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रातोंरात स्टार बने जालंधर के सिंगर मस्कीन की कहानी:एक साल पुरानी रील से ऑफर मिला; 1.80 करोड़ देख चुके 'बुल्लेया वे' सॉन्ग

जालंधर के रहने वाले अशोक मस्कीन की जिंदगी एक रील से बदल गई। इसी रील से उन्हें ऐसा ऑफर मिला कि फैक्ट्री में खराद का काम करने वाले मस्कीन कोक स्टूडियो में गाए ‘बुल्लेया वे और लगदा नीं दिल मर जाणा…’ गाकर रातों-रात स्टार बन गए। उनका गाया सॉन्ग 1.8 करोड़ लोग देख चुके हैं। दिल्ली से लेकर मुंबई तक उन्हें बॉलीवुड मूवीज में गाने के साथ लाइव शोज के ऑफर तक आ रहे हैं। हालांकि अशोक की जिंदगी पहले बहुत संघर्ष से भरी रही। 15 किमी पैदल चलकर अशोक ने मशहूर पंजाबी सिंगर साबर कोटी से गायकी सीखी। हालांकि गरीबी के चलते उनकी गायकी का शौक दिहाड़ी में ही दब गया था। 50 साल की उम्र में वह फेमस हुए तो फैक्ट्री का काम छोड़ दिया और पूरा ध्यान अब सिंगिंग पर है। किस्मत बदलने पर अब पत्नी-बेटी को भी गर्व और खुशी है। दैनिक भास्कर ने जिंदगी के संघर्ष और अचानक मिली शोहरत के बारे में अशोक मस्कीन से बात की, पढ़िए पूरी रिपोर्ट… अशोक मस्कीन के संगीत के सफर की कहानी जानिए… जानें एक रील से कैसे बदली मस्कीन की किस्मत बेटे के ऑपरेशन का खर्च तक मुंबई के संगीतकार ने उठाया मस्कीन ने बताया कि मुंबई के कालाकार बहुत मददगार हैं। मेरी बेटी के नाक की हड्‌डी में प्रॉब्लम थी, जन्म से उसका होठ भी फटा था। इसका ऑपरेशन करवाना था। बेटी को दाखिल कराया तो डॉक्टरों ने मोटा बिल बना दिया। समझ नहीं आ रहा था क्या करुं। इस पर मैंने मुंबई के संगीतकार तनिष को डरते हुए फोन किया और कहा कि बेटी का ऑपरेशन करवाया है और पैसे कम पड़ गए हैं। उन्होंने मेरी बात सुन एक मिनट भी नहीं लगाया और कहा कि टोटल खर्च बताओ कितना हुआ है और सारा पैसा खुद दे दिया। 2 कमरों के घर में रहते अशोक मकसूदां चौक के पास महाशा कॉलोनी में रहने वाली 50 वर्षीय अशोक मस्कीन के घर में 2 कमरे हैं। जिस गली में वह रहते हैं, वह संगीतकारों की गली है। गली में 70 घर हैं और हर कोई संगीत से जुड़ा है। एक सिरे से बंद गली में रहने वाले वाले मस्कीन की किस्मत को कोक स्टूडियो ने खोल दिया। बॉलीवुड और लाइव शोज के ऑफर्स मिल रहे अपने छोटे से मकान में पत्नी मोनिका और बेटी के साथ बैठे अशोक ने खुशी जाहिर करते हुए बताया कि संगीत इंडस्ट्री के कई लोगों ने मुझसे संपर्क किया है। मुझे एक हिंदी फिल्म में गाने का ऑफर मिला है और मेरे लाइव शोज की बुकिंग भी शुरू हो गई है। अभी जालंधर की एक कंपनी से दिल्ली की एक सिंगर के साथ ड्यूट गीत का कॉन्ट्रैक्ट साइन हुआ है। बॉलीवुड फिल्म के लिए प्लेबैक किया है और 2 गीत एडवांस रिकॉर्ड हैं।

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नवाजुद्दीन सिद्दीकी@52:वॉचमैन बने तो मालिक ने कहा- इस मरे हुए को किसने रखा, दोस्त की गुमशुदगी से मिली सरफरोश, सीन कटे तो थिएटर में रोए

उत्तर प्रदेश के बुढ़ाना में जन्में नवाजुद्दीन सिद्दीकी जब 17 साल के हुए तो उनके गांव के एक घर में टीवी आया। एक दिन नवाज की नजर पड़ोस में रहनेवाली लड़की पर पड़ी। पहली नजर में ही उन्हें उस लड़की से प्यार हो गया। वो लड़की रोज टीवी देखने उस घर एक घर में जाती, तो पीछे-पीछे नवाज भी वहीं जाने लगे। दोनों घंटों उस घर में बैठते और कई बार नजरें टकरातीं। एक दिन नवाजुद्दीन ने हिम्मत कर लड़की का हाथ पकड़ लिया और कहा- ‘टीवी मत देखो, मुझे देखो।’ लड़की ने जवाब दिया- 'मैं तो टीवी ही देखूंगी।' इस पर नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने तैश में कहा- ‘देखना, एक दिन मैं भी टीवी पर आऊंगा।’ नवाज को गुस्सा करते देख, लड़की उनका हाथ झटक कर वहां से चली गई। उसने भी एक पल के लिए जरूर सोचा होगा कि एक छोटे से गांव का सांवला, आम सी शक्ल का दुबला-पतला ये लड़का हीरो बनेगा? कुछ साल बाद नवाजुद्दीन ने अपनी कही बात सच कर दिखाई। ये मुमकिन हो सका उनकी लगन, संघर्ष और काबिलियत से, जिसे नवाजुद्दीन ने साल-दर-साल निखारा। इस सफर में नवाजुद्दीन कभी वॉचमैन बने, तो कभी 100 रुपए का नुकसान होने से 19 किलोमीटर पैदल चले। कभी तीन वक्त चाय-बिस्कुल में गुजारा किया, तो कभी स्टूडियो से बेइज्जती कर निकाले गए। कभी टीवी पर वेटर बने, चोर बने, तो कभी गुंडे, लेकिन फिर हुनर की बदौलत उनकी गिनती बॉलीवुड के सबसे मंझे हुए एक्टर्स में की जाने लगी। उनके कहे गए डायलॉग- ‘बाप का, दादा का, भाई का सबका बदला लेगा तेरा फैजल….’, ‘आखिर चाहिए क्या औरत को….’, ‘मैं 15 मिनट तक अपनी सांस रोक सकता हूं, मौत को छू के टक से वापस आ सकता हूं…’, आज भी चाहनेवालों की जुबां पर रटे रहते हैं। वजह है उनका हुनर, कहने का सलीका और दमदार अभिनय। आज नवाजुद्दीन सिद्दीकी 52 साल के हो चुके हैं। उनके जन्मदिन के खास मौके पर जानिए उनकी जिंदगी से जुड़े मजेदार किस्से, जो उनकी शख्सियत को करीब से समझने का मौका देते हैं- किस्सा- 1 चीफ केमिस्ट की नौकरी छोड़ी, फिर वॉचमैन बनने के लिए मां के गहने रखे गिरवी 19 मई 1974 नवाजुद्दीन सिद्दीकी का जन्म उत्तर प्रदेश के बुढ़ाना (मुजफ्फरनगर) में जमींदार के घर हुआ। प्री-मैच्योर नवाज 8 भाई-बहनों में सबसे बड़े थे। घरवाले खेती-किसानी करते थे, लेकिन नवाजुद्दीन को पढ़ाई में दिलचस्पी थी। 10 की उम्र में पिता ने अखाड़े भेजा, लेकिन बार-बार पिटाई होने पर उन्होंने इसे जारी रखने से इनकार कर दिया। शुरुआती पढ़ाई गांव से हुई और फिर पिता ने उनकी रुचि की कद्र करते हुए केमिट्री में ग्रेजुएन करने के लिए उनका दाखिला हरिद्वार के कांगड़ी विश्वविद्यालय में करवा दिया। पढ़ाई के बाद उनकी वडोदरा की केमिकल फेक्ट्री में चीफ केमिस्ट की नौकरी लग गई। नवाज अपने परिवार के इकलौते थे, जिन्होंने ग्रेजुशन किया था। एक महीने में ही नवाज इस काम से ऊब गए और नई नौकरी की तलाश में दिल्ली निकल पड़े। एक दिन मंडी हाउस में दोस्त का प्ले देखने गए नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने खुद भी एक्टिंग करने का फैसला कर लिया। उन्हें महसूस हुआ कि यही वो काम है, जिसे कर वो कभी बोर नहीं हो सकते। उन्होंने नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में दाखिला लेने के लिए एक प्ले ग्रुप जॉइन कर लिया। दरअसल, दाखिले के लिए स्टूडेंट के लिए 10 प्ले करना अनिवार्य होता था। प्ले के दिनों में गुजारा करना मुश्किल होने लगा। एक दिन नई दिल्ली रेल्वे स्टेशन के बाहर बने सुलभ में पेशाब करते हुए नवाजुद्दीन सिद्दीकी की नजर सामने चिपके पैंप्लेट पर पड़ी। लिखा था, 500 सिक्योरिटी गार्ड, 300 वॉचमैन चाहिए। उस कंपनी के शाहदरा ऑफिस पहुंचे, तो कहा गया, नौकरी मिल जाएगी, लेकिन 5 हजार सिक्योरिटी डिपॉजिट देने होंगे। नवाजुद्दीन ने हामी भर दी। वो गांव गए, मां के सोने के गहने गिरवी रखकर पैसे लिए, जिसके डिपॉजिट से उन्हें नोएडा की एक खिलौने बनाने वाली कंपनी में वॉचमैन की नौकरी मिल गई। किस्सा- 2 धूप में बेहोश हुए, तो मालिक ने कहा- इस मरे हुए इंसान को किसने काम दिया नवाजुद्दीन सिद्दीकी सुबह 9 बजे से 5 बजे तक वॉचमैन की नौकरी करते और शाम को सीधे मंडी हाउस पहुंचकर प्ले करते थे। डेढ़ सालों तक ये सिलसिला जारी रहा। वो जिस टॉय कंपनी में काम करते थे,वहां उन्हें कड़ी धूप में 8 घंटे खड़ा रहना पड़ता था, छांव के लिए कोई जगह ही नहीं थी, ऊपर से नवाज एकदम दुबले-पतले थे। कुछ देर में ही धूप और थकान के मारे वो गेट के कोने में बैठ जाते थे। बदकिस्मती से जैसे ही वो बैठते, वैसे ही उनके मालिक आ जाते। 5-6 बार यही हुआ। एक दिन वो धूप में खड़े-खड़े बेहोश हो गए। तभी वहां मालिक पहुंच गए। अगले दिन उन्होंने चिल्लाते हुए कहा- ‘ये मरे हुए आदमी को किसने काम पर रखा। कौन लेकर आया है, हटाओ इसे।’ नवाजुद्दीन ने जब डिपॉजिट वापस मांगा, तो जवाब मिला- ‘गिरे तुम, गलती तुम्हारी, तो हम पैसे नहीं देंगे।’ और इस तरह नवाज के 5000 डूब गए। संघर्ष के दिनों में वो ईस्ट दिल्ली के शकरपुर में किराए के कमरे में रहते थे। तब स्ट्रगल कर रहे एक्टर-कॉमेडियन विजय राज उनके रूम मेट थे। कमरे का किराया 150 रुपए था, तो दोनो 75-75 रुपए देते थे। दोनों तीन वक्त चाय-बिस्कुट खाकर गुजारा करते। कुछ समय बाद उन्हें प्लेज की बदौलत नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में दाखिला मिल गया। वहां रहने और खाने की भी व्यवस्था दी गई। नवाजुद्दीन के प्ले के दिनों की तस्वीरें- किस्सा- 3 100 के 200 करने के लिए चौराहे में धनिया बेची NSD से पढ़ाई पूरी कर नवाजुद्दीन 1999 में बॉम्बे आ गए। एक दिन एक दोस्त ने नवाजुद्दीन सिद्दीकी से कहा, ‘100 रुपए के 200 करने हैं।’ नवाजुद्दीन ने झट से कहा- ‘हां करना है, लेकिन कैसे।’ जवाब मिला- 'धनिया बेचेंगे। चल साथ में।' नवाज दोस्त के साथ लोकल ट्रेन से गोरेगांव से दादर गए। सब्जी मंडी से 400 की थोक में धनिया खरीदी और गड्डियां बनाकर चौराहे में खड़े हो गए। नवाज तो चुप खड़े थे, लेकिन दोस्त जोर-जोर से चिल्ला रहा था- ‘धनिया, 10 की एक गड्डी।’ कोई ग्राहक नहीं आया और एक घंटे में धनिया काली पड़ गई। दोनों सब्जीवाले के पास गए और कहा, ये बिके भी नहीं काले अलग पड़ गए। दुकानवाले ने कहा- ‘अरे इसे हर मिनट पानी देना पड़ता है।’ इस बार नवाज ने गुस्से में कहा- ‘तो ये बात पहले बतानी थी।’ पैसे डबल करने के बदले और कम हो गए। पैसे नहीं थे तो दोनों बिना टिकट दादर से गोरेगांव आए। किस्सा- 4 विजय राज के साथ खाई वजन बढ़ाने की दवा, बिगड़ी बॉडी स्ट्रगल के दिनों में एक्टर विजय राज और नवाजुद्दीन रूम मेट्स थे। कमरे का किराया 150 रुपए था, तो दोनों 75-75 देते थे। दोनों ही दुबले-पतले थे। एक दिन वजन बढ़ाने के लिए परेशान नवाजुद्दीन को देख विजय राज ने कहा- ‘तू एक काम कर, मैं तुझे दवा लिखकर देता हूं, तू वो खा।’ अपनी दवाइयां लिखकर दे दीं। वो भी वजन बढ़ाने के लिए वही दवा लेते थे। एक बार उनका वजन काफी बढ़ गया, लेकिन दवा छोड़ने पर वो फिर पतले हो गए। नवाजुद्दीन ने भी वही दवाइयां लीं। तब उनका वजन 50-51 किलो ही था। एक गोली खाते ही ऐसी भूख लगती थी कि वो घंटों तक खाते रहते थे। दवा लेते ही 15 दिनों में वो 65-67 किलो के हो गए। शरीर ऐसा बिगड़ा कि उन्हें दवा छोड़नी पड़ी और कुछ ही दिनों में वजन फिर घट गया। किस्सा- 5 पैसे बचाने के लिए सब्जीवाले के सामने अंधे बनने की करते रहे एक्टिंग नवाजुद्दीन सिद्दीकी स्ट्रगल के दिनों में पैसे बचाने के लिए हर मुमकिन कोशिश करते थे। वो जहां किराए पर रहते थे, वहां पास में एक सब्जीवाला था। वो रोज, अंधे की एक्टिंग करते हुए सब्जी खरीदने जाते। दया करते हुए सब्जीवाला कम पैसे लेता। ऐसा नवाज ने पूरे 2 सालों तक किया। किस्सा- 6 प्ले में मनोज तिवारी बनते थे भालू, घंटों पेड़ बनकर खड़े रहते थे नवाज थिएटर के दिनों में मनोज तिवारी काफी फेमस हुआ करते थे। उन्हें फिल्म बैंडिट क्वीन मिली थी। तभी नवाजुद्दीन सिद्दीकी और विजय राज को उनके साथ एक प्ले मिला। मनोज उसमें भालू बने थे और नवाजुद्दीन सिद्दीकी को रोल मिला पेड़ का। भालू बने मनोज जानबूझकर, पेड़ के पास आकर बॉडी को रगड़ते और खुजली की एक्टिंग करते थे। प्ले के चक्कर में नवाजुद्दीन सिद्दीकी को घंटों पेड़ बनकर खड़े रहना पड़ता था। किस्सा- 7 दोस्त गायब हुआ तो संयोग से मिला फिल्म सरफरोश में पहला रोल नवाजुद्दीन सिद्दीकी मुंबई में जिस जगह रहते थे, वहां उनकी तरह स्ट्रगल कर रहे कई लोग रहते थे। उनके पास के कमरे में एक लड़का था, जिसका नाम था, निर्मल दास। नवाजुद्दीन उसके अच्छे दोस्त थे। निर्मल दास की उस समय फिल्म सरफरोश में टेररिस्ट का रोल निभाने के लिए बात चल रही थी, लेकिन जिस दिन कास्टिंग वाले उन्हें ढूंढते हुए आए, वो अपने कमरे में ही नहीं थे। नवाजुद्दीन सिद्दीकी वहीं पास में टहल रहे थे। निर्मल दास नहीं मिला तो, कास्टिंग वालों ने नवाजुद्दीन को रोककर पूछा कि क्या आप एक फिल्म के लिए ऑडिशन देंगे। नवाजुद्दीन, जो इस दिन का बेसब्री से इंतजार कर रहे थे, वो इनकार कैसे करते। झट से हां कहा और फिर डायरेक्टर जॉन मैथ्यू के घर उनका ऑडिशन लिया गया और उनका सिलेक्शन हो गया। फिल्म में उन्होंने 1 मिनट से भी कम समय का रोल किया, जिन्हें आमिर खान कस्टडी में लेते हैं। तब तो हर किसी ने उन्हें नजरअंदाज कर दिया, किसी को उनका नाम तक नहीं पता था। लेकिन आज फिल्म देखकर हर कोई वो सीन देख कहता जरूर है- देखो वो नवाजुद्दीन है। जिस निर्मल दास की अचानक गुमशुदगी से नवाजुद्दीन सिद्दीकी को सरफरोश में काम मिला। वो सालों तक गायब रहा। किसी ने उसे नहीं देखा। फिर सालों बाद पता चला कि वो पागल हो चुका है। इसी तरह नवाजुद्दीन ने 2000 में आई फिल्म जंगल में भी काम किया था, लेकिन उनके लगभग सभी सीन काट दिए गए। उन्हें फिल्म की फीस नहीं मिली थी, तो वो रोज सेट पर खाना खाकर फीस वसूलते थे। नवाजुद्दीन सिद्दीकी के चुनिंदा रोल देखिए- किस्सा- 8 दोस्तों के अपनी फिल्म दिखाने पहुंचे, सीन कटे, तो वहीं खड़े रो पड़े मुंबई में लंबी जद्दोजहद करते हुए नवाजुद्दीन सिद्दीकी को आमिर खान की फिल्म सरफरोश में टेररिस्ट का एक छोटा सा रोल मिल गया। उन्होंने सोच लिया कि छोटे-छोटे रोल ही मिल जाएं, तो उनके रहने-खाने का खर्च निकलता रहेगा। थोड़े ही पैसे मिले। इसके बाद उन्हें कमल हासन की फिल्म हे राम में एक अच्छा रोल मिला। फिल्म की स्क्रीनिंग रखी गई, तो नवाजुद्दीन अपने 5 दोस्तों को साथ ले गए। उनके लिए बड़ा रोल मिलना बड़ी बात थी। नवाज पहुंचे, तो डायरेक्टर-प्रोड्यूसर कमल हासन उनके पास आए और कहा- ‘नवाज, अपने दोस्तों को बोल दो कि तुम्हारा रोल कट गया है।’ नवाज घबरा गए और कहा- ‘सर, क्या बात कर रहे हो, मैं अपने दोस्तों को लेकर आया हूं। क्या कुछ हो नहीं सकता। आप एक काम करो, यहां बैठे लोगों को मेरे सीन दिखा दो, बाद में भले ही फिल्म से निकाल देना। प्लीज सर मेरी बहुत बेइज्जती हो जाएगी।’ कमल हासन ने कहा- ‘नहीं ऐसा नहीं हो सकता, फिल्म कल ही रिलीज हो रही है। हम ऐसा नहीं कर सकते, लेकिन तुम दोस्तों से ईमानदारी से बोल दो।’ नवाज जैसे ही दोस्तों के पास पहुंचे, सभी एक्साइटेड होकर पूछने लगे, ‘अरे तुम्हारी डायरेक्टर से क्या बात हुई।’ ये सुनते ही नवाज रो पड़े। उन्होंने रोते हुए दोस्तों से कहा- ‘मेरा रोल कट चुका है। तुम लोग डिसाइड करो, अब फिल्म देखनी है या नहीं।’ सबने तय किया कि आ गए हैं, तो फिल्म देख ही लेते हैं। किस्सा- 9 किराया नहीं था, तो सीनियर ने कुक बनाकर दी घर में जगह छोटे-मोटे रोल से नवाजुद्दीन का गुजारा मुश्किल होने लगा। 2002 में एक समय ऐसा आया, जब उनके पास किराए के पैसे भी नहीं थे। नवाजुद्दीन ने जब एनएसडी के सीनियर्स से रहने के लिए जगह मांगी, तो उन्होंने शर्त रखी की मुफ्त में कमरे में रहने की इजाजत तो दे देंगे, लेकिन इसके बदले तुम्हें सबके लिए खाना बनाना होगा। नवाजुद्दीन मान गए और घर का काम कर वहीं रहते रहे। किस्सा-10 फिल्म में की दोस्त की नकल, फिल दोस्त को ही नहीं मिला काम संघर्ष के दिनों में नवाजुद्दीन सिद्दीकी का एक घनश्याम नाम को दोस्त हुआ करता था। घनध्याम तोतला था और उसकी बॉडी लैंग्वेज भी काफी अलग थी। जब छोटे-मोटे किरदारों के बाद नवाजुद्दीन को लंच बॉक्स में काम मिला, तो उन्होंने घनश्याम की तरह ही उसे निभाया। जब लंच बॉक्स रिलीज हुई, तो नवाजुद्दीन अलग फ्लैट में शिफ्ट हो चुके थे। फिल्म देखने के बाद दोस्त ने मैसेज कर कहा- ‘मैंने लंच बॉक्स देखी थैंक्यू।’ कुछ समय बाद ऐसा हुआ कि जब भी घनश्याम ऑडिशन देने जाते, तो उन्हें ये कहते हुए इनकार किया जाता कि ये रोल तो नवाजुद्दीन करके जा चुके हैं। और वो दोस्त रिजेक्शन के बाद खिजियाकर कहते, ‘नहीं, मैं ऑरिजिनल हूं, वो मेरी कॉपी करता है।’ लेकिन उनकी बात कोई नहीं मानता था और भगा देता था। एक नजर नवाजुद्दीन सिद्दीकी के करियर पर- ……………………………………………………………………………………. फिल्मी हस्तियों से जुड़ी ये स्टोरीज भी पढ़ें- विजय का लेडी लक, जिसके बर्थडे पर चुनाव जीते: तमिलनाडु का रिजल्ट आते ही विजय के घर पहुंचीं तृषा, एक्टर का हो चुका तलाक तमिलनाडु चुनाव में थलापति विजय की पार्टी TVK की जीत में उनकी 'लेडी लक' तृषा कृष्णन को अहम माना जा रहा है। 4 मई को 'लेडी लक' एक्ट्रेस तृषा कृष्णन का जन्मदिन था, जिनका नाम विजय से जुड़ता रहा है। तृषा तमिलनाडु चुनाव का रिजल्ट आने से पहले तिरुमाला मंदिर पहुंचीं, दर्शन किए और फिर विजय के घर पहुंचीं। 51 साल के विजय आज तमिल फिल्मों के सबसे बड़े स्टार हैं तो तृषा कृष्णन क्वीन ऑफ साउथ इंडिया कही जाती हैं। दोनों करीब 5 फिल्मों में साथ नजर आए हैं, जिनमें से 2023 में रिलीज सुपरहिट फिल्म लियो भी शामिल है। यह वही वक्त था जब विजय की पत्नी संगीता सोर्नालिंगम तलाक के लिए कोर्ट में लड़ाई लड़ रही थीं। पूरी खबर पढ़िए… पुण्यतिथि: ऋषि कपूर को सलमान के पिता ने धमकाया:राज कपूर ने सिगरेट पीने पर पीटा, दाऊद के साथ चाय पी, कभी अमिताभ का अवॉर्ड खरीदा 30 अप्रैल 2020, 6 साल पहले सुबह खबर आई कि ऋषि कपूर अब नहीं रहे। कुछ दिन पहले तक वो गंभीर हालत होने के बावजूद हॉस्पिटल स्टाफ को हंसाते तो कभी गाना सुना रहे थे। दैनिक भास्कर से बात करते हुए ऋषि कपूर की इकलौती बेटी रिद्धिमा कहती हैं, ‘सब अचानक हुआ, वो बहुत डरावना दिन था। अचानक एक खालीपन आ गया। एक सूनापन, उनकी जिंदगी उनकी मौजूदगी लार्जर देन लाइफ थी।’ पूरी स्टोरी पढ़ें… ………………………………………………. विनोद खन्ना की पुण्यतिथि, पिता ने पिस्तौल तानी:अमिताभ ने फेंका ग्लास, तो टांके आए: महेश भट्ट को धमकाया, आखिरी ख्वाहिश थी- पाकिस्तान जाना लंबी कद-काठी, गोरी रंगत और गहरी आंखें। 18 साल की उम्र में कॉलेज के दिनों में कई लड़कियां विनोद खन्ना के लुक की तारीफ करती नहीं थकती थीं। सबका एक ही सुझाव था, ‘हीरो जैसे लगते हो, फिल्मों में जाओ’, लेकिन विनोद के पिता चाहते थे कि बेटा पढ़ाई पूरी कर खानदानी टेक्सटाइल बिजनेस संभाले। विनोद का बागी रवैया तभी शुरू हो गया था, जब उन्होंने पिता के कहने पर कॉमर्स के बजाय साइंस चुना। एक रोज उनकी कॉलेज पार्टी में कुछ फिल्मी हस्तियां पहुंचीं, जिनमें उस दौर के नामी हीरो सुनील दत्त और उनकी दोस्त अंजू महेंद्रू भी थीं। वो देखना चाहते थे कि टीनएजर्स किस तरह पार्टी करते थे। पूरी खबर पढ़ें…

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Self-sufficient Iron Age settlement found in Saxony

An excavation at a gravel extraction site in Belgern-Schildau, Saxony, Germany, has uncovered a settlement from the late Roman/early Migration Period. Inside the dwellings, archaeologists found evidence they were used as homes, stables and for textile production from the 3rd to 5th centuries A.D.

The State Office for Archaeology of Saxony (LfA) surveyed the site before the expansion of the open-pit gravel mine. The area is known to have been settled for millennia, and any archaeological remains would inevitably be destroyed in the extraction of gravel.

Among the numerous finds, such as pits and postholes—structures in the ground created by human intervention—at least four multi-aisled longhouses built using post-and-beam construction and three pit houses can be identified. While the longhouses, up to 20 meters long and five meters wide, were used as dwellings and stables, the small pit houses, dug into the ground and with a floor area of ​​between seven and twelve square meters, served as farm buildings and storage facilities.

One pit house yielded clear evidence of textile production. Thirty flat, round clay loom weights indicate that fabrics were produced here using a loom. The loom weights tensioned the warp threads, which hung vertically on the loom, through which the weft threads were then threaded. During the Roman Imperial period, woven textiles made primarily from sheep’s wool were produced. A clay spindle whorl was also found, which could be used to spin raw wool into thread on a weighted spindle.

Among the finds, mostly fragments of everyday pottery, a large, dark, opaque glass bead decorated with light-colored wave bands stands out. These beads are usually found as ornamental items in women’s graves. The shape and decoration of beads of this type are very durable. They are most commonly found in the 4th and 5th centuries AD. Since this large bead was found in a settlement pit, its use as a spindle whorl, for example, cannot be ruled out.

Burned clay and grain indicate the dwelling walls were coated with coat and grain stored in the structures. A fire must have struck to burn the walls and grain. The settlement may have been abandoned in the wake of the fire. Archaeologists will now focus on analyzing the recovered remains, including radiocarbon dating the plant matter and charcoal.



* This article was originally published here

PBKS के लिए प्रीति जिंटा गोल्डन टेंपल में नतमस्तक:लंगर हॉल में सेवा की; बोलीं- पंजाब का भरपूर प्यार मिला, प्लेऑफ में जरूर पहुंचेंगे

बॉलीवुड एक्ट्रेस प्रीति जिंटा शनिवार रात अमृतसर स्थित गोल्डन टेंपल में माथा टेकने पहुंचीं। उन्होंने गुरु घर में नतमस्तक होकर अरदास की। इस दौरान प्रीति जिंटा की एक झलक पाने के लिए श्रद्धालुओं में भी काफी उत्साह देखा गया। कई लोगों ने उनके साथ तस्वीरें भी खिंचवाईं। गुरुद्वारा साहिब में माथा टेकने के बाद प्रीति जिंटा ने लंगर हॉल में सेवा की। उन्होंने संगत को लंगर वितरित किया। मीडिया से बात करते हुए प्रीति जिंटा ने कहा- बाबा जी का बुलावा आया था, उन्होंने बुलाया था तो हम आ गए। उन्होंने बताया कि 11 मई को उनकी पंजाब किंग्स क्रिकेट टीम का महत्वपूर्ण मुकाबला है और वह टीम की जीत के लिए अरदास करने पहुंची हैं। उन्होंने विश्वास जताया कि वाहेगुरु जी की कृपा से उनकी टीम शानदार प्रदर्शन करेगी और सभी मैच जीतने का प्रयास करेगी और प्लेऑफ में पहुंचेगी। इस दौरान उन्होंने टीम के कप्तान श्रेयस अय्यर का जिक्र करते हुए कहा कि पंजाब के लोग उन्हें प्यार से सरपंच बुलाते हैं, जो टीम के लिए गर्व की बात है। प्रीति जिंटा ने पंजाब के युवाओं और क्रिकेट प्रेमियों का धन्यवाद करते हुए कहा कि टीम को लोगों से भरपूर प्यार और समर्थन मिल रहा है। उन्होंने कहा कि यही प्यार खिलाड़ियों का मनोबल बढ़ाता है और टीम की सबसे बड़ी ताकत है। प्रीति की टीम का टूर्नामेंट में अब तक प्रदर्शन इन समीकरणों से प्लेऑफ में बना सकती है जगह हालांकि, अब भी टीम प्लेऑफ की रेस में बनी हुई है। आईपीएल 2026 के ताजा समीकरणों के अनुसार, पंजाब किंग्स (PBKS) की स्थिति काफी मजबूत है। फिर भी टीम को प्लेऑफ में अपनी जगह पक्की करने के लिए आगे भी बढ़िया प्रदर्शन करना होगा। पंजाब टीम यदि बाकी बचे अपने सभी 4 मुकाबले जीतती है तो वह पॉइंट टेबल में टॉप भी कर सकती है। इससे उसे क्लालीफायर खेलकर फाइनल में पहुंचने के 2 अवसर मिलेंगे। जबकि, यदि टीम कम से कम 2 मैच और जीत ले तो 17 अंकों के साथ भी टॉप-4 में निश्चित रूप से अपनी जगह पक्की कर लेगी। टीम अगले 4 मैचों में से केवल 1 मैच जीतकर भी 15 अंकों के साथ प्लेऑफ में प्रवेश कर सकती है, लेकिन तब टीम को नेट रन रेट (NRR) और दूसरी टीमों (जैसे RCB, RR, GT) के मैचों के नतीजों पर डिपेंड रहने पड़ेगा।

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Eurovision winner Dara arrives to screaming fans in Bulgaria

The 27-year-old's tune Bangaranga won Bulgaria its first ever title in the song contest.

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Eurovision winner Dara arrives to screaming fans in Bulgaria

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Melsonby Hoard exhibition opens at Yorkshire Museum

The largest Iron Age hoard of metalwork ever found in the UK is going on display at the Yorkshire Museum. Chariots, Treasure and Power: Secrets of the Melsonby Hoard will feature of selection of objects amounting to around 20% of the 800+ objects in the Melsonby Hoard, including weapons, cauldrons, chariot and horse fittings. The star of the show will be “The Block,” an extraordinary mass of 88 artifacts fused together by corrosion materials more than three feet wide and weighing 150kg (331lb) that is being preserved as it is.

The first objects were discovered by a metal detectorist in field near Melsonby in December 2021. Archaeologists from the University of Durham followed up with an excavation of the find site and uncovered two distinct deposits: one massive group of Iron Age metalwork, and nearby a second smaller one of the same materials that had been deliberately destroyed, wrapped in cloth and placed in a separate ditch 2.000 years ago. Both were closely packed with objects fused together. The second had formed a concreted mass and had to be removed in a single block for excavation in the conservation laboratory at Durham University.

Between the on-site excavation and the micro-excavation in the laboratory, archaeologists spend months recovering individual items and cleaning the fused mass that would become known as The Block. They found the remains of dozens of wheeled vehicles, from iron tires to horse harnesses to bridle bits, two large drinking vessels decorated with fish motifs, coral studs and masks of human faces. More than 800 individual objects, in the final tally.

When the excavation was complete, the hoard was assessed by a committee of the British Museum which determined its market value was £254,000 ($328,000). Last year, the York Museums Trust launched a fundraising campaign to secure the hoard for the Yorkshire Museum near where it was found. More than 1,000 people contributed to the crowdfunding initiative raising £54,000. The National Heritage Memorial Fund contributed £192,096 and other institutions pitched up to reach the final goal.

In September 2025, the hoard was moved from Durham University to the Yorkshire Museum. It was a major challenge, requiring specialist movers and customized vehicles and crates to keep the delicate artifacts safe in transportation. The museum created a custom storage facility to house the hoard safely with climate-controlled extra dry air to prevent further corrosion.

Fourteen months after the fundraiser was launched, the Yorkshire Museum’s landmark exhibition of the Melsonby Hoard has opened to visitors.

The size and value of the collection suggests an “amount of wealth” which could only have belonged to a “someone very important”, [Emily North, curator of archaeology at the Yorkshire Museum,] told journalists at a briefing ahead of the public opening.

Items include a mirror and blue glass beads, commonly associated with female power in the Iron Age.

“What we could be looking at are the belongings of a queen.”

The exhibition demonstrates the “incredibly rich” culture of the Brigante tribe which ruled the region. The Brigantes were a Celtic people who attempted to stave off the approaching Roman army at Stanwick St John, near Melsonby.

The exhibition also features a wine-mixing bowl, typically found 2,000 years ago in the Mediterranean, likely to have been brought back to Britain.

“It gives us a hint of how interconnected Iron Age people in North Yorkshire were,” North said.



* This article was originally published here

डेथ एनिवर्सरीःगहने गिरवी रख प्रकाश मेहरा ने बनाई जंजीर:फ्लॉप अमिताभ को लिया तो डिस्ट्रीब्यूटर बोले- ये लंबा-बेवकूफ कौन, नशे में कहा- मैंने तुम्हें स्टार बनाया

70 के दशक की बात है। रोमांस का दौर था और हिंदी सिनेमा के सुपरस्टार थे दिलीप कुमार। धर्मेंद्र उस दौर में ‘मेरा गांव मेरा देश’(1971), ‘सीता और गीता’(1972) जैसी बेहतरीन फिल्मों से खुद को फिल्म इंडस्ट्री में स्थापित कर चुके थे। समय के साथ वो फिल्में बनाने में दिलचस्पी लेने लगे। कोई भी स्क्रिप्ट अच्छी लगती थी, तो झट से खरीद लेते। सीता और गीता में काम करते हुए धर्मेंद्र ने उस फिल्म की राइटर जोड़ी सलीम-जावेद की एक कहानी सुनी। नाम था ‘जंजीर’। सलीम-जावेद तब ‘अंदाज’ (1971) और ‘हाथी मेरे साथी’ (1971) जैसी फिल्में लिख चुके थे। कहानी पसंद आने पर धर्मेंद्र ने जंजीर की स्क्रिप्ट झट से खरीद ली। समय के साथ वो दूसरी फिल्मों में व्यस्त हो गए। एक रोज उनकी मुलाकात हसीना मान जाएगी, आन बान जैसी जुबली हिट डायरेक्ट करने वाले प्रकाश मेहरा से हुई। वो प्रोडक्शन में कदम रखने वाले थे। उन्होंने धर्मेंद्र से कहा कि वो फिल्म ‘समाधि’ बना रहे हैं, हीरो का डबल रोल होगा। धर्मेंद्र ने दिलचस्पी दिखाई और कहानी सुनी। उन्हें वो स्क्रिप्ट इतनी पसंद आई कि वो झट से इसे करने के लिए मान गए, लेकिन फिर एक डील हुई। धर्मेंद्र ने प्रकाश मेहरा से ‘समाधि’ की स्क्रिप्ट खरीद ली और बदले में 3500 रुपए लेकर जंजीर की स्क्रिप्ट थमा दी, जो सलीम-जावेद ने उन्हें दी थी। और इस तरह जंजीर की स्क्रिप्ट पहुंचीं प्रकाश मेहरा के पास। वो जंजीर, जिसने प्रकाश मेहरा को सबसे बड़ा डायरेक्टर, फ्लॉप-मनहूस एक्टर अमिताभ बच्चन को स्टार और सलीम-जावेद को इतिहास रचने वाली राइटर जोड़ी का दर्जा दिलाया। पत्नी के गहने बेचकर इस फिल्म को रूप देने वाले प्रकाश मेहरा को गुजरे आज 17 साल हो गए। डेथ एनिवर्सरी के मौके पर जानिए कैसे एक फिल्म और कई संयोंग ने उन्हें बनाया हिंदी सिनेमा का आला फिल्मकार- प्रकाश मेहरा ने धर्मेंद्र और मुमताज के साथ फिल्म जंजीर अनाउंस की। इसी समय प्रकाश मेहरा ने राइटर के.नारायण से ‘कहानी किस्मत की’ फिल्म की स्क्रिप्ट खरीदी। धर्मेंद्र को ये कहानी भी पसंद आई। उन्होंने प्रकाश मेहरा से कहा, ‘अगर आप कहानी किस्मत की फिल्म की स्क्रिप्ट डायरेक्टर अर्जुन हिंगोरानी (धर्मेंद्र को पहली फिल्म देने वाले) को दे देंगे, तो वो आपकी जंजीर बनाने में काफी मदद कर सकते हैं।’ प्रकाश मेहरा को ये ऑफर पसंद नहीं आया। वो पहले ही ‘समाधि’ की कहानी धर्मेंद्र को दे चुके थे, अब एक और फिल्म किसी और को देना उन्हें मुनासिब नहीं लगा। उन्होंने साफ इनकार कर दिया। धर्मेंद्र को ये बात थोड़ी खटकी। कुछ दिन बीते ही थे कि धर्मेंद्र ने अपने भाई की फिल्म शुरू कर दी। जंजीर के लिए डेट्स मांगी गई तो धर्मेंद्र ने साफ कहा- ‘पहले मैं अपने भाई की फिल्म का आधा शेड्यूल करूंगा और फिर जंजीर की शूटिंग शुरू करूंगा।’ प्रकाश मेहरा इतना लंबा इंतजार नहीं करना चाहते थे। धर्मेंद्र ने इस बारे में सोचने का समय लिया, लेकिन फिर फिल्म छोड़ दी। धर्मेंद्र के इनकार के बाद प्रकाश मेहरा देव आनंद के पास गए। उन्हें लगा कि फिल्म में एक्शन-ही-एक्शन है और गाने कम। उन्होंने प्रकाश मेहरा को सुझाव दिया- ‘क्यों न तुम फिल्म में कुछ और गाने डालो’। बातचीत के बीच देव आनंद ने कहा- ‘अगर मैं अपने होम प्रोडक्शन नव निकेतन के बैनर तले ये फिल्म बनाऊं तो तुम कितने पैसे लोगे?’ प्रकाश मेहरा ये स्क्रिप्ट छोड़ना नहीं चाहते थे। उन्होंने देव आनंद का ऑफर झट से ठुकरा दिया। हीरो की तलाश जारी रही। अब प्रकाश मेहरा, राजकुमार के पास गए। वो तब मद्रास में एक फिल्म शूट कर रहे थे। उन्हें ‘जंजीर’ इतनी पसंद आई कि उन्होंने कहा कि वो कल से ही फिल्म की शूटिंग करने के लिए तैयार हैं, बशर्ते शूटिंग मद्रास में ही हो, जिससे वो दूसरी फिल्म भी शूट कर सकें। ये मुमकिन नहीं था, क्योंकि कहानी बॉम्बे की थी। बात इस बार भी नहीं बनी। राजेश खन्ना, दिलीप कुमार ने भी एक्शन फिल्म करने से इनकार कर दिया। प्रकाश मेहरा बार-बार मिल रहे रिजेक्शन से परेशान हो गए। जावेद अख्तर ने दैनिक भास्कर को दिए पुराने इंटरव्यू में कहा था- फिल्म इंडस्ट्री में अगर एक -दो बड़े स्टार्स ने फिल्म की स्क्रिप्ट को ना कह दिया तो प्रोड्यूसर्स को लगता है कि स्क्रिप्ट खराब है और वो उसे छोड़ देते थे, लेकिन इस इंसान की न जाने क्या धारणा थी जो इन्होंने फिल्म नहीं छोड़ी। वो भी तब जब बड़े स्टार्स ने इसे करने से इनकार कर दिया था। एक दिन प्राण, प्रकाश मेहरा से मिलने पहुंचे और परेशान देख कहा- ‘तुम अमिताभ को ट्राय क्यों नहीं करते? बॉम्बे टू गोवा में देखने के बाद मुझे लगता है कि वो भविष्य में स्टार बनेगा। आपको भी वो फिल्म जरूर देखनी चाहिए।’ प्रकाश मेहरा ने ये बात अनसुनी कर दी। उस समय अमिताभ बच्चन एक फ्लॉप हीरो थे। अमिताभ 30 साल के थे और तब उनकी एक-एक कर 12 फिल्में फ्लॉप हो गईं। हर कोई उन्हें फिल्मों में लेने से कतराने लगा था। कुछ दिन बीते तो सलीम-जावेद भी उनसे मिलने पहुंचे। उन्होंने भी प्रकाश मेहरा के सामने अमिताभ का नाम सुझाया और कहा- ‘इस लड़के में वो बात है, जो जंजीर में विजय खन्ना बनने के लिए परफेक्ट हैं।' सलीम-जावेद ने भी प्रकाश मेहरा के सामने फिल्म बॉम्बे टू गोवा के उस फाइट सीन का जिक्र किया, जिसमें अमिताभ बच्चन च्विंगम खाते हुए गुंडों की पिटाई कर रहे थे। सबके सुझाव पर प्रकाश मेहरा ने फिल्म बॉम्बे टू गोवा देखी। एक सीन में अमिताभ बच्चन को देखते ही प्रकाश मेहरा जोर से चिल्लाए- ‘जंजीर का हीरो मिल गया।’ प्रकाश मेहरा ने अमिताभ को फिल्म ऑफर की, तो वो माने, जरूर लेकिन ये भी कहा कि अगर जंजीर नहीं चली तो मैं फिल्म इंडस्ट्री और बॉम्बे छोड़कर इलाहाबाद चला जाऊंगा। प्रकाश मेहरा को सलीम-जावेद की इस कहानी पर काफी भरोसा था। उन्होंने आश्वासन दिया कि ये फ्लॉप नहीं होगी। हीरो की कास्टिंग के बाद अब बारी थी हीरोइन की। फिल्म मुमताज के साथ अनाउंस हुई थी, लेकिन उन्होंने शादी के लिए फिल्म इंडस्ट्री छोड़ दी। बाद में कुछ और हीरोइनों ने ये कहकर फिल्म ठुकरा दी कि वो अमिताभ जैसे फ्लॉप एक्टर के साथ काम नहीं करेंगी। एक दिन अमिताभ ने जया भादुड़ी से कहा कि कोई भी हीरोइन उनके साथ काम करने के लिए राजी नहीं है। उस समय दोनों रिलेशनशिप में थे। अमिताभ बच्चन की निराशा देख जया ने कहा- ‘अगर प्रकाश मेहरा कहें, तो मैं फिल्म करने के लिए तैयार हूं।’ अमिताभ ये बात लेकर प्रकाश मेहरा के पास पहुंचे और बात बन गई। 1973 में ये फिल्म बनकर तैयार हो गई, लेकिन जब प्रकाश मेहरा ने डिस्ट्रीब्यूटर्स को फिल्म दिखाई, तो उन्होंने अमिताभ बच्चन को देख मजाक उड़ाते हुए कहा- ‘ये लंबा बेवकूफ हीरो कौन है।’ अमिताभ बच्चन को ये बात काफी बुरी लगी। बिग बी तब प्रकाश मेहरा को लल्ला कहते थे, जो इलाहाबाद में भाई को कहा जाता ता। एक दिन उन्होंने कहा, ‘लल्ला मैं नहीं जानता कि इस फिल्म के बाद मेरा भविष्य क्या होगा?’ जवाब मिला, ‘स्वार्थी मत बनो, मेरे बारे में सोचो। अगर कुछ भी गड़बड़ हुई तो मैं सब कुछ गंवा दूंगा।’ वाकई प्रकाश मेहरा ने इस फिल्म में अपना सब कुछ लगा दिया। हर एक जमापूंजी। यहां तक कि उन्होंने पत्नी के सारे जेवर भी गिरवी रख दिए थे। लंबे स्ट्रगल के बाद जंजीर को डिस्ट्रीब्यूटर्स मिले, लेकिन रिलीज होने से पहले ही डायरेक्टर प्रकाश मेहरा और राइटर जोड़ी सलीम-जावेद के बीच क्रेडिट की मजेदार जंग शुरू हो गई। दरअसल, सलीम जावेद को अपनी लिखी कहानी पर पूरा भरोसा था। उनका मानना था कि अगर फिल्म की कहानी अच्छी हो, तो उसे हिट होने से कोई रोक नहीं सकता, लेकिन अगर कोई फिल्म हिट होती है, तो उसका क्रेडिट राइटर्स को भी जरूर मिलना चाहिए। एक दिन राइटर सलीम खान, प्रकाश मेहरा के पास पहुंचे और कहा- ‘हमारे नाम भी जंजीर के पोस्टर में होने चाहिए।’ प्रकाश मेहरा ने हैरानी जताते हुए कहा- ‘राइटर्स के नाम? ऐसा कभी होता है क्या?’ वाकई हिंदी सिनेमा के इतिहास में किसी भी फिल्म के पोस्टर में उस समय तक कभी किसी राइटर का नाम नहीं लिखा गया था, लेकिन सलीम-जावेद ये रीत बदलने पर अड़े थे। देखते-ही-देखते फिल्म रिलीज की तारीख पास आ गई और बॉम्बे में पोस्टर लगा दिए गए। एक दिन सलीम खान ने काफी शराब पी और जे.पी.सिप्पी के प्रोडक्शन हाउस में काम करने वाले लड़के को कॉल कर जीप और पेंटिंग के सामान का इंतजाम करने को कहा। वो लड़का जैसे ही पहुंचा, सलीम खान ने उससे कहा- ‘जाओ, शहर में जंजीर के जितने भी पोस्टर लिखे हैं, उनके ऊपर जाकर लिख दो, रिटन बाय सलीम-जावेद।’ उस लड़के ने ठीक वैसा ही किया। अगली सुबह जुहू से ओपेरा हाउस तक के हर पोस्टर में जया और प्राण नाथ के माथे पर अलग से पोते गए सलीम-जावेद के नाम थे। फिल्म इंडस्ट्री में इसकी जमकर चर्चा हुई, लेकिन फिर प्रकाश मेहरा ने उनकी जिद के आगे घुटने टेक दिए। उन्होंने जंजीर के नए पोस्टर बनवाए, जिसमें हिंदी सिनेमा के इतिहास में पहली बार राइटर के नाम शामिल किए गए। फिल्म के कोलकाता प्रीमियर कोलकाता में कई बड़ी हस्तियां पहुंचीं। प्रीमियर खत्म होते ही वहां मौजूद हर कोई प्राण के पास जाकर उनके अभिनय की तारीफ करने लगा और अमिताभ नजरअंदाज हो गए। ये देख अमिताभ बच्चन की आंखों में आंसू आ गए। प्रकाश मेहरा ने ये देखा, तो पास आकर कहा- ‘तुम चिंता मत करो, एक बार फिल्म रिलीज होने दो, फिर देखना, जो लोग आज प्राण-प्राण कर रहे हैं, वो कैसे अमिताभ-अमिताभ करेंगे।’ 11 मई 1973 फ्लॉप हीरो अमिताभ बच्चन और जया बच्चन स्टारर, प्रकाश मेहरा द्वारा डायरेक्ट और प्रोड्यूस की हुई फिल्म जंजीर रिलीज हुई। कोलकाता में फिल्म ने ठीक-ठाक कमाई की, लेकिन बॉम्बे में थिएटर खाली-खाली रहे। अमिताभ बच्चन ने इलाहाबाद लौटने की तैयारी कर ली। निराशा इतनी हुई कि उन्हें तेज बुखार हो गया। फिल्म रिलीज हुए 4 दिन बीत गए और प्रकाश मेहरा ने रोज-रोज फिल्म की खबर लेना भी बंद कर दिया। एक दिन मुंबई के गेएटी गैलेक्सी सिनेमा हॉल के बाहर से गुजरते हुए उन्होंने देखा कि टिकट विंडो के बाहर काफी भीड़ लगी है। आज से पहले तक वहां कभी इतनी भीड़ नहीं लगी थी। वो पास गए, तो वहां जंजीर लगी थी। फिल्म देखने वालों की भीड़ इतनी थी कि उन्हें टिकट भी नहीं मिल रही थी। तब भी लोग 5 रुपए की टिकट 100-100 रुपए में खरीदने के लिए झगड़ रहे थे। फिल्म जंजीर चल निकली थी। फिल्म के गाने ‘यारी है ईमान मेरा, यार मेरी जिंदगी…’ और ‘दीवाने हैं, दीवानों को न घर चाहिए…’ काफी हिट रहे। हर जगह बस फिल्म की ही चर्चा थी। प्रकाश मेहरा ने तुरंत अमिताभ को कॉल कर ये खबर दी, उन्हें लगा ये सुनकर उनकी तबीयत ठीक हो जाएगी, लेकिन हुआ इसका उल्टा। अमिताभ बच्चन को ये सुनते ही 104 डिग्री बुखार हो गया। एक हफ्ते में अमिताभ बच्चन स्टार बन चुके थे। उनके हुए डायलॉग- ‘जब तक बैठने को न कहा जाए, शराफत से खड़े रहो, ये पुलिस स्टेशन है, तुम्हारे बाप का घर नहीं….’, हर किसी की जुबान पर था और अमिताभ बच्चन फ्लॉप एक्टर से बन गए एंग्री यंग मैन। प्रकाश मेहरा, अमिताभ बच्चन, सलीम-जावेद, चारों को फिल्म का फायदा मिला। प्रकाश मेहरा को अमिताभ का काम ऐसा पसंद आया कि आगे उन्होंने ‘हेरा फेरी’, ‘खून पसीना’, ‘मुकद्दर का सिकंदर’, ‘लावारिस’, ‘नमक हलाल’ और ‘शराबी’ जैसी 6 फिल्में अमिताभ बच्चन के साथ बनाईं। तब कहा जाता था कि जिस फिल्म में प्रकाश मेहरा अमिताभ बच्चन को लें, उसका हिट होना तय है, लेकिन ये भ्रम फिल्म ‘जादूगर’ (1989) से टूट गया, जो प्रकाश मेहरा ने तत्कालीन प्राइम मिनिस्टर इंदिरा गांधी के कहने पर बनाई थी। दरअसल, 5 हिट फिल्मों के बाद प्रकाश मेहरा अमिताभ के साथ फिल्म जादूगर बनाना चाहते थे, लेकिन बैक-टु-बैक फिल्में कर रहे अमिताभ के पास समय नहीं था। इसी बीच अमिताभ ने प्रकाश मेहरा के सबसे बड़े कॉम्पिटिटर मनमोहन देसाई के साथ कुछ फिल्में कीं। मर्द, अमर अकबर एंथोनी, नसीब और कूली बनाने वाले मनमोहन देसाई और प्रकाश मेहरा का झगड़ा जगजाहिर था। दोनों इंटरव्यूज में एक दूसरे को फिल्मों के नाम से ताने देते थे। मनमोहन देसाई ने एक इंटरव्यू में कहा- ‘एक शराबी ही शराबी जैसी फिल्म बना सकता है, और मर्द ही मर्द जैसी फिल्में बनाते हैं।’ प्रकाश मेहरा ने जवाब दिया- ‘एक कुली ही इतने नीचे गिरकर ऐसी बात कर सकता है।’ इस कॉम्पिटिशन का असर बिग बी पर भी पड़ा, क्योंकि वो दोनों की फिल्में कर रहे थे। लेकिन एक गलतफहमी से प्रकाश मेहरा के जहन में बिग बी के लिए शक पैदा हो गया। उन्हें लगा कि स्टार बनने के बाद वो उन्हें समय नहीं दे रहे। 1987 में प्रकाश मेहरा एक पार्टी में पहुंचे। उन्होंने जमकर शराब पी। नशा होते ही वो अमिताभ बच्चन के पास पहुंचे और चिल्लाकर कहा- 'मैंने तुम्हें स्टार बनाया और अब तुम्हारे पास मेरे लिए ही टाइम नहीं। तुम मुझे भूल जाओ, मेरी फिल्म भूल जाओ, लेकिन ये मत भूलना कि जब तुम्हें कोई पूछता नहीं था, तब मैंन तुम्हें जंजीर से उठाया। एंग्री यंग मैन बनाया।' अमिताभ खामोश खड़े सुनते रहे। बात वहीं खत्म हो गई। अगले दिन अमिताभ ने प्रकाश मेहरा को कॉल कर कहा, ‘आपको ऐसा क्यों लगा कि मैं आपकी फिल्म नहीं करना चाहता। इस बार प्रकाश मेहरा खामोश रहे। आगे अमिताभ ने कहा- आप अपनी फिल्म के लिए डेट्स ले लीजिए।’ अनबन वहीं खत्म हो गई, लेकिन फिर प्रकाश मेहरा ने जादूगर बनाने का आइडिया ड्रॉप कर दिया। वाइल्ड फिल्म्स इंडिया को दिए इंटरव्यू में प्रकाश मेहरा ने स्वीकार किया था कि अमिताभ बच्चन से उनकी अनबन थी। उन्होंने ये भी कहा कि फिल्म जादूगर को चुनना उनकी बदकिस्मती थी। एक दिन यशवंतराव चौहान हॉल में इंदिरा गांधी एक प्रोग्राम में आई थीं,अमिताभ बच्चन के गांधी परिवार से करीब के रिश्ते थे, तो वो भी पहुंचे और प्रकाश मेहरा भी आए। वहां इंदिरा गांधी ने कहा कि फिल्म इंडस्ट्री को जिम्मेदारी लेकर अंधविश्वास कम करने के लिए फिल्में बनानी चाहिए। इंदिरा गांधी की बात सुनकर अमिताभ बच्चन ने प्रकाश मेहरा ने कहा, ‘देखो अपने बीच जो भी बात हुई उसे भूल जाओ।’ फिल्म बननी शुरू हुई, जो एक फर्जी बाबा को एक्सपोज करने की कहानी थी। शूटिंग चल ही रही थी कि एक दिन एक आदमी ने प्रकाश मेहरा की कार की डिग्गी में 50 लाख रुपए से भरी पेटी रख दी। कुछ देर बाद एक बाबा उनके पास आए और कहा ये 50 लाख रख लो, लेकिन ये फिल्म मत बनाओ। प्रकाश मेहरा ने इनकार कर दिया। फिल्म 1989 में रिलीज हुई और बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप रही। प्रकाश मेहरा क्रिएटिव, मस्ती-मजाक करने वाले शख्स थे, लेकिन सेट पर बेहद सख्त मिजाज थे। यही वजह रही कि वो फिल्म ‘लावारिस’ से राखी को निकालने वाले थे। इस फिल्म में परवीन बाबी को अमिताभ के साथ कास्ट किया गया था। परवीन बाबी की मानसिक हालत से सेट का माहौल बिगड़ने लगा, तो उन्हें हटाकर जीनत अमान की कास्टिंग की गई। राखी ने फिल्म में अमिताभ बच्चन की मां का रोल निभाया। एक दिन सेट पर अमजद खान तैयार बैठे, लेकिन राखी नहीं पहुंचीं। कई घंटे बीते, कई कॉल भी किए गए, लेकिन जवाब नहीं मिला। प्रकाश मेहरा शूटिंग रुकने से भड़क गए। उन्होंने टीम से कहा, ‘आखिरी बार कॉल करो, उठे तो ठीक वरना आज पैकअप कर, कल नई हीरोइन के साथ शूट करेंगे।’ खुशकिस्मती से राखी ने कॉल उठाकर कहा कि उनकी बेटी बीमार है। ये सुनकर प्रकाश मेहरा का गुस्सा शांत हो गया। एक नजर प्रकाश मेहरा के करियर पर- 13 जुलाई 1939 को प्रकाश मेहरा का जन्म उत्तर प्रदेश के बिजनौर में हुआ। जन्म के ठीक बाद मां का निधन हो गया। पिता ने भी संन्यास ले लिया और नवजात प्रकाश को उनके नाना-नानी के पास छोड़ गए। रेडियो सुनते हुए उन्हें म्यूजिक कंपोजर बनने की ठानी और नाना से 13 रुपए चुराकर मुंबई आ गए। फिल्म इंडस्ट्री में काम नहीं मिला तो वो गुजारे के लिए सैलून में काम करने लगे। लंबी जद्दोजहद के बाद उन्हें 1962 की फिल्म प्रोफेसर में प्रोडक्शन कंट्रोलर का काम मिला। आगे उन्होंने 1965 की मीना कुमारी स्टारर फिल्म पूर्णिमा में असिस्टेंट डायरेक्टर का काम किया। साथ ही फिल्म का एक गाना भी लिखा। दो सालों में ही हुनर परखने के बाद उन्होंने 1968 की हसीना मान जाएगी से बतौर डायरेक्टर फिल्म बनाई, जो जुबली हिट रही। आगे उन्होंने मेला, समाधि और आन-बान जैसी फिल्में भी बनाईं, जो सभी जुबली हिट रहीं। आगे उन्होंने जंजीर से बतौर प्रोड्यूसर करियर की दूसरी पारी शुरू की और शराबी, लावारिस, मुकद्दर का सिकंदर जैसी कई हिट फिल्में बनाईं। जादूगर फ्लॉप होने के बाद उनकी जिंदगी एक जुआं, दलाल और बाल ब्रह्मचारी जैसी फिल्में एवरेज रहीं। प्रकाश मेहरा ने फिल्मी करियर में कई गाने भी लिखे और साथ ही चमेली की शादी की स्क्रिप्ट में भी उनकी भागीदारी रही। उनके डायरेक्शन और प्रोडक्शन की आखिरी फिल्म मुझे मेरी बीवी से बचाओ (2001) रही। उन्हें प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन की तरफ से दो बार लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड दिया गया। 17 मई 2009 में उनका 69 साल की उम्र में मल्टीपल ऑर्गन फैल्योर से निधन हो गया। ……………………………………………………………………………………. फिल्मी हस्तियों से जुड़ी ये स्टोरीज भी पढ़ें- विजय का लेडी लक, जिसके बर्थडे पर चुनाव जीते: तमिलनाडु का रिजल्ट आते ही विजय के घर पहुंचीं तृषा, एक्टर का हो चुका तलाक तमिलनाडु चुनाव में थलापति विजय की पार्टी TVK की जीत में उनकी 'लेडी लक' तृषा कृष्णन को अहम माना जा रहा है। 4 मई को 'लेडी लक' एक्ट्रेस तृषा कृष्णन का जन्मदिन था, जिनका नाम विजय से जुड़ता रहा है। तृषा तमिलनाडु चुनाव का रिजल्ट आने से पहले तिरुमाला मंदिर पहुंचीं, दर्शन किए और फिर विजय के घर पहुंचीं। 51 साल के विजय आज तमिल फिल्मों के सबसे बड़े स्टार हैं तो तृषा कृष्णन क्वीन ऑफ साउथ इंडिया कही जाती हैं। दोनों करीब 5 फिल्मों में साथ नजर आए हैं, जिनमें से 2023 में रिलीज सुपरहिट फिल्म लियो भी शामिल है। यह वही वक्त था जब विजय की पत्नी संगीता सोर्नालिंगम तलाक के लिए कोर्ट में लड़ाई लड़ रही थीं। पूरी खबर पढ़िए… पुण्यतिथि: ऋषि कपूर को सलमान के पिता ने धमकाया:राज कपूर ने सिगरेट पीने पर पीटा, दाऊद के साथ चाय पी, कभी अमिताभ का अवॉर्ड खरीदा 30 अप्रैल 2020, 6 साल पहले सुबह खबर आई कि ऋषि कपूर अब नहीं रहे। कुछ दिन पहले तक वो गंभीर हालत होने के बावजूद हॉस्पिटल स्टाफ को हंसाते तो कभी गाना सुना रहे थे। दैनिक भास्कर से बात करते हुए ऋषि कपूर की इकलौती बेटी रिद्धिमा कहती हैं, ‘सब अचानक हुआ, वो बहुत डरावना दिन था। अचानक एक खालीपन आ गया। एक सूनापन, उनकी जिंदगी उनकी मौजूदगी लार्जर देन लाइफ थी।’ पूरी स्टोरी पढ़ें… ………………………………………………. विनोद खन्ना की पुण्यतिथि, पिता ने पिस्तौल तानी:अमिताभ ने फेंका ग्लास, तो टांके आए: महेश भट्ट को धमकाया, आखिरी ख्वाहिश थी- पाकिस्तान जाना लंबी कद-काठी, गोरी रंगत और गहरी आंखें। 18 साल की उम्र में कॉलेज के दिनों में कई लड़कियां विनोद खन्ना के लुक की तारीफ करती नहीं थकती थीं। सबका एक ही सुझाव था, ‘हीरो जैसे लगते हो, फिल्मों में जाओ’, लेकिन विनोद के पिता चाहते थे कि बेटा पढ़ाई पूरी कर खानदानी टेक्सटाइल बिजनेस संभाले। विनोद का बागी रवैया तभी शुरू हो गया था, जब उन्होंने पिता के कहने पर कॉमर्स के बजाय साइंस चुना। एक रोज उनकी कॉलेज पार्टी में कुछ फिल्मी हस्तियां पहुंचीं, जिनमें उस दौर के नामी हीरो सुनील दत्त और उनकी दोस्त अंजू महेंद्रू भी थीं। वो देखना चाहते थे कि टीनएजर्स किस तरह पार्टी करते थे। पूरी खबर पढ़ें…

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