डेथ एनिवर्सरीःगहने गिरवी रख प्रकाश मेहरा ने बनाई जंजीर:फ्लॉप अमिताभ को लिया तो डिस्ट्रीब्यूटर बोले- ये लंबा-बेवकूफ कौन, नशे में कहा- मैंने तुम्हें स्टार बनाया
70 के दशक की बात है। रोमांस का दौर था और हिंदी सिनेमा के सुपरस्टार थे दिलीप कुमार। धर्मेंद्र उस दौर में ‘मेरा गांव मेरा देश’(1971), ‘सीता और गीता’(1972) जैसी बेहतरीन फिल्मों से खुद को फिल्म इंडस्ट्री में स्थापित कर चुके थे। समय के साथ वो फिल्में बनाने में दिलचस्पी लेने लगे। कोई भी स्क्रिप्ट अच्छी लगती थी, तो झट से खरीद लेते। सीता और गीता में काम करते हुए धर्मेंद्र ने उस फिल्म की राइटर जोड़ी सलीम-जावेद की एक कहानी सुनी। नाम था ‘जंजीर’। सलीम-जावेद तब ‘अंदाज’ (1971) और ‘हाथी मेरे साथी’ (1971) जैसी फिल्में लिख चुके थे। कहानी पसंद आने पर धर्मेंद्र ने जंजीर की स्क्रिप्ट झट से खरीद ली। समय के साथ वो दूसरी फिल्मों में व्यस्त हो गए। एक रोज उनकी मुलाकात हसीना मान जाएगी, आन बान जैसी जुबली हिट डायरेक्ट करने वाले प्रकाश मेहरा से हुई। वो प्रोडक्शन में कदम रखने वाले थे। उन्होंने धर्मेंद्र से कहा कि वो फिल्म ‘समाधि’ बना रहे हैं, हीरो का डबल रोल होगा। धर्मेंद्र ने दिलचस्पी दिखाई और कहानी सुनी। उन्हें वो स्क्रिप्ट इतनी पसंद आई कि वो झट से इसे करने के लिए मान गए, लेकिन फिर एक डील हुई। धर्मेंद्र ने प्रकाश मेहरा से ‘समाधि’ की स्क्रिप्ट खरीद ली और बदले में 3500 रुपए लेकर जंजीर की स्क्रिप्ट थमा दी, जो सलीम-जावेद ने उन्हें दी थी। और इस तरह जंजीर की स्क्रिप्ट पहुंचीं प्रकाश मेहरा के पास। वो जंजीर, जिसने प्रकाश मेहरा को सबसे बड़ा डायरेक्टर, फ्लॉप-मनहूस एक्टर अमिताभ बच्चन को स्टार और सलीम-जावेद को इतिहास रचने वाली राइटर जोड़ी का दर्जा दिलाया। पत्नी के गहने बेचकर इस फिल्म को रूप देने वाले प्रकाश मेहरा को गुजरे आज 17 साल हो गए। डेथ एनिवर्सरी के मौके पर जानिए कैसे एक फिल्म और कई संयोंग ने उन्हें बनाया हिंदी सिनेमा का आला फिल्मकार- प्रकाश मेहरा ने धर्मेंद्र और मुमताज के साथ फिल्म जंजीर अनाउंस की। इसी समय प्रकाश मेहरा ने राइटर के.नारायण से ‘कहानी किस्मत की’ फिल्म की स्क्रिप्ट खरीदी। धर्मेंद्र को ये कहानी भी पसंद आई। उन्होंने प्रकाश मेहरा से कहा, ‘अगर आप कहानी किस्मत की फिल्म की स्क्रिप्ट डायरेक्टर अर्जुन हिंगोरानी (धर्मेंद्र को पहली फिल्म देने वाले) को दे देंगे, तो वो आपकी जंजीर बनाने में काफी मदद कर सकते हैं।’ प्रकाश मेहरा को ये ऑफर पसंद नहीं आया। वो पहले ही ‘समाधि’ की कहानी धर्मेंद्र को दे चुके थे, अब एक और फिल्म किसी और को देना उन्हें मुनासिब नहीं लगा। उन्होंने साफ इनकार कर दिया। धर्मेंद्र को ये बात थोड़ी खटकी। कुछ दिन बीते ही थे कि धर्मेंद्र ने अपने भाई की फिल्म शुरू कर दी। जंजीर के लिए डेट्स मांगी गई तो धर्मेंद्र ने साफ कहा- ‘पहले मैं अपने भाई की फिल्म का आधा शेड्यूल करूंगा और फिर जंजीर की शूटिंग शुरू करूंगा।’ प्रकाश मेहरा इतना लंबा इंतजार नहीं करना चाहते थे। धर्मेंद्र ने इस बारे में सोचने का समय लिया, लेकिन फिर फिल्म छोड़ दी। धर्मेंद्र के इनकार के बाद प्रकाश मेहरा देव आनंद के पास गए। उन्हें लगा कि फिल्म में एक्शन-ही-एक्शन है और गाने कम। उन्होंने प्रकाश मेहरा को सुझाव दिया- ‘क्यों न तुम फिल्म में कुछ और गाने डालो’। बातचीत के बीच देव आनंद ने कहा- ‘अगर मैं अपने होम प्रोडक्शन नव निकेतन के बैनर तले ये फिल्म बनाऊं तो तुम कितने पैसे लोगे?’ प्रकाश मेहरा ये स्क्रिप्ट छोड़ना नहीं चाहते थे। उन्होंने देव आनंद का ऑफर झट से ठुकरा दिया। हीरो की तलाश जारी रही। अब प्रकाश मेहरा, राजकुमार के पास गए। वो तब मद्रास में एक फिल्म शूट कर रहे थे। उन्हें ‘जंजीर’ इतनी पसंद आई कि उन्होंने कहा कि वो कल से ही फिल्म की शूटिंग करने के लिए तैयार हैं, बशर्ते शूटिंग मद्रास में ही हो, जिससे वो दूसरी फिल्म भी शूट कर सकें। ये मुमकिन नहीं था, क्योंकि कहानी बॉम्बे की थी। बात इस बार भी नहीं बनी। राजेश खन्ना, दिलीप कुमार ने भी एक्शन फिल्म करने से इनकार कर दिया। प्रकाश मेहरा बार-बार मिल रहे रिजेक्शन से परेशान हो गए। जावेद अख्तर ने दैनिक भास्कर को दिए पुराने इंटरव्यू में कहा था- फिल्म इंडस्ट्री में अगर एक -दो बड़े स्टार्स ने फिल्म की स्क्रिप्ट को ना कह दिया तो प्रोड्यूसर्स को लगता है कि स्क्रिप्ट खराब है और वो उसे छोड़ देते थे, लेकिन इस इंसान की न जाने क्या धारणा थी जो इन्होंने फिल्म नहीं छोड़ी। वो भी तब जब बड़े स्टार्स ने इसे करने से इनकार कर दिया था। एक दिन प्राण, प्रकाश मेहरा से मिलने पहुंचे और परेशान देख कहा- ‘तुम अमिताभ को ट्राय क्यों नहीं करते? बॉम्बे टू गोवा में देखने के बाद मुझे लगता है कि वो भविष्य में स्टार बनेगा। आपको भी वो फिल्म जरूर देखनी चाहिए।’ प्रकाश मेहरा ने ये बात अनसुनी कर दी। उस समय अमिताभ बच्चन एक फ्लॉप हीरो थे। अमिताभ 30 साल के थे और तब उनकी एक-एक कर 12 फिल्में फ्लॉप हो गईं। हर कोई उन्हें फिल्मों में लेने से कतराने लगा था। कुछ दिन बीते तो सलीम-जावेद भी उनसे मिलने पहुंचे। उन्होंने भी प्रकाश मेहरा के सामने अमिताभ का नाम सुझाया और कहा- ‘इस लड़के में वो बात है, जो जंजीर में विजय खन्ना बनने के लिए परफेक्ट हैं।' सलीम-जावेद ने भी प्रकाश मेहरा के सामने फिल्म बॉम्बे टू गोवा के उस फाइट सीन का जिक्र किया, जिसमें अमिताभ बच्चन च्विंगम खाते हुए गुंडों की पिटाई कर रहे थे। सबके सुझाव पर प्रकाश मेहरा ने फिल्म बॉम्बे टू गोवा देखी। एक सीन में अमिताभ बच्चन को देखते ही प्रकाश मेहरा जोर से चिल्लाए- ‘जंजीर का हीरो मिल गया।’ प्रकाश मेहरा ने अमिताभ को फिल्म ऑफर की, तो वो माने, जरूर लेकिन ये भी कहा कि अगर जंजीर नहीं चली तो मैं फिल्म इंडस्ट्री और बॉम्बे छोड़कर इलाहाबाद चला जाऊंगा। प्रकाश मेहरा को सलीम-जावेद की इस कहानी पर काफी भरोसा था। उन्होंने आश्वासन दिया कि ये फ्लॉप नहीं होगी। हीरो की कास्टिंग के बाद अब बारी थी हीरोइन की। फिल्म मुमताज के साथ अनाउंस हुई थी, लेकिन उन्होंने शादी के लिए फिल्म इंडस्ट्री छोड़ दी। बाद में कुछ और हीरोइनों ने ये कहकर फिल्म ठुकरा दी कि वो अमिताभ जैसे फ्लॉप एक्टर के साथ काम नहीं करेंगी। एक दिन अमिताभ ने जया भादुड़ी से कहा कि कोई भी हीरोइन उनके साथ काम करने के लिए राजी नहीं है। उस समय दोनों रिलेशनशिप में थे। अमिताभ बच्चन की निराशा देख जया ने कहा- ‘अगर प्रकाश मेहरा कहें, तो मैं फिल्म करने के लिए तैयार हूं।’ अमिताभ ये बात लेकर प्रकाश मेहरा के पास पहुंचे और बात बन गई। 1973 में ये फिल्म बनकर तैयार हो गई, लेकिन जब प्रकाश मेहरा ने डिस्ट्रीब्यूटर्स को फिल्म दिखाई, तो उन्होंने अमिताभ बच्चन को देख मजाक उड़ाते हुए कहा- ‘ये लंबा बेवकूफ हीरो कौन है।’ अमिताभ बच्चन को ये बात काफी बुरी लगी। बिग बी तब प्रकाश मेहरा को लल्ला कहते थे, जो इलाहाबाद में भाई को कहा जाता ता। एक दिन उन्होंने कहा, ‘लल्ला मैं नहीं जानता कि इस फिल्म के बाद मेरा भविष्य क्या होगा?’ जवाब मिला, ‘स्वार्थी मत बनो, मेरे बारे में सोचो। अगर कुछ भी गड़बड़ हुई तो मैं सब कुछ गंवा दूंगा।’ वाकई प्रकाश मेहरा ने इस फिल्म में अपना सब कुछ लगा दिया। हर एक जमापूंजी। यहां तक कि उन्होंने पत्नी के सारे जेवर भी गिरवी रख दिए थे। लंबे स्ट्रगल के बाद जंजीर को डिस्ट्रीब्यूटर्स मिले, लेकिन रिलीज होने से पहले ही डायरेक्टर प्रकाश मेहरा और राइटर जोड़ी सलीम-जावेद के बीच क्रेडिट की मजेदार जंग शुरू हो गई। दरअसल, सलीम जावेद को अपनी लिखी कहानी पर पूरा भरोसा था। उनका मानना था कि अगर फिल्म की कहानी अच्छी हो, तो उसे हिट होने से कोई रोक नहीं सकता, लेकिन अगर कोई फिल्म हिट होती है, तो उसका क्रेडिट राइटर्स को भी जरूर मिलना चाहिए। एक दिन राइटर सलीम खान, प्रकाश मेहरा के पास पहुंचे और कहा- ‘हमारे नाम भी जंजीर के पोस्टर में होने चाहिए।’ प्रकाश मेहरा ने हैरानी जताते हुए कहा- ‘राइटर्स के नाम? ऐसा कभी होता है क्या?’ वाकई हिंदी सिनेमा के इतिहास में किसी भी फिल्म के पोस्टर में उस समय तक कभी किसी राइटर का नाम नहीं लिखा गया था, लेकिन सलीम-जावेद ये रीत बदलने पर अड़े थे। देखते-ही-देखते फिल्म रिलीज की तारीख पास आ गई और बॉम्बे में पोस्टर लगा दिए गए। एक दिन सलीम खान ने काफी शराब पी और जे.पी.सिप्पी के प्रोडक्शन हाउस में काम करने वाले लड़के को कॉल कर जीप और पेंटिंग के सामान का इंतजाम करने को कहा। वो लड़का जैसे ही पहुंचा, सलीम खान ने उससे कहा- ‘जाओ, शहर में जंजीर के जितने भी पोस्टर लिखे हैं, उनके ऊपर जाकर लिख दो, रिटन बाय सलीम-जावेद।’ उस लड़के ने ठीक वैसा ही किया। अगली सुबह जुहू से ओपेरा हाउस तक के हर पोस्टर में जया और प्राण नाथ के माथे पर अलग से पोते गए सलीम-जावेद के नाम थे। फिल्म इंडस्ट्री में इसकी जमकर चर्चा हुई, लेकिन फिर प्रकाश मेहरा ने उनकी जिद के आगे घुटने टेक दिए। उन्होंने जंजीर के नए पोस्टर बनवाए, जिसमें हिंदी सिनेमा के इतिहास में पहली बार राइटर के नाम शामिल किए गए। फिल्म के कोलकाता प्रीमियर कोलकाता में कई बड़ी हस्तियां पहुंचीं। प्रीमियर खत्म होते ही वहां मौजूद हर कोई प्राण के पास जाकर उनके अभिनय की तारीफ करने लगा और अमिताभ नजरअंदाज हो गए। ये देख अमिताभ बच्चन की आंखों में आंसू आ गए। प्रकाश मेहरा ने ये देखा, तो पास आकर कहा- ‘तुम चिंता मत करो, एक बार फिल्म रिलीज होने दो, फिर देखना, जो लोग आज प्राण-प्राण कर रहे हैं, वो कैसे अमिताभ-अमिताभ करेंगे।’ 11 मई 1973 फ्लॉप हीरो अमिताभ बच्चन और जया बच्चन स्टारर, प्रकाश मेहरा द्वारा डायरेक्ट और प्रोड्यूस की हुई फिल्म जंजीर रिलीज हुई। कोलकाता में फिल्म ने ठीक-ठाक कमाई की, लेकिन बॉम्बे में थिएटर खाली-खाली रहे। अमिताभ बच्चन ने इलाहाबाद लौटने की तैयारी कर ली। निराशा इतनी हुई कि उन्हें तेज बुखार हो गया। फिल्म रिलीज हुए 4 दिन बीत गए और प्रकाश मेहरा ने रोज-रोज फिल्म की खबर लेना भी बंद कर दिया। एक दिन मुंबई के गेएटी गैलेक्सी सिनेमा हॉल के बाहर से गुजरते हुए उन्होंने देखा कि टिकट विंडो के बाहर काफी भीड़ लगी है। आज से पहले तक वहां कभी इतनी भीड़ नहीं लगी थी। वो पास गए, तो वहां जंजीर लगी थी। फिल्म देखने वालों की भीड़ इतनी थी कि उन्हें टिकट भी नहीं मिल रही थी। तब भी लोग 5 रुपए की टिकट 100-100 रुपए में खरीदने के लिए झगड़ रहे थे। फिल्म जंजीर चल निकली थी। फिल्म के गाने ‘यारी है ईमान मेरा, यार मेरी जिंदगी…’ और ‘दीवाने हैं, दीवानों को न घर चाहिए…’ काफी हिट रहे। हर जगह बस फिल्म की ही चर्चा थी। प्रकाश मेहरा ने तुरंत अमिताभ को कॉल कर ये खबर दी, उन्हें लगा ये सुनकर उनकी तबीयत ठीक हो जाएगी, लेकिन हुआ इसका उल्टा। अमिताभ बच्चन को ये सुनते ही 104 डिग्री बुखार हो गया। एक हफ्ते में अमिताभ बच्चन स्टार बन चुके थे। उनके हुए डायलॉग- ‘जब तक बैठने को न कहा जाए, शराफत से खड़े रहो, ये पुलिस स्टेशन है, तुम्हारे बाप का घर नहीं….’, हर किसी की जुबान पर था और अमिताभ बच्चन फ्लॉप एक्टर से बन गए एंग्री यंग मैन। प्रकाश मेहरा, अमिताभ बच्चन, सलीम-जावेद, चारों को फिल्म का फायदा मिला। प्रकाश मेहरा को अमिताभ का काम ऐसा पसंद आया कि आगे उन्होंने ‘हेरा फेरी’, ‘खून पसीना’, ‘मुकद्दर का सिकंदर’, ‘लावारिस’, ‘नमक हलाल’ और ‘शराबी’ जैसी 6 फिल्में अमिताभ बच्चन के साथ बनाईं। तब कहा जाता था कि जिस फिल्म में प्रकाश मेहरा अमिताभ बच्चन को लें, उसका हिट होना तय है, लेकिन ये भ्रम फिल्म ‘जादूगर’ (1989) से टूट गया, जो प्रकाश मेहरा ने तत्कालीन प्राइम मिनिस्टर इंदिरा गांधी के कहने पर बनाई थी। दरअसल, 5 हिट फिल्मों के बाद प्रकाश मेहरा अमिताभ के साथ फिल्म जादूगर बनाना चाहते थे, लेकिन बैक-टु-बैक फिल्में कर रहे अमिताभ के पास समय नहीं था। इसी बीच अमिताभ ने प्रकाश मेहरा के सबसे बड़े कॉम्पिटिटर मनमोहन देसाई के साथ कुछ फिल्में कीं। मर्द, अमर अकबर एंथोनी, नसीब और कूली बनाने वाले मनमोहन देसाई और प्रकाश मेहरा का झगड़ा जगजाहिर था। दोनों इंटरव्यूज में एक दूसरे को फिल्मों के नाम से ताने देते थे। मनमोहन देसाई ने एक इंटरव्यू में कहा- ‘एक शराबी ही शराबी जैसी फिल्म बना सकता है, और मर्द ही मर्द जैसी फिल्में बनाते हैं।’ प्रकाश मेहरा ने जवाब दिया- ‘एक कुली ही इतने नीचे गिरकर ऐसी बात कर सकता है।’ इस कॉम्पिटिशन का असर बिग बी पर भी पड़ा, क्योंकि वो दोनों की फिल्में कर रहे थे। लेकिन एक गलतफहमी से प्रकाश मेहरा के जहन में बिग बी के लिए शक पैदा हो गया। उन्हें लगा कि स्टार बनने के बाद वो उन्हें समय नहीं दे रहे। 1987 में प्रकाश मेहरा एक पार्टी में पहुंचे। उन्होंने जमकर शराब पी। नशा होते ही वो अमिताभ बच्चन के पास पहुंचे और चिल्लाकर कहा- 'मैंने तुम्हें स्टार बनाया और अब तुम्हारे पास मेरे लिए ही टाइम नहीं। तुम मुझे भूल जाओ, मेरी फिल्म भूल जाओ, लेकिन ये मत भूलना कि जब तुम्हें कोई पूछता नहीं था, तब मैंन तुम्हें जंजीर से उठाया। एंग्री यंग मैन बनाया।' अमिताभ खामोश खड़े सुनते रहे। बात वहीं खत्म हो गई। अगले दिन अमिताभ ने प्रकाश मेहरा को कॉल कर कहा, ‘आपको ऐसा क्यों लगा कि मैं आपकी फिल्म नहीं करना चाहता। इस बार प्रकाश मेहरा खामोश रहे। आगे अमिताभ ने कहा- आप अपनी फिल्म के लिए डेट्स ले लीजिए।’ अनबन वहीं खत्म हो गई, लेकिन फिर प्रकाश मेहरा ने जादूगर बनाने का आइडिया ड्रॉप कर दिया। वाइल्ड फिल्म्स इंडिया को दिए इंटरव्यू में प्रकाश मेहरा ने स्वीकार किया था कि अमिताभ बच्चन से उनकी अनबन थी। उन्होंने ये भी कहा कि फिल्म जादूगर को चुनना उनकी बदकिस्मती थी। एक दिन यशवंतराव चौहान हॉल में इंदिरा गांधी एक प्रोग्राम में आई थीं,अमिताभ बच्चन के गांधी परिवार से करीब के रिश्ते थे, तो वो भी पहुंचे और प्रकाश मेहरा भी आए। वहां इंदिरा गांधी ने कहा कि फिल्म इंडस्ट्री को जिम्मेदारी लेकर अंधविश्वास कम करने के लिए फिल्में बनानी चाहिए। इंदिरा गांधी की बात सुनकर अमिताभ बच्चन ने प्रकाश मेहरा ने कहा, ‘देखो अपने बीच जो भी बात हुई उसे भूल जाओ।’ फिल्म बननी शुरू हुई, जो एक फर्जी बाबा को एक्सपोज करने की कहानी थी। शूटिंग चल ही रही थी कि एक दिन एक आदमी ने प्रकाश मेहरा की कार की डिग्गी में 50 लाख रुपए से भरी पेटी रख दी। कुछ देर बाद एक बाबा उनके पास आए और कहा ये 50 लाख रख लो, लेकिन ये फिल्म मत बनाओ। प्रकाश मेहरा ने इनकार कर दिया। फिल्म 1989 में रिलीज हुई और बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप रही। प्रकाश मेहरा क्रिएटिव, मस्ती-मजाक करने वाले शख्स थे, लेकिन सेट पर बेहद सख्त मिजाज थे। यही वजह रही कि वो फिल्म ‘लावारिस’ से राखी को निकालने वाले थे। इस फिल्म में परवीन बाबी को अमिताभ के साथ कास्ट किया गया था। परवीन बाबी की मानसिक हालत से सेट का माहौल बिगड़ने लगा, तो उन्हें हटाकर जीनत अमान की कास्टिंग की गई। राखी ने फिल्म में अमिताभ बच्चन की मां का रोल निभाया। एक दिन सेट पर अमजद खान तैयार बैठे, लेकिन राखी नहीं पहुंचीं। कई घंटे बीते, कई कॉल भी किए गए, लेकिन जवाब नहीं मिला। प्रकाश मेहरा शूटिंग रुकने से भड़क गए। उन्होंने टीम से कहा, ‘आखिरी बार कॉल करो, उठे तो ठीक वरना आज पैकअप कर, कल नई हीरोइन के साथ शूट करेंगे।’ खुशकिस्मती से राखी ने कॉल उठाकर कहा कि उनकी बेटी बीमार है। ये सुनकर प्रकाश मेहरा का गुस्सा शांत हो गया। एक नजर प्रकाश मेहरा के करियर पर- 13 जुलाई 1939 को प्रकाश मेहरा का जन्म उत्तर प्रदेश के बिजनौर में हुआ। जन्म के ठीक बाद मां का निधन हो गया। पिता ने भी संन्यास ले लिया और नवजात प्रकाश को उनके नाना-नानी के पास छोड़ गए। रेडियो सुनते हुए उन्हें म्यूजिक कंपोजर बनने की ठानी और नाना से 13 रुपए चुराकर मुंबई आ गए। फिल्म इंडस्ट्री में काम नहीं मिला तो वो गुजारे के लिए सैलून में काम करने लगे। लंबी जद्दोजहद के बाद उन्हें 1962 की फिल्म प्रोफेसर में प्रोडक्शन कंट्रोलर का काम मिला। आगे उन्होंने 1965 की मीना कुमारी स्टारर फिल्म पूर्णिमा में असिस्टेंट डायरेक्टर का काम किया। साथ ही फिल्म का एक गाना भी लिखा। दो सालों में ही हुनर परखने के बाद उन्होंने 1968 की हसीना मान जाएगी से बतौर डायरेक्टर फिल्म बनाई, जो जुबली हिट रही। आगे उन्होंने मेला, समाधि और आन-बान जैसी फिल्में भी बनाईं, जो सभी जुबली हिट रहीं। आगे उन्होंने जंजीर से बतौर प्रोड्यूसर करियर की दूसरी पारी शुरू की और शराबी, लावारिस, मुकद्दर का सिकंदर जैसी कई हिट फिल्में बनाईं। जादूगर फ्लॉप होने के बाद उनकी जिंदगी एक जुआं, दलाल और बाल ब्रह्मचारी जैसी फिल्में एवरेज रहीं। प्रकाश मेहरा ने फिल्मी करियर में कई गाने भी लिखे और साथ ही चमेली की शादी की स्क्रिप्ट में भी उनकी भागीदारी रही। उनके डायरेक्शन और प्रोडक्शन की आखिरी फिल्म मुझे मेरी बीवी से बचाओ (2001) रही। उन्हें प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन की तरफ से दो बार लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड दिया गया। 17 मई 2009 में उनका 69 साल की उम्र में मल्टीपल ऑर्गन फैल्योर से निधन हो गया। ……………………………………………………………………………………. फिल्मी हस्तियों से 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स्टाफ को हंसाते तो कभी गाना सुना रहे थे। दैनिक भास्कर से बात करते हुए ऋषि कपूर की इकलौती बेटी रिद्धिमा कहती हैं, ‘सब अचानक हुआ, वो बहुत डरावना दिन था। अचानक एक खालीपन आ गया। एक सूनापन, उनकी जिंदगी उनकी मौजूदगी लार्जर देन लाइफ थी।’ पूरी स्टोरी पढ़ें…
………………………………………………. विनोद खन्ना की पुण्यतिथि, पिता ने पिस्तौल तानी:अमिताभ ने फेंका ग्लास, तो टांके आए: महेश भट्ट को धमकाया, आखिरी ख्वाहिश थी- पाकिस्तान जाना
लंबी कद-काठी, गोरी रंगत और गहरी आंखें। 18 साल की उम्र में कॉलेज के दिनों में कई लड़कियां विनोद खन्ना के लुक की तारीफ करती नहीं थकती थीं। सबका एक ही सुझाव था, ‘हीरो जैसे लगते हो, फिल्मों में जाओ’, लेकिन विनोद के पिता चाहते थे कि बेटा पढ़ाई पूरी कर खानदानी टेक्सटाइल बिजनेस संभाले। विनोद का बागी रवैया तभी शुरू हो गया था, जब उन्होंने पिता के कहने पर कॉमर्स के बजाय साइंस चुना। एक रोज उनकी कॉलेज पार्टी में कुछ फिल्मी हस्तियां पहुंचीं, जिनमें उस दौर के नामी हीरो सुनील दत्त और उनकी दोस्त अंजू महेंद्रू भी थीं। वो देखना चाहते थे कि टीनएजर्स किस तरह पार्टी करते थे। पूरी खबर पढ़ें…
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