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» » » एक्ट्रेस अनीता गुहा की दर्दनाक कहानी:चेहरा खराब हुआ तो घर से निकलना छोड़ा, परिवार से कहा था- ‘मेकअप करके अंतिम संस्कार करना’

70 के दशक की ब्लॉकबस्टर मूवी ‘जय संतोषी मां’ की लीड एक्ट्रेस अनीता गुहा की आज 17वीं डेथ एनिवर्सरी है। फिल्म में संतोषी माता का किरदार निभाकर अनीता इतनी पॉपुलर हो गई थीं कि लोग उन्हें भगवान मानने लगे थे। लोग अपने घरों में उनके पोस्टर लगाकर उनकी पूजा किया करते थे। 1975 में आई 'जय संतोषी मां' से अनीता बड़ी स्टार बन गई थीं। फिल्म ने उस दौर में पांच करोड़ की कमाई का रिकॉर्ड बनाया था। प्रोफेशनल लाइफ में कामयाबी हासिल कर चुकीं अनीता की निजी जिंदगी अंतिम समय में मुश्किलों से भरी रही। शादी के कुछ सालों के बाद ही पति का निधन हो गया और अनीता अकेली रह गईं। अनीता को ल्यूकोडर्मा बीमारी ने भी घेर लिया जिससे उनके पूरे शरीर पर सफेद धब्बे पड़ गए थे। अनीता इस वजह से खुद से नफरत करने लगी थीं। अनीता इन सफेद धब्बों से इतनी परेशान थीं कि उन्होंने कह दिया था कि जब उनका अंतिम संस्कार हो तो पहले उनका मेकअप किया जाए ताकि कोई उनके दाग-धब्बे न देख पाए। जानिए अनीता गुहा की जिंदगी से जुड़े कुछ दिलचस्प फैक्ट्स… टैलेंट कॉम्पिटिशन में हिस्सा लेने गई थीं बॉम्बे अनीता गुहा का जन्म 17 जनवरी 1939 को बर्मा के पास एक गांव में हुआ था। पिता फॉरेस्ट ऑफिसर थे तो अनीता का बचपन पूर्वोत्तर के राज्यों जैसे दार्जिलिंग और सुंदरबन में गुजरा। बंटवारे के बाद अनीता का परिवार कोलकाता आकर बस गया था जहां अनीता ने स्कूल की पढ़ाई की। पढ़ाई पूरी करने के बाद अनीता ने मॉडलिंग में हाथ आजमाया और मिस कोलकाता बनीं। इसके बाद एक टैलेंट कॉम्पिटिशन में हिस्सा लेने के लिए अनीता बॉम्बे (अब मुंबई) चली आईं तब वो केवल 15 साल की थीं। ये कॉम्पिटिशन बॉलीवुड के मशहूर कारदार स्टूडियो ने आयोजित करवाया था। इस कॉम्पिटिशन के सभी राउंड्स में अनीता पहले नंबर पर रहीं। कारदार स्टूडियो ने उनके साथ प्रतिमाह 300 रुपए की सैलरी पर कॉन्ट्रैक्ट किया, लेकिन एक दिक्कत थी कि अनीता को हिंदी नहीं आती थी। उन्होंने स्टूडियो से वादा किया कि वो छह महीने में हिंदी सीख लेंगी और फिर काम शुरू कर देंगी। अनीता मुंबई से वापस कोलकाता आ गईं और अपनी हिंदी ठीक करने में जुट गईं। इसी बीच उनके पिता का निधन हो गया। अनीता को मां वापस मुंबई भेजने को तैयार नहीं थीं इसलिए उन्हें कारदार स्टूडियो के साथ अपना कॉन्ट्रैक्ट तोड़ना पड़ा। उधर टैलेंट कॉम्पिटिशन जीतने की वजह से अनीता बंगाली फिल्ममेकर्स की नजर में भी आ गई थीं तो उन्हें एक बांग्ला मूवी करने का ऑफर मिला। अनीता ने ये मौका न गंवाते हुए फिल्म साइन कर ली। इसका नाम 'बांशेर केल्ला' था। अनीता की ये फिल्म 1953 में रिलीज हुई थी, लेकिन वो मुंबई आकर हिंदी फिल्मों में काम करना चाहती थीं। इसमें उनकी मदद एक्टर ओमप्रकाश ने की जो कि एक काम के सिलसिले में कोलकाता गए थे। बी-ग्रेड फिल्में मिलने से परेशान हो गईं अनीता अनीता ने किसी तरह ओमप्रकाश से मिलने की प्लानिंग की और इसमें सफल भी हो गईं। उन्होंने ओमप्रकाश से मुलाकात करके उन्हें फिल्मों में अपनी दिलचस्पी के बारे में बता दिया। ओमप्रकाश ने उन्हें एक फिल्म में साइन किया और इस तरह अनीता मुंबई आ गईं। 1955 में रिलीज हुई फिल्म 'तांगा वाली' उनकी पहली हिंदी फिल्म थी। इसके बाद वह 'दुनिया गोल है', 'झांझर' जैसी फिल्मों में नजर आईं। अनीता को शुरुआत में फिल्मों में कोई खास सफलता नहीं मिली। उन्होंने 'भला आदमी', 'कल क्या होगा', 'माया बाजार', 'एक झलक', 'देख कबीरा रोए', 'टैक्सी स्टैंड' जैसी बी-ग्रेड फिल्मों में साइड कैरेक्टर किए। इस बात से अनीता काफी निराश रहने लगीं कि उन्हें ए ग्रेड फिल्मों में हीरोइन के रोल ऑफर नहीं हो रहे। पौराणिक फिल्म ने संवारी अनीता की किस्मत 1957 में वक्त ने करवट ली और अनीत को फिल्ममेकर होमी वाडिया ने फिल्म पवनपुत्र हनुमान में सीता का रोल ऑफर किया। अनीता पौराणिक फिल्म करने को लेकर असमंजस में थीं, लेकिन इस फिल्म की कामयाबी ने उनकी सोच बदल दी। अनीता पौराणिक फिल्मों के ऑफर स्वीकारने लगीं और उन्हें संपूर्ण रामायण, श्री राम भरत मिलाप जैसी फिल्मों में भी सीता के किरदार में देखा गया। पौराणिक फिल्मों में मिली सफलता से उत्साहित अनीता ने फिर ऐतिहासिक फिल्मों की ओर रुख किया और टीपू सुल्तान, महारानी पद्मिनी, संत तुकाराम जैसी फिल्मों में लीड भूमिका निभाई। पति की मौत से लगा सदमा, फिल्मों से लिया ब्रेक 1961 में अनीता ने एक्टर माणिक दत्त से शादी कर ली। शादी के बाद अनीता चार साल तक फिल्मों से दूर रहीं। दरअसल, शादी के चंद साल बाद ही उनके पति माणिक की मौत हो गई थी। पति की मौत के बाद अनीता मुंबई के बांद्रा की लिंकिंग रोड पर स्थित अपने फ्लैट में अकेले रहने लगीं। पति की मौत के सदमे ने उन्हें डिप्रेशन में पहुंचा दिया था। इसके अलावा उन्हें इस बात का गम था कि वो मां नहीं बन पाईं। अनीता ने ठुकरा दिया था ‘जय संतोषी मां’ का ऑफर अनीता के करियर का दूसरा दौर 1969 में फिल्म आराधना से शुरू हुआ जिसमें उन्होंने साइड कैरेक्टर निभाया था। इसके बाद वो शर्मीली, अनुराग, झूम उठा आकाश, नागिन जैसी फिल्मों में भी नजर आईं, लेकिन 1975 में आई फिल्म जय संतोषी मां ने उनकी जिंदगी बदल दी। फिल्म में उन्होंने संतोषी माता का किरदार निभाया था। जब अनीता को ये फिल्म ऑफर हुई तो वो इसे नहीं करना चाहती थीं क्योंकि वो अपने करियर में कई पौराणिक फिल्में कर चुकी थीं और टाइपकास्ट होने के चलते उन्हें दूसरे जॉनर की फिल्में नहीं मिल रही थीं। दूसरा कारण ये था कि अनीता को संतोषी माता के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। ऐसे में उन्हें डर था कि वो ये किरदार अच्छे से नहीं निभा पाएंगी, लेकिन अनीता डायरेक्टर विजय शर्मा के मनाने के बाद फिल्म में काम करने को तैयार हो गईं। ‘जय संतोषी मां’ की शूटिंग के दौरान रखा व्रत इस फिल्म के लिए अनीता को बस 10 से 12 दिनों की शूटिंग करनी थी क्योंकि फिल्म में उनका रोल बहुत बड़ा नहीं था। जब पहले दिन अनीता शूट पर पहुंचीं तो सेट पर हड़बड़ी का माहौल था। फिल्म का बजट कम था इसलिए मेकर्स जल्द से जल्द शूटिंग पूरी करना चाहते थे। इसी वजह से अनीता नाश्ता नहीं कर पाईं और शूटिंग शुरू कर दी। काम ज्यादा होने की वजह से अनीता दोपहर में लंच भी नहीं कर पाईं। जब शाम को ये बात डायरेक्टर विजय शर्मा को मालूम चली तो उन्होंने अनीता के लिए तुरंत खाने की व्यवस्था करवाई, लेकिन अनीता ने कुछ भी खाने से मना कर दिया। उन्होंने शूटिंग के पहले दिन को व्रत की तरह मानकर फिर अन्न ही नहीं खाया। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अनीता ने जितने दिनों तक फिल्म की शूटिंग की, उन्होंने उतने दिन व्रत रखा था। 15 अगस्त 1975 को फिल्म रिलीज हुई। शुरुआत में फिल्म के हाल बुरे थे। आरती की थाली सजाकर थिएटर जाती थीं महिलाएं एक शो में केवल 56 रुपए की और दूसरे शो में 64 और तीसरे शो में केवल 100 रुपए की कमाई हुई थी। सबको लगा था कि फिल्म फ्लॉप हो जाएगी क्योंकि इसका मुकाबला फिल्म 'शोले' से था, लेकिन अचानक से टिकट खिड़की के हाल बदल गए। 'जय संतोषी मां' को देखने के लिए थिएटरों में दर्शकों की भीड़ जुटने लगी। फिल्म महिलाओं के बीच खासी लोकप्रिय हुई और उनके लिए शनिवार को स्पेशल शोज रखे गए। महिलाएं आरती की थाली सजाकर थिएटरों में जातीं और ‘मैं तो आरती उतारूं’ गाना पर्दे पर देखकर आरती करतीं, सिक्के फेंकतीं और फूल चढ़ातीं। इस फिल्म की सफलता के बाद अनीता गुहा स्टार बन गईं। वो जहां भी जातीं, लोग उनके पैर छूकर आशीर्वाद लेने लगते और उन्हें संतोषी माता कहकर पुकारते। अपने घरों में उनकी फोटो लगाकर उन्हें पूजते। इस फिल्म के बाद अनीता गुहा संतोषी माता की इमेज में ऐसी बंधीं कि इसके बाद उन्हें अन्य रोल में दर्शकों ने बिल्कुल पसंद नहीं किया। यही वजह रही कि कुछ फिल्मों के बाद अनीता ने फिर फिल्मी दुनिया छोड़ दी और अकेले जिंदगी बिताने लगीं। अनीता गुहा की आखिरी फिल्म 'लखपति' थी जो कि 1991 में रिलीज हुई थी। बीमारी के कारण घर से निकलना किया बंद अनीता गुहा के लिए अंतिम समय काफी मुश्किलों भरा रहा। उन्हें ल्यूकोडर्मा बीमारी ने घेर लिया था। इस बीमारी में पूरे शरीर पर सफेद दाग-धब्बे पड़ जाते हैं। अनीता के चेहरे पर भी दाग-धब्बे हो गए जिससे वो डिप्रेशन में चली गईं। उन्होंने घर से निकलना, लोगों से मिलना-जुलना बेहद कम कर दिया। चेहरे के दाग-धब्बे छुपाने के लिए अनीता खूब मेकअप करती थीं। यहां तक कि उन्होंने अपने रिश्तेदारों को ये तक कह दिया था कि उनके अंतिम संस्कार से पहले उनका मेकअप जरूर किया जाए ताकि कोई उनके दाग-धब्बे न देख पाए। 20 जून 2007 को मुंबई में अनीता ने 68 साल की उम्र में कार्डियक अरेस्ट से दम तोड़ दिया। उनकी आखिरी इच्छा के मुताबिक अंतिम संस्कार से पहले उनके चेहरे का मेकअप किया गया था।

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