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Rare ring with runic inscription found in Lincolnshire

A rare Viking-era finger ring with a runic inscription has been discovered by a metal detectorist near Quadring in Lincolnshire. It dates to the between the 8th and the 10th centuries and is one of very few inscribed rings from the early Middle Ages found in Britain.

Archaeologist Dr Lisa Brundle described it as one of “the most significant” archaeological finds ever recorded in the area. […]

Brundle, who is finds liaison officer for PAS at Lincolnshire County Council, said the ring “would have been a treasured possession”.

Found by metal detectorist Rafal Wesolowski in May 2024, the ring is made of silver gilded on the outside of the central band. The runes are engraved on the exterior band and show no sign of having been gilded, so they must have been carved after the gilding was complete. There’s a raised border encircling the top and bottom of the band. It is silver now, but may have originally been gilded and the gold wore off with use.

There are 16 runic characters running from left to right on the central band in fine lines. There’s a cross mark at the beginning of the inscription, and dots at the end. Experts from the University of Nottingham have interpreted the runes as reading: +udnAnH(:)Ri*aHiSDe. There are several possible translations of the runes, all involving “Udnan” as the starting point and “ring” in the middle. It could be a simple declaration of ownership, as in “Udnan owns this ring,” but it’s not certain that Udnan is a personal name, and the simple statement leaves out a number of the runes.

Other artefacts found at the same location by Wesolowski, including a late Anglo‑Saxon buckle, indicated the presence of a previously unknown early medieval archaeological site in the area, Brundle added.

“Together, these discoveries point to a community of considerable status and may even suggest the presence of a literate elite living along the fen‑edge landscape.”

The ring has been officially declared treasure at a coroner’s inquest and will now be assessed for valuation. When the fair value is determined, a local museum will be given the opportunity to acquire the ring for the sum assessed. The fee will then be shared by the finder and landowner.

Brundle said it was hoped the artefact, which has since been declared as treasure by the Coroner in Lincoln, could be acquired by Lincoln Museum, where it could “enrich our understanding and appreciation of the early medieval past”.



* This article was originally published here

सुनंदा शर्मा के पैरों में गिरा फैन:डरकर चिल्लाई सिंगर, स्टेज छोड़ा, बाउंसरों ने युवक को स्टेज से नीचे फेंका; शो बीच में ही कैंसिल

पंजाबी सिंगर सुनंदा शर्मा ने गाजियाबाद में बीच में ही लाइव शो कैसिंल कर दिया और परफॉर्मेंस छोड़कर चली गईं। 3 अप्रैल की रात आरकेजीआईटी कॉलेज में चल रहे शो के दौरान अचानक एक युवक स्टेज पर चढ़ गया और उन्हें छूने की कोशिश करने लगा और उनके पैरों में गिर पड़ा। अचानक हुई इस घटना से सुनंदा घबरा गईं। जैसे ही युवक ने उन्हें छुआ, वह जोर से चीखीं और भागकर स्टेज के पीछे चली गईं। माइक ऑन होने की वजह से उनकी चीख साफ सुनाई दी, जिससे माहौल अफरा-तफरी में बदल गया। युवक करीब 2 मिनट तक स्टेज पर रहा और शाहरुख खान के सिग्नेजर स्टाइल में वाहें फैलाकर स्टूडेंट्स की तरफ देखने लगा। आवाज सुनते ही पुलिस तुरंत स्टेज पर पहुंची और युवक को वहां से हटाया। बाउंसरों ने भी उसे पकड़कर स्टेज से नीचे उतारा और बाद में पुलिस के हवाले कर दिया। फिलहाल गाजियाबाद पुलिस ने आरोपी युवक को हिरासत में लेकर पूछताछ शुरू कर दी है। बताया जा रहा है कि युवक उसी कॉलेज का छात्र है। इस घटना के बाद सुनंदा इतनी डर गईं कि दोबारा स्टेज पर नहीं लौटीं। नीचे मौजूद लोग उन्हें वापस बुलाते रहे, लेकिन उनकी टीम ने शो को बीच में ही कैंसिल करने का फैसला लिया। शो रद्द होने की घोषणा के बाद छात्र निराश होकर वापस लौट गए। स्टेज पर सुनंदा के साथ क्या हुआ… शो को नेक्सट लेवल का बनाने की जानकारी की थी साझा शो शुरु होने से पहले सुनंदा काफी एक्साइटेड दिखीं। उन्होंने खुद वीडियो शेयर कर कहा कि मेरा आज गाजिबाद में शो है। इसके बाद वह स्टेज पर आने के बाद कहने लगीं कि आज मैं गाजियाबाद में आई हूं और ऐसा कैसे हो सकता है कि गाजियाबाद वाले मेरे साथ न गुनगुनाएं। सुनंदा ने कहा कि आज का शो नेक्सट लेवल का होने वाला है।

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NMACC की तीसरी एनिवर्सरी में पहुंचे सलमान खान:रणवीर सिंह भी सेलिब्रेशन में शामिल हुए, मुकेश-नीता अंबानी ने इवेंट होस्ट किया था

मुंबई में नीता मुकेश अंबानी कल्चरल सेंटर (NMACC) की तीसरी एनिवर्सरी पर एक इवेंट आयोजित किया गया। यह इवेंट मुकेश अंबानी और नीता अंबानी ने होस्ट किया। सलमान खान, रणवीर सिंह, संजय दत्त, शहीद कपूर जैसे कई सेलेब्स इवेंट में शामिल हुए। इवेंट को लेकर नीता अंबानी ने कहा कि NMACC की शुरुआत के समय उन्होंने भारत की संस्कृति को दुनिया तक पहुंचाने और दुनिया की कला को भारत लाने का लक्ष्य रखा था, और संस्था उसी दिशा में काम कर रही है। देखें इवेंट की तस्वीरें- NMACC की शुरुआत 2023 में हुई थी बता दें कि NMACC की शुरुआत नीता अंबानी ने भारतीय कला और संस्कृति को बढ़ावा देने के उद्देश्य से की थी। यह सेंटर मुंबई के बांद्रा कुर्ला कॉम्प्लेक्स (BKC) में जियो वर्ल्ड सेंटर के अंदर स्थित है। इस सेंटर का उद्घाटन 31 मार्च 2023 को हुआ था। यह तीन दिन का बड़ा लॉन्च इवेंट था, जो 2 अप्रैल तक चला। इसमें रजनीकांत, शाहरुख खान, प्रियंका चोपड़ा के साथ टॉम हॉलैंड और जेंडाया जैसे इंटरनेशनल स्टार्स भी शामिल हुए थे। NMACC को 3 अप्रैल 2023 से आम जनता के लिए खोल दिया गया। यहां शुरुआत में ‘द ग्रेट इंडियन म्यूजिकल: सिविलाइजेशन टू नेशन’, ‘इंडिया इन फैशन’ और ‘संगम’ जैसे बड़े शो हुए हैं। यह सेंटर परफॉर्मिंग आर्ट्स, विजुअल आर्ट्स और ट्रेडिशनल क्राफ्ट्स के लिए अलग-अलग स्पेस उपलब्ध कराता है। यहां का ग्रैंड थिएटर बड़े शो और नाटकों के लिए जाना जाता है, जबकि आर्ट हाउस में भारतीय और इंटरनेशनल कलाकारों की प्रदर्शनियां लगती हैं। ‘स्वदेश’ सेक्शन में भारतीय हस्तशिल्प को प्रमोट किया जाता है। पिछले तीन सालों में यहां 3,500 से ज्यादा शो हुए हैं और 10,500 से अधिक कलाकार हिस्सा ले चुके हैं।

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परवीन बाबी को सिगरेट पीते देख डायरेक्टर ने फिल्म दी:शाही परिवार से थीं; 3 लिव-इन रिलेशनशिप रहे, अमिताभ बच्चन को मानती थीं हत्यारा

करीब साढ़े 400 साल पहले पश्तून बाबी वंश मुगल शासक हुमायूं के साथ गुजरात पहुंचा। यह अफगानिस्तान का शाही परिवार था, जो मुगल साम्राज्य का अहम हिस्सा बना और कई रियासतों पर शासन किया। मुगल सत्ता कमजोर होने पर बाबी और मराठा (गायकवाड़ वंश) में जंग हुई, जिसमें मराठाओं ने अधिकांश गुजरात पर कब्जा किया, लेकिन बाबी ने जुनागढ़, राधनपुर और बालासिनोर पर शासन जारी रखा। मोहम्मद महाबत खान-3, जूनागढ़ की रियासत के आखिरी नवाब रहे। महाबत खान के एक करीबी रिश्तेदार थे वली मोहम्मद खान बाबी। उन्होंने 1940 में जमाल बख्ते बाबी से शादी की। सालों तक उन्हें संतान नहीं हुई। 1947 में ब्रिटिश हुकूमत खत्म होने पर रियासतें खत्म कर सरकारें बनाई जाने लगीं और भारत-पाकिस्तान का बंटवारा हुआ। 15 अगस्त 1947 को आखिरी नवाब महाबत खान ने जूनागढ़ को पाकिस्तान में शामिल करने की घोषणा की, जिस पर लोगों ने आपत्ति जताई। 20 फरवरी 1948 के जनमत में 99% से ज्यादा लोगों ने भारत में शामिल होने का फैसला किया। जब सरकार बनी तो जूनागढ़ के नवाब माहबत के करीबी रिश्तेदार वली मोहम्मद खान की भी रियासत ले ली गई और बदले में उन्हें 100 बीघा जमीन यानी 40 एकड़ (17 लाख 42 हजार वर्ग फुट) दी गई। राजशाही खत्म होने के बावजूद वो शाही जिंदगी जीते थे। शादी के 14 साल बाद उनके घर खुशखबरी आई। पत्नी जमाल बख्ते ने जूनागढ़ की शाही हवेली में 4 अप्रैल 1954 को बेटी को जन्म दिया। नाम दिया गया, परवीन सुल्ताना वली मोहम्मद खानजी बाबी। वही परवीन बाबी जो हिंदी सिनेमा की मशहूर और टॉप एक्ट्रेसेस में शामिल रहीं। वही परवीन बाबी जो अपने ग्लैमर, वेस्टर्नाइजेशन और समय से आगे चलने वाली सोच के लिए जानी गईं। जब महिलाएं पर्दे पर भी सिगरेट थामने से कतराती थीं, तब परवीन बाबी मिनी स्कर्ट पहनकर सड़कों पर सिगरेट पीते हुए टहला करती थीं। जब डायरेक्टर बी.आर.इशारा ने उन्हें पहली बार देखा, तब उनकी इसी बोल्डनेस के मुरीद हो गए और उन्हें तुरंत फिल्म ऑफर कर दी। आज परवीन बाबी की 72वीं बर्थ एनिवर्सरी है। अगर आज वो होतीं, तो अपना 72वां जन्मदिन मनातीं। उनकी जिंदगी के आखिरी दिन बेहद दर्दनाक थे। अकेलेपन की हद ये थी कि जब उनकी मौत हुई तो 4 दिनों तक बॉडी बंद घर में सड़ती रही। आज परवीन बाबी की बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर जानिए उनके समय से आगे चलने और जिंदगी से जुड़े कुछ रोचक किस्से- 54 कमरों की हवेली में हुई परवरिश, पढ़ाई के लिए शर्त पर घर छोड़ा शाही परिवार में जन्मीं परवीन बाबी का बचपन जूनागढ़ की 54 कमरों की हवेली में बीता। इकलौती संतान को ऐशोआराम मिला और घर में 6 नौकर थे। 6 साल की उम्र में पिता का कैंसर से निधन हुआ, जिसके बाद वह दीवान चौक की दो मंजिला हवेली में रहने लगीं। शुरुआती पढ़ाई गुजराती मीडियम स्कूल से हुई। 14 साल की उम्र में मां ने उन्हें पढ़ाई के लिए अहमदाबाद भेजा, हालांकि परिवार इसके खिलाफ था। शर्त रखी गई कि जल्दी शादी कराई जाएगी, जिस पर मां मान गईं और उनका दाखिला सेंट जेवियर कॉलेज में हुआ। कॉलेज में कोर्स न होने के बावजूद परवीन बाबी ने खुद फर्राटे दार अंग्रेजी बोलना सीखा। आगे उन्होंने इंग्लिश और साइकोलॉजी में बेचलर डिग्री ली और अंग्रेजी में मास्टर डिग्री। शर्त के अनुसार 15 साल की उम्र में परवीन की सगाई कजिन जमील खान से हुई, जो पाकिस्तान इंटरनेशनल एयरलाइन्स में पायलट थे। 1971 के भारत-पाक युद्ध के बाद मां ने सगाई तोड़ दी और परवीन को इसकी जानकारी पोस्टकार्ड से मिली। 17 की उम्र में सिगरेट पीती थीं, मिनी स्कर्ट पहनती थीं; यही देख ऑफर हुई फिल्म 1971 में डायरेक्टर बी.आर. इशारा अहमदाबाद में एक नांव दो किनारे की शूटिंग कर रहे थे। भीड़ के बीच उनकी नजर एक लड़की पर पड़ी, जो मिनी स्कर्ट में सिगरेट पी रही थी। लंबी कद-काठी और छरहरे बदन वाली वह लड़की चारमिना सिगरेट थामे हुए थी। वह लड़की परवीन बाबी थीं, जिनकी उम्र 17 साल थी। बी.आर. इशारा समझ गए कि वह खास हैं और उन्होंने फोटोग्राफर से उनकी तस्वीरें लेने को कहा। फोटोग्राफर ने तस्वीरें लीं और बी.आर. इशारा ने परवीन को बुलाकर पूछा- फिल्मों में काम करोगी। आमतौर पर कोई भी लड़की तुरंत हामी भर देती, लेकिन परवीन ने कहा, अगर स्क्रिप्ट पसंद आई तो। बी.आर.इशारा इस एक जवाब में समझ गए कि लड़की में कॉन्फिडेंट की भरमार है। वैसे तो वो कभी अपनी फिल्मों की हीरोइन से किसी तरह का कॉन्ट्रैक्ट साइन नहीं करवाते थे, लेकिन परवीन बाबी का मॉडर्न लुक देख वो भी सोच में पड़ गए। उन्हें लगा कि कहीं ये मॉडर्न ख्यालों वाली लड़की मन न बदल ले। उन्होंने तुरंत कॉन्ट्रैक्ट बनवाया, जिसमें एक ही बात थी कि जब तक उनकी फिल्म नहीं बनती, परवीन किसी दूसरी फिल्म का हिस्सा नहीं बन सकतीं। शाही परिवार से आने के बावजूद परवीन ने फिल्मों में आने का फैसला कर लिया। बेबाक अंदाज में फिल्म मांगी, लॉन्च के लिए डायरेक्टर ने उधार लिया बी.आर. इशारा कॉन्ट्रैक्ट के बाद दूसरी फिल्मों में व्यस्त हो गए और यह बात लगभग भूल गए। इस दौरान परवीन बाबी सितंबर 1971 में कालिको डोम के फैशन शो में शामिल हुईं, जहां साथ काम करने वालीं मॉडल ममता साहू ने उन्हें अपने डायरेक्टर पिता किशोर साहू को सुझाया। किशोर साहू ने परवीन से एक मुलाकात कर उन्हें फिल्म धुंएं की लकीर के लिए फाइनल कर लिया। तभी उन्हें बी.आर.इशारा के कॉन्ट्रैक्ट का पता चला। किशोर साहू ने तुरंत उन्हें कॉल किया और कहा कि जिस हीरोइन से आपका कॉन्ट्रैक्ट है, मैं उसके साथ फिल्म बनाना चाहता हूं। परवीन बाबी का नाम सुनकर उन्हें फिर वो लड़की याद आई। लेकिन उनकी फिल्म बनने में देरी थी, तो उन्होंने कॉन्ट्रैक्ट कैंसिल कर परवीन को वो फिल्म करने की इजाजत दे दी। कुछ महीने बीते। बी.आर.इशारा, मुंबई के राजकमल स्टूडियो में एक फिल्म की मिक्सिंग के सिलसिले में पहुंचे थे। वो सीढ़ियों पर बैठे सिगरेट पी ही रहे थे कि अचानक परवीन उनके ठीक बाजू में आकर बैठ गईं। उन्होंने न हाल पूछा न कोई और बात की, सीधे कहा- आप मेरे साथ फिल्म क्यों नहीं बनाते। बी.आर.इशारा इस सवाल से घिर गए। उनके जहन में भी यही सवाल था कि वो परवीन के साथ फिल्म क्यों नहीं बना रहे। उन्होंने घर लौटते ही अपने फोटोग्राफर को कॉल कर फिल्म बनाने के लिए रकम जुटाने को कहा। फोटोग्राफर ने जैसे-तैसे 2 लाख उधार लिए, जिसकी बदौलत बी.आर.इशारा ने परवीन बाबी के साथ फिल्म चरित्र शुरू की। ये फिल्म पहले बनी और परवीन बाबी की पहली फिल्म रही। इस फिल्म में पहने गए परवीन बाबी के कपड़े उन्होंने खुद खरीदे और चुने। 3 लिव-इन रिलेशनशिप और समय से आगे की सोच परवीन बाबी की शुरुआती 5 फिल्में कुछ खास नहीं रहीं, फिर आया साल 1974। परवीन बाबी को फिल्म दीवार में अमिताभ बच्चन के ऑपोजिट वैश्या अनिता को रोल मिला। फिल्म सुपरहिट रही और परवीन बाबी को हिंदी सिनेमा में खास पहचान मिल गई। आगे उन्होंने अमर अक्बर एंथोनी, काला सोना, काला पत्थर, सुहाग, द बर्निंग ट्रेन, शान, नमक हलाल जैसी कई हिट फिल्में दीं और 70-80 के दशक की हाईएस्ट पेड एक्ट्रेस बनीं। 1972 में फिल्म सेट पर परवीन बाबी की मुलाकात डैनी डेंग्जोंग्पा से हुई। दोनों जल्द करीब आए और शिवाजी पार्क में लिव-इन में रहने लगे, जो उस दौर में आम नहीं था। किसी कारण वो 3 साल बाद अलग हुए, लेकिन दोस्ती बनी रही। डेनी से ब्रेकअप के बाद परवीन बाबी की जिंदगी में कबीर बेदी आए। वो तब ओपन मैरिज में थे। परवीन के लिए कबीर बेदी पत्नी प्रोतिमा को तलाक देना चाहते थे, लेकिन प्रोतिमा इसके लिए राजी नहीं हुईं। परवीन उनके साथ भी लिव-इन में रहीं। साल 1977 में परवीन बाबी ने भारत छोड़ दिया और कबीर बेदी के साथ जिंदगी बिताने के लिए लंदन शिफ्ट हो गईं। लेकिन महज 3 महीनों में ही वो कबीर को लंदन में छोड़कर भारत लौट आईं। भारत लौटकर वो फिर डेनी से संपर्क में आईं, जिन्हें वो हमेशा से अच्छा दोस्त मानती थीं। उन्होंने डेनी से कहा कि कबीर बेदी ने उनका जबरदस्ती अबॉर्शन करवाया, जिससे वो भागकर आ गईं। भारत लौटकर परवीन बाबी ने फिर 1977 से फिल्मों में काम करना शुरू कर दिया। इस समय उनकी महेश भट्ट से नजदीकियां बढ़ने लगीं। 6 महीने तक रिलेशनशिप में रहने के बाद महेश भट्ट ने परवीन बाबी के लिए पत्नी किरण और बच्चों को छोड़ दिया और उनके साथ लिव इन में रहने लगे। तभी परवीन को अमर अकबर एंथोनी और काला पत्थर जैसी फिल्में मिली थीं। परवीन बाबी और वो लाइलाज बीमारी 1979 की शाम, जब महेश भट्ट घर पहुंचे तो देखा कि परवीन बाबी के घर के बाहर उनकी मां डरी-सहमी खड़ी हैं। महेश को देखते ही उन्होंने कहा- देखो परवीन को क्या हुआ। वो अंदर गए तो परवीन कमरे के कौने में चाकू लिए बैठीं कंपकपा रही थीं। महेश भट्ट ने कुछ कहना चाहा तो परवीन ने चुप करवाते हुए कहा, श्श्श…कुछ मत कहना। इस कमरे की जासूसी हो रही है। यहां डिवाइस लगी है। वो मुझे मारना चाहते हैं। महेश समझ गए कि परवीन को इलाज की जरूरत है। वह उन्हें भारत और विदेश के कई डॉक्टरों के पास ले गए, जहां पता चला कि उन्हें सिजोफ्रेनिया है, जिसमें मरीज को वहम होता है कि कोई उसे मारना चाहता है। शॉक ट्रीटमेंट की सलाह दी गई, लेकिन महेश भट्ट ने मना कर दिया। समय के साथ उनकी हालत बिगड़ने लगी। कभी वह एसी या कार में बम होने की बात कहतीं और चलती कार से उतरने लगतीं, तो कभी कहतीं कि लोग उनका पीछा कर रहे हैं। साल 1979 में महेश भट्ट उन्हें लेकर चकाचौंध से दूर बैंग्लोर शिफ्ट हो गए। डॉक्टर्स लगातार उनसे संपर्क में थे, लेकिन परवीन इलाज नहीं करवाना चाहती थीं। एक रोज उन्होंने महेश भट्ट से साफ कहा कि उन्हें परवीन या डॉक्टर्स में से किसी एक को चुनना होगा। महेश भट्ट उन्हें छोड़कर घर से निकले, तो परवीन बिना कपड़े ही उनके पीछे दौड़ पड़ीं। इस दिन महेश भट्ट ने डॉक्टर्स की सलाह पर परवीन से दूरी बना ली। कुछ दिनों बाद परवीन भी फिर मुंबई लौट आईं और फिल्मों में काम करने लगीं। वो मौके जब परवीन बाबी को पागल समझने लगे लोग 1984 में परवीन बाबी को सिक्योरिटी चेक में अजीब बर्ताव करने और पहचान न बता पाने पर अरेस्ट किया गया था। उन्हें न्यूयॉर्क के पागलखाने में रखा गया, तब इंडियन काउंसिल के हस्तक्षेप के बाद उन्हें छोड़ा गया था। 1988 में फिल्म शान के टाइटल सॉन्ग की शूटिंग के दौरान परवीन बाबी ने हंगामा खड़ा कर दिया। उन्होंने शूटिंग रोक दी और कहा कि को-स्टार अमिताभ बच्चन उनके ऊपर झूमर गिराना चाहते हैं और हत्या करना चाहते हैं। वो डरी-सहमी सेट से भाग गईं। 1989 में परवीन बाबी ने फिल्मफेयर मैगजीन को दिए इंटरव्यू में कहा कि अमिताभ बच्चन एक इंटरनेशनल गैंगस्टर हैं, जो उनकी जान लेना चाहते हैं। उन्होंने ये भी दावा किया कि अमिताभ बच्चन के गुंडों ने उन्हें किडनैप कर आइलैंड में रखा और कान के नीचे की तरफ एक चिप लगा दी, जिससे उन्हें ट्रेस किया जा सके। इस इंटरव्यू के बाद इंडस्ट्री में उनकी बीमारी की खबर फैल गई। वह कहती थीं कि लोग उन्हें बदनाम कर साजिश कर रहे हैं। इस समय भी परवीन बाबी एक्स बॉयफ्रेंड डेनी से मिलती थीं। वो डेनी को अच्छा दोस्त मानती थीं। तब तक डेनी की जिंदगी में किम नाम की महिला आ चुकी थीं। वो गर्लफ्रेंड के साथ लिव-इन में थे। जब परवीन आए दिन उनके घर आने लगीं तो उनकी गर्लफ्रेंड ने चिंता जताई। कई बार ऐसा भी हुआ जब डेनी गर्लफ्रेंड के साथ घर लौटे और परवीन उनके बेडरूम में टीवी देखती मिलीं। डेनी ने जब परवीन को ऐसा करने से रोका, तो जवाब में उन्होंने कहा कि ब्रेकअप के बाद वो दोस्ती जारी रखना चाहती हैं, इसमें कुछ गलत नहीं है। एक दिन डेनी, उनकी गर्लफ्रेंड और परवीन डाइनिंग टेबल पर डिनर कर रहे थे। चांदी का वर्क टेबल पर गिरा और डेनी ने फूंक मारकर उसे हटाना चाहा। फूंकते ही परवीन बेहद डर गईं और चीखने लगीं। तब डेनी को पहली बार एहसास हुआ कि वाकई परवीन की मानसिक स्थिति ठीक नहीं है। उन्होंने महेश भट्ट को कॉल कर इसकी खबर दी थी, तब महेश ने उन्हें पूरी कहानी सुनाई। डेनी भी परवीन की इस बीमारी से लड़ने में मदद कर रहे थे। फिर एक दिन अखबार में अमिताभ बच्चन का एक इंटरव्यू छपा, जिसमें उन्होंने डेनी को अच्छा दोस्त कहा। अमिताभ को पहले ही जान का दुश्मन मानने वालीं परवीन ने जैसे ही खबर पढ़ा, तो उन्हें फिर वहम होने लगे। उस दिन जब डेनी घर पहुंचे, तो परवीन ने चीखना शुरू कर दिया। और ये कहा कि डेनी, अमिताभ बच्चन के लिए उनकी जासूसी करते थे। इसके बाद कई मौकों पर परवीन उन्हें देखते ही चीखना शुरू कर देती थीं, यही वजह रही कि उनकी ये दोस्ती हमेशा के लिए खत्म हो गई। बीमारी के कारण परवीन ने इंडस्ट्री और रिश्तेदारों से दूरी बना ली। 2001 में मां के निधन के बाद वह जुहू के रेज रिवेरा अपार्टमेंट में अकेले रहने लगीं और घर से कम ही निकलती थीं। साल 2002 में उन्होंने कई एफिडेविट फाइल कर कहा कि टाडा केस में उनके पास संजय दत्त के खिलाफ कई सबूत हैं। उन्हें कोर्ट में हाजिर होने के लिए कहा गया, लेकिन हर बार वो ये कहकर इनकार कर देती थीं कि बाहर निकलने पर उनकी जान को खतरा है। साल 2002 में ही उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में अमिताभ बच्चन, रॉबर्ट रेडफोर्ड और कई बॉलीवुड-हॉलीवुड एक्टर के खिलाफ उनकी हत्या की साजिश रचने के आरोप में एक याचिका दायर की थी। वैसे तो परवीन मुस्लिम थीं, लेकिन जिंदगी के आखिरी सालों में वो क्रिश्चियन हो चुकी थीं। 22 जनवरी 2005 को परवीन बाबी का शव उनके फ्लैट में सड़ती हुई हालत में मिला। उनकी मौत 2 दिन पहले ही हो चुकी थी। आखिरी समय में कोई उनकी बॉडी भी क्लेम करने हॉस्पिटल नहीं पहुंचा, ऐसे में महेश भट्ट ने बॉडी क्लेम कर उनका अंतिम संस्कार करवाया। जहां डेनी भी मौजूद रहे। परवीन चाहती थीं कि उनको क्रिश्चियन रीति-रिवाजों से दफ्नाया जाए, लेकिन आखिरी समय में कुछ रिश्तेदारों ने इस्लामिक तरीके से उन्हें दफ्नाया।

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परवीन बाबी को सिगरेट पीते देख डायरेक्टर ने फिल्म दी:शाही परिवार से थीं; 3 लिव-इन रिलेशनशिप रहे, अमिताभ बच्चन को मानती थीं हत्यारा

करीब साढ़े 400 साल पहले पश्तून बाबी वंश मुगल शासक हुमायूं के साथ गुजरात पहुंचा। यह अफगानिस्तान का शाही परिवार था, जो मुगल साम्राज्य का अहम हिस्सा बना और कई रियासतों पर शासन किया। मुगल सत्ता कमजोर होने पर बाबी और मराठा (गायकवाड़ वंश) में जंग हुई, जिसमें मराठाओं ने अधिकांश गुजरात पर कब्जा किया, लेकिन बाबी ने जुनागढ़, राधनपुर और बालासिनोर पर शासन जारी रखा। मोहम्मद महाबत खान-3, जूनागढ़ की रियासत के आखिरी नवाब रहे। महाबत खान के एक करीबी रिश्तेदार थे वली मोहम्मद खान बाबी। उन्होंने 1940 में जमाल बख्ते बाबी से शादी की। सालों तक उन्हें संतान नहीं हुई। 1947 में ब्रिटिश हुकूमत खत्म होने पर रियासतें खत्म कर सरकारें बनाई जाने लगीं और भारत-पाकिस्तान का बंटवारा हुआ। 15 अगस्त 1947 को आखिरी नवाब महाबत खान ने जूनागढ़ को पाकिस्तान में शामिल करने की घोषणा की, जिस पर लोगों ने आपत्ति जताई। 20 फरवरी 1948 के जनमत में 99% से ज्यादा लोगों ने भारत में शामिल होने का फैसला किया। जब सरकार बनी तो जूनागढ़ के नवाब माहबत के करीबी रिश्तेदार वली मोहम्मद खान की भी रियासत ले ली गई और बदले में उन्हें 100 बीघा जमीन यानी 40 एकड़ (17 लाख 42 हजार वर्ग फुट) दी गई। राजशाही खत्म होने के बावजूद वो शाही जिंदगी जीते थे। शादी के 14 साल बाद उनके घर खुशखबरी आई। पत्नी जमाल बख्ते ने जूनागढ़ की शाही हवेली में 4 अप्रैल 1954 को बेटी को जन्म दिया। नाम दिया गया, परवीन सुल्ताना वली मोहम्मद खानजी बाबी। वही परवीन बाबी जो हिंदी सिनेमा की मशहूर और टॉप एक्ट्रेसेस में शामिल रहीं। वही परवीन बाबी जो अपने ग्लैमर, वेस्टर्नाइजेशन और समय से आगे चलने वाली सोच के लिए जानी गईं। जब महिलाएं पर्दे पर भी सिगरेट थामने से कतराती थीं, तब परवीन बाबी मिनी स्कर्ट पहनकर सड़कों पर सिगरेट पीते हुए टहला करती थीं। जब डायरेक्टर बी.आर.इशारा ने उन्हें पहली बार देखा, तब उनकी इसी बोल्डनेस के मुरीद हो गए और उन्हें तुरंत फिल्म ऑफर कर दी। आज परवीन बाबी की 72वीं बर्थ एनिवर्सरी है। अगर आज वो होतीं, तो अपना 72वां जन्मदिन मनातीं। उनकी जिंदगी के आखिरी दिन बेहद दर्दनाक थे। अकेलेपन की हद ये थी कि जब उनकी मौत हुई तो 4 दिनों तक बॉडी बंद घर में सड़ती रही। आज परवीन बाबी की बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर जानिए उनके समय से आगे चलने और जिंदगी से जुड़े कुछ रोचक किस्से- 54 कमरों की हवेली में हुई परवरिश, पढ़ाई के लिए शर्त पर घर छोड़ा शाही परिवार में जन्मीं परवीन बाबी का बचपन जूनागढ़ की 54 कमरों की हवेली में बीता। इकलौती संतान को ऐशोआराम मिला और घर में 6 नौकर थे। 6 साल की उम्र में पिता का कैंसर से निधन हुआ, जिसके बाद वह दीवान चौक की दो मंजिला हवेली में रहने लगीं। शुरुआती पढ़ाई गुजराती मीडियम स्कूल से हुई। 14 साल की उम्र में मां ने उन्हें पढ़ाई के लिए अहमदाबाद भेजा, हालांकि परिवार इसके खिलाफ था। शर्त रखी गई कि जल्दी शादी कराई जाएगी, जिस पर मां मान गईं और उनका दाखिला सेंट जेवियर कॉलेज में हुआ। कॉलेज में कोर्स न होने के बावजूद परवीन बाबी ने खुद फर्राटे दार अंग्रेजी बोलना सीखा। आगे उन्होंने इंग्लिश और साइकोलॉजी में बेचलर डिग्री ली और अंग्रेजी में मास्टर डिग्री। शर्त के अनुसार 15 साल की उम्र में परवीन की सगाई कजिन जमील खान से हुई, जो पाकिस्तान इंटरनेशनल एयरलाइन्स में पायलट थे। 1971 के भारत-पाक युद्ध के बाद मां ने सगाई तोड़ दी और परवीन को इसकी जानकारी पोस्टकार्ड से मिली। 17 की उम्र में सिगरेट पीती थीं, मिनी स्कर्ट पहनती थीं; यही देख ऑफर हुई फिल्म 1971 में डायरेक्टर बी.आर. इशारा अहमदाबाद में एक नांव दो किनारे की शूटिंग कर रहे थे। भीड़ के बीच उनकी नजर एक लड़की पर पड़ी, जो मिनी स्कर्ट में सिगरेट पी रही थी। लंबी कद-काठी और छरहरे बदन वाली वह लड़की चारमिना सिगरेट थामे हुए थी। वह लड़की परवीन बाबी थीं, जिनकी उम्र 17 साल थी। बी.आर. इशारा समझ गए कि वह खास हैं और उन्होंने फोटोग्राफर से उनकी तस्वीरें लेने को कहा। फोटोग्राफर ने तस्वीरें लीं और बी.आर. इशारा ने परवीन को बुलाकर पूछा- फिल्मों में काम करोगी। आमतौर पर कोई भी लड़की तुरंत हामी भर देती, लेकिन परवीन ने कहा, अगर स्क्रिप्ट पसंद आई तो। बी.आर.इशारा इस एक जवाब में समझ गए कि लड़की में कॉन्फिडेंट की भरमार है। वैसे तो वो कभी अपनी फिल्मों की हीरोइन से किसी तरह का कॉन्ट्रैक्ट साइन नहीं करवाते थे, लेकिन परवीन बाबी का मॉडर्न लुक देख वो भी सोच में पड़ गए। उन्हें लगा कि कहीं ये मॉडर्न ख्यालों वाली लड़की मन न बदल ले। उन्होंने तुरंत कॉन्ट्रैक्ट बनवाया, जिसमें एक ही बात थी कि जब तक उनकी फिल्म नहीं बनती, परवीन किसी दूसरी फिल्म का हिस्सा नहीं बन सकतीं। शाही परिवार से आने के बावजूद परवीन ने फिल्मों में आने का फैसला कर लिया। बेबाक अंदाज में फिल्म मांगी, लॉन्च के लिए डायरेक्टर ने उधार लिया बी.आर. इशारा कॉन्ट्रैक्ट के बाद दूसरी फिल्मों में व्यस्त हो गए और यह बात लगभग भूल गए। इस दौरान परवीन बाबी सितंबर 1971 में कालिको डोम के फैशन शो में शामिल हुईं, जहां साथ काम करने वालीं मॉडल ममता साहू ने उन्हें अपने डायरेक्टर पिता किशोर साहू को सुझाया। किशोर साहू ने परवीन से एक मुलाकात कर उन्हें फिल्म धुंएं की लकीर के लिए फाइनल कर लिया। तभी उन्हें बी.आर.इशारा के कॉन्ट्रैक्ट का पता चला। किशोर साहू ने तुरंत उन्हें कॉल किया और कहा कि जिस हीरोइन से आपका कॉन्ट्रैक्ट है, मैं उसके साथ फिल्म बनाना चाहता हूं। परवीन बाबी का नाम सुनकर उन्हें फिर वो लड़की याद आई। लेकिन उनकी फिल्म बनने में देरी थी, तो उन्होंने कॉन्ट्रैक्ट कैंसिल कर परवीन को वो फिल्म करने की इजाजत दे दी। कुछ महीने बीते। बी.आर.इशारा, मुंबई के राजकमल स्टूडियो में एक फिल्म की मिक्सिंग के सिलसिले में पहुंचे थे। वो सीढ़ियों पर बैठे सिगरेट पी ही रहे थे कि अचानक परवीन उनके ठीक बाजू में आकर बैठ गईं। उन्होंने न हाल पूछा न कोई और बात की, सीधे कहा- आप मेरे साथ फिल्म क्यों नहीं बनाते। बी.आर.इशारा इस सवाल से घिर गए। उनके जहन में भी यही सवाल था कि वो परवीन के साथ फिल्म क्यों नहीं बना रहे। उन्होंने घर लौटते ही अपने फोटोग्राफर को कॉल कर फिल्म बनाने के लिए रकम जुटाने को कहा। फोटोग्राफर ने जैसे-तैसे 2 लाख उधार लिए, जिसकी बदौलत बी.आर.इशारा ने परवीन बाबी के साथ फिल्म चरित्र शुरू की। ये फिल्म पहले बनी और परवीन बाबी की पहली फिल्म रही। इस फिल्म में पहने गए परवीन बाबी के कपड़े उन्होंने खुद खरीदे और चुने। 3 लिव-इन रिलेशनशिप और समय से आगे की सोच परवीन बाबी की शुरुआती 5 फिल्में कुछ खास नहीं रहीं, फिर आया साल 1974। परवीन बाबी को फिल्म दीवार में अमिताभ बच्चन के ऑपोजिट वैश्या अनिता को रोल मिला। फिल्म सुपरहिट रही और परवीन बाबी को हिंदी सिनेमा में खास पहचान मिल गई। आगे उन्होंने अमर अक्बर एंथोनी, काला सोना, काला पत्थर, सुहाग, द बर्निंग ट्रेन, शान, नमक हलाल जैसी कई हिट फिल्में दीं और 70-80 के दशक की हाईएस्ट पेड एक्ट्रेस बनीं। 1972 में फिल्म सेट पर परवीन बाबी की मुलाकात डैनी डेंग्जोंग्पा से हुई। दोनों जल्द करीब आए और शिवाजी पार्क में लिव-इन में रहने लगे, जो उस दौर में आम नहीं था। किसी कारण वो 3 साल बाद अलग हुए, लेकिन दोस्ती बनी रही। डेनी से ब्रेकअप के बाद परवीन बाबी की जिंदगी में कबीर बेदी आए। वो तब ओपन मैरिज में थे। परवीन के लिए कबीर बेदी पत्नी प्रोतिमा को तलाक देना चाहते थे, लेकिन प्रोतिमा इसके लिए राजी नहीं हुईं। परवीन उनके साथ भी लिव-इन में रहीं। साल 1977 में परवीन बाबी ने भारत छोड़ दिया और कबीर बेदी के साथ जिंदगी बिताने के लिए लंदन शिफ्ट हो गईं। लेकिन महज 3 महीनों में ही वो कबीर को लंदन में छोड़कर भारत लौट आईं। भारत लौटकर वो फिर डेनी से संपर्क में आईं, जिन्हें वो हमेशा से अच्छा दोस्त मानती थीं। उन्होंने डेनी से कहा कि कबीर बेदी ने उनका जबरदस्ती अबॉर्शन करवाया, जिससे वो भागकर आ गईं। भारत लौटकर परवीन बाबी ने फिर 1977 से फिल्मों में काम करना शुरू कर दिया। इस समय उनकी महेश भट्ट से नजदीकियां बढ़ने लगीं। 6 महीने तक रिलेशनशिप में रहने के बाद महेश भट्ट ने परवीन बाबी के लिए पत्नी किरण और बच्चों को छोड़ दिया और उनके साथ लिव इन में रहने लगे। तभी परवीन को अमर अकबर एंथोनी और काला पत्थर जैसी फिल्में मिली थीं। परवीन बाबी और वो लाइलाज बीमारी 1979 की शाम, जब महेश भट्ट घर पहुंचे तो देखा कि परवीन बाबी के घर के बाहर उनकी मां डरी-सहमी खड़ी हैं। महेश को देखते ही उन्होंने कहा- देखो परवीन को क्या हुआ। वो अंदर गए तो परवीन कमरे के कौने में चाकू लिए बैठीं कंपकपा रही थीं। महेश भट्ट ने कुछ कहना चाहा तो परवीन ने चुप करवाते हुए कहा, श्श्श…कुछ मत कहना। इस कमरे की जासूसी हो रही है। यहां डिवाइस लगी है। वो मुझे मारना चाहते हैं। महेश समझ गए कि परवीन को इलाज की जरूरत है। वह उन्हें भारत और विदेश के कई डॉक्टरों के पास ले गए, जहां पता चला कि उन्हें सिजोफ्रेनिया है, जिसमें मरीज को वहम होता है कि कोई उसे मारना चाहता है। शॉक ट्रीटमेंट की सलाह दी गई, लेकिन महेश भट्ट ने मना कर दिया। समय के साथ उनकी हालत बिगड़ने लगी। कभी वह एसी या कार में बम होने की बात कहतीं और चलती कार से उतरने लगतीं, तो कभी कहतीं कि लोग उनका पीछा कर रहे हैं। साल 1979 में महेश भट्ट उन्हें लेकर चकाचौंध से दूर बैंग्लोर शिफ्ट हो गए। डॉक्टर्स लगातार उनसे संपर्क में थे, लेकिन परवीन इलाज नहीं करवाना चाहती थीं। एक रोज उन्होंने महेश भट्ट से साफ कहा कि उन्हें परवीन या डॉक्टर्स में से किसी एक को चुनना होगा। महेश भट्ट उन्हें छोड़कर घर से निकले, तो परवीन बिना कपड़े ही उनके पीछे दौड़ पड़ीं। इस दिन महेश भट्ट ने डॉक्टर्स की सलाह पर परवीन से दूरी बना ली। कुछ दिनों बाद परवीन भी फिर मुंबई लौट आईं और फिल्मों में काम करने लगीं। वो मौके जब परवीन बाबी को पागल समझने लगे लोग 1984 में परवीन बाबी को सिक्योरिटी चेक में अजीब बर्ताव करने और पहचान न बता पाने पर अरेस्ट किया गया था। उन्हें न्यूयॉर्क के पागलखाने में रखा गया, तब इंडियन काउंसिल के हस्तक्षेप के बाद उन्हें छोड़ा गया था। 1988 में फिल्म शान के टाइटल सॉन्ग की शूटिंग के दौरान परवीन बाबी ने हंगामा खड़ा कर दिया। उन्होंने शूटिंग रोक दी और कहा कि को-स्टार अमिताभ बच्चन उनके ऊपर झूमर गिराना चाहते हैं और हत्या करना चाहते हैं। वो डरी-सहमी सेट से भाग गईं। 1989 में परवीन बाबी ने फिल्मफेयर मैगजीन को दिए इंटरव्यू में कहा कि अमिताभ बच्चन एक इंटरनेशनल गैंगस्टर हैं, जो उनकी जान लेना चाहते हैं। उन्होंने ये भी दावा किया कि अमिताभ बच्चन के गुंडों ने उन्हें किडनैप कर आइलैंड में रखा और कान के नीचे की तरफ एक चिप लगा दी, जिससे उन्हें ट्रेस किया जा सके। इस इंटरव्यू के बाद इंडस्ट्री में उनकी बीमारी की खबर फैल गई। वह कहती थीं कि लोग उन्हें बदनाम कर साजिश कर रहे हैं। इस समय भी परवीन बाबी एक्स बॉयफ्रेंड डेनी से मिलती थीं। वो डेनी को अच्छा दोस्त मानती थीं। तब तक डेनी की जिंदगी में किम नाम की महिला आ चुकी थीं। वो गर्लफ्रेंड के साथ लिव-इन में थे। जब परवीन आए दिन उनके घर आने लगीं तो उनकी गर्लफ्रेंड ने चिंता जताई। कई बार ऐसा भी हुआ जब डेनी गर्लफ्रेंड के साथ घर लौटे और परवीन उनके बेडरूम में टीवी देखती मिलीं। डेनी ने जब परवीन को ऐसा करने से रोका, तो जवाब में उन्होंने कहा कि ब्रेकअप के बाद वो दोस्ती जारी रखना चाहती हैं, इसमें कुछ गलत नहीं है। एक दिन डेनी, उनकी गर्लफ्रेंड और परवीन डाइनिंग टेबल पर डिनर कर रहे थे। चांदी का वर्क टेबल पर गिरा और डेनी ने फूंक मारकर उसे हटाना चाहा। फूंकते ही परवीन बेहद डर गईं और चीखने लगीं। तब डेनी को पहली बार एहसास हुआ कि वाकई परवीन की मानसिक स्थिति ठीक नहीं है। उन्होंने महेश भट्ट को कॉल कर इसकी खबर दी थी, तब महेश ने उन्हें पूरी कहानी सुनाई। डेनी भी परवीन की इस बीमारी से लड़ने में मदद कर रहे थे। फिर एक दिन अखबार में अमिताभ बच्चन का एक इंटरव्यू छपा, जिसमें उन्होंने डेनी को अच्छा दोस्त कहा। अमिताभ को पहले ही जान का दुश्मन मानने वालीं परवीन ने जैसे ही खबर पढ़ा, तो उन्हें फिर वहम होने लगे। उस दिन जब डेनी घर पहुंचे, तो परवीन ने चीखना शुरू कर दिया। और ये कहा कि डेनी, अमिताभ बच्चन के लिए उनकी जासूसी करते थे। इसके बाद कई मौकों पर परवीन उन्हें देखते ही चीखना शुरू कर देती थीं, यही वजह रही कि उनकी ये दोस्ती हमेशा के लिए खत्म हो गई। बीमारी के कारण परवीन ने इंडस्ट्री और रिश्तेदारों से दूरी बना ली। 2001 में मां के निधन के बाद वह जुहू के रेज रिवेरा अपार्टमेंट में अकेले रहने लगीं और घर से कम ही निकलती थीं। साल 2002 में उन्होंने कई एफिडेविट फाइल कर कहा कि टाडा केस में उनके पास संजय दत्त के खिलाफ कई सबूत हैं। उन्हें कोर्ट में हाजिर होने के लिए कहा गया, लेकिन हर बार वो ये कहकर इनकार कर देती थीं कि बाहर निकलने पर उनकी जान को खतरा है। साल 2002 में ही उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में अमिताभ बच्चन, रॉबर्ट रेडफोर्ड और कई बॉलीवुड-हॉलीवुड एक्टर के खिलाफ उनकी हत्या की साजिश रचने के आरोप में एक याचिका दायर की थी। वैसे तो परवीन मुस्लिम थीं, लेकिन जिंदगी के आखिरी सालों में वो क्रिश्चियन हो चुकी थीं। 22 जनवरी 2005 को परवीन बाबी का शव उनके फ्लैट में सड़ती हुई हालत में मिला। उनकी मौत 2 दिन पहले ही हो चुकी थी। आखिरी समय में कोई उनकी बॉडी भी क्लेम करने हॉस्पिटल नहीं पहुंचा, ऐसे में महेश भट्ट ने बॉडी क्लेम कर उनका अंतिम संस्कार करवाया। जहां डेनी भी मौजूद रहे। परवीन चाहती थीं कि उनको क्रिश्चियन रीति-रिवाजों से दफ्नाया जाए, लेकिन आखिरी समय में कुछ रिश्तेदारों ने इस्लामिक तरीके से उन्हें दफ्नाया।

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Wreck of Danish flagship blown up by Nelson found

The remains of the Danish–Norwegian flagship Dannebroge, destroyed by the British Navy under the command of then Vice Admiral Horatio Nelson during the Battle of Copenhagen in 1801, have been discovered by maritime archaeologists from the Danish Viking Ship Museum.

The blockship Dannebroge was at anchor in the harbor of Copenhagen, serving as a central command ship of the Danish–Norwegian fleet as it was under heavy attack by the Royal British Navy. In the early morning of April 2, 1801, Dannebroge was bombarded by two British ships and hit with incendiary shells. The crew had to fight the fires that had broken out all over the ship while still dodging artillery. The battle raged for hours, the Danish fleet steadily weakening, until at 4:00 PM a ceasefire was declared and fighting stopped.

Dannebroge, adrift and aflame, exploded at 4:30 PM. What was left of the ship and its contents sank onto the seabed. Out of the crew of 357, 53 died on the ship and another three were wounded so severely they died from their injuries in the hospital. There were 48 wounded who survived, and 19 were lost, their bodies never recovered.

Archaeologists began exploring the seabed of Copenhagen harbor over the past few weeks in advance of the planned construction of the new artificial island of Lynetteholm. The site is 50 feet below the surface, dark, cold and silty. Visibility is almost zero, so divers had to move slowly and deliberately. The excavation has so far revealed ship timbers, a ballast pile, cannon and objects belonging to the crew — uniform badges, shoes, clay pipes, weapons. A fragment of a jawbone of one of 19 missing was found.

Archaeological materials form the Battle of Copenhagen have never been excavated or even sought out before now, despite the significance of the battle in Danish history.

The Battle of Copenhagen is part of our national narrative, written into books, painted on canvases, and embedded in our culture. For that reason, every single find is—according to Otto Uldum—an important source for understanding our shared history. And this means that the excavation of Dannebroge is not only about archaeology, but about an event that has shaped Denmark’s history and self‑understanding:

“Every time we say even a little something about a shoe or a bone, it matters just a bit more, because this is actually the Battle of Copenhagen.”

According to the archaeologist, the archaeological finds contribute a dimension that written sources and the museums’ collections of prestigious objects do not contain. These are not objects created to commemorate or impress. They are the remains of the majority, offering broader perspectives and new sources for a history we may think we already know:

“Statistically, it is easier for us to find something that belonged to the ordinary sailor. We have found more remains of shoes from common gunners than of the officers’ fine boots—and you have to be lucky to find those, because there weren’t many such boots on board, but there were an awful lot of those gunner’s shoes. In that sense, what we find is probably more representative—socially speaking,” Otto Uldum concludes.



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आर्मी का सपना टूटा, एस्पिरेंट्स में एसके बनकर छाए:अभिलाष थपलियाल बोले- आउटसाइडर होने का सबसे बड़ा स्ट्रगल, इंडस्ट्री में अपना काम खुद बताना पड़ता है

अभिलाष थपलियाल इन दिनों वेब सीरीज ‘एस्पिरेंट्स’ के सीजन 3 को लेकर चर्चा में हैं, जहां उनका ‘एसके’ का किरदार दर्शकों के दिलों में खास जगह बना चुका है। दैनिक भास्कर से बातचीत में अभिलाष ने बताया कि इस बार भी शो को जबरदस्त रिस्पॉन्स मिल रहा है, खासकर दोस्ती से जुड़े इमोशनल सीन लोगों को गहराई से छू रहे हैं। उन्होंने कहा कि ‘एसके’ का किरदार उन लोगों की कहानी है जो जिंदगी में फेल होते हैं, इसलिए दर्शक उससे खुद को जोड़ पाते हैं। अभिलाष ने अपने करियर की शुरुआत, रेडियो जॉकी से लेकर फिल्मों और वेब सीरीज तक के सफर को भी साझा किया। उन्होंने बताया कि एक्टिंग उनका पहला सपना नहीं था, बल्कि वह आर्मी जॉइन करना चाहते थे। इंडस्ट्री में आउटसाइडर होने के कारण आई चुनौतियों और लगातार खुद को साबित करने की जरूरत पर भी उन्होंने खुलकर बात की। पेश है कुछ प्रमुख अंश.. ‘एस्पिरेंट्स’ सीजन 3 को लेकर कैसा रिस्पॉन्स मिल रहा है? बहुत शानदार। एस्पिरेंट्स से लोग पहले ही जुड़ चुके हैं, इसलिए इस बार भी प्यार मिल रहा है। खासकर दोस्ती वाले सीन काफी वायरल हुए हैं। लोग कहते हैं कि देखकर भावुक हो गए। आपके किरदार ‘एसके’ से लोग इतना कनेक्ट क्यों करते हैं? क्योंकि ये सिर्फ टॉपर की कहानी नहीं है, बल्कि उन लोगों की कहानी है जो फेल हो जाते हैं। हम सब कहीं न कहीं वैसा ही महसूस करते हैं, इसलिए कनेक्शन बनता है। क्या बचपन से ही एक्टर बनना चाहते थे? बिल्कुल नहीं। मैं तो आर्मी जॉइन करना चाहता था। मैं फौजी परिवार से हूं, NDA क्लियर करना सपना था, लेकिन वो पूरा नहीं हुआ। एक्टिंग में एंट्री कैसे हुई? मैं दिल्ली में रेडियो जॉकी था। वहीं फिल्म ‘तेवर’ के डायरेक्टर अमित शर्मा से मुलाकात हुई। उन्होंने मुझे फिल्मों में ट्राई करने को कहा। फिर मुंबई आया और पहली फिल्म पहली फिल्म ‘दिल जंगली’ मिली। ‘एस्पिरेंट्स’ से पहले करियर कैसा था? शुरुआत में फिल्में ज्यादा नहीं चलीं, फिर टीवी और कॉमेडी शोज किए। सोशल मीडिया पर पॉलिटिकल सटायर भी करता था। लेकिन असली पहचान ‘एस्पिरेंट्स’ से मिली। इस सीरीज में ‘एसके’ का रोल कैसे मिला? मैंने ऑडिशन दिया था। पहले मुझे लगा मैं ‘अभिलाष’ का किरदार करूंगा, लेकिन बाद में पता चला कि मुझे ‘एसके’ का रोल मिल रहा है। ‘एस्पिरेंट्स’ सीजन 1 के बाद क्या जिम्मेदारी बढ़ गई थी? हां, लेकिन मैं स्क्रिप्ट में ज्यादा बदलाव नहीं करता। जो लिखा होता है, उसे ईमानदारी से निभाता हूं। मेरा मानना है “कम में बम”, कम सीन हों, लेकिन असरदार हों। रेडियो से एक्टिंग तक का सफर कैसा रहा? रेडियो ने मुझे बहुत कुछ सिखाया। वहां सिर्फ आवाज से पहचान बनती है। वही कॉन्फिडेंस एक्टिंग में काम आया। क्या आपने एक्टिंग की ट्रेनिंग ली है? नहीं, मैंने कोई फॉर्मल ट्रेनिंग नहीं ली। जो सीखा, लाइफ से सीखा। अलग-अलग जगह रहने से अलग-अलग भाषा और एक्सेंट पकड़ना आसान हो गया। ‘एस्पिरेंट्स’ के बाद करियर में क्या बदलाव आया? इसके बाद मुझे कॉन्फिडेंस आया कि मैं खुद को एक्टर कह सकता हूं। फिर मैंने अनुराग कश्यप जैसे डायरेक्टर्स के साथ काम किया और अलग-अलग रोल मिले। आपने किन-किन फिल्मों और प्रोजेक्ट्स में काम किया है? ‘एस्पिरेंट्स’ के बाद मुझे कई अच्छे प्रोजेक्ट्स मिले। मैंने फिल्म ‘ब्लर’ में काम किया, अनुराग कश्यप के साथ फिल्म ‘केनेडी’ में काम किया। और अश्विनी अय्यर तिवारी के साथ वेब सीरीज ‘फाड़ू’ में काम किया। इन प्रोजेक्ट्स ने मुझे एक एक्टर के तौर पर काफी कॉन्फिडेंस दिया। इंडस्ट्री में सबसे बड़ा स्ट्रगल क्या रहा? आउटसाइडर होने का। आपको खुद जाकर लोगों को बताना पड़ता है कि आप क्या कर सकते हैं। यहां कोई गॉडफादर नहीं होता। आज भी स्ट्रगल जारी है? बिल्कुल। मैं आज भी डायरेक्टर्स और प्रोड्यूसर्स से मिलता हूं, खुद को पिच करता हूं। यह प्रोसेस कभी खत्म नहीं होती। खुद को बेहतर बनाने के लिए क्या कर रहे हैं? मैं FTII और NSD के स्टूडेंट्स के साथ शॉर्ट फिल्म्स कर रहा हूं। वहां से बहुत कुछ सीखने को मिलता है। मैं अपनी एक्टिंग को लगातार बेहतर करना चाहता हूं।

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आर्मी का सपना टूटा, एस्पिरेंट्स में एसके बनकर छाए:अभिलाष थपलियाल बोले- आउटसाइडर होने का सबसे बड़ा स्ट्रगल, इंडस्ट्री में अपना काम खुद बताना पड़ता है

अभिलाष थपलियाल इन दिनों वेब सीरीज ‘एस्पिरेंट्स’ के सीजन 3 को लेकर चर्चा में हैं, जहां उनका ‘एसके’ का किरदार दर्शकों के दिलों में खास जगह बना चुका है। दैनिक भास्कर से बातचीत में अभिलाष ने बताया कि इस बार भी शो को जबरदस्त रिस्पॉन्स मिल रहा है, खासकर दोस्ती से जुड़े इमोशनल सीन लोगों को गहराई से छू रहे हैं। उन्होंने कहा कि ‘एसके’ का किरदार उन लोगों की कहानी है जो जिंदगी में फेल होते हैं, इसलिए दर्शक उससे खुद को जोड़ पाते हैं। अभिलाष ने अपने करियर की शुरुआत, रेडियो जॉकी से लेकर फिल्मों और वेब सीरीज तक के सफर को भी साझा किया। उन्होंने बताया कि एक्टिंग उनका पहला सपना नहीं था, बल्कि वह आर्मी जॉइन करना चाहते थे। इंडस्ट्री में आउटसाइडर होने के कारण आई चुनौतियों और लगातार खुद को साबित करने की जरूरत पर भी उन्होंने खुलकर बात की। पेश है कुछ प्रमुख अंश.. ‘एस्पिरेंट्स’ सीजन 3 को लेकर कैसा रिस्पॉन्स मिल रहा है? बहुत शानदार। एस्पिरेंट्स से लोग पहले ही जुड़ चुके हैं, इसलिए इस बार भी प्यार मिल रहा है। खासकर दोस्ती वाले सीन काफी वायरल हुए हैं। लोग कहते हैं कि देखकर भावुक हो गए। आपके किरदार ‘एसके’ से लोग इतना कनेक्ट क्यों करते हैं? क्योंकि ये सिर्फ टॉपर की कहानी नहीं है, बल्कि उन लोगों की कहानी है जो फेल हो जाते हैं। हम सब कहीं न कहीं वैसा ही महसूस करते हैं, इसलिए कनेक्शन बनता है। क्या बचपन से ही एक्टर बनना चाहते थे? बिल्कुल नहीं। मैं तो आर्मी जॉइन करना चाहता था। मैं फौजी परिवार से हूं, NDA क्लियर करना सपना था, लेकिन वो पूरा नहीं हुआ। एक्टिंग में एंट्री कैसे हुई? मैं दिल्ली में रेडियो जॉकी था। वहीं फिल्म ‘तेवर’ के डायरेक्टर अमित शर्मा से मुलाकात हुई। उन्होंने मुझे फिल्मों में ट्राई करने को कहा। फिर मुंबई आया और पहली फिल्म पहली फिल्म ‘दिल जंगली’ मिली। ‘एस्पिरेंट्स’ से पहले करियर कैसा था? शुरुआत में फिल्में ज्यादा नहीं चलीं, फिर टीवी और कॉमेडी शोज किए। सोशल मीडिया पर पॉलिटिकल सटायर भी करता था। लेकिन असली पहचान ‘एस्पिरेंट्स’ से मिली। इस सीरीज में ‘एसके’ का रोल कैसे मिला? मैंने ऑडिशन दिया था। पहले मुझे लगा मैं ‘अभिलाष’ का किरदार करूंगा, लेकिन बाद में पता चला कि मुझे ‘एसके’ का रोल मिल रहा है। ‘एस्पिरेंट्स’ सीजन 1 के बाद क्या जिम्मेदारी बढ़ गई थी? हां, लेकिन मैं स्क्रिप्ट में ज्यादा बदलाव नहीं करता। जो लिखा होता है, उसे ईमानदारी से निभाता हूं। मेरा मानना है “कम में बम”, कम सीन हों, लेकिन असरदार हों। रेडियो से एक्टिंग तक का सफर कैसा रहा? रेडियो ने मुझे बहुत कुछ सिखाया। वहां सिर्फ आवाज से पहचान बनती है। वही कॉन्फिडेंस एक्टिंग में काम आया। क्या आपने एक्टिंग की ट्रेनिंग ली है? नहीं, मैंने कोई फॉर्मल ट्रेनिंग नहीं ली। जो सीखा, लाइफ से सीखा। अलग-अलग जगह रहने से अलग-अलग भाषा और एक्सेंट पकड़ना आसान हो गया। ‘एस्पिरेंट्स’ के बाद करियर में क्या बदलाव आया? इसके बाद मुझे कॉन्फिडेंस आया कि मैं खुद को एक्टर कह सकता हूं। फिर मैंने अनुराग कश्यप जैसे डायरेक्टर्स के साथ काम किया और अलग-अलग रोल मिले। आपने किन-किन फिल्मों और प्रोजेक्ट्स में काम किया है? ‘एस्पिरेंट्स’ के बाद मुझे कई अच्छे प्रोजेक्ट्स मिले। मैंने फिल्म ‘ब्लर’ में काम किया, अनुराग कश्यप के साथ फिल्म ‘केनेडी’ में काम किया। और अश्विनी अय्यर तिवारी के साथ वेब सीरीज ‘फाड़ू’ में काम किया। इन प्रोजेक्ट्स ने मुझे एक एक्टर के तौर पर काफी कॉन्फिडेंस दिया। इंडस्ट्री में सबसे बड़ा स्ट्रगल क्या रहा? आउटसाइडर होने का। आपको खुद जाकर लोगों को बताना पड़ता है कि आप क्या कर सकते हैं। यहां कोई गॉडफादर नहीं होता। आज भी स्ट्रगल जारी है? बिल्कुल। मैं आज भी डायरेक्टर्स और प्रोड्यूसर्स से मिलता हूं, खुद को पिच करता हूं। यह प्रोसेस कभी खत्म नहीं होती। खुद को बेहतर बनाने के लिए क्या कर रहे हैं? मैं FTII और NSD के स्टूडेंट्स के साथ शॉर्ट फिल्म्स कर रहा हूं। वहां से बहुत कुछ सीखने को मिलता है। मैं अपनी एक्टिंग को लगातार बेहतर करना चाहता हूं।

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तापसी पन्नू बोलीं- फिल्में फ्लॉप हुईं, पनौती कहा गया:हीरोइन बनने पर संदेह था, कंटेंट-ड्रिवन फिल्मों से इंडस्ट्री में अपनी अलग जगह बनाई

दिल्ली के एक साधारण परिवार से निकलकर इंजीनियरिंग करने वाली तापसी पन्नू ने कभी नहीं सोचा था कि वह ग्लैमर इंडस्ट्री में पहचान बनाएंगी। मॉडलिंग से शुरुआत कर उन्हें साउथ फिल्म इंडस्ट्री में मौका मिला, लेकिन वहां लंबे समय तक सिर्फ ग्लैमरस किरदारों तक सीमित रहीं। कई फिल्मों के फ्लॉप होने पर उन्हें पनौती कहा गया, जिससे आत्मविश्वास को गहरा झटका लगा। बॉलीवुड में एंट्री आसान नहीं रही। ‘चश्मे बद्दूर’ से डेब्यू के बाद असफलताओं और आत्म-संदेह के दौर में तापसी ने खुद को संभाला। उन्होंने स्वीकार किया कि वह अपने लुक, आत्मविश्वास और काबिलियत को लेकर असुरक्षित महसूस करती थीं। इस संघर्ष ने उन्हें मजबूत बनाया और बेहतर फैसले लेना सिखाया। फिर आया टर्निंग पॉइंट- पिंक। इस फिल्म ने उनकी इमेज बदली और उन्हें गंभीर अभिनेत्री के रूप में पहचान दिलाई। इसके बाद उन्होंने कंटेंट-ड्रिवन फिल्मों का रास्ता चुना और इंडस्ट्री में अपनी अलग जगह बनाई। आज की सक्सेस स्टोरी में जानते हैं तापसी पन्नू के करियर और निजी जीवन से जुड़ी बातें। 1984 दंगों का परिवार पर असर तापसी पन्नू का जन्म 1 अगस्त 1987 को नई दिल्ली में जाट सिख परिवार में हुआ। उनके पिता दिलमोहन सिंह पन्नू सेवानिवृत्त रियल एस्टेट एजेंट हैं, जबकि मां निर्मलजीत कौर पन्नू गृहिणी हैं। परिवार शक्ति नगर में रहता था और 1984 के सिख-विरोधी दंगे के दौरान हिंसा का सामना किया, लेकिन पड़ोसियों की मदद से सुरक्षित बच निकले। उनकी एक छोटी बहन शगुन पन्नू हैं। स्कूलिंग और शुरुआती शिक्षा तापसी ने स्कूली शिक्षा माता जय कौर पब्लिक स्कूल, अशोक विहार से पूरी की। इसके बाद गुरु गोबिंद सिंह इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय से कंप्यूटर साइंस और इंजीनियरिंग में डिग्री ली। इंजीनियरिंग के बाद वह सॉफ्टवेयर कंपनी में नौकरी कर रही थीं। इसी दौरान पार्ट-टाइम कुछ नया करने के लिए मॉडलिंग ट्राय की। ग्लैमर इंडस्ट्री में आने का मकसद सिर्फ एक्स्ट्रा कमाई तापसी बताती हैं कि शुरुआत में मकसद सिर्फ एक्स्ट्रा कमाई और एक्सपोजर था, न कि ग्लैमर इंडस्ट्री में करियर बनाना। लेकिन काम मिलने पर लगा कि इसे आगे बढ़ाया जा सकता है। तापसी ने 2008 में “गेट गॉर्जियस” टैलेंट शो में हिस्सा लिया, जहां से पहचान मिली और मॉडलिंग को फुल-टाइम करियर बना लिया। मॉडलिंग के दौरान उन्होंने “पैंटालून्स फेमिना मिस फ्रेश फेस” और “साफी फेमिना मिस ब्यूटीफुल स्किन” जैसे खिताब जीते। कॉलेज टाइम में ही कैमरे के सामने कॉन्फिडेंस आया कॉलेज टाइम में तापसी कल्चरल एक्टिविटीज और डांस में हिस्सा लेती थीं, जिससे कैमरे के सामने कॉन्फिडेंस आया। मॉडलिंग असाइनमेंट्स मिलने पर लगा कि इस फील्ड में ग्रोथ और पहचान मिल सकती है। धीरे-धीरे उन्होंने कई ब्रांड्स के लिए एड शूट किए और झुकाव बढ़ता गया। तापसी ने कई बड़े ब्रांड्स के विज्ञापनों में काम किया, जिनमें रिलायंस ट्रेंड्स, रेड एफएम 93.5, कोका-कोला, मोटोरोला, पैंटालून्स, पीवीआर सिनेमाज, स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक, डाबर, एयरटेल, टाटा डोकोमो, हैवेल्स और वर्धमान शामिल हैं। फिल्मों की ओर रुख करने का फैसला कुछ साल बाद तापसी को लगा कि मॉडलिंग से वह पहचान नहीं मिल रही जो चाहती थीं। इसी वजह से उन्होंने फिल्मों की ओर रुख किया। मॉडलिंग की वजह से ही उन्हें पहला ब्रेक साउथ फिल्म इंडस्ट्री में मिला। साउथ सिनेमा में डेब्यू और शुरुआती सफर तापसी को साउथ में पहला बड़ा ब्रेक 2010 में तेलुगु फिल्म ‘झुम्मंडी नादम’ से मिला, जिसमें उन्होंने मोहन बाबू के साथ काम किया। इसके बाद तमिल फिल्म ‘आदुकलम’ में धनुष के साथ नजर आईं। फिल्म को समीक्षकों से सराहना मिली और 58वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में कई अवॉर्ड्स मिले। इसमें उनके अभिनय को प्रॉमिसिंग बताया गया। ग्लैमरस रोल्स में सीमित रहने की चुनौती शुरुआती दौर में उन्हें ज्यादातर ग्लैमरस रोल्स तक सीमित रखा गया, जिससे वह संतुष्ट नहीं थीं। इसके बाद उन्होंने ‘मिस्टर परफेक्ट’ में प्रभास और ‘वीरा’ में रवि तेजा के साथ काम किया। इन फिल्मों को मिला-जुला रिस्पॉन्स मिला। फिर तमिल फिल्म ‘वान्थान वेंदरान’ में काम किया, जो न आलोचकों को पसंद आई और न बॉक्स ऑफिस पर सफल रही। इसके बाद ‘मोगुडु’ में गोपीचन्द के साथ नजर आईं। फ्लॉप फिल्मों से मिला पनौती का टैग इस फिल्म में उनके अभिनय की तारीफ हुई, भले ही फिल्म को बड़ी सफलता नहीं मिली। इसी दौरान उन्होंने ‘गुंडेलो गोदारी’, ‘दारुवु’ और ‘शैडो’ जैसी तेलुगु फिल्मों में काम किया। उस समय उनकी कई फिल्में बॉक्स ऑफिस पर अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाईं, इसलिए उन्हें पनौती कहा जाने लगा। बाद में तापसी ने इंटरव्यू में बताया कि यह समय उनके लिए मुश्किल था, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और लगातार मेहनत करती रहीं। वह कहती हैं कि साउथ इंडस्ट्री में शुरुआती दौर में उन्हें ग्लैमरस रोल्स तक सीमित रखा गया, जिससे वह संतुष्ट नहीं थीं। तापसी मलयालम फिल्म ‘डबल्स’ में ममूटी के साथ और तमिल फिल्म ‘कंचना 2’ में राघव लॉरेन्स के साथ काम कर चुकी हैं। डेविड धवन की फिल्म से बॉलीवुड में एंट्री तापसी पन्नू ने साउथ इंडस्ट्री में पहचान बनाने के बाद बॉलीवुड में कदम रखा, लेकिन शुरुआती सफर आसान नहीं रहा। उन्होंने डेविड धवन की फिल्म ‘चश्मे बद्दूर’ (2013) से हिंदी सिनेमा में एंट्री की। फिल्म औसत रही और इसके बाद उन्हें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। शुरुआती फ्लॉप फिल्मों का दौर ‘चश्मे बद्दूर’ के बाद तापसी ने कई फिल्मों में काम किया जो बॉक्स ऑफिस पर खास कमाल नहीं दिखा सकीं। इनमें ‘रनिंग शादी’, ‘दिल जंगली’ और ‘द गाजी अटैक’ शामिल हैं। कुछ फिल्मों को क्रिटिक्स की सराहना मिली, लेकिन व्यावसायिक सफलता नहीं मिली। इस तरह शुरुआती दौर में करीब 2–3 फिल्में फ्लॉप या औसत रहीं। आत्म-संदेह और मानसिक दबाव का दौर जूम टीवी के साथ बातचीत में तापसी ने कहा था- जब मैंने बॉलीवुड में कदम रखा, तो सच कहूं तो मैं खुद को काफी असुरक्षित महसूस कर रही थी। मुझे लगता था कि मैं उसके योग्य नहीं हूं। शुरुआत में मैं अपने लुक, अपने अंदाज, अपने आत्म-विश्वास को लेकर बहुत शंकित रहती थी। हर नई फिल्म, हर नया रोल मेरे लिए डर का विषय था। मैंने तेलुगू फिल्म ‘झुम्मंडी नादम’ से शुरुआत की, फिर बॉलीवुड में ‘चश्मे बद्दूर’ से डेब्यू किया। उस समय मुझे इंडस्ट्री की कोई समझ नहीं थी, कोई मार्गदर्शन नहीं मिला। अगर मुझे पहले पता होता कि मैं यहां सफल हो सकती हूं, तो शायद मैं खुद को बेहतर तरीके से तैयार कर पाती। शुरुआत में मैं खुद की हमेशा आलोचना करती रहती थी। अगर फिल्म ठीक से चली नहीं, तो मैं खुद को ही दोषी मान लेती थी, भले ही नतीजा पूरी टीम पर निर्भर करता हो। यह आत्म-संदेह मेरे मानसिक स्वास्थ्य पर भी असर डालता था। खुद से सवाल, कोई हीरोइन क्यों लेगा ? मैं यह भी सोचती थी कि मैं उन हीरोइनों जैसी खूबसूरत नहीं हूं, इसलिए शायद लोग मुझे कास्ट नहीं करेंगे। फैशन, मेकअप, कैमरे का अच्छा एंगल, इन सब चीजों की मुझे बिल्कुल समझ नहीं थी। उस समय सीखने की प्रक्रिया बहुत थकाने वाली थी। आज मुझे लगता है कि अगर आप खुद में आत्म-विश्वास महसूस करते हैं, तो आप हर चुनौती का सामना कर सकते हैं। मैंने सीखा है कि असफलता को स्वीकार करना और खुद को सीखने देना कितना जरूरी है। अब मैं खुद को इतना कठोर नहीं बनाती और हर मौके का पूरा आनंद लेती हूं। फिल्मों में कई भूमिकाएं और कहानियां हैं जो महिलाओं के संघर्ष, व्यक्तित्व और ताकत पर केंद्रित हैं। मुझे खुशी है कि मैंने भी ऐसी भूमिकाएं निभाईं, जो मेरे लिए चुनौती और सीख दोनों साबित हुई हैं। बॉलीवुड में संघर्ष और चुनौतियां तापसी के लिए बॉलीवुड में जगह बनाना आसान नहीं था। साउथ इंडस्ट्री में काम करने के बाद भी उन्हें बॉलीवुड में आउटसाइडर की तरह देखा गया। बड़े बैनर और स्टार किड्स के बीच पहचान बनाना बड़ी चुनौती थी। उन्हें कई बार टाइपकास्ट होने का खतरा रहा, जहां सिर्फ ग्लैमरस रोल ऑफर किए जाते थे। लेकिन उन्होंने इस धारणा को तोड़ते हुए कंटेंट-ड्रिवन फिल्मों का चुनाव किया और धीरे-धीरे अभिनय के दम पर अलग पहचान बनाई। तापसी ने बताया कि जब फिल्मों का सिलसिला उम्मीद के मुताबिक सफल नहीं हुआ, तो उन्होंने खुद पर भरोसा करना सीखा। इन अनुभवों ने उन्हें मजबूत बनाया और अपनी प्रतिभा के अनुसार सही प्रोजेक्ट्स चुनना सिखाया। उन्होंने कहा कि अब वह उन फिल्मों को चुनती हैं जिनसे उन्हें भावनात्मक और रचनात्मक जुड़ाव महसूस होता है। उनके अनुसार अब कमर्शियल सफलता से ज्यादा कलात्मक संतुष्टि उनके निर्णयों का आधार है। तापसी ने स्वीकार किया कि शुरुआती फिल्मों के चयन में उन्होंने सुरक्षित विकल्प चुने, जो बॉक्स ऑफिस पर असरदार साबित नहीं हुए। लेकिन बाद में उनके चुनौतीपूर्ण निर्णयों ने दर्शकों से अच्छा कनेक्शन बनाया और उन्हें अलग पहचान दिलाई। पिंक से करियर का टर्निंग पॉइंट लगातार फ्लॉप और औसत फिल्मों के बाद तापसी ने करियर की दिशा बदली। 2016 में रिलीज फिल्म ‘पिंक’ उनके करियर का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट बनी। इसमें उन्होंने अमिताभ बच्चन के साथ काम किया। कंटेंट-ड्रिवन फिल्मों से बनी पहचान ‘पिंक’ के बाद तापसी पन्नू ने करियर की दिशा साफ कर दी थी। वह सिर्फ ग्लैमरस या कमर्शियल रोल तक सीमित नहीं रहना चाहती थीं। उन्होंने ऐसी फिल्मों का चुनाव किया, जिनकी कहानी मजबूत हो और जो समाज से जुड़े अहम मुद्दे उठाती हों। इस कड़ी में उन्होंने ‘नाम शबाना’, ‘मुल्क’, ‘मनमर्जियां’, ‘बदला’ और ‘थप्पड़’ जैसी फिल्मों में काम किया। इन फिल्मों से उन्होंने साबित किया कि वह कंटेंट-ड्रिवन सिनेमा की भरोसेमंद एक्ट्रेस हैं। खासकर ‘थप्पड़’ में उनके अभिनय को सराहा गया, जिसके लिए उन्हें फिल्मफेयर क्रिटिक्स अवॉर्ड मिला। इस फिल्म के बारे में उन्होंने फिल्मफेयर को दिए इंटरव्यू में कहा था- यह फिल्म सिर्फ एक थप्पड़ की नहीं, बल्कि आत्मसम्मान की कहानी है, और मैं ऐसी कहानियों का हिस्सा बनना चाहती हूं। इसके अलावा तापसी ने ‘सांड की आंख’ और ‘हसीन दिलरुबा’ में दमदार किरदार निभाए। ‘रश्मि रॉकेट’ में एथलीट की भूमिका निभाई, जबकि ‘लूप लपेटा’ में अलग अंदाज दिखा। ‘दोबारा’ और ‘ब्लर’ में उन्होंने एक्सपेरिमेंटल सिनेमा में हाथ आजमाया। ओटीटी प्लेटफॉर्म पर भी तापसी ने मजबूत मौजूदगी दर्ज कराई। ‘हसीन दिलरुबा’ और ‘ब्लर’ को डिजिटल ऑडियंस से अच्छा रिस्पॉन्स मिला, जिससे लोकप्रियता बढ़ी। उन्होंने शाहरुख खान के साथ फिल्म ‘डंकी’ में काम किया, जिसने उन्हें मेनस्ट्रीम सिनेमा में मजबूत पहचान दिलाई। _______________________________________________ पिछले हफ्ते की सक्सेस स्टोरी पढ़िए... कम उम्र में गंजेपन का सामना:सुपरस्टार बनने का अधूरा सपना, धुरंधर से अक्षय खन्ना ने साबित किया, ‘धुरंधर’ से शानदार वापसी की कम उम्र में गंजेपन जैसी पर्सनल चुनौतियों और करियर के कई उतार-चढ़ाव झेलने के बावजूद अक्षय खन्ना ने कभी खुद पर भरोसा नहीं खोया। सुपरस्टार बनने का उनका सपना भले पूरी तरह साकार न हो पाया हो, लेकिन उन्होंने अपनी दमदार एक्टिंग के दम पर इंडस्ट्री में एक अलग और मजबूत पहचान जरूर बनाई। पूरी खबर पढ़ें..

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Neolithic axe found in Lake Constance

A wood and stone axe from the Neolithic era in impeccable condition was discovered in Switzerland’s Lake Constance last year. It has been conserved and stabilized and is now on display at the Museum of Archaeology in Frauenfeld. Its wooden handle dates it to around 4,800 years ago when a prehistoric community of houses built on stilts occupied what is now the lake shore.

The artifact was found during an underwater excavation in the harbor basin of Steckborn on the southwestern arm of the lake. The area was scheduled for dredging due to low water levels this winter, and because the remains of prehistoric pile dwellings had been found there in the 19th century, divers from the Thurgau Office for Archaeology explored the site last spring.

The excavation uncovered posts from the pile houses, animal bones, pottery fragments and stone tools. The axe was the most important find in the group and would have been highly valued in the Neolithic community. Experiments with fiddle bows have found that it takes more than a day of work to manufacture an axe like this one.

The axe blade was made of prasinite, a hard, tough rock from the Grisons Alps. However, back then, it wasn’t necessary to hike all the way up the Alpine Rhine Valley to obtain this raw material. Such stones can also be found in the Ice Age moraines around Steckborn. For the handle, the pile dwellers chose a thin ash trunk. This type of wood is hard and elastic, thus perfectly fulfilling the requirements for a tool handle.

The pile dwellings were built on what was then marshy land. Building the houses on piles protected them from flooding, enemies and predators while giving the early agrarian communities easy access to fishing in the water and farming on the shore. Hundreds of people lived in groups of small homes connected to each other by wooden walkways that were also built on piles. Made out of wood, wattle and daub (clay over woven branches) walls and thatch for roofs, they were not intended to be permanent structures. Evidence suggests they were replaced every 10 years or so.

As the waters of what would become the lake rose, the settlements were abandoned, but the waterlogged environment preserved organic materials for thousands of years. Artifacts recovered from the pile settlements include textiles, dugout canoes and the oldest wheels in Europe (ca. 3,000 B.C.). The rich source of archaeological materials illuminate how Neolithic farming communities worked, traded, fished, hunted and raised livestock.



* This article was originally published here