड़ में एक अंकल थे, जब मैंने उनसे इंग्लिश में बात की, तो उन्होंने मुझे बचाया। मेरी इंग्लिश से उन्हें लगा कि ये कोई अच्छा आदमी है। छोले-कुलचे वाले को देने के लिए पैसे नहीं थे मैं जोर बाग में एक छोले-कुलचे वाले का रेगुलर कस्टमर था, लेकिन जब मेरे पास पैसे नहीं थे, तब मैंने वहां जाना छोड़ दिया। मेरी बेनेटन शोरूम में गार्ड की नई-नई नौकरी लगी थी। मैंने सोचा जब सैलरी आएगी, तभी जाऊंगा। मेरे अंदर बहुत ज्यादा प्राइड था। एक दिन किसी ने कहा कि वो छोले-कुलचे वाला मुझे ढूंढ रहा है। मैं डरते-डरते उसके पास गया। जब मैं वहां पहुंचा तो वो मुझे गाली देने लगा, लेकिन वो गाली पैसों के लिए नहीं थी। वो कहने लगा कि तुम आ नहीं रहे मेरी रोजी-रोटी नहीं हो पा रही है। कल से हर रोज तुम्हें यहां आना है। फिर लंबे समय तक उन्होंने मुझे फ्री में खिलाया। ड्रामा टीचर ने एक्ट में शामिल होने से मना किया मैं 11वीं क्लास में था और एक ड्रामा का हिस्सा बनना चाहता था। मैं अपनी ड्रामा टीचर के पास गया और उन्हें बताया कि मैं भी एक्ट करना चाहता हूं। मुझे ड्रामा में रोल दिया जाए। मेरी टीचर ने मुझे ये कहते हुए मना कर दिया था कि तुम बहुत शरारती हो। तुम इस एक्ट को भी खराब कर दोगे। मैं तीन-चार दिन उनकी इनकार पर सोचता रहा। मुझे अब लगता है कि अगर उन्होंने मुझे उस वक्त मौका दिया होता तो मेरी लाइफ अलग होती। मैंने फिल्म ‘काई पो चे’ से पहले एक हॉलीवुड फिल्म के लिए ऑडिशन दिया था। उस फिल्म के डायरेक्टर ऑस्कर विनर रह चुके थे। उन्होंने मुझसे सवाल किया था कि तुम्हें एक्टिंग का ख्याल कब आया? तब मुझे 11वीं क्लास का किस्सा याद आया। मुझे एहसास हुआ कि वो पहली स्टेज थी, जब मुझे एक्टिंग का ख्याल आया था। रातों-रात बैकग्राउंड आर्टिस्ट से हीरो बना मेरा लाइफ में मन नहीं लग रहा था। दुनिया से, खुद से परेशान था। एक दिन दिल्ली में सब छोड़ कर वापस पहाड़ों पर चला गया। वहां मैं बच्चों और बड़ों का ट्रैकिंग गाइड था। मैं बाइक रेस करता था। लोगों को ट्रैकिंग पर ले जाता था, लेकिन वहां भी मन नहीं लगा। मेरे दो दोस्त मुंबई आ रहे थे तो मैं उनके साथ एक्टर बनने मुंबई आ गया। किसी ने बताया कि नीना गुप्ता जी अपने शो के लिए ऑडिशन ले रही हैं, तो मैं वहां चला गया। वहां जाकर पता चला कि हीरो के पीछे खड़ा होना, जिसे क्रोनी कहते हैं। मुझे तो उस वक्त एक्टर, विलेन कुछ भी नहीं पता था। मैंने बस पूछा कि पैसे कितने मिलेंगे। उन्होंने कहा आठ हजार रुपए महीना। मैंने अपना गुणा-भाग लगाया और हां बोल दिया, लेकिन मुझे अगले दिन फिर फोन आया, मुझे वापस बुलाया गया। जब मैं पहुंचा तो मुझे काफी इज्जत दे रहे थे। मुझसे कुछ डायलॉग बोलने को कहा गया। फिर उन्होंने मुझे कहा कि हम हीरो के लिए आपका ऑडिशन करना चाहते हैं। चैनल को आपका फेस बहुत अच्छा लगा। इस तरह मैं रातों-रात ‘क्यों होता है प्यार’ सीरियल का हीरो बन गया। मुझे एक्टिंग नहीं आती थी। सेट पर सब मुझसे परेशान हो गए, लेकिन उस समय चैनल से जुड़ीं गुरसील और तरुण कटियार थे, जिन्होंने मेरे साथ सब्र दिखाया। मुझे चीजें सिखाईं। छह महीने बाद मुझे पता चला कि मुझे शो से निकाला जा रहा है, लेकिन गुरसील ने मेरा साथ दिया। मैंने साल 2002 से 2007 तक टीवी में खूब काम किया। कई सीरियल्स किए, जिसमें मैं लीड रोल में रहा। टीवी के दर्शक मुझ पर अपना प्यार भी लुटा रहे थे, लेकिन मैं एक्टिंग में अच्छा नहीं था। दूसरा मेरे अंदर गुस्सा बहुत था। मेरी हर किसी से लड़ाई हो जाती थी। ऐसे में कई शो से मुझे निकाला भी गया। मुझे टीवी इंडस्ट्री में बैन कर दिया गया। एक्टिंग कोर्स किया, ‘काई पो छे’ से बदली जिंदगी सच बताऊं तो टेलीविजन में काम करके मुझे एक्टर बनने की ख्वाहिश जगने लगी, लेकिन जब मैंने बतौर एक्टर अपनी ताकत को जानना चाहा तो मुझे एहसास हुआ कि मुझे कुछ नहीं आता। मैं खुद से बात करने लगा कि मैं अपने जीवन के साथ क्या कर रहा हूं। रिएक्टिव इंसान हूं, बस सबसे लड़ते रहता हूं। मैंने खुद को सुधारने की कोशिश की। बतौर एक्टर मैंने खुद पर काम करना शुरू किया। अपनी हिंदी, उच्चारण पर काम किया। किताबें पढ़ना और फिल्में देखने लगा। एक्टिंग सीखने के लिए मैं न्यूयॉर्क चला गया। वहां, मैंने ली स्ट्रासबर्ग थिएटर एंड फिल्म इंस्टीट्यूट में एक्टिंग सीखी। फिर जब वापस आया तो मुझे फिल्म ‘काई पो छे’ मिली। इस फिल्म ने मेरी लाइफ को बदलकर रख दिया। सुशांत की मौत से टूट गया था, इंडस्ट्री छोड़ना चाहता था सुशांत सिंह राजपूत की मौत मेरे लिए कभी पुरानी बात नहीं होगी। सुशांत के बारे में कोई भी, कहीं भी बात करे तो वो मुझे तुरंत हिट करता है। मैंने फिल्म 'काई पो छे' के दौरान उसके साथ डेढ़ साल बिताया था। सुशांत की मौत का मुझ पर इतना गहरा असर हुआ कि मैं इंडस्ट्री छोड़ने जा रहा था। मैंने खुद को बंद कर लिया था। उस समय मेरी सीरीज 'ब्रीद' आने वाली थी। मैंने उसका प्रमोशन तक नहीं किया। मैं इंडस्ट्री, मुंबई सब छोड़कर जाना चाहता था। 16 से 18 साल की उम्र में मैंने खुद चार बार सुसाइड की कोशिश की थी, तो मुझे एहसास था कि अंदर क्या चल रहा होता है। सुसाइड इंसान तब करता है, जब उसके जीवन में पूरी तरह से अंधेरा छा जाए। इसमें उस इंसान की गलती नहीं होती, बल्कि समाज और उसके आसपास वाले लोगों की गलती होती है। लेकिन उस दौरान मुझे अचानक से स्मृति ईरानी का कॉल आया। उन्होंने मुझे 6 घंटे कॉल पर समझाया। फिर मुझे दिल्ली मिलने बुलाया। वो हर चार दिन बाद मुझे कॉल करतीं और समझाती थीं। इसके अलावा आर माधवन ने मुझे उस दौरान सदमे से उबरने में बहुत मदद की। पिछले हफ्ते की सक्सेस स्टोरी यहां पढ़ें... मिस्टर इंडिया में चाइल्ड आर्टिस्ट बने:आर्थिक स्थिति खराब हुई, सेट पर जाने के पैसे नहीं थे; आज बड़े डायरेक्टर्स में एक अहमद खान एक ऐसा शख्स जो एक्टिंग भी कर सकता है। अपने इशारों पर लोगों को नचा भी सकता है। साथ ही, इंडस्ट्री को एक से बढ़कर एक फिल्में भी बनाकर दे सकता है। हम बात कर रहे हैं, कोरियोग्राफर-डायरेक्टर अहमद खान की। शेखर कपूर की आइकॉनिक फिल्म मिस्टर इंडिया में इन्होंने चाइल्ड आर्टिस्ट की भूमिका निभाई थी। पूरी स्टोरी पढ़ें...

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