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» » » पैसों के लिए आर्केस्ट्रा में डांस किया:'सेक्रेड गेम्स’ के लिए लोगों ने पोर्न स्टार कहा, 'ट्रायल बाई फायर' से राजश्री देशपांडे ने बदली अपनी इमेज

‘सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं, मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।’ दुष्यंत कुमार की ये लाइनें एक्ट्रेस राजश्री देशपांडे के करियर और जिंदगी के दो अलग-अलग सिरों को जोड़ती हैं। फिल्मों में अपनी बोल्ड चॉइस से हंगामा मचाने वाली राजश्री असल जिंदगी में अपने सोशल वर्क से लोगों की जिंदगी बदल रही हैं। लेकिन इस मुकाम तक पहुंचने से पहले उन्होंने खुद कई मुश्किलों का सामना किया है। बचपन में तंगी देखी, पैसों के लिए आर्केस्ट्रा में काम किया। अपनी जिद और मेहनत के दम पर खुद की एड एजेंसी खोली और खूब पैसे भी कमाए। जब वहां से भी दिल भर गया तो सबकुछ छोड़ वापस कला का रुख किया और मुंबई आकर फिर से स्ट्रगल किया। आज सक्सेस स्टोरी में राजश्री देशपांडे की कहानी… आर्केस्ट्रा में डांस करने के लिए पांच सौ मिलते थे मैं एक किसान परिवार से ताल्लुक रखती हूं। मेरा बचपन औरंगाबाद में बीता है। मेरी पढ़ाई मराठी मीडियम स्कूल से हुई। वो वक्त मैं आज भी मिस करती हूं, जब गर्मी की छुट्टियां आम के बगीचे में बिना चप्पल घूमते बीत जाती थीं। मैं अपने घर की सबसे एंटरटेंनिग बच्ची थी। जब भी कोई मेहमान आता घरवाले मुझे आगे कर देते कि डांस दिखाओ। किसी की मिमिक्री करके दिखाओ। मेरे ख्याल से यही वो फेज था, जब मेरे अंदर का आर्टिस्ट मेरे जाने बिना ही तैयार होने लगा। कुल मिलाकर मेरा बचपन मजेदार रहा। मेरा अधिकांश समय खेलकूद या ड्रामा में बीता। पढ़ाई में मेरी दिलचस्पी थोड़ी कम थी। मैं जूडो प्लेयर थी और इसमें स्टेट और नेशनल लेवल तक खेला है। स्कूल के दिनों से ही मैं ड्रामा में हिस्सा लेने लगी थी। डांस में रुचि थी तो एक आर्केस्ट्रा का हिस्सा भी बन गई थी। डांस करने के लिए मुझे पांच सौ रुपए मिलते। जो उस वक्त के हिसाब से मेरे लिए बहुत ज्यादा थे। हम लोग गांव-गांव जाकर लावणी परफॉर्म करते। लोगों का रिएक्शन, उनकी तालियों की गड़गड़ाहाट मुझे किसी और दुनिया में ले जाती, मेरे सपनों की दुनिया में। बचपन में पैसों की तंगी देखी हमारे जीवन में एक वक्त ऐसा आया, जब बहुत चुनौतियां देखने मिली। एक किसान के लिए उसकी जमीन ही सबकुछ होती है। हमारी जमीन इंडस्ट्रियल जोन में आ गई। जमीन चली गई तो मां ने घर संभाला। पापा को बहुत मुश्किलों के बाद नौकरी मिली। फिर घर की हालत थोड़ी सुधरी। इस दौर में मेरा बचपन ऐसा बीता, जब लगने लगा कि पैसा ही सबकुछ है। खुशियां सिर्फ पैसों से ही मिल सकती थी। ऐसे में मैं कला से दूर होती गई। नाटक और डांस से जीवन नहीं चल पा रहा था। ये यकीन होने लगा कि पढ़ाई ही आपको बचा सकती है। मैं औरंगाबाद से निकलकर पुणे पहुंची। वहां सिम्बॉयसिस कॉलेज से लॉ की पढ़ाई की। ट्यूशन और डांस से निकाला पढ़ाई का खर्च पुणे आकर एक आजादी महसूस हुई। हालांकि, मेरे घरवालों के पास मुझे पढ़ाने के पैसे नहीं थे। मुझे याद है, मेरी मां ने उस वक्त कहा था कि लड़-झगड़कर तुम आ तो गई हो, लेकिन हम तुम्हारा खर्च नहीं उठा पाएंगे। कैसे मैनेज करोगी? मैं जिस हॉस्टल में रहती थी, वहीं पास में दो बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने लगी, डांस सिखाती और उनका ख्याल रखती। इससे मुझे कुछ पैसे मिलते। इस तरह पढ़ाई के साथ अपना खर्चा उठाने का इंतजाम हो गया। ऐसे छोटे-मोटे काम करते हुए मुझे एडवरटाइजिंग फील्ड क्लाइंट सर्विस की नौकरी मिली। इसके बारे में मुझे कुछ पता भी नहीं था। बस पोस्टर पर देखा था कि नौकरी के साथ एक सनी गाड़ी मिलेगी। लेकिन यहां भी मैंने जल्द काम सीख लिया और फिर मुझे एडवरटाइजिंग से प्यार होने लगा। खुद की एड एजेंसी बनाई, फिर एक्टिंग के लिए सब छोड़ा मैंने घर में पैसों की तंगी देखी थी तो मेरा ध्यान अच्छी कमाई पर था। मुझ पर पैसा कमाने का जुनून सा सवार था। मैंने बड़ा डिसीजन लिया, खुद की एड एजेंसी खोल ली। अच्छा पैसा भी कमाने लगी लेकिन 6-7 साल के अंदर मुझे एहसास हुआ कि मैं अंदर से खोखली होती जा रही हूं। डांस, नाटक सबसे दूर हो गई हूं। मेरे अंदर का कलाकार मुझे कोसने लगा। फिर मैंने एक दिन एजेंसी छोड़ने का फैसला किया। कमाई के लिए पेरेंट्स सिनेमाघर में स्टाम्प लगाते थे मेरे घर में किताब पढ़ने, सिनेमा या नाटक देखने का कल्चर नहीं था। मेरे पेरेंट्स ने भी बचपन से ही काम शुरू कर दिया था। उन दोनों ने बहुत कम पढ़ाई की और सिनेमा भी नहीं देखा। हालांकि, मेरे पेरेंट्स एक्स्ट्रा इनकम के लिए थिएटर में टिकट पर स्टाम्प लगाते थे। मेरे माता-पिता दोनों दिन भर का अपना काम खत्म करके, शाम में इस काम के लिए थिएटर जाते थे। स्टाम्प लगाने से दोनों की कमाई मिलाकर दस रुपए होती थी। उनके लिए सिनेमा अमीरों का शौक था। उनकी चिंता तीन बेटियों का खर्च उठाना और उनकी शादी करनी थी। ऐसे में जब मैं नसीरुद्दीन सर के थिएटर का हिस्सा बनी तो पापा एक दिन प्ले देखने आए। वहां पर जब मैंने उनको नसीर सर से मिलाया तो पापा उन्हें जानते ही नहीं थे। पापा को ये लगा कि कोई बड़ा आदमी है लेकिन कौन ये वो नहीं जानते थे। मेरे पापा ने नसीर सर से पूछा भी था कि आप क्या करते हैं? काफी समय बाद, मैंने पापा को उनकी फिल्में दिखाई। तब जाकर उन्हें पता चला कि मेरी बेटी बड़े लोगों को जानती है। शुरुआत में सारे ऑडिशन में फेल रही जब पुणे छोड़कर मुंबई आई तो काफी संघर्ष करना पड़ा। मुझमें काम की भूख हमेशा से थी और आज भी है। यहां आकर मैंने थिएटर जॉइन किया। लोगों को बताना शुरू किया मैं भी आर्टिस्ट हूं। खूब सारे ऑडिशन का हिस्सा बनी। शुरुआत के लगभग सारे ऑडिशन में फेल हुई। बड़ी फिल्मों में कुछ छोटे-मोटे रोल ही मिले। हालांकि, मेरा मानना है कि ऑडिशन बेहद जरूरी चीज है। ऑडिशन को निगेटिव रूप में नहीं देखना चाहिए। आपको 10 मिनट के अंदर अपनी इमेजिनेशन से एक किरदार में ढलना होता है। ये एक तरह की एक्टिंग एक्सरसाइज है। साल 2015 में आई ‘एंग्री इंडियन गॉडेस’ के लिए मेरा पहला ऑडिशन था, जिसे मैंने क्रैक किया था। इस फिल्म के बाद मेरे लिए चीजें बदलनी शुरू हुईं। 'एस दुर्गा' फिल्म के लिए मिली जान से मारने की धमकी साल 2017 में मेरी मलयालम फिल्म ‘एस दुर्गा’ आई थी। रिलीज से पहले ही फिल्म को लेकर बहुत विवाद हो गया था। विवाद इतना बढ़ा कि फिल्म का नाम सेक्सी दुर्गा से बदलकर ‘एस दुर्गा’ करना पड़ा। लोगों ने बिना फिल्म देखे, सिर्फ नाम से तय कर लिया कि फिल्म खराब है। शुरुआत में इसे बैन कर दिया गया। फिल्म के नाम की वजह मुझे जान से मारने और एसिड अटैक की धमकी मिलने लगी। मेरे बारे में बहुत कुछ लिखा और कहा गया। मुझे कहा जाता था कि हिंदू होकर देवी का अपमान कर रही हो। लोगों ने मेरे घरवालों को भी नहीं छोड़ा, उनको भी परेशान किया गया। ये हम सबके लिए डरावना माहौल था। ‘एंग्री इंडियन गॉडेस’ के समय भी लोगों ने विवाद खड़ा कर दिया था। ‘सेक्रेड गेम्स’ के सीन के लिए पोर्न स्टार कहा गया मैंने साल 2018 में नेटफ्लिक्स की सीरीज ‘सेक्रेड गेम्स’ में काम किया था। सीरीज को तो खूब तारीफ मिलीं लेकिन मुझे मेरे इंटीमेसी सीन के लिए पोर्न स्टार कहा गया। सीरीज के सीन से छेड़छाड़ करके कोई क्लिप पोर्न वेबसाइट पर डाल दी गई। मेरी फोटो मॉर्फ करके वायरल की गई। कोई नवाजुद्दीन सिद्दीकी या डायरेक्टर अनुराग कश्यप से सवाल नहीं कर रहा था। हर कोई मुझे ब्लेम कर रहा था। लेकिन मैंने खुद पर इसका असर नहीं होने दिया। विवाद चलते रहे, और मैं चुपचाप अपने काम में लगी रही। सोशल वर्क के लिए छोड़े कई ऑफर ‘सेक्रेड गेम्स’ के बाद मुझे लगातार काम के ऑफर मिल रहे थे। लेकिन मैं सब छोड़कर औरंगाबाद चली गई। काफी यंग एज से ही मैं सामाजिक मुद्दों पर वालंटियर कर रही हूं। कभी मैं बीच की सफाई करने चली जाती थी तो कभी शेल्टर होम के बच्चों के साथ वक्त बिताती थी। 2015 नेपाल भूंकप का मेरे ऊपर काफी असर हुआ। मैंने वहां एक इंटरनेशनल एनजीओ के साथ मिलकर काम किया। नेपाल से लौटकर मैं मराठवाड़ा के सूखाग्रस्त इलाकों में घूमी। मैंने पानी के मुद्दे पर सोचना शुरू किया। पानी पर काम शुरू करने से पहले मैंने 3-4 महीने रिसर्च भी की। 6 महीने लगाकर किसानों को और चंदा इकट्ठा किया। इतना करके चुप नहीं बैठी और वहां, टॉयलेट्स, हेल्थ केयर पर काम किया। सरकार ने स्कूल नहीं बनवाया तो खुद उठाया जिम्मा मैं औरंगाबाद के पांढरी पिंपल गांव में सैनिटेशन, हेल्थ केयर और पानी की समस्याओं पर काम कर रही थी, तब मेरा ध्यान गांव के स्कूल पर गया। उस गांव में स्कूल की हालत बहुत खराब थी। साल 2017 में मैंने सरकार से स्कूल पर काम करने की रिक्वेस्ट की। उस वक्त उनके पास फंड नहीं था तो उन्होंने एक साल का समय मांगा। एक साल बाद जब मैं उनके पास गई तो मुझे जवाब मिला कि एक साल और रुकना पड़ेगा। ऐसे में मैंने उनसे कहा कि आप मुझे इजाजत दीजिए, मैं स्कूल बनाऊंगी। ये जोश में लिया गया फैसला था। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं इस पर काम कैसे करूंगी। ऐसे में एनजीओ 'नाभांगन' अस्तित्व में आया। मैंने अपने इस एनजीओ को रजिस्टर किया। चार सौ से ज्यादा लोगों ने मेरे एनजीओ के जरिए स्कूल के लिए डोनेशन दिया। मुझे दो साल लगे स्कूल बनाने में। आज उस स्कूल को बने पांच साल हो गए हैं। बच्चों की संख्या बढ़ती जा रही है। हम उस स्कूल में बच्चों को सारे सब्जेक्ट्स के अलावा पेंटिंग, डांस, नाटक, सिंगिंग, इंस्ट्रूमेंट बजाना और जूडो भी सिखाते हैं। माधुरी के साथ काम करना सपना सच होने जैसा मैं बचपन में माधुरी दीक्षित के गानों पर डांस करती थी। उनका मेरे ऊपर काफी प्रभाव रहा है। साल 2022 में मुझे उनके साथ ‘फेम गेम’ सीरीज में काम करने का मौका मिला। मैं उनसे जब पहली बार सेट पर मिली तो मुझे 15 मिनट इस बात को हजम करने में लग गए। फिर धीरे-धीरे हमारी मराठी में बातचीत शुरू हुई। उसके बाद तो मेरे लिए वो बड़ी बहन जैसी हो गईं। इतनी बड़ी सुपरस्टार होने के बाद भी वो काफी हंबल हैं। उनके साथ काम करना सपना सच होने जैसा था। रातों-रात बहुत सारे प्रोजेक्ट से निकाला गया मेरे साथ कई बार ऐसा हुआ कि मैंने प्रोजेक्ट साइन कर लिया और प्रोजेक्ट बंद हो गया। कई बार तो ऐसा भी हुआ कि डेट लेने के बाद मुझे कहा गया कि प्रोजेक्ट में किसी बड़े स्टार ने आपको रिप्लेस कर दिया है। कई बार तो पैसे के लिए भी लड़ाई लड़नी पड़ी है। मेरा एक्सपीरियंस है कि फिल्म इंडस्ट्री आसान नहीं है। यहां पर अनिश्चितताएं बहुत ज्यादा हैं। यहां ऐसा नहीं होता कि आपको एक प्रोजेक्ट मिल गया तो आप सेट हो गए हैं। ‘ट्रायल बाई फायर’ सीरीज मेरे करियर के लिए काफी अहम रही है। इस सीरीज के किरदार के लिए मैंने मेंटली और फिजिकली कई तरह का बदलाव किए थे। इसका रिजल्ट भी मुझे मिला। इस सीरीज के लिए मुझे एशियाई एकेडमी क्रिएटिव अवॉर्ड्स 2023 में बेस्ट एक्ट्रेस का खिताब मिला। इसी साल मुझे फिल्मफेयर ओटीटी अवॉर्ड भी मिला। मेरा एम्बिशन बस अच्छा काम करने की है। तमाम स्ट्रगल के बाद मैंने लीड रोल भी निभाए हैं, इसे मैं अपनी जर्नी की अचीवमेंट मानती हूं। जल्द ही अमेजन प्राइम पर मेरा नया काम दिखेगा। पिछले हफ्ते की सक्सेस स्टोरी यहां पढ़िए... अमीरों के बर्तन धोने से लेकर बॉलीवुड स्टार तक:अमित साध की कहानी- स्कूल ने निकाला, चार बार सुसाइड की कोशिश, सिक्योरिटी गार्ड भी बने अक्सर हम सब सुनते हैं कि गुस्सा इंसान का दुश्मन होता है, लेकिन एक्टर अमित साध ने अपनी जिंदगी में इस लाइन को जिया है। इस गुस्से ने ना सिर्फ उनसे उनका बचपन छीना बल्कि स्कूल से भी निकाले गए। इंडस्ट्री में आए तो शो से निकाले गए और बैन हुए। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें...

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