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ಗುರುವಾರ ಕೇಳಿ ಶ್ರೀ ರಾಘವೇಂದ್ರ ರಕ್ಷಾ ಮಂತ್ರ

Tuesday, 1 September 2026

नेपाल बाढ़ में फंसी एक्ट्रेस मानसी भारत लौटीं:एयरपोर्ट पर बेटी को गले लगाकर भावुक हुईं; लैंडस्लाइड के बाद पैदल बॉर्डर पार किया

नेशनल अवॉर्ड विनिंग एक्ट्रेस मानसी पारेख कैलाश मानसरोवर यात्रा के दौरान नेपाल-तिब्बत सीमा पर आई भीषण बाढ़ के बीच फंसने के बाद सुरक्षित मुंबई लौट आई हैं। मुंबई एयरपोर्ट पर वे अपने पति और बेटी को गले लगाकर भावुक दिखाई दीं। तिब्बत में भूस्खलन होने के कारण उन्हें 4 घंटे तक बस में इंतजार करना पड़ा। इसके बाद वे पैदल खराब रास्ता पार कर नेपाल सीमा पहुंचीं और काठमांडू होते हुए मुंबई अपने परिवार के पास पहुंचीं। मानसी ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर इस पूरे अनुभव को शेयर करते हुए जंग जीतने जैसा बताया है। पैदल पार किया लैंडस्लाइड वाला रास्ता एक्ट्रेस मानसी पारेख ने इंस्टाग्राम पर पोस्ट शेयर कर इस पूरे मामले की जानकारी दी है। भूस्खलन हकी वजह से रास्ता साफ होने तक उनकी बस 4 घंटे तक वहीं खड़ी रही। इसके बाद करीब 40 मील का सफर तय करके उनकी टीम नेपाल बॉर्डर पहुंची। वहां एक और लैंडस्लाइड की वजह से रास्ता पूरी तरह बंद था। ऐसे में बस छोड़कर पैदल ही क्षतिग्रस्त इलाके को पार करना पड़ा, ताकि दूसरी तरफ खड़ी बसों तक पहुंचा जा सके। 'जंग जीतने जैसा था मुंबई वापस लौटना' मानसी ने अपनी पोस्ट में लिखा कि चीन से निकलकर नेपाल सीमा तक पहुंचना किसी जंग को जीतने जैसा महसूस हो रहा था। नेपाल सीमा पार करने के बाद काठमांडू तक का 4 घंटे का बस सफर उनके जीवन का सबसे मुश्किल सफर रहा। मानसी ने लिखा कि तमाम मुश्किलों के बाद भी मुंबई वापस आना, अपने परिवार से मिलना और बेटी को गले लगाना सबसे राहत देने वाला पल था। जिस जगह हुआ था स्वागत, वह पानी में डूबी सोशल मीडिया पर 27 अगस्त को शेयर की गई एक अन्य पोस्ट में मानसी ने इस आपदा से जुड़ा एक भयानक संयोग भी बताया। उन्होंने उस जगह का वीडियो शेयर किया जहां वे आपदा आने से ठीक 5 दिन पहले रुकी थीं। मानसी के मुताबिक, 5 दिन पहले जिस जगह पर उनका स्वागत किया गया था, वह इलाका बाढ़ के पानी में पूरी तरह डूब चुका था। उन्होंने बताया कि जिस दिन वहां तबाही आई, वे अगले ही दिन फिर से उसी जगह पहुंचने वाली थीं। नेशनल अवॉर्ड विनर हैं मानसी पारेख मानसी पारेख ने अपने अभिनय करियर की शुरुआत साल 2004 में टीवी शो 'कितनी मस्त है जिंदगी' से की थी। इसके बाद वे 'इंडिया कॉलिंग', 'गुलाल' और 'सुमित संभाल लेगा' जैसे लोकप्रिय टीवी धारावाहिकों में नजर आईं। अभिनय के साथ-साथ मानसी एक प्रशिक्षित गायिका भी हैं और उन्होंने साल 2011 में जी टीवी का सिंगिंग रिएलिटी शो 'स्टार या रॉकस्टार' जीता था। बॉलीवुड में उन्होंने साल 2019 की फिल्म 'उरी: द सर्जिकल स्ट्राइक' में अहम भूमिका निभाई थी। मानसी गुजराती सिनेमा में बतौर एक्ट्रेस और प्रोड्यूसर काफी सक्रिय हैं। साल 2024 में 70वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में उन्हें गुजराती फिल्म 'कच्छ एक्सप्रेस' में बेहतरीन अभिनय के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री (बेस्ट एक्ट्रेस) का नेशनल अवॉर्ड मिला था। नेपाल-तिब्बत सीमा पर बाढ़ से भारी तबाही नेपाल और तिब्बत के सीमावर्ती इलाकों में 26 अगस्त को अचानक आई बाढ़ और भूस्खलन ने भारी तबाही मचाई है। नेपाल के रसुवा, नुवाकोट और धादिंग जिले इस आपदा से सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं। स्थानीय प्रशासन और राहत एजेंसियों की रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस आपदा में अब तक नेपाल और तिब्बत में मिलाकर 900 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है। वहीं अकेले नेपाल के हिस्सों से 4 हजार से ज्यादा लोग लापता बताए जा रहे हैं। बाढ़ की वजह से कई पुल, सड़कें और मकान पूरी तरह बह गए हैं।

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नेपाल बाढ़ में फंसी एक्ट्रेस मानसी भारत लौटीं:एयरपोर्ट पर बेटी को गले लगाकर भावुक हुईं; लैंडस्लाइड के बाद पैदल बॉर्डर पार किया

नेशनल अवॉर्ड विनिंग एक्ट्रेस मानसी पारेख कैलाश मानसरोवर यात्रा के दौरान नेपाल-तिब्बत सीमा पर आई भीषण बाढ़ के बीच फंसने के बाद सुरक्षित मुंबई लौट आई हैं। मुंबई एयरपोर्ट पर वे अपने पति और बेटी को गले लगाकर भावुक दिखाई दीं। तिब्बत में भूस्खलन होने के कारण उन्हें 4 घंटे तक बस में इंतजार करना पड़ा। इसके बाद वे पैदल खराब रास्ता पार कर नेपाल सीमा पहुंचीं और काठमांडू होते हुए मुंबई अपने परिवार के पास पहुंचीं। मानसी ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर इस पूरे अनुभव को शेयर करते हुए जंग जीतने जैसा बताया है। पैदल पार किया लैंडस्लाइड वाला रास्ता एक्ट्रेस मानसी पारेख ने इंस्टाग्राम पर पोस्ट शेयर कर इस पूरे मामले की जानकारी दी है। भूस्खलन हकी वजह से रास्ता साफ होने तक उनकी बस 4 घंटे तक वहीं खड़ी रही। इसके बाद करीब 40 मील का सफर तय करके उनकी टीम नेपाल बॉर्डर पहुंची। वहां एक और लैंडस्लाइड की वजह से रास्ता पूरी तरह बंद था। ऐसे में बस छोड़कर पैदल ही क्षतिग्रस्त इलाके को पार करना पड़ा, ताकि दूसरी तरफ खड़ी बसों तक पहुंचा जा सके। 'जंग जीतने जैसा था मुंबई वापस लौटना' मानसी ने अपनी पोस्ट में लिखा कि चीन से निकलकर नेपाल सीमा तक पहुंचना किसी जंग को जीतने जैसा महसूस हो रहा था। नेपाल सीमा पार करने के बाद काठमांडू तक का 4 घंटे का बस सफर उनके जीवन का सबसे मुश्किल सफर रहा। मानसी ने लिखा कि तमाम मुश्किलों के बाद भी मुंबई वापस आना, अपने परिवार से मिलना और बेटी को गले लगाना सबसे राहत देने वाला पल था। जिस जगह हुआ था स्वागत, वह पानी में डूबी सोशल मीडिया पर 27 अगस्त को शेयर की गई एक अन्य पोस्ट में मानसी ने इस आपदा से जुड़ा एक भयानक संयोग भी बताया। उन्होंने उस जगह का वीडियो शेयर किया जहां वे आपदा आने से ठीक 5 दिन पहले रुकी थीं। मानसी के मुताबिक, 5 दिन पहले जिस जगह पर उनका स्वागत किया गया था, वह इलाका बाढ़ के पानी में पूरी तरह डूब चुका था। उन्होंने बताया कि जिस दिन वहां तबाही आई, वे अगले ही दिन फिर से उसी जगह पहुंचने वाली थीं। नेशनल अवॉर्ड विनर हैं मानसी पारेख मानसी पारेख ने अपने अभिनय करियर की शुरुआत साल 2004 में टीवी शो 'कितनी मस्त है जिंदगी' से की थी। इसके बाद वे 'इंडिया कॉलिंग', 'गुलाल' और 'सुमित संभाल लेगा' जैसे लोकप्रिय टीवी धारावाहिकों में नजर आईं। अभिनय के साथ-साथ मानसी एक प्रशिक्षित गायिका भी हैं और उन्होंने साल 2011 में जी टीवी का सिंगिंग रिएलिटी शो 'स्टार या रॉकस्टार' जीता था। बॉलीवुड में उन्होंने साल 2019 की फिल्म 'उरी: द सर्जिकल स्ट्राइक' में अहम भूमिका निभाई थी। मानसी गुजराती सिनेमा में बतौर एक्ट्रेस और प्रोड्यूसर काफी सक्रिय हैं। साल 2024 में 70वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में उन्हें गुजराती फिल्म 'कच्छ एक्सप्रेस' में बेहतरीन अभिनय के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री (बेस्ट एक्ट्रेस) का नेशनल अवॉर्ड मिला था। नेपाल-तिब्बत सीमा पर बाढ़ से भारी तबाही नेपाल और तिब्बत के सीमावर्ती इलाकों में 26 अगस्त को अचानक आई बाढ़ और भूस्खलन ने भारी तबाही मचाई है। नेपाल के रसुवा, नुवाकोट और धादिंग जिले इस आपदा से सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं। स्थानीय प्रशासन और राहत एजेंसियों की रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस आपदा में अब तक नेपाल और तिब्बत में मिलाकर 900 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है। वहीं अकेले नेपाल के हिस्सों से 4 हजार से ज्यादा लोग लापता बताए जा रहे हैं। बाढ़ की वजह से कई पुल, सड़कें और मकान पूरी तरह बह गए हैं।

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Victoria Beckham's company makes its first profit after 18 years

Beckham's fashion and beauty business makes a £7.3m operating profit after years of losses.

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Dolly Parton's dad couldn't read - it inspired her to send books to millions of children

Families across the globe share how free books from Parton's Imagination Library helped their children.

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Monday, 31 August 2026

Iron Age shield boss found in Polish scrapyard

An Iron Age shield boss containing cinerary remains has been discovered in a scrapyard in Hrubieszów, southeastern Poland. The center of a shield, also known as an umbo, reinforced the wooden shield and protected the hand of the warrior who held it from a strap in the center of the back right behind the boss. It dates to the 2nd century A.D.

Włodzimierz Starykiewicz was looking for car and motorcycle parts when he came across a rusted circular piece with central spike shaped like a Hershey’s Kiss. It was so corroded and encrusted with dirt that it would have been easy to discount it as just some random part, but the finder thought it might be of archaeological significance. He immediately sent a photograph to the Father Stanisław Staszic Museum in Hrubieszów labelling it “A relic from a scrapyard!”

Museum staff confirmed that his instincts were correct and identified it from the photograph as ancient shield boss. Its design suggested it was part of a Vandal shield from the 2nd century. Starykiewicz handed it over to the museum for archaeologists to examine.

They found that inside the concave umbo was compacted dried earth with remnants of crop stubble, suggesting the original context was a cultivated field. Włodzimierz prudently and deliberately kept the soil inside the object so that it could be micro-excavated once it was at the museum. This wise decision preserved not just organic crop traces, but also burned human bones inside the compacted soil.

The iron surface also shows signs of having been exposed to high temperatures. The cinerary remains and the condition of the iron boss clearly indicate the shield was burned on the funeral pyre with a warrior of the Vandal community (Przeworsk culture). Unfortunately the grave is gone, disconnected from the shield boss that somehow made its way to the scrapyard, so there’s no way to track down what else might have been buried. Comparable burials from the period that have been excavated in their original contexts often include other weapons — swords, spearheads — and metal accessories — belt buckles, brooches.

The museum has appealed to whomever may have dropped the boss at the scrapyard in the first place to come forward with any information they have about where they found it. If they can pinpoint a find site, even within a general area, they may be able to locate what’s left of the original burial.



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Celebrity Hunted showed I can achieve anything after cancer, Amy Dowden says

The Strictly Come Dancing star appeared on the latest series of the Channel 4 challenge show.

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Sunday, 30 August 2026

Old Kingdom tomb found at Saqqara necropolis

Archaeologists excavating a section of the Saqqara necropolis have discovered a tomb belonging to a high-ranking official of the Old Kingdom (ca. 2700–2000 B.C.). The burial chamber’s false door was found intact in its original position, and in front of it the full set of alabaster ritual offering objects that were used for the funerary rites.

Hieroglyphic inscriptions on the false door and the ritual objects identified the tomb owner and revealed several of his prestigious titles, including Royal Chamberlain, Overseer of All the Works of the King, Overseer of Royal Documents, Keeper of the Secrets of Royal Decrees, Priest of the Goddess Maat, and Overseer of the Scribes. The titles indicate that Sekhenty-Ptah held a prominent administrative position within the state apparatus during the Old Kingdom.

The discovery of the complete group of funerary implements in their original location provides valuable new evidence for understanding funerary rituals and practices during the Old Kingdom.

The tomb was found in the Bubasteion necropolis, the burial ground associated with the temple to the cat goddess Bastet. The site was in continuous use for thousands of years, and the discovery of a tomb dating to the Old Kingdom, adds significant new information about the necropolis’ early usage and chronology.

The excavation also unearthed a complex interconnected network of burial shafts from the Late Period containing numerous human remains, more than 100 faience ushabti figures and large quantities of painted cartonnage used in mummy wrappings. Three stone sarcophagi were also found in the shafts, still sealed and in their original locations, plus numerous pottery vessels and a wooden statue in the shape of a falcon.

Preliminary studies suggest that some of the burial shafts were subjected to looting in antiquity, evidenced by openings created by tomb robbers between burial chambers. Despite this, the surviving finds remain of considerable archaeological and scientific importance and are expected to provide further insights into the site’s internal layout, architectural development and successive phases of use.



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'सलमान नशे में था, मुझे गालियां दीं':सुभाष घई ने बताया- झगड़े के बाद सलीम खान ने सलमान को माफी मांगने के लिए भेजा था

फिल्ममेकर सुभाष घई ने हाल ही में बताया कि सलमान खान के साथ हुए उनके झगड़े के बाद सलीम खान ने सलमान को उनसे माफी मांगने के लिए भेजा था। यह घटना फिल्म ‘युवराज’ में दोनों के साथ काम करने से पहले हुई थी। घई के मुताबिक, एक पार्टी में सलमान ने कथित तौर पर उन्हें गालियां दी थीं और दोनों के बीच हाथापाई भी हुई थी। टाइम्स नाउ को दिए इंटरव्यू में सुभाष घई ने बताया, “युवराज के लिए सलमान खान के भाई ने मुझसे संपर्क किया और कहा, ‘आप सलमान के साथ फिल्म क्यों नहीं बनाते?’ मैंने कहा, ‘क्या सलमान इसके लिए तैयार हैं? क्योंकि मैंने उनके साथ कभी काम नहीं किया।’ उन्होंने कहा, ‘वह तैयार हैं।’” इसके बाद घई ने फिल्म की कहानी लिखी। उन्होंने कहा, “मेरी चुनौती यह थी कि मुझे एक ऐसे किरदार में एक्टर को लेना था, जिसे उसने पहले कभी नहीं निभाया हो।” बता दें कि फिल्म ‘युवराज’ में सलमान खान के साथ अनिल कपूर और कैटरीना कैफ भी थीं। इसके बावजूद यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सक्सेस नहीं हो पाई। घई बोले- स्टार इमेज किरदार पर भारी पड़ सकती है फिल्म के कामयाब नहीं होने पर घई ने कहा, “कई बार ये किरदार इसलिए काम नहीं करते, क्योंकि स्टार किरदार पर हावी हो जाता है। वह किरदार निभाने के बजाय खुद को ही निभाता है।” घई ने आगे कहा, “एक समय के बाद स्टार खुद का ही कैरिकेचर बन जाते हैं। आप कितनी बार खुद को दोहरा सकते हैं? बच्चन साहब यानी अमिताभ बच्चन को सलाम है कि उन्होंने इतने सारे किरदार निभाए हैं।” पार्टी में सलमान से हुआ था झगड़ा घई ने झगड़े वाली घटना को याद करते हुए कहा, “फिल्म से पहले हमारा झगड़ा हुआ था। हाथापाई हुई थी। इसके बाद उनके (सलमान) पिता ने उन्हें डांटा था।” उन्होंने बताया, “हम एक पार्टी में थे। सलमान नशे में थे। वह कुछ गलत बात कह रहे थे, तो मैंने उनसे कहा, ‘ऐसा मत कहो।’ उन्हें मुझसे किसी बात की नाराजगी थी।” घई ने कहा, “उन्होंने मुझसे पूछा, ‘तुमने यह या वह क्यों किया?’ मैंने कहा कि डायरेक्टर के तौर पर यह मेरा फैसला है। वह मुझे गालियां देने लगे। मैंने उनसे ऐसा नहीं करने को कहा। इसके बाद वहां हमारा झगड़ा हो गया।” सलीम खान ने सलमान को माफी मांगने भेजा घई के मुताबिक, इस बहस के बाद सलीम खान ने मामले को सुलझाया। उन्होंने कहा, “अगली सुबह सलीम साहब ने मुझे फोन किया और बताया कि सलमान ने अपनी मां को ये सारी बातें बता दी थीं।” घई ने कहा, “उन्होंने बताया कि मैंने (सलीम) उसे डांटा है। इसके बाद उन्होंने सलमान को मेरे घर माफी मांगने के लिए भेजा। सलमान आए और उन्होंने शालीनता से माफी मांगी।” उन्होंने आगे कहा, “इसके बाद मैं उन्हें पसंद करने लगा, क्योंकि वह अपने पिता की बहुत इज्जत करते थे। मैंने उस बात को वहीं खत्म कर दिया। हम अक्सर एक-दूसरे के घर जाते थे। इसके बाद हमने साथ में एक फिल्म की।” ............ सुभाष घई से जुड़ी यह खबर भी पढ़ें 83 साल के हुए डायरेक्टर सुभाष घई: जन्मदिन के मौके पर बताया क्यों नानाजी ने सुभाष चंद्र बोस के नाम पर उनका नाम रखा था? डायरेक्टर सुभाष घई ने अपने 83वें जन्मदिन के मौके पर दैनिक भास्कर के साथ खास बातचीत की थी। इसमें उन्होंने बताया था कि 83 साल की उम्र में अब वे अपनी सेहत, आध्यात्मिकता, आचरण, परिवार, समाज और देशहित के लिए जितना संभव हो सके, उतना काम करेंगे। साथ ही बताया था कि क्यों उनके नानाजी ने सुभाष चंद्र बोस के नाम पर उनका नाम रखा था? पूरी खबर यहां पढ़ें..

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हर्षिता गौर ने ‘मिर्जापुर’ पहले ठुकराया था:एक्सेल ऑफिस इस उम्मीद में पहुंचीं कि फरहान अख्तर की नजर पड़ेगी और हीरोइन बना देंगे

‘मिर्जापुर’ में डिंपी पंडित का किरदार निभाकर घर-घर पहचान बनाने वालीं हर्षिता गौर अब ‘मिर्जापुर: द मूवी’ में नजर आएंगी। दिलचस्प बात यह है कि जिस सीरीज ने उन्हें पहचान दी, उसे उन्होंने शुरुआत में करने से मना कर दिया था। उस वक्त ओटीटी का दौर नया था और हर्षिता टीवी पर मुख्य किरदार निभा चुकी थीं। उन्हें लगा था कि किसी की बहन का किरदार क्यों निभाएं। एक्सेल के ऑफिस पहुंचते वक्त उन्हें उम्मीद थी कि शायद फरहान अख्तर या रितेश सिधवानी की नजर उन पर पड़ जाए और उन्हें किसी फिल्म में हीरोइन बनने का मौका मिल जाए। लेकिन डिंपी के एक सीन ने उनकी सोच बदल दी। आज वे मानती हैं कि अगर उस वक्त ‘मिर्जापुर’ को मना कर देतीं तो यह उनके करियर की सबसे बड़ी गलती होती। करीब 8 साल बाद उसी दुनिया की फिल्म में लौटना उनके लिए घर वापसी जैसा है। सवाल: जिस ‘मिर्जापुर’ ने आपको इतनी बड़ी पहचान दी, आपने शुरुआत में इस सीरीज के लिए मना कर दिया था, ऐसा क्यों? जवाब: हां, बिल्कुल। मैंने शुरुआत में ‘मिर्जापुर’ के लिए मना कर दिया था। उस समय ओटीटी का कॉन्सेप्ट हमारे लिए इतना साफ नहीं था। मैं ‘साड्डा हक’ में मुख्य किरदार कर चुकी थी, इसलिए मुझे लगा कि अब किसी की बहन का किरदार क्यों निभाऊं। मुझे फिल्मों की तरफ जाना है। सवाल: फिर आप ‘मिर्जापुर’ के लिए कैसे तैयार हुईं? जवाब: दोबारा जब टीम ने मुझे बुलाया तो मैंने स्क्रिप्ट और किरदार को थोड़ा समझा। मुझे एक सीन सुनाया गया, जिसमें मुन्ना मुझे उठाकर ले जाता है और बाद में डिंपी गन उठाकर कहती है कि गाड़ी रोक, वरना ठोक देंगे। वह सीन सुनकर मुझे लगा कि यह सिर्फ किसी की बहन का किरदार नहीं है। इसमें अपनी एक कहानी और ताकत है। तब मुझे लगा कि इसे करना चाहिए। हालांकि, एक्सेल के ऑफिस जाते समय मेरे मन में एक अलग उम्मीद थी। सवाल: आपने बताया कि एक्सेल के ऑफिस जाते समय आपके मन में एक अलग उम्मीद थी। वह क्या थी? जवाब: जब मुझे एक्सेल के ऑफिस बुलाया गया तो मैं इस सोच के साथ गई थी कि शायद वहां रितेश सिधवानी या फरहान अख्तर मिल जाएं और उनकी नजर मुझ पर पड़ जाए। मन में यह भी था कि शायद वे मुझे किसी फिल्म में हीरोइन के तौर पर साइन कर लें। मैं फिल्मों में काम करना चाहती थी, इसलिए ऐसी उम्मीद थी। मैंने पहले बहुत सुना था कि फलां डायरेक्टर की नजर एक लड़की पर पड़ी और उन्होंने अपनी फिल्म में हीरोइन बना दिया। सवाल: फिर एक्सेल ऑफिस में क्या हुआ? जवाब: रितेश सिधवानी और फरहान अख्तर तो नहीं मिले, लेकिन वहां की एनर्जी बहुत अच्छी लगी। मैं डायरेक्टर गुरमीत सिंह, करण अंशुमान और राइटर पुनीत कृष्णा से मिली। सबसे अच्छी बात यह थी कि उन्होंने मुझे किरदार बेचने की कोशिश नहीं की। उन्होंने यह नहीं कहा कि आपका किरदार सबसे बड़ा होगा या आपको बहुत ग्लैमरस तरीके से दिखाया जाएगा। उन्होंने जैसा किरदार था, वैसा ही बताया। मुझे यह ईमानदारी अच्छी लगी। किरदार और कहानी समझने के बाद मुझे लगा कि यह करना चाहिए। सवाल: क्या कभी सोचा कि अगर उस समय ‘मिर्जापुर’ को मना कर देतीं तो क्या होता? जवाब: पीछे मुड़कर देखती हूं तो लगता है कि अगर मैंने उस समय मना कर दिया होता तो यह मेरे करियर की सबसे बड़ी बेवकूफी होती। आज ‘मिर्जापुर’ मेरे करियर का बहुत बड़ा हिस्सा है। इसी वजह से अब बड़े परदे पर आने का मौका मिला है। सवाल: ‘मिर्जापुर’ ने आपको एक्टिंग को लेकर क्या सिखाया? जवाब: ‘मिर्जापुर’ ने मुझे समझाया कि सिर्फ हीरो या हीरोइन होना जरूरी नहीं, किरदार भी बहुत मायने रखता है। ओटीटी ने हमें समझाया कि कहानी में हर किरदार की अपनी जगह हो सकती है। ‘मिर्जापुर’ में महिलाओं के किरदार भी मजबूत हैं। हर महिला अपने तरीके से कहानी में कुछ लेकर आती है। सवाल: डिंपी के किरदार में आपको सबसे ज्यादा क्या पसंद आया? जवाब: मुझे डिंपी का सफर बहुत अच्छा लगा। शुरुआत में वह शांत और मासूम लड़की है, लेकिन कहानी के साथ उसकी जिंदगी बदलती जाती है। वह बहुत कुछ खोती है और फिर उसके अंदर एक अलग तरह की ताकत आती है। मुझे लगा कि इस किरदार से बहुत कुछ सीखने को मिलेगा। सवाल: करीब 8 साल से ‘मिर्जापुर’ का हिस्सा हैं। इस परिवार से आपका रिश्ता कैसा है? जवाब: मैं इसे हमेशा ‘मिर्जापुर फैमिली’ कहती हूं। यह सिर्फ कहने के लिए नहीं है, सच में लगता है कि हम एक परिवार हैं। जब ‘मिर्जापुर’ के लिए शूट करते हैं तो लगता है कि घर वापस आ गए हैं। इस बार फिल्म के लिए इतने सारे लोग दोबारा इकट्ठा हुए तो बिल्कुल रीयूनियन जैसा महसूस हुआ। जैसे स्कूल या कॉलेज के दोस्त कई साल बाद मिलते हैं और वही पुरानी बॉन्डिंग वापस आ जाती है। सवाल: इतने साल बाद पुराने कलाकारों से मिलना कैसा रहा? जवाब: बहुत अच्छा लगा। साथ काम करते-करते ‘मिर्जापुर’ हमारे लिए बहुत खास बन गया है। हम सबने इसके साथ बहुत कुछ देखा है। दोबारा साथ आए तो लगा कि सभी के अंदर का बच्चा वापस आ गया था। अली, दिवेंदु, श्रिया, जीतू और बाकी सभी लोग बहुत उत्साहित थे। नए लोग भी ऐसे जुड़े कि लगा ही नहीं कि वे नए हैं। सवाल: पंकज त्रिपाठी, अली फजल और दिवेंदु शर्मा में इतने सालों बाद क्या बदलाव देखती हैं? जवाब: एक एक्टर अपने अनुभव के साथ बेहतर होता जाता है। इन सभी ने ‘मिर्जापुर’ के बाद बहुत बड़ा काम किया है, लेकिन निजी तौर पर मुझे उनमें कोई बड़ा बदलाव नहीं दिखा। उनसे मिलते हैं तो वही पुरानी मासूमियत नजर आती है। मुझे सेट पर बहुत प्यार मिलता है, क्योंकि मैं सबसे छोटी हूं। सभी ने मुझे बहुत प्यार से रखा है। सवाल: पंकज त्रिपाठी के साथ आपका रिश्ता कैसा है? जवाब: मैंने उनका काम पहले देखा था और मुझे वे बहुत अच्छे एक्टर लगते थे। लेकिन मुझे नहीं पता था कि उनके अंदर एक बच्चा भी है। उनके पास बहुत सारे किस्से हैं और वे बहुत सेल्फ-अश्योर्ड इंसान हैं। आज भी जब वे मुझे देखते हैं तो कहते हैं, ‘बहुत दुबली हो गई हो, कुछ खा रही हो?’ मैं उन्हें कहती हूं कि मैं नौ साल से ऐसी ही हूं। सवाल: जीतेंद्र कुमार के ‘मिर्जापुर’ परिवार में शामिल होने पर क्या लगा? जवाब: शुरुआत में जीतू थोड़े शांत थे, लेकिन जैसे ही वे खुले तो लगा कि हम उन्हें बहुत पहले से जानते हैं। नए इंसान के साथ घुलने-मिलने में समय लगता है, लेकिन उनके साथ ऐसा बिल्कुल नहीं हुआ। वे आसानी से परिवार का हिस्सा बन गए। सवाल: रवि किशन के साथ काम करने का अनुभव कैसा रहा? जवाब: रवि जी बहुत अच्छे स्टोरीटेलर हैं। दूर से देखने पर वे शांत लगते हैं, लेकिन किस्से सुनाते हैं तो उनका सेंस ऑफ ह्यूमर बहुत अच्छा है। एक बार जैसलमेर में मैं, श्वेता और रवि जी साथ बैठे थे। बाद में डायरेक्टर और राइटर भी आ गए। रवि जी जिस उत्साह से अपने किरदार और फिल्म के बारे में बात कर रहे थे, वह बहुत अच्छा लगा। मुझे लगता है कि अच्छे एक्टर्स की खासियत होती है कि उनके अंदर का बच्चा कभी खत्म नहीं होता। रवि जी ने इतना काम किया है, इतने उतार-चढ़ाव देखे हैं, लेकिन आज भी किसी अच्छे सीन को लेकर उसी उत्साह से बात करते हैं। यही उनकी खूबसूरत क्वालिटी है। सवाल: ‘मिर्जापुर’ फिल्म बनने की खबर जब पहली बार मिली तो आपकी प्रतिक्रिया क्या थी? जवाब: उड़ती-उड़ती खबर हम सब सुन रहे थे कि मेकर्स कुछ ऐसा सोच रहे हैं। लेकिन तब सवाल था कि फिल्म बनाएंगे तो क्या बनाएंगे? कहानी क्या होगी? फिर जब पता चला कि फिल्म सीजन 1 की दुनिया में वापस जा रही है तो थोड़ा अजीब लगा, क्योंकि हम किरदारों की जिंदगी में सीजन 3 तक आगे बढ़ चुके थे। लेकिन जब स्क्रिप्ट सुनी और शूट किया तो लगा कि इसे बहुत अच्छे तरीके से नए अंदाज में बनाया गया है। सवाल: सीजन 1 की दुनिया में वापस जाना आपके लिए कितना मुश्किल था? जवाब: बहुत मुश्किल था। हम सभी अपने किरदारों की जिंदगी में काफी आगे बढ़ चुके थे। लेकिन फिल्म में फिर उसी दौर में जाना था। एक तरफ वही दुनिया, वही किरदार और वही रिश्ते दिखाने थे, दूसरी तरफ इसे बड़े पर्दे के हिसाब से नया भी बनाना था। यह बहुत मुश्किल काम था, लेकिन टीम ने इसे बहुत फ्रेश तरीके से पेश किया है। सवाल: क्या ‘मिर्जापुर: द मूवी’ देखने के लिए दर्शकों को पहले सीरीज देखनी जरूरी है? जवाब: बिल्कुल नहीं। अगर आपने ‘मिर्जापुर’ देखा है तो किरदारों के साथ पहले से जुड़ाव है, इसलिए फिल्म का मजा और बढ़ जाएगा। लेकिन अगर आपने सीरीज नहीं देखी है तो भी फिल्म समझने में परेशानी नहीं होगी। फिल्म इस तरह बनाई गई है कि पहले तीन सीजन देखने की जरूरत नहीं है। आप इसे क्लीन स्लेट और क्लीन माइंड के साथ देख सकते हैं। सवाल: बड़े पर्दे पर ‘मिर्जापुर’ देखने का अनुभव कैसा होगा? जवाब: जब मैंने पहली बार फिल्म का ट्रेलर थिएटर की बड़ी स्क्रीन पर देखा तो मुझे लगा कि क्या मैं सच में इस चीज का हिस्सा हूं? बड़े पर्दे पर हर चीज 10 गुना बड़ी हो जाती है। ‘मिर्जापुर’ में इमोशन, हिंसा, ड्रामा और रिश्ते पहले से बहुत मजबूत हैं। बड़े पर्दे पर इन सबका असर और ज्यादा होगा। ट्रेलर देखने के बाद मुझे खुद लगा कि यह फिल्म देखनी है। सवाल: फिल्म की शूटिंग के दौरान पुरानी ‘मिर्जापुर’ फैमिली के साथ काम करने में क्या खास रहा? जवाब: ऐसा लग रहा था जैसे हम घर वापस आ गए हैं। हम सबने साथ में एक बहुत बड़ी चीज बनाई थी, जो लोगों के दिलों तक पहुंची। इसलिए दोबारा साथ आए तो सभी के अंदर वही पुराना उत्साह था। कई नए लोग भी जुड़े, लेकिन उनकी फ्रीक्वेंसी इतनी अच्छी तरह मैच हुई कि लगा ही नहीं कि कोई नया है। सवाल: क्या फिल्म में ‘मिर्जापुर’ के पुराने किरदारों को नए अंदाज में देखना दिलचस्प होगा? जवाब: बिल्कुल। यही इस फिल्म की खासियत है। किरदार वही हैं, लेकिन उन्हें नए तरीके से पेश किया गया है। कहानी को बड़े पर्दे के हिसाब से नए अंदाज में बनाया गया है। अगर आपने सीरीज देखी है तो कई चीजों में पुरानी यादें मिलेंगी, लेकिन फिल्म आपको कुछ नया भी देगी। सवाल: क्या आपको लगता है कि ‘मिर्जापुर’ फिल्म के बाद इसका दूसरा पार्ट भी आ सकता है? जवाब: अभी इस बारे में मैं कुछ नहीं कह सकती। आगे क्या होगा, यह दर्शकों के प्यार और फिल्म की सफलता पर निर्भर करेगा। सवाल: दर्शकों से ‘मिर्जापुर: द मूवी’ को लेकर क्या कहना चाहेंगी? जवाब: मैं चाहती हूं कि सभी लोग फिल्म देखने जाएं। आपने हमें करीब 8 साल तक इतना प्यार दिया है और उसी प्यार की वजह से यह सीरीज अब बड़े पर्दे तक पहुंची है। जिन लोगों ने ‘मिर्जापुर’ देखा है, वे जरूर फिल्म देखने जाएं। लेकिन जिन्होंने सीरीज नहीं देखी है, वे भी बिना किसी चिंता के फिल्म देख सकते हैं। अगर ट्रेलर आपको अच्छा लगा है तो यह मत सोचिए कि पहले सीरीज देखनी जरूरी है। आप नए दर्शक की तरह फिल्म देखने जा सकते हैं।

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हर्षिता गौर ने ‘मिर्जापुर’ पहले ठुकराया था:एक्सेल ऑफिस इस उम्मीद में पहुंचीं कि फरहान अख्तर की नजर पड़ेगी और हीरोइन बना देंगे

‘मिर्जापुर’ में डिंपी पंडित का किरदार निभाकर घर-घर पहचान बनाने वालीं हर्षिता गौर अब ‘मिर्जापुर: द मूवी’ में नजर आएंगी। दिलचस्प बात यह है कि जिस सीरीज ने उन्हें पहचान दी, उसे उन्होंने शुरुआत में करने से मना कर दिया था। उस वक्त ओटीटी का दौर नया था और हर्षिता टीवी पर मुख्य किरदार निभा चुकी थीं। उन्हें लगा था कि किसी की बहन का किरदार क्यों निभाएं। एक्सेल के ऑफिस पहुंचते वक्त उन्हें उम्मीद थी कि शायद फरहान अख्तर या रितेश सिधवानी की नजर उन पर पड़ जाए और उन्हें किसी फिल्म में हीरोइन बनने का मौका मिल जाए। लेकिन डिंपी के एक सीन ने उनकी सोच बदल दी। आज वे मानती हैं कि अगर उस वक्त ‘मिर्जापुर’ को मना कर देतीं तो यह उनके करियर की सबसे बड़ी गलती होती। करीब 8 साल बाद उसी दुनिया की फिल्म में लौटना उनके लिए घर वापसी जैसा है। सवाल: जिस ‘मिर्जापुर’ ने आपको इतनी बड़ी पहचान दी, आपने शुरुआत में इस सीरीज के लिए मना कर दिया था, ऐसा क्यों? जवाब: हां, बिल्कुल। मैंने शुरुआत में ‘मिर्जापुर’ के लिए मना कर दिया था। उस समय ओटीटी का कॉन्सेप्ट हमारे लिए इतना साफ नहीं था। मैं ‘साड्डा हक’ में मुख्य किरदार कर चुकी थी, इसलिए मुझे लगा कि अब किसी की बहन का किरदार क्यों निभाऊं। मुझे फिल्मों की तरफ जाना है। सवाल: फिर आप ‘मिर्जापुर’ के लिए कैसे तैयार हुईं? जवाब: दोबारा जब टीम ने मुझे बुलाया तो मैंने स्क्रिप्ट और किरदार को थोड़ा समझा। मुझे एक सीन सुनाया गया, जिसमें मुन्ना मुझे उठाकर ले जाता है और बाद में डिंपी गन उठाकर कहती है कि गाड़ी रोक, वरना ठोक देंगे। वह सीन सुनकर मुझे लगा कि यह सिर्फ किसी की बहन का किरदार नहीं है। इसमें अपनी एक कहानी और ताकत है। तब मुझे लगा कि इसे करना चाहिए। हालांकि, एक्सेल के ऑफिस जाते समय मेरे मन में एक अलग उम्मीद थी। सवाल: आपने बताया कि एक्सेल के ऑफिस जाते समय आपके मन में एक अलग उम्मीद थी। वह क्या थी? जवाब: जब मुझे एक्सेल के ऑफिस बुलाया गया तो मैं इस सोच के साथ गई थी कि शायद वहां रितेश सिधवानी या फरहान अख्तर मिल जाएं और उनकी नजर मुझ पर पड़ जाए। मन में यह भी था कि शायद वे मुझे किसी फिल्म में हीरोइन के तौर पर साइन कर लें। मैं फिल्मों में काम करना चाहती थी, इसलिए ऐसी उम्मीद थी। मैंने पहले बहुत सुना था कि फलां डायरेक्टर की नजर एक लड़की पर पड़ी और उन्होंने अपनी फिल्म में हीरोइन बना दिया। सवाल: फिर एक्सेल ऑफिस में क्या हुआ? जवाब: रितेश सिधवानी और फरहान अख्तर तो नहीं मिले, लेकिन वहां की एनर्जी बहुत अच्छी लगी। मैं डायरेक्टर गुरमीत सिंह, करण अंशुमान और राइटर पुनीत कृष्णा से मिली। सबसे अच्छी बात यह थी कि उन्होंने मुझे किरदार बेचने की कोशिश नहीं की। उन्होंने यह नहीं कहा कि आपका किरदार सबसे बड़ा होगा या आपको बहुत ग्लैमरस तरीके से दिखाया जाएगा। उन्होंने जैसा किरदार था, वैसा ही बताया। मुझे यह ईमानदारी अच्छी लगी। किरदार और कहानी समझने के बाद मुझे लगा कि यह करना चाहिए। सवाल: क्या कभी सोचा कि अगर उस समय ‘मिर्जापुर’ को मना कर देतीं तो क्या होता? जवाब: पीछे मुड़कर देखती हूं तो लगता है कि अगर मैंने उस समय मना कर दिया होता तो यह मेरे करियर की सबसे बड़ी बेवकूफी होती। आज ‘मिर्जापुर’ मेरे करियर का बहुत बड़ा हिस्सा है। इसी वजह से अब बड़े परदे पर आने का मौका मिला है। सवाल: ‘मिर्जापुर’ ने आपको एक्टिंग को लेकर क्या सिखाया? जवाब: ‘मिर्जापुर’ ने मुझे समझाया कि सिर्फ हीरो या हीरोइन होना जरूरी नहीं, किरदार भी बहुत मायने रखता है। ओटीटी ने हमें समझाया कि कहानी में हर किरदार की अपनी जगह हो सकती है। ‘मिर्जापुर’ में महिलाओं के किरदार भी मजबूत हैं। हर महिला अपने तरीके से कहानी में कुछ लेकर आती है। सवाल: डिंपी के किरदार में आपको सबसे ज्यादा क्या पसंद आया? जवाब: मुझे डिंपी का सफर बहुत अच्छा लगा। शुरुआत में वह शांत और मासूम लड़की है, लेकिन कहानी के साथ उसकी जिंदगी बदलती जाती है। वह बहुत कुछ खोती है और फिर उसके अंदर एक अलग तरह की ताकत आती है। मुझे लगा कि इस किरदार से बहुत कुछ सीखने को मिलेगा। सवाल: करीब 8 साल से ‘मिर्जापुर’ का हिस्सा हैं। इस परिवार से आपका रिश्ता कैसा है? जवाब: मैं इसे हमेशा ‘मिर्जापुर फैमिली’ कहती हूं। यह सिर्फ कहने के लिए नहीं है, सच में लगता है कि हम एक परिवार हैं। जब ‘मिर्जापुर’ के लिए शूट करते हैं तो लगता है कि घर वापस आ गए हैं। इस बार फिल्म के लिए इतने सारे लोग दोबारा इकट्ठा हुए तो बिल्कुल रीयूनियन जैसा महसूस हुआ। जैसे स्कूल या कॉलेज के दोस्त कई साल बाद मिलते हैं और वही पुरानी बॉन्डिंग वापस आ जाती है। सवाल: इतने साल बाद पुराने कलाकारों से मिलना कैसा रहा? जवाब: बहुत अच्छा लगा। साथ काम करते-करते ‘मिर्जापुर’ हमारे लिए बहुत खास बन गया है। हम सबने इसके साथ बहुत कुछ देखा है। दोबारा साथ आए तो लगा कि सभी के अंदर का बच्चा वापस आ गया था। अली, दिवेंदु, श्रिया, जीतू और बाकी सभी लोग बहुत उत्साहित थे। नए लोग भी ऐसे जुड़े कि लगा ही नहीं कि वे नए हैं। सवाल: पंकज त्रिपाठी, अली फजल और दिवेंदु शर्मा में इतने सालों बाद क्या बदलाव देखती हैं? जवाब: एक एक्टर अपने अनुभव के साथ बेहतर होता जाता है। इन सभी ने ‘मिर्जापुर’ के बाद बहुत बड़ा काम किया है, लेकिन निजी तौर पर मुझे उनमें कोई बड़ा बदलाव नहीं दिखा। उनसे मिलते हैं तो वही पुरानी मासूमियत नजर आती है। मुझे सेट पर बहुत प्यार मिलता है, क्योंकि मैं सबसे छोटी हूं। सभी ने मुझे बहुत प्यार से रखा है। सवाल: पंकज त्रिपाठी के साथ आपका रिश्ता कैसा है? जवाब: मैंने उनका काम पहले देखा था और मुझे वे बहुत अच्छे एक्टर लगते थे। लेकिन मुझे नहीं पता था कि उनके अंदर एक बच्चा भी है। उनके पास बहुत सारे किस्से हैं और वे बहुत सेल्फ-अश्योर्ड इंसान हैं। आज भी जब वे मुझे देखते हैं तो कहते हैं, ‘बहुत दुबली हो गई हो, कुछ खा रही हो?’ मैं उन्हें कहती हूं कि मैं नौ साल से ऐसी ही हूं। सवाल: जीतेंद्र कुमार के ‘मिर्जापुर’ परिवार में शामिल होने पर क्या लगा? जवाब: शुरुआत में जीतू थोड़े शांत थे, लेकिन जैसे ही वे खुले तो लगा कि हम उन्हें बहुत पहले से जानते हैं। नए इंसान के साथ घुलने-मिलने में समय लगता है, लेकिन उनके साथ ऐसा बिल्कुल नहीं हुआ। वे आसानी से परिवार का हिस्सा बन गए। सवाल: रवि किशन के साथ काम करने का अनुभव कैसा रहा? जवाब: रवि जी बहुत अच्छे स्टोरीटेलर हैं। दूर से देखने पर वे शांत लगते हैं, लेकिन किस्से सुनाते हैं तो उनका सेंस ऑफ ह्यूमर बहुत अच्छा है। एक बार जैसलमेर में मैं, श्वेता और रवि जी साथ बैठे थे। बाद में डायरेक्टर और राइटर भी आ गए। रवि जी जिस उत्साह से अपने किरदार और फिल्म के बारे में बात कर रहे थे, वह बहुत अच्छा लगा। मुझे लगता है कि अच्छे एक्टर्स की खासियत होती है कि उनके अंदर का बच्चा कभी खत्म नहीं होता। रवि जी ने इतना काम किया है, इतने उतार-चढ़ाव देखे हैं, लेकिन आज भी किसी अच्छे सीन को लेकर उसी उत्साह से बात करते हैं। यही उनकी खूबसूरत क्वालिटी है। सवाल: ‘मिर्जापुर’ फिल्म बनने की खबर जब पहली बार मिली तो आपकी प्रतिक्रिया क्या थी? जवाब: उड़ती-उड़ती खबर हम सब सुन रहे थे कि मेकर्स कुछ ऐसा सोच रहे हैं। लेकिन तब सवाल था कि फिल्म बनाएंगे तो क्या बनाएंगे? कहानी क्या होगी? फिर जब पता चला कि फिल्म सीजन 1 की दुनिया में वापस जा रही है तो थोड़ा अजीब लगा, क्योंकि हम किरदारों की जिंदगी में सीजन 3 तक आगे बढ़ चुके थे। लेकिन जब स्क्रिप्ट सुनी और शूट किया तो लगा कि इसे बहुत अच्छे तरीके से नए अंदाज में बनाया गया है। सवाल: सीजन 1 की दुनिया में वापस जाना आपके लिए कितना मुश्किल था? जवाब: बहुत मुश्किल था। हम सभी अपने किरदारों की जिंदगी में काफी आगे बढ़ चुके थे। लेकिन फिल्म में फिर उसी दौर में जाना था। एक तरफ वही दुनिया, वही किरदार और वही रिश्ते दिखाने थे, दूसरी तरफ इसे बड़े पर्दे के हिसाब से नया भी बनाना था। यह बहुत मुश्किल काम था, लेकिन टीम ने इसे बहुत फ्रेश तरीके से पेश किया है। सवाल: क्या ‘मिर्जापुर: द मूवी’ देखने के लिए दर्शकों को पहले सीरीज देखनी जरूरी है? जवाब: बिल्कुल नहीं। अगर आपने ‘मिर्जापुर’ देखा है तो किरदारों के साथ पहले से जुड़ाव है, इसलिए फिल्म का मजा और बढ़ जाएगा। लेकिन अगर आपने सीरीज नहीं देखी है तो भी फिल्म समझने में परेशानी नहीं होगी। फिल्म इस तरह बनाई गई है कि पहले तीन सीजन देखने की जरूरत नहीं है। आप इसे क्लीन स्लेट और क्लीन माइंड के साथ देख सकते हैं। सवाल: बड़े पर्दे पर ‘मिर्जापुर’ देखने का अनुभव कैसा होगा? जवाब: जब मैंने पहली बार फिल्म का ट्रेलर थिएटर की बड़ी स्क्रीन पर देखा तो मुझे लगा कि क्या मैं सच में इस चीज का हिस्सा हूं? बड़े पर्दे पर हर चीज 10 गुना बड़ी हो जाती है। ‘मिर्जापुर’ में इमोशन, हिंसा, ड्रामा और रिश्ते पहले से बहुत मजबूत हैं। बड़े पर्दे पर इन सबका असर और ज्यादा होगा। ट्रेलर देखने के बाद मुझे खुद लगा कि यह फिल्म देखनी है। सवाल: फिल्म की शूटिंग के दौरान पुरानी ‘मिर्जापुर’ फैमिली के साथ काम करने में क्या खास रहा? जवाब: ऐसा लग रहा था जैसे हम घर वापस आ गए हैं। हम सबने साथ में एक बहुत बड़ी चीज बनाई थी, जो लोगों के दिलों तक पहुंची। इसलिए दोबारा साथ आए तो सभी के अंदर वही पुराना उत्साह था। कई नए लोग भी जुड़े, लेकिन उनकी फ्रीक्वेंसी इतनी अच्छी तरह मैच हुई कि लगा ही नहीं कि कोई नया है। सवाल: क्या फिल्म में ‘मिर्जापुर’ के पुराने किरदारों को नए अंदाज में देखना दिलचस्प होगा? जवाब: बिल्कुल। यही इस फिल्म की खासियत है। किरदार वही हैं, लेकिन उन्हें नए तरीके से पेश किया गया है। कहानी को बड़े पर्दे के हिसाब से नए अंदाज में बनाया गया है। अगर आपने सीरीज देखी है तो कई चीजों में पुरानी यादें मिलेंगी, लेकिन फिल्म आपको कुछ नया भी देगी। सवाल: क्या आपको लगता है कि ‘मिर्जापुर’ फिल्म के बाद इसका दूसरा पार्ट भी आ सकता है? जवाब: अभी इस बारे में मैं कुछ नहीं कह सकती। आगे क्या होगा, यह दर्शकों के प्यार और फिल्म की सफलता पर निर्भर करेगा। सवाल: दर्शकों से ‘मिर्जापुर: द मूवी’ को लेकर क्या कहना चाहेंगी? जवाब: मैं चाहती हूं कि सभी लोग फिल्म देखने जाएं। आपने हमें करीब 8 साल तक इतना प्यार दिया है और उसी प्यार की वजह से यह सीरीज अब बड़े पर्दे तक पहुंची है। जिन लोगों ने ‘मिर्जापुर’ देखा है, वे जरूर फिल्म देखने जाएं। लेकिन जिन्होंने सीरीज नहीं देखी है, वे भी बिना किसी चिंता के फिल्म देख सकते हैं। अगर ट्रेलर आपको अच्छा लगा है तो यह मत सोचिए कि पहले सीरीज देखनी जरूरी है। आप नए दर्शक की तरह फिल्म देखने जा सकते हैं।

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Saturday, 29 August 2026

The power of Roman fashion at The Glyptotek

A new exhibition this fall at the Glyptotek museum in Copenhagen will examine the link between fashion, power and culture in ancient Rome. The Power of Fashion in the Roman Empire draws from the Glyptotek’s exceptional collection of antiquities combined with loans from other institutions, including pieces that have never been on loan before.

Based on the museum’s long-standing research on colour and ancient dress and fashion, the exhibition presents the latest findings on the clothing, perfumes, jewellery and hairstyles those in power used to signal their position in the social hierarchy.

Covering over 1,000 m2, The Power of Fashion in the Roman Empire is an exhibition that appeals to the senses. Custom-made scents, research-based colours, a scenography of textiles and audio narratives all contribute to an immersive experience and space for reflection on people’s obsession – then as now – with status, identity and appearance.

The Glyptotek has been breaking new ground in researching the clothing, colors, accessories and perfumes of ancient Rome, investigating sculptures for traces of original polychromy, allowing researchers to make links between how draping, garment styles and colors conveyed social position and power. For example, a portrait sculpture of the emperor Tiberius with his torso and legs bare, a garment draped around his waist and over his arm, was presenting him as a demi-god hero or deity, conveying even more strength than a military costume would have. Research into the garment’s original coloring discovered that it was pink, a color then associated with divinity and power.

The museum isn’t only relying on traces of color on sculptures, however. They have secured three exceedingly rare tunics from the British Museum that have never before left the confines of the museum. Another first-time loan is the leg of a monumental sculpture of Emperor Septimius Severus from the archaeological museum in Burdur, Turkey. The leg is wearing lionskin boots, symbol of regal power, and heroic attributes like Hercules wearing the skin of the Nemean Lion.

Perfumes get special attention, too, and just as with the colors, the scent palette in antiquity had very different meaning than it does today.

The Glyptotek has worked with the Danish skincare company Karmameju to create scents based on ancient perfume recipes. There are four scent stations providing insight into Roman perfumes and their relationship to gender roles and status. Men, for example, wore flower scents for special occasions, whereas women tended to use stronger, more pungent perfumes.

This landmark show will be the last major exhibition at the Glyptotek before it closes to embark on an ambitious restoration project to preserve its historic buildings while improving accessibility, repairing structural issues and damaged mosaic floors, and modernizing its technical systems of climate control and fire safety to ensure the optimal conservation conditions for its collection of classical sculpture, antiquities and 19th century French and Danish art. The Glyptotek of the Future project is funded in large part by a grant from the Carlsberg Foundation, a fitting callback to brewer and philanthropist Carl Jacobsen who founded the museum 130 years ago with the goal of making his private art and antiquities collection available to the public.

The restoration is scheduled to begin in 2028 and will take four to six years. More than 10,000 individual works from the museum’s collections will be removed and stored. The museum will be closed for part of that time, and the Glyptotek will be taking advantage of the downtime to exhibit some of its works elsewhere in Denmark and internationally. That will set them up nicely to get loans in exchange once the new facilities are up and running.



* This article was originally published here