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» » » कॉर्पोरेट बुकिंग करके आंकड़ों में हेरफेर:माहौल बनाने के लिए पूरा थिएटर बुक करते हैं; यह गोरखधंधा इंडस्ट्री में आम

‘एक दिन मैं अपने ऑफिस में बैठा था। मेरे पास शाहरुख खान फैन क्लब के लोग आए। उन्होंने कहा कि पठान रिलीज हो रही है, हमें पूरा थिएटर बुक करना है। मैंने कहा कि पैसे दीजिए और बुक कर लीजिए। उन्होंने पैसे दिए और पूरा थिएटर बुक कर लिया।’ यह बात मुंबई के फेमस मराठा मंदिर सहित कई थिएटर्स के मालिक मनोज देसाई ने हमसे बताई। आप सोच रहे होंगे कि इस बात में आखिर दम क्या है। दरअसल यह बात सीधे-सीधे बॉक्स ऑफिस की कालाबाजारी की तरफ संकेत करती है। बड़े एक्टर्स और प्रोड्यूसर्स अपनी फिल्मों की रिलीज के पहले दिन बल्क में टिकट खरीदते या पूरा थिएटर बुक कर देते हैं। इसे कॉर्पोरेट बुकिंग कहते हैं। ऐसा करके वो अपनी फिल्मों को लेकर माहौल बनाते हैं, जिससे कि आगे चलकर फिल्म का वर्डिक्ट तय होता है। फिल्म इंडस्ट्री में यह गोरखधंधा आज से नहीं, बल्कि 70-80 के दशक से आम है। फिल्म क्रिटिक तरण आदर्श ने कहा कि आज सफलता का पैमाना बॉक्स ऑफिस नंबर्स से ही मापा जाता है। आर्टिस्ट इतनी ज्यादा फीस ले रहे हैं कि उन्हें अपनी वैल्यू दिखाने के लिए ऐसे हथकंडे अपनाने पड़ रहे हैं। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या दर्शक इससे छला हुआ महसूस करते हैं, क्योंकि इसकी वजह से उन्हें फर्स्ट डे पर फिल्म देखने के लिए टिकटें नहीं मिल पातीं। आज हम इस स्पेशल स्टोरी के जरिए फिल्म इंडस्ट्री में फैले बॉक्स ऑफिस नंबर्स की कालाबाजारी पर बात करेंगे। इसके अलावा पेड और निगेटिव रिव्यूज के जरिए इंडस्ट्री और ऑडियंस में जो गलत माहौल बनाया जाता है, उस पर भी बात करेंगे। इस संबंध में हमने देश के सबसे बड़े फिल्म क्रिटिक और ट्रेड एक्सपर्ट्स में से एक तरण आदर्श, एग्जीबिटर अक्षय राठी, फिल्म डायरेक्टर विवेक शर्मा और मराठा मंदिर थिएटर के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर मनोज देसाई से बात की। तरण आदर्श ने कहा, ‘कॉर्पोरेट बुकिंग की बात सामने आती है, तो एक्टर्स की इमेज को बहुत नुकसान होता है। ऑडियंस में भी गलत मैसेज जाता है। इससे दर्शक खुद को ठगा महसूस करते हैं।' कॉर्पोरेट बुकिंग का चलन कब और कहां से शुरू हुआ? तरण आदर्श ने कहा, ‘ऐसा नहीं है कि अभी कुछ सालों से ही यह प्रैक्टिस शुरू हुई है। 70, 80 और 90 के दशक में भी ऐसा होता था। 70-80 के दशक के एक बहुत बड़े एक्टर हुआ करते थे। उनका करियर ग्राफ थोड़ा नीचे जा रहा था। अचानक उनकी एक कमबैक फिल्म रिलीज हुई। पहले दिन सिनेमाघरों के बाहर हाउसफुल के बोर्ड लटके देखे गए, हालांकि अंदर ऑडियंस बहुत कम थी। मैंने कुछ सालों बाद उसी स्टार से इसे लेकर सवाल किया तो वे भड़क गए। उन्होंने कहा कि आप यह सवाल मुझसे ही क्यों पूछ रहे हैं, और लोगों से क्यों नहीं पूछते? उनकी झल्लाहट देखकर समझ में आ गया कि उन्होंने ही गड़बड़ की थी।’ तरण आदर्श ने कहा कि 70-80 के दशक में इसे कॉर्पोरेट बुकिंग नहीं, बल्कि ‘फीडिंग’ कहते थे। शाहरुख खान फैन क्लब वालों ने पठान और जवान के समय थिएटर बुक कराया हमने मराठा मंदिर और गेयटी गैलेक्सी थिएटर के मालिक मनोज देसाई से सवाल किया कि क्या कभी ऐसा होता है कि एक कोई ग्रुप आकर पूरा थिएटर ही बुक कर ले? मनोज देसाई ने कहा, ‘बहुत बार होता है। पठान और जवान के समय शाहरुख खान के फैन क्लब ने पूरा थिएटर बुक करा लिया था।’ कॉर्पोरेट बुकिंग की नौबत क्यों आ रही है? तरण आदर्श ने कहा, ‘एक्टर्स जो भर-भर कर करोड़ों में फीस ले रहे हैं, उन्हें बदले में नंबर्स भी तो दिखाने हैं। इसके अलावा एक-दूसरे से आगे निकलने की भी होड़ है। आज सफलता का पैमाना एक्टिंग से ज्यादा बॉक्स नंबर्स से मापा जाता है। अगर कोई फिल्म अच्छी है, लेकिन वो कमाई अच्छी नहीं कर पाई तो उसे एक असफल फिल्म के तौर पर देखा जाता है। वहीं अगर किसी मूवी का कॉन्सेप्ट थर्ड क्लास हो, लेकिन उसका बॉक्स ऑफिस कलेक्शन तगड़ा हो, तो ऐसी फिल्म को सुपरहिट का तमगा मिल जाता है। ऐसे में ओपनिंग डे की कमाई पर सबकी नजरें होती हैं। अगर ओपनिंग डे अच्छी लग गई तो फिल्म को लेकर वैसे ही माहौल बन जाता है। इसी वजह से एक्टर्स अपनी टीम को कहकर ये सारे हथकंडे अपनाते हैं। हालांकि ऐसा नहीं है कि सारे एक्टर्स ही ऐसा करते हैं।' एक्टर्स फीस के बदले थिएटर बुक करने को बोलते हैं एग्जीबिटर अक्षय राठी ने कॉर्पोरेट बुकिंग को लेकर एक अलग बात बताई। उन्होंने कहा, ‘आपको तो पता ही होगा कि एक्टर्स बहुत सारे ब्रांड्स का प्रचार करते हैं। कभी-कभी वे उन ब्रांड कंपनियों से आधी फीस लेते हैं, बदले में जब उनकी फिल्म रिलीज होती है तो उन्हीं कंपनियों से पहले दिन के टिकट्स खरीदने को कहते हैं। एक्टर्स फिर कंपनी वालों से कहते हैं कि सारे टिकट अपने कर्मचारियों में बांट दो।' 60-70 के दशक में अलग खेल चलता था, मनोज कुमार और राज कपूर एक-दूसरे की फिल्मों के टिकट खरीद लेते थे मनोज देसाई ने बताया कि 60-70 के दशक में तो अलग ही खेल चलता था। उस वक्त राज कपूर और मनोज कुमार की फिल्में एक साथ रिलीज होती थीं। दोनों एक्टर्स एक-दूसरे की फिल्मों के बहुत सारे टिकट खरीद लेते थे। अब वे दोनों ऐसा क्यों करते थे, मनोज देसाई बताते हैं, ‘मैंने एक दिन राज कपूर से पूछ लिया कि आप मनोज कुमार की फिल्मों के टिकट क्यों खरीदते हो। उन्होंने कहा कि यह बिजनेस है। मैं मनोज कुमार की फिल्मों के टिकटें खरीदकर उसे थिएटर्स के सामने सस्ते दामों में बेचवा देता हूं और प्रचार करवाता हूं कि उसकी फिल्म में दम नहीं है, इसलिए कम दाम में टिकट उपलब्ध है। ठीक यही काम मनोज कुमार मेरी फिल्मों के साथ करता है।’ एक्टर्स को अपनी फीस पर लगाम लगानी चाहिए कॉर्पोरेट बुकिंग को रोकने के लिए क्या कदम उठाने चाहिए? तरण आदर्श ने कहा, ‘एक्टर्स को सबसे पहले अपनी फीस पर विचार करना चाहिए। ऐसा नहीं होना चाहिए कि आप 35 करोड़ रुपए चार्ज करें और फिल्म 3 करोड़ की भी ओपनिंग न ले पाए। ऐसे में फिर अपनी फीस और वैल्यू जस्टिफाई करने के लिए ये एक्टर्स, प्रोड्यूसर्स के साथ मिलकर कॉर्पोरेट बुकिंग जैसे हथकंडे अपनाने लगते हैं।’ दर्शकों को लालच देकर फिल्म दिखाने का हथकंडा भी शुरू हुआ अभी एक नया चलन देखने को मिल रहा है- BOGO (BUY ONE-GET ONE FREE) इसका मतलब एक टिकट लेने पर एक फ्री। तरण आदर्श ने कहा कि यह तो सबसे खतरनाक बात है। आप दर्शकों को फिल्म देखने के नाम पर लालच दे रहे हैं। जिसे देखो वो रिव्यूअर बना फिर रहा, इनके ऊपर बिस्किट फेंको, दुम हिलाने लगेंगे आजकल मूवी रिव्यू को लेकर भी ट्रेंड बदल गया है। कुछ रिव्यूअर अपना फायदा देखते हुए फिल्म को अच्छा या बुरा बताते हैं। अभी हाल ही में फिल्म कल्कि के मेकर्स ने कुछ रिव्यूअर के खिलाफ लीगल एक्शन लेने की भी तैयारी कर ली थी। इसे लेकर तरण आदर्श कहते हैं, ‘पहले के समय में चुनिंदा फिल्म समीक्षकों को रिव्यू करने के लिए बुलाया जाता था। वे किसी न किसी अच्छे पब्लिकेशंस के साथ जुड़े होते थे। उनके रिव्यूज की काफी अहमियत होती थी। आज के वक्त में 300-400 लोग रिव्यू करने चले आते हैं। जिसे देखो, वो रिव्यूअर बना फिर रहा है। भले ही उनकी रीच ज्यादा है, लेकिन ऐसा थोड़ी है कि उनकी क्रैडिबिलिटी भी उसी हिसाब से होगी। मैंने आदिपुरुष का निगेटिव रिव्यू किया था। कुछ लोगों को यह बात खराब लगी। वे सारे सेल्फ क्लेम्ड रिव्यूअर थे। वे मेरे पीछे पड़ गए। अभी कुछ दिन पहले अक्षय कुमार-टाइगर श्रॉफ की फिल्म बड़े मियां-छोटे मियां रिलीज हुई थी। मैं प्रोड्यूसर के साथ ही बैठकर फिल्म देख रहा था। फिल्म खत्म होते ही मैंने उनसे कह दिया कि इससे ज्यादा उम्मीद मत रखिएगा। मैंने यह नहीं कहा कि फिल्म डिजास्टर है, लेकिन इतना जरूर कहा कि इसे और बेहतर बनाया जा सकता था। जब मैंने फिल्म का रिव्यू डाला तो कुछ लोग फिर मेरे पीछे पड़ गए। हो सकता है कि उनके सामने बिस्किट फेंकी गई हो, इसीलिए दुम हिलाते हुए मेरे पीछे पड़ गए।’ पैसे लेकर रिव्यू करने वाले यूट्यूबर्स को एंटरटेन करना बंद करना चाहिए डायरेक्टर विवेक शर्मा ने कथित फिल्म समीक्षकों को आड़े हाथों लिया। उन्होंने कहा, ‘कई ऐसे फिल्म क्रिटिक्स हैं जो पर्दे के पीछे किसी न किसी प्रोडक्शन हाउस के साथ जुड़े हुए हैं। वे उनकी फिल्मों को 3.5 स्टार से नीचे देते ही नहीं हैं। ये क्रिटिक्स पूरी तरह बिके हुए हैं। ऊपर से 2020 के बाद छुटभैये यूट्यूबर्स भी पैदा हो गए हैं। इसमें से अधिकतर पैसे लेकर फिल्मों का रिव्यू करते हैं और ऑडियंस को गुमराह करते हैं। आज का यूथ इन्हें भारी संख्या में देखता और फॉलो करता है, ऐसे में इन्हें अपनी क्रैडिबिलिटी बनाकर रखनी चाहिए। इंडस्ट्री वालों को भी अपने कॉन्टेंट और स्टोरी पर ज्यादा काम करना चाहिए, न कि इन्हें एंटरटेन कर अपना पैसा और सामर्थ्य खर्च करना चाहिए।’ भाड़े के लोग बुलाकर थिएटर में हो हल्ला मचवाते हैं मनोज देसाई ने कहा कि इंडस्ट्री में ऐसे भी लोग हैं, जो खुद को आगे दिखाने के लिए दूसरों को गिराने की फिराक में रहते हैं। उन्होंने कहा, ‘आप यकीन नहीं करेंगे, कई ऐसे फिल्म मेकर और एक्टर हैं जो 300-500 रुपए में लोगों को पकड़कर लाते हैं और उन्हें थिएटर के अंदर भेज कर जबरदस्ती निगेटिव हूटिंग कराते हैं। ये भाड़े के लोग थिएटर के अंदर ही फिल्म को बुरा-भला और एक्टर्स को गालियां देना स्टार्ट कर देते हैं। इससे जो असली ऑडियंस होती है, वो भी सोचने लगती है कि फिल्म सच में खराब है, तभी लोग इतना आक्रोश दिखा रहे हैं। इससे फिल्म को लेकर गलत माहौल बन जाता है।’ भिड़ गए थे शाहरुख और प्रभास के फैंस दिसंबर 2023 में प्रभास की फिल्म सलार और शाहरुख खान की फिल्म डंकी एक साथ रिलीज हुई थी। दोनों फिल्मों के कलेक्शन को लेकर सोशल मीडिया पर काफी बहसबाजी हुई थी। शाहरुख के फैंस डंकी को आगे बताते थे, जबकि प्रभास के प्रशंसक सलार को लीड लेता दिखा रहे थे। अब इस जद्दोजहद में ऑडियंस परेशान थी कि आखिर वे इन फिल्मों में से किसे देखने जाएं। दोनों फिल्मों के क्लैश होने से बॉक्स ऑफिस नंबर्स बंट गए। नुकसान दोनों ही फिल्मों को हुआ। बात यह है कि इस खींचातानी में सिनेमा के चाहने वाले परेशान होते हैं, उन्हें समझ नहीं आता कि आखिर किस फिल्म के लिए पैसे खर्च करना ज्यादा सही रहेगा। *** ग्राफिक्स- कुणाल शर्मा

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