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भूत बंगला में कॉमेडी-हॉरर का नया अनुभव देंगे अक्षय:प्रियदर्शन बोले- कहानी कई बार लिखी गई; वामिका ने कहा- फिल्म ने शांत रहना और काम एंजॉय करना सिखाया

फिल्म ‘भूत बंगला’ को लेकर स्टारकास्ट और डायरेक्टर ने खुलकर बातचीत की, जिसमें इसके आइडिया, शूटिंग अनुभव और कॉमेडी-हॉरर के संतुलन पर चर्चा हुई। डायरेक्टर प्रियदर्शन ने बताया कि कहानी को कई बार री-राइट कर इसे एक परफेक्ट एंटरटेनर बनाया गया, जबकि अक्षय कुमार ने फिल्म में लॉजिक और रियल अप्रोच पर जोर दिया। वामिका गब्बी ने कहा कि इस फिल्म ने उन्हें शांत रहकर काम को एंजॉय करना सिखाया। शूटिंग के दौरान के दिलचस्प किस्से और प्रैंक्स भी सामने आए। साथ ही, आज के दौर में कॉमेडी, ओटीटी, जेन जी ऑडियंस और एआई के बढ़ते प्रभाव पर भी अपनी राय रखी। फिल्म को अलग ट्रीटमेंट और फ्रेश एक्सपीरियंस देने का दावा किया गया है। पेश है फिल्म की स्टारकास्ट और डायरेक्टर से हुई बातचीत के कुछ प्रमुख अंश.. ‘भूत बंगला’ का आइडिया कैसे आया और ऐसा क्या है इसमें जो यह दर्शकों को एक नयापन देगी? प्रियदर्शन– भूत बंगला का आइडिया मुझे प्रोड्यूसर की तरफ से मिला था। उन्होंने एक स्टोरीलाइन भेजी थी, जो मुझे काफी दिलचस्प लगी। जब मैंने उसे सुना, तो लगा कि इसमें एक बहुत अच्छा प्लॉट है और इसे आगे डेवलप किया जा सकता है। इसके बाद हमने कहानी पर बार-बार काम किया, उसे री-राइट किया, क्योंकि हमारा मकसद था कि यह फिल्म एक पूरी तरह से एंटरटेनर बने। जिसमें भरपूर कॉमेडी भी हो और हॉरर भी। ये बैलेंस बनाना आसान नहीं होता, लेकिन हमने इसे हासिल करने की कोशिश की। अक्षय–एकता ने यह आइडिया मुझे सुनाया, फिर हमने इसे प्रियंक सर को सुनाया और आगे मिलकर इसे डेवलप किया। इसके बाद कहानी को एक अलग तरीके से ट्रीट किया गया। इसमें कॉमेडी, हॉरर और सबसे जरूरी, लॉजिक जोड़ा गया। हमने खास तौर पर ध्यान रखा कि फिल्म में लॉजिक मजबूत रहे। इसी प्रक्रिया के बाद यह फिल्म तैयार हुई। शूटिंग के दौरान क्या कभी डर लगा, कोई वाकया सेट का? अक्षय–सेट पर हमें कभी डर नहीं लगा, क्योंकि वहां असल में कोई भूत-वूत नहीं था। लेकिन एक दिलचस्प इंसिडेंट जरूर याद आता है, जो मैं आपसे शेयर करना चाहूंगा। मड आइलैंड में एक बहुत बड़ा बंगला है, जहां मैंने कई बार शूटिंग की है। हालांकि, लोग वहां रात में शूटिंग करने से बचते हैं। मैं बंगले का नाम नहीं लेना चाहूंगा, लेकिन उसके बारे में यह मशहूर था कि वहां रात को ‘भूत’ दिखाई देता है। कई लोगों ने उसे देखने का दावा भी किया था—यहां तक कि वहां के केयरटेकर ने भी कहा था कि उसने कई बार उसे देखा है। इसी वजह से वहां शूटिंग जल्दी खत्म कर दी जाती थी। आमतौर पर रात 1 बजे तक पैकअप हो जाता था और उसके बाद कोई भी बाहर नहीं निकलता था। उस बंगले के बारे में इतना डर फैल गया था कि उसका मालिक भी उसे बेच नहीं पा रहा था। सालों तक वह बंगला बिक ही नहीं पाया लेकिन कुछ साल पहले सच्चाई सामने आई, जो काफी हैरान करने वाली थी। दरअसल, वही केयरटेकर खुद ‘भूत’ बनकर लोगों को डराता था। वह नहीं चाहता था कि बंगला बिके, क्योंकि वह खुद वहीं रहना चाहता था। इसलिए वह रात में साड़ी पहनकर इधर-उधर घूमता था और लोगों को डराता था, जिससे इलाके में यह बात फैल गई कि वहां सच में भूत है। इस तरह उसने करीब 26–27 साल तक लोगों को भ्रम में रखा और बंगले को बिकने नहीं दिया। सच में, यह उसकी एक बहुत ही चालाकी भरी योजना थी।” वामिका–मेरे लिए यही हैं (अक्षय) सबसे बड़े प्रैंकस्टर। सेट पर एक दिन मेरे डैड आए थे। मुझे हार्नेस में शॉट देना था और जैसे ही एक्शन हुआ अक्षय ने मुझे अचानक छोड़ दिया। मैं हवा में लटक गई। मुझे नहीं पता था यह होने वाला है तो मैं तो बहुत डर गई थी। बाद में पता चला कि इस प्रैंक में खुद डैड शामिल थे और वीडियो बना रहे थे। ऐसी फिल्मों में हॉरर और कॉमेडी दोनों की टाइमिंग मेंटेन करना बड़ा चैलेंज होता है? प्रियदर्शन– नहीं, ऐसा बिल्कुल नहीं है कि हम पहले से तय करते हैं कि फिल्म में कितनी कॉमेडी होगी और कितना हॉरर। अगर आपने भूल-भुलैया देखी है, तो वह भी हॉरर और कॉमेडी का ही एक बेहतरीन कॉम्बिनेशन है। असल में इसमें कोई फिक्स टाइमिंग नहीं होती कि इतने मिनट हॉरर होगा और इतने मिनट कॉमेडी। यह सब कहानी के साथ नैचुरली चलता है। जब आप थिएटर में बैठकर फिल्म देखते हैं, तो कभी आपको हंसी आती है, तो कभी अचानक आप टेंशन या डर महसूस करने लगते हैं। यही इस तरह की फिल्मों की खासियत होती है कि दोनों चीजें साथ-साथ चलती हैं और ऑडियंस को एक अलग ही एक्सपीरियंस देती हैं।’ दो दशक पहले की और अब की कॉमेडी में क्या अंतर आया है? अक्षय–कॉमेडी की बात करें तो यह कई तरह की होती है। जैसे फिजिकल कॉमेडी, सिचुएशनल कॉमेडी और कई बार सिर्फ एक्सप्रेशन्स के जरिए होने वाली फेशियल कॉमेडी–जहां बिना कुछ बोले ही दर्शक हंस पड़ते हैं। यानी कॉमेडी के कई अलग-अलग रूप होते हैं। मुझे नहीं लगता कि कॉमेडी के बेसिक फॉर्म में अब तक कोई बहुत बड़ा बदलाव आया है, लेकिन हां, समय के साथ ह्यूमर का स्टाइल जरूर थोड़ा बदला है। अगर आप हेरा फेरी की बात करें, तो वह एक बहुत खास फिल्म थी। उस समय तक कॉमेडी फिल्में ओवरसीज में ज्यादा नहीं चलती थीं। आमतौर पर वहां सिर्फ रोमांटिक फिल्में ही अच्छा बिजनेस करती थीं। लेकिन हेरा फेरी पहली ऐसी कॉमेडी फिल्म बनी, जिसने ओवरसीज में भी शानदार प्रदर्शन किया और यह साबित किया कि अच्छी कॉमेडी हर जगह दर्शकों को पसंद आ सकती है। प्रियदर्शन की फिल्में सिचुएशनल कॉमेडी होती हैं। प्रियदर्शन–हेराफेरी के बाद हम कॉमेडी फिल्मों में जोक्स नहीं लाते हैं बल्कि हमारी कॉमेडी सिचुएशनल होती है। ‘हेरा फेरी’ के बाद आपके करियर में काम करने के तरीकों में क्या बदलाव आया? अक्षय–जब मैंने पहली बार उनके साथ काम किया, तो मेरे लिए वह एक बहुत सीखने वाला अनुभव था। अपने करियर में मैंने उनसे काफी कुछ सीखा है, खासकर कॉमेडी के अलग-अलग पहलुओं को समझने में। कॉमेडी के भी कई प्रकार होते हैं और उन्हें किस तरह पेश करना है, उसकी बारीकियां मैंने उन्हीं से सीखी हैं। इसके अलावा, फिल्म बनाते समय एक और बहुत महत्वपूर्ण बात मैंने समझी कि एक डायरेक्टर को एडिटिंग की अच्छी समझ होना बेहद जरूरी है। उनके साथ काम करते हुए मुझे कई नई चीजें सीखने का मौका मिला, जो मेरे करियर में काफी काम आई हैं। ‘भूत बंगला’ से रिलेटेड कोई ऐसा किस्सा बताइए जो अलग हो? प्रियदर्शन–असल में फिल्म बनाते वक्त हम उसे कॉमेडी के तौर पर एंजॉय नहीं कर रहे होते, जैसा कि लोग सोचते हैं। क्योंकि हमारे किरदार काफी सीरियस होते हैं, लेकिन परिस्थितियां हास्य पैदा करती हैं। शूटिंग के दौरान हम ज्यादा हंसते नहीं हैं, क्योंकि हम पूरी तरह अपने किरदार और सिचुएशन पर फोकस करते हैं। हमें पहले से पता होता है कि जब यही सीन थिएटर में जाएगा, तो दर्शक उस सिचुएशन की वजह से ज्यादा हंसेंगे। यानी हमारी फिल्म की कॉमेडी सिर्फ परफॉर्मेंस पर नहीं, बल्कि सिचुएशन पर ज्यादा निर्भर करती है और यही उसकी खासियत है। आप लोग शूटिंग के दौरान पूरी तरह स्क्रिप्ट पर ही चलते हैं या इम्प्रोवाइज करते हैं? अक्षय–सेट पर काफी कुछ चेंज होता है। इंप्रोवाइजेशन बहुत होता है। मैं कुछ बोलता हूं, फिर इन्हें प्रियदर्शन को बताता हूं। ऐसा करके देखिए। अगर ठीक लगता है तो हम तुरंत उसे करते हैं। कोई भी सीन जो लिखा गया है, वो बदलता जरूर है। इम्प्रोवाइजेशन सेट के माहौल के हिसाब से होता है। यह राइटर बैठकर नहीं कर सकता है। वो खड़े–खड़े सेट पर ही होगा। आप एक साथ कई फिल्में कर चुके हैं। कभी कोई ऐसा सीन जहां आप एक दूसरे से सहमत ना हों? अक्षय–नहीं ऐसा नहीं है। हमने 8 फिल्में साथ की हैं। लेकिन हम हर शॉट और हर डायलॉग पर एक-दूसरे से सहमत होते हैं। इसीलिए लंबे समय से साथ काम कर रहे हैं। कभी एक-दूसरे को क्वेश्चन नहीं किया। शॉर्ट्स और रील के दौर में आप जेन जी दर्शकों को कैसे ध्यान में रखते हैं? अक्षय– दर्शकों को हर तरह का कंटेंट पसंद होता है। वो शॉर्ट्स भी देखता है और चार घंटे की धुरंधर भी दर्शक पसंद कर रहे हैं। वामिका–मैं खुद भी इंस्टाग्राम पर रील देखती हूं। लेकिन मैं फिल्में भी देखती हूं। लोग फोन देखते हैं लेकिन फिल्में देखने का अनुभव बिल्कुल अलग है। वो रील्स नहीं है। उसमें कैरेक्टर हैं, स्टोरी है। इसलिए यंग लोग भी नेटफ्लिक्स, अमेजन पर और थिएटर पर फिल्में और वेबसीरीज देख रहे हैं। अक्षय– मैं तो जब घर पर ओटीटी पर कॉमेडी फिल्में देख रहा होता हूं तो उतनी हंसी नहीं आती है। क्योंकि आसपास कम लोग होते हैं। लेकिन जब लोग थिएटर में जाते हैं तो 150–200 लोगों के बीच में मजा आता है। थिएटर और घर पर बैठकर फिल्म देखने में बहुत अंतर है। आज एआई एक्टर्स की आवाज कॉपी कर रहा है। सीन रीक्रिएट कर रहा है। इसे आप कैसे देखते हैं? अक्षय– हाल ही में मुझसे किसी ने पूछा कि मैं किस तरह की फिल्म करना चाहता हूं। तो मैंने कहा कि मैं एक ऐसी फिल्म करना चाहता हूं जिसमें जबरदस्त एक्शन हो, और मैं फिर से 80s–90s के दौर में लौटना चाहता हूं। उस समय एक्टर खुद अपने स्टंट करते थे, खुद फाइट सीन करते थे—ना कि वीएफएक्स या एआई के सहारे। आजकल टेक्नोलॉजी बहुत आगे बढ़ गई है, लेकिन मैं एक ऐसी फिल्म बनाना चाहता हूं जिसमें ना एआई का इस्तेमाल हो और ना ही वीएफएक्स का– पूरी तरह रियल और ऑर्गेनिक फिल्म। मैं इसे एक उदाहरण से समझाता हूं–जैसे घर में एक प्रिंटेड पेंटिंग और एक हाथ से बनाई गई पेंटिंग होती है। प्रिंटेड पेंटिंग देखने में बहुत परफेक्ट लगती है, लेकिन जो असली पेंटिंग होती है, जिसे किसी कलाकार ने अपने हाथों से मेहनत करके बनाया होता है, उसमें जो डिटेलिंग, मेहनत और आत्मा होती है, वो अलग ही स्तर की होती है। ठीक उसी तरह, मैं ऐसी फिल्म बनाना चाहता हूं जिसमें वही असलियत और पवित्रता हो, जहां सब कुछ रियल हो। मैं अपनी जिंदगी में कम से कम एक ऐसी फिल्म जरूर बनाने की कोशिश करूंगा, जिसमें एआई और वीएफएक्स का इस्तेमाल बिल्कुल न हो। क्या एडिटिंग और स्क्रिप्टिंग जैसे कामों में भी खूब एआई इस्तेमाल हो रहा है? प्रियदर्शन–देखिए, फिल्म में हम एआई का सीमित इस्तेमाल करते हैं। जैसे कॉन्सेप्ट ड्रॉइंग बनाने के लिए, ताकि हमें यह समझने में मदद मिल सके कि कोई किरदार या सीन कैसा दिख सकता है। एआई के जरिए हम अलग-अलग विकल्प देख लेते हैं। लेकिन एक बात समझना जरूरी है कि आज भी एआई के पास सीमित डेटा है और वह पूरी तरह से क्रिएटर के निर्देशों पर ही काम करता है। वह खुद से कुछ नहीं करता, बल्कि इंसान के दिए गए कमांड के आधार पर ही रिजल्ट देता है। हां, अगर कभी ऐसा समय आता है जब एआई खुद इंसानों की तरह सोचने और फैसले लेने लगे, तो वह एक खतरनाक स्थिति हो सकती है। वामिका आपकी क्या लर्निंग रही इस स्टारकास्ट के साथ? वामिका–मेरी सबसे बड़ी लर्निंग यही रही कि आपको पेशेंस रखना चाहिए, शांत रहना चाहिए और अपने काम को एंजॉय करना चाहिए। शुरुआत में मैं चीजों को बहुत ज्यादा सीरियसली ले रही थी और अपने दिमाग में काफी प्रेशर बना लिया था लेकिन फिर मुझे एहसास हुआ कि आप रिलैक्स रहते हुए भी अच्छा काम कर सकते हैं, और इस पूरे प्रोसेस को एंजॉय करना बहुत जरूरी है। इसमें ‘भूल भुलैया’ से अलग क्या देखने को मिलेगा? प्रियदर्शन–‘भूल-भुलैया’ और इस फिल्म में यही सबसे बड़ा अंतर है। ‘भूल-भुलैया’ एक साइकोलॉजिकल थ्रिलर थी, जहां अंत में पता चलता है कि असल में कोई भूत नहीं है लेकिन यह फिल्म एक फैंटेसी है। यहां कहानी का ट्रीटमेंट अलग है—इसमें शुरुआत में हमारा मुख्य किरदार यही मानता है कि भूत जैसी कोई चीज नहीं होती, लेकिन जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, उसे खुद भूत का सामना करना पड़ता है।’ असरानी जी अब नहीं हैं, इस फिल्म से जुड़ी उनकी कोई बात? प्रियदर्शन–मैंने उनके साथ फिल्म का आखिरी शॉट शूट किया था। उस दिन उन्होंने शॉट पूरा किया और फिर कहा कि उनकी तबीयत ठीक नहीं है। उसके दो दिन बाद ही उनका निधन हो गया लेकिन उन्होंने दोनों फिल्मों की शूटिंग पूरी कर ली थी। कोई भी शॉट अधूरा नहीं रहा। दोनों फिल्मों में उनकी ही असली आवाज़ इस्तेमाल की गई है। सब कुछ बिल्कुल ओरिजिनल है। और सच कहूं तो हम सभी उन्हें दिल से बहुत मिस करते हैं।

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धुरंधर 2 बनी 6वीं सबसे ज्यादा कमाई वाली भारतीय फिल्म:वर्ल्डवाइड कलेक्शन ₹1226.44 करोड़ हुआ, KGF चैप्टर 2 और जवान को पीछे छोड़ा

रणवीर सिंह की फिल्म धुरंधर 2 (धुरंधर: द रिवेंज) दुनियाभर में 6वीं सबसे ज्यादा कमाई करने वाली भारतीय फिल्म बन गई है। फिल्म का दुनियाभर में कलेक्शन 1,226.44 करोड़ रुपए पहुंच गया है और इसने KGF चैप्टर 2 (1,215 करोड़ रुपए) व जवान (1,160 करोड़ रुपए) को पीछे छोड़ दिया है। ट्रेड वेबसाइट सैकनिल्क के अनुसार, रिलीज के दसवें दिन (शनिवार) फिल्म ने भारत में 62.85 करोड़ रुपए का नेट कलेक्शन किया। फिल्म ने दुनियाभर में 1,226.44 करोड़ रुपए का ग्रॉस कलेक्शन कर लिया है। धुरंधर 2 का भारत में कुल नेट कलेक्शन 778.77 करोड़ रुपए और ग्रॉस कलेक्शन 930.44 करोड़ रुपए हो गया। ग्रॉस कलेक्शन टिकट से कुल कमाई और नेट कलेक्शन टैक्स के बाद की कमाई होती है। ओवरसीज में फिल्म ने 296.00 करोड़ रुपए कमाए, जिससे वर्ल्डवाइड ग्रॉस 1,226.44 करोड़ रुपए पहुंच गया। दसवें दिन फिल्म के हिंदी वर्जन ने 58.00 करोड़ रुपए की सबसे ज्यादा कमाई की। वहीं, तेलुगु में 3.00 करोड़ रुपए, तमिल में 1.40 करोड़ रुपए, कन्नड़ में 0.30 करोड़ रुपए और मलयालम में 0.15 करोड़ रुपए का कलेक्शन हुआ। धुरंधर को शानदार रिस्पॉन्स मिला था धुरंधर के पहले पार्ट ने भारत और अंतरराष्ट्रीय बॉक्स ऑफिस पर शानदार प्रदर्शन किया और दुनियाभर में करीब 1,307 करोड़ रुपए कमाए। भारत में फिल्म का ग्रॉस कलेक्शन 1,005.85 करोड़ रुपए रहा, जबकि नेट कलेक्शन लगभग 840 करोड़ रुपए हुआ। वहीं, 894.49 करोड़ रुपए की कमाई के साथ ही यह हिंदी भाषा में सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म बनी थी। विदेशी बाजारों में भी फिल्म को जबरदस्त रिस्पॉन्स मिला। ओवरसीज में इसने करीब 299.5 करोड़ रुपए कमाए। अमेरिका और कनाडा में 193.06 करोड़ रुपए से ज्यादा की कमाई कर बाहुबली 2 का रिकॉर्ड भी तोड़ा। दिलचस्प बात यह थी कि फिल्म को खाड़ी देशों में रिलीज की अनुमति नहीं मिलने के बावजूद शानदार सफलता मिली। साथ ही यह भारतीय सिनेमा की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली ‘A’ रेटेड फिल्म बनी। ……..……..……..…….. धुरंधर 2 से जुड़ी ये खबर भी पढ़ें… धुरंधर 2 रिव्यू; रणवीर की फिर दमदार परफॉर्मेंस: नोटबंदी और राजनीतिक कड़ियों से जुड़ी कहानी, जानिए कैसी है फिल्म रणवीर सिंह की फिल्म ‘धुरंधर: द रिवेंज’ यानी धुरंधर 2 पहले पार्ट की ब्लॉकबस्टर सफलता के बाद बड़े स्केल पर लौटी है। इस बार फिल्म सिर्फ गैंगवार या बदले की कहानी नहीं रहती, बल्कि नोटबंदी से लेकर देश की कई बड़ी घटनाओं को जोड़ते हुए एक बड़ा नैरेटिव पेश करती है। पूरी खबर यहां पढ़ें…

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Rahul Ramakrishna’s brother allegedly dies after Paraquat poisoning: Experts warn why this herbicide is so deadly

Telugu actor Rahul Ramakrishna’s brother tragically died after ingesting the highly toxic herbicide paraquat.

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Toltec human sacrifice altar found in Mexico

Archaeologists with Mexico’s National Institute of Anthropology and History (INAH) have discovered an ancient Toltec altar and human remains near the Tula archaeological zone north of Mexico City. It dates to the Tollan period (900–1150 A.D.) when Tula was the capital city of the Toltec Empire.

The momoztli (altar) measures about one meter (3.3 feet) square and was built out of different stones, including volcanic blocks and river stone. It consists of three sections: a base of andesite quarry stone with small blocks no more than four inches thick on the outer face, a second section of larger slabs of andesite and a top section composed of river stones and basalt.

Four skulls, one of them still connected to a vertebral column, and several long bones, probably femurs, were found placed on three of the four sides. Their placement suggests a ritual purpose, and archaeologists believe they may be the result of ceremonial decapitations. Ceramic vessels, including a black bowl containing another bowl, obsidian fragments, obsidian blades and bone tools, known to have been used in sacrificial rituals, were also found. Archaeologists also uncovered shell remains, spindle whorls and awls, objects that played roles in both ritual practices and daily life. The fourth side has not yet been fully excavated; there are likely to be remains there too.

At the base of the altar were two skulls, one facing upwards and the other southwest. As the levels descended, a compacted layer with stucco, possibly lime and sand, was detected, and beneath this were found the other two incomplete skeletons, as well as some vessels.

Heredia Guillén said there is little chance of finding complete skeletons, because perhaps only those parts of the individuals were offered as sacrifices. Once registered, they will be sent to the project’s physical anthropology laboratory in the State of Mexico to determine age, sex, bone pathologies, and even whether they were decapitated, since one of the skulls still appears to be attached to the spine.

“In this case, although metals were already being worked in the Postclassic period, we know that here decapitations were still done with obsidian or flint knives, and they left cut marks on the bones,” he explained.

The altar was found near the Tula Chico area, about 300 meters (984 feet) from the perimeter wall of the Toltec capital. Remains of walls and foundations indicate the altar was in the center of a courtyard. INAH archaeologists believe the walls are the remains of elite buildings as people of high social rank in Tula lived outside the walls of the city.

All of the artifacts and remains recovered from the excavation will be cleaned, conserved and studied in laboratory conditions. The bones will be analyzed to narrow down the date of deposition and to determine the individual’s age, sex, geographical origins, health and possible causes of death.



* This article was originally published here

Oscars ceremony moving to new home outside Hollywood

The centrally located Peacock Theater in Los Angeles will host the 101st Academy Awards ceremony when it begins streaming on YouTube in 2029.

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The centrally located Peacock Theater in Los Angeles will host the 101st Academy Awards ceremony when it begins streaming on YouTube in 2029.

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Hellenistic necropolis unearthed in Nessebar, Bulgaria

Tombs from the Hellenistic era (3rd-2nd centuries B.C.) have been discovered in Nessebar, Bulgaria, with a rare stepped pit containing artifacts including a gilded bronze wreath.

Diggers found a stepped pit at the site, which is an unusual type of feature within the necropolis of ancient Mesambria. Enclosed within were several artifacts, including a gilded bronze wreath, a small silver coin placed as a symbolic payment for the dead, a jug, a scraping tool used for bathing, and a set of small animal bones used as game pieces.

The same excavation also turned up coins in silver and bronze, decorated drinking cups, small containers possibly used for oils and perfumes and popularly referred to as tear-collecting vessels, more scraping tools, glass beads, and a range of ceramic pieces.

According to ancient chroniclers, modern-day Nessebar was founded in the 6th century B.C. as the Greek colony of Mesambria. It was part of the Pentapolis (five allied cities) on the Black Sea, and later a member of the Delian League, the confederation of Greek city-states arrayed against Persia under the leadership of Athens. It was a prosperous center of trade and minted its own coins, including gold ones during the Hellenistic period.

Mesambria had several large public buildings and most of the archaeological remains found in the modern city — a temple of Apollo, the agora, the acropolis — date to the Hellenistic era. The excavation uncovered a Hellenistic era necropolis.

The recovered artifacts are now being conserved at the Archaeological Museum of Nesebar. Some of the damaged objects will be repaired in preparation for an exhibition dedicated to the necropolis discoveries.



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'Devil Wears Prada moment' for NI creatives featured in Vogue

The photo shoot took place at a property on Lawrence Hill in Londonderry and showcased local talent.

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कम उम्र में गंजेपन का सामना:सुपरस्टार बनने का अधूरा सपना, धुरंधर से अक्षय खन्ना ने साबित किया, आज भी एक्टिंग के असली खिलाड़ी हैं

कम उम्र में गंजेपन जैसी पर्सनल चुनौतियों और करियर के कई उतार-चढ़ाव झेलने के बावजूद अक्षय खन्ना ने कभी खुद पर भरोसा नहीं खोया। सुपरस्टार बनने का उनका सपना भले पूरी तरह साकार न हो पाया हो, लेकिन उन्होंने अपनी दमदार एक्टिंग के दम पर इंडस्ट्री में एक अलग और मजबूत पहचान जरूर बनाई। 90 के दशक में ‘बॉर्डर’ और ‘ताल’ जैसी फिल्मों से उन्होंने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया और दर्शकों के दिलों में जगह बनाई। अक्षय खन्ना ने हमेशा ग्लैमर से ज्यादा अपने किरदारों और कंटेंट को महत्व दिया, यही वजह है कि उनका करियर भले ही पारंपरिक सुपरस्टार जैसा न रहा हो, लेकिन उनकी एक्टिंग को हमेशा सराहा गया। उन्होंने अलग-अलग तरह के रोल्स चुनकर यह साबित किया कि वे हर किरदार में खुद को ढाल सकते हैं। हाल ही में फिल्म ‘धुरंधर’ में उनके शानदार प्रदर्शन ने एक बार फिर यह दिखा दिया कि वे आज भी अभिनय के मामले में किसी से कम नहीं हैं। उनकी गहराई, स्क्रीन प्रेजेंस और किरदार में पूरी तरह डूब जाने की कला उन्हें खास बनाती है। अक्षय खन्ना उन चुनिंदा कलाकारों में शामिल हैं, जो कम दिखाई देते हैं, लेकिन जब भी पर्दे पर आते हैं, अपनी छाप छोड़ जाते हैं और साबित करते हैं कि असली खिलाड़ी वही होते हैं, जो वक्त के साथ खुद को साबित करते रहें। आज की सक्सेस स्टोरी में आइए जानते हैं अक्षय खन्ना के करियर और निजी जीवन से जुड़ी कुछ और बातें.. ‘हिमालय पुत्र’ से ‘ताल’ तक अक्षय का सफर अक्षय खन्ना ने 1997 में फिल्म ‘हिमालय पुत्र’ से अपने करियर की आधिकारिक शुरुआत की, जिसे उनके पिता विनोद खन्ना ने प्रोड्यूस किया था। फिल्म बॉक्स ऑफिस पर खास खड़खड़ाहट नहीं पैदा कर पाई, लेकिन इस दौर में उनका नाम जुड़ा रहा उन उभरते युवा अभिनेताओं की लिस्ट में, जिन्हें पिछली पीढ़ी के स्टार्स ने अपने बच्चों के तौर पर नहीं, बल्कि अभिनय की क्षमता के आधार पर देखा। उसी साल रिलीज हुई ‘बॉर्डर’ ने एक बार फिर साबित कर दिया कि अक्षय खन्ना सिर्फ स्टार किड नहीं, बल्कि एक अलग स्टाइल और इंटेंसिटी लेकर आए अभिनेता हैं। जे.पी. दत्ता की इस मल्टीस्टारर फिल्म में उनकी डिलीवरी ने न केवल क्रिटिक्स का ध्यान खींचा, बल्कि यह फिल्म उनके करियर की एक ऑल‑टाइम ब्लॉकबस्टर बन गई। 1999 में सुभाष घई की फिल्म 'ताल' ने उनके लुक, स्टाइल और भावनात्मक गहराई को नई ऊंचाई दी। फिल्म में उनका रोमांटिक किरदार दर्शकों को खासा पसंद आया। यह आज भी उनकी यादगार रोमांटिक फिल्मों में शुमार है। फ्लॉप फिल्मों से जूझता करियर सफल शुरुआत के बावजूद 2000 के दशक की शुरुआत अक्षय खन्ना के लिए चुनौतीपूर्ण रही। ‘आ अब लौट चलें’ जैसी फिल्मों में काम करने के बावजूद वे लगातार हिट फिल्में नहीं दे पाए। उनकी कई फिल्में बॉक्स ऑफिस पर उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर सकीं, जिससे उनका करियर अस्थिर हो गया। इस दौर में उन्होंने अलग-अलग तरह के किरदार निभाने की कोशिश की, लेकिन लगातार सफल फिल्मों की कमी के कारण वे टॉप स्टार्स की रेस में पीछे रह गए। गंजेपन और असफलता ने तोड़ा आत्मविश्वास अक्षय खन्ना के करियर का सबसे कठिन दौर वह भी था जब उन्हें कम उम्र में ही गंजेपन का सामना करना पड़ा। मिड-डे को दिए इंटरव्यू में अक्षय खन्ना ने कहा था। मेरे साथ ये बहुत कम उम्र में होने लगा था। उस समय मुझे ऐसा लगता था जैसे किसी पियानो बजाने वाले का हाथ कट गया हो। एक एक्टर के लिए ये वैसा ही है, क्योंकि आपकी शक्ल-सूरत बहुत मायने रखती है। जब आप इस सच्चाई को स्वीकार कर लेते हैं, तब ये आपको कम परेशान करता है। लेकिन उससे पहले जो अनुभव होता है, वो बहुत मुश्किल होता है। जैसे आप सुबह उठें, अखबार देखें और महसूस करें कि मुझे कुछ भी साफ नहीं दिख रहा, मैं इसे पढ़ नहीं पा रहा हूं। मुझे चश्मे की जरूरत है। आप सोचते हैं कि अचानक क्या हो गया, मेरी आंखें काम क्यों नहीं कर रहीं? मान लीजिए आप एक खिलाड़ी हैं, क्रिकेटर या फुटबॉलर और आपको पता चले कि आपके घुटने की सर्जरी होगी। ये दिल तोड़ने वाला होता है, क्योंकि इससे आपके करियर के एक-दो साल चले जाते हैं। मेरे लिए प्रीमैच्योर बाल्डिंग कुछ वैसा ही था। ‘दिल चाहता है’ बनीं करियर की टर्निंग पॉइंट अक्षय खन्ना की सबसे बड़ी ताकत हमेशा उनकी अभिनय क्षमता रही है। 2001 में आई फिल्म ‘दिल चाहता है’ उनके करियर का टर्निंग पॉइंट साबित हुई। फिल्म में ‘सिड’ के किरदार में उनके संयमित और गहराई भरे अभिनय ने दर्शकों और समीक्षकों दोनों का दिल जीत लिया। इसके अलावा अक्षय ने ‘हमराज’, ‘हंगामा’ और ‘दीवानगी’ जैसी फिल्मों में अपनी बहुमुखी प्रतिभा का प्रदर्शन किया। इन फिल्मों ने उन्हें एक वर्सेटाइल अभिनेता के रूप में स्थापित किया, हालांकि व्यावसायिक रूप से वे लगातार सुपरहिट फिल्मों की कतार नहीं लगा सके, और उन्हें बॉलीवुड में सुपरस्टार का दर्जा नहीं मिल पाया। इस पर खुद अक्षय खन्ना का नजरिया काफी साफ और व्यावहारिक रहा है। सुपरस्टार बनने के लिए बड़ी और कल्ट फिल्मों की जरूरत अक्षय कहते हैं- किसी कलाकार का सुपरस्टार बनना सिर्फ उसकी एक्टिंग या मेहनत पर निर्भर नहीं करता, बल्कि सही समय पर सही फिल्म मिलना बेहद जरूरी होता है। उनके मुताबिक- आपको सुपरस्टार बनाने का काम फिल्में करती हैं। जब तक आपके पास ‘गदर: एक प्रेम कथा’, ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ और ‘हम आपके हैं कौन’ जैसी बड़ी और कल्ट फिल्में नहीं होतीं, तब तक उस स्तर तक पहुंचना मुश्किल है। सुपरस्टार बनना खुद के हाथ में नहीं होता है अक्षय ने यह भी माना कि एक कलाकार के हाथ में बहुत सीमित चीजें होती हैं। वह सिर्फ अपनी तरफ से पूरी ईमानदारी और मेहनत के साथ काम कर सकता है, लेकिन किसे कौन-सी फिल्म मिलेगी, यह काफी हद तक किस्मत और मौके पर निर्भर करता है। उन्होंने कहा- आप सिर्फ कोशिश कर सकते हैं। अगर आपके नसीब में वैसी फिल्में हैं, तो वो आपको मिलेंगी, नहीं तो नहीं। अपने करियर को लेकर अक्षय खन्ना किसी तरह की कड़वाहट नहीं रखते। उनका मानना है कि उन्हें जो भी काम मिला, उसमें उन्होंने अपना सर्वश्रेष्ठ देने की कोशिश की है और आगे भी वह बेहतर काम करने की उम्मीद रखते हैं। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि वह अब पहले से ज्यादा परिपक्व हो चुके हैं और भविष्य में और मजबूत किरदारों के साथ दर्शकों के सामने आना चाहते हैं। 'तारे जमीन पर’ अमोल गुप्ते ने अक्षय खन्ना के लिए लिखी थी फिल्म ‘तारे जमीन पर’ में अक्षय खन्ना काम करने वाले थे। लेकिन फिल्म आखिरकार आमिर खान के हाथ चली गई। मिड-डे से बातचीत के दौरान अक्षय खन्ना ने बताया था कि फिल्म के लेखक‑निर्देशक अमोल गुप्ते ने उन्हें स्क्रिप्ट सुनाने का प्रयास किया, लेकिन आमिर ने इसे पहले सुन लिया और फिल्म करने का फैसला कर लिया। अक्षय खन्ना ने बताया कि 'तारे जमीन पर' के लिए लेखक अमोल गुप्ते चाहते थे कि वे खुद उनके साथ फिल्म करें। उन्होंने आमिर से संपर्क किया क्योंकि वे आमिर के दोस्त थे। कहा, "मैं वास्तव में अक्षय को यह कहानी सुनाना चाहता हूं। मैं उन्हें नहीं जानता, लेकिन तुमने अभी उनके साथ 'दिल चाहता है' में काम किया है। क्या तुम उनसे फोन पर कह सकते हो कि मैं उन्हें एक स्क्रिप्ट सुनाना चाहता हूं?" आमिर ने उनसे कहा कि मैं तब तक किसी स्क्रिप्ट को रेकेमेंड नहीं कर सकता, जब तक मैं खुद उसे न सुन लूं। इसलिए पहले मुझे सुनाओ और अगर यह मुझे पसंद आ गई तो अक्षय को बताऊंगा। आमिर को ये स्क्रिप्ट इतनी पसंद आई कि उन्होंने ही खुद वो फिल्म कर ली ‘तारे जमीन पर’’ 2007 में रिलीज हुई और बॉक्स ऑफिस पर सुपरहिट रही। आमिर ने फिल्म के निर्देशन और प्रोडक्शन का जिम्मा खुद लिया और साथ ही मुख्य भूमिका भी निभाई। फिल्म ने बच्चों की शिक्षा, उनकी कल्पनाशीलता और माता‑पिता के रिश्तों पर एक नया दृष्टिकोण पेश किया। अक्षय ने बताया कि उन्हें यह अवसर छोड़ने में अफसोस नहीं हुआ। उन्होंने कहा कि बॉलीवुड में ऐसे मौके आते-जाते रहते हैं और कभी-कभी चीजे हमारे हाथ से चली जाती हैं। लंबे गैप और इंडस्ट्री से दूरी अक्षय खन्ना उन अभिनेताओं में रहे हैं जो लाइमलाइट से दूर रहना पसंद करते हैं। उनके करियर में कई बार लंबे गैप आए। यहां तक कि एक समय ऐसा भी आया जब उन्होंने लगभग 5-6 साल तक फिल्मों से दूरी बना ली। इस तरह के ब्रेक को लेकर इंडस्ट्री में भी चर्चा रही कि वह अपने तरीके से काम करना पसंद करते हैं। अक्षय खन्ना कहते हैं- मैंने कुछ समय के लिए खुद ही फिल्मों से दूरी बना ली थी। उस वक्त शायद लगा कि ब्रेक लेना ठीक रहेगा, लेकिन बाद में समझ आया कि इंडस्ट्री में अगर आप रुक जाते हैं, तो लोग मान लेते हैं कि आप अब काम नहीं कर रहे। फिर वापसी करना आसान नहीं होता। जब मैं वापस आया, तो मुझे काम मिलने में दिक्कत हुई। फिल्म बनाना भी एक लंबी प्रक्रिया है। अच्छी स्क्रिप्ट मिलना, सही प्रोजेक्ट का इंतजार करना,ये सब समय लेते हैं। इसलिए भले ही मैं ज्यादा काम करना चाहता हूं, लेकिन चीजें अपने समय से ही होती हैं। दमदार वापसी और नई ऊंचाइयां लंबे ब्रेक के बाद अक्षय खन्ना ने 2017 में फिल्म ‘मॉम’ से शानदार वापसी की, जिसमें उनके नेगेटिव किरदार को काफी सराहा गया। इसके बाद ‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ और ‘सेक्शन 375’ जैसी फिल्मों में उन्होंने अपनी एक्टिंग का लोहा मनवाया। इसके बाद उनके करियर का सबसे मजबूत फेज शुरू हुआ। ‘दृश्यम 2’ में उनका सख्त और प्रभावशाली पुलिस ऑफिसर का किरदार दर्शकों को खूब पसंद आया। वहीं फिल्म ‘छावा’ में औरंगजेब के किरदार में उनकी खूब तारीफ हुई। फिल्म में अक्षय के वनलाइनर, हाव-भाव और प्रॉस्थेटिक मेकअप ने उनके रोल को यादगार बना दिया। वहीं, ‘धुरंधर’ ने अक्षय खन्ना के करियर को नई ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया। इस फिल्म में गैंगस्टर रहमान डकैत के किरदार में उन्होंने जिस गहराई और निभाया, उसने उन्हें एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया। यह फिल्म उनके करियर की सबसे बड़ी सफलताओं में गिनी जा रही है और दर्शकों के साथ-साथ समीक्षकों से भी उन्हें जबरदस्त सराहना मिली। ______________________________________________ पिछले हफ्ते की सक्सेस स्टोरी पढ़िए... आदित्य धर की लिखी स्क्रिप्ट्स चुराकर हिट फिल्में बनीं:शूटिंग से पहले कई प्रोजेक्ट बंद हुए, डिस्लेक्सिया बीमारी को हराकर बने बॉलीवुड के धुरंधर डिस्लेक्सिया जैसी गंभीर बीमारी, पढ़ाई में कमजोरी और बार-बार टूटते सपनों के बावजूद आदित्य धर ने हार नहीं मानी। मुंबई आकर उन्होंने लंबे समय तक संघर्ष किया। कभी स्क्रिप्ट चोरी हुईं, तो कभी फिल्में शूटिंग से ठीक पहले बंद हो गईं। कई बार लगा कि अब सफर खत्म हो गया, लेकिन उन्होंने हर बार खुद को संभाला और एक कोशिश और की।पूरी खबर पढ़ें..

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