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1,500-year-old kitchen knife set found in Hadrianopolis

Archaeologists have discovered a set of iron kitchen knives and a marble whetstone from Late Antiquity in Hadrianopolis, northern Turkey. Stratigraphic analysis dates them to the 5th or 6th century.

The set was found in the kitchen section of a structure dubbed the Hammam Building Complex. They were in fragments at the time of discovery, broken into around 250 pieces. Archaeologists puzzled them back together in the conservation laboratory of Karabük University, restoring them to their original shapes. The knives are identical in type, but of graduated sizes, just like a modern knife set.

Emphasizing the importance of the knives, [dig leader Ersin Çelikbaş, professor at Karabük University’s Department of Archaeology,] stated: “The fact that the knives were found in the same place indicates that the people living in the Hammam Building Complex were engaged in animal husbandry. Archaeological data had already shown that livestock activities were intensive in Hadrianopolis during antiquity, especially in the Late Roman and Early Byzantine periods. The discovery of these knives confirms that families involved in animal husbandry lived in the Hadrianopolis region in ancient times.”

(Animal husbandry or butchery? Obviously ones leads to the other in a general sense, but the evidence of meat processing at the location isn’t evidence that the stock were raised for slaughter in that specific building complex. They could have bought the livestock the way butchers do today or sold their butchering services to people who brought in their own. That may be a translation issue or the team has indeed unearthed archaeological evidence of animal husbandry at the site but the articles are just focused on the knives because of how cool it is that they found a matched graduated set like you’d find in any modern kitchen.)

Pointing out that the knives are rare examples from a typological perspective, Çelikbaş continued: “The fact that they were found as a set is also very important. We can say that they are significant archaeological finds both methodologically and in terms of providing important data about the social life here. In addition, a sharpening stone was found alongside the knives. This is also important for us because there is a quarry in the Eskipazar region, known from the Turkish-Islamic and especially the Ottoman period, that produces a stone called ‘kösüre stone.’ This stone was famously used during the Ottoman period for sharpening knives and cutting tools.”

The discovery of the knives and stone together is evidence that the same type of stone used to sharpen blades in the Ottoman era (between 1300 and 1922) was in active use in the region much earlier.



* This article was originally published here

The Onion launches new effort to turn Infowars into parody website

The new proposal would involve the publication licensing Alex Jones's company, which faces liquidation.

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महाकाल की शरण में सांसद-एक्टर रवि किशन:भस्म आरती के बाद किए दिव्य दर्शन, गोरखपुर की खुशहाली की मांगी कामना

भोजपुरी और हिन्दी सिनेमा के प्रसिद्ध अभिनेता एवं गोरखपुर से सांसद रवि किशन ने बुधवार सुबह श्री महाकालेश्वर मंदिर में भगवान महाकाल के दर्शन किए। वे भस्म आरती के पश्चात मंदिर पहुंचे, जहां उन्होंने विधि-विधान से पूजन-अर्चन कर आशीर्वाद प्राप्त किया। मंदिर पहुंचने के बाद रवि किशन ने सबसे पहले नंदी हॉल में पूजा-अर्चना की और फिर चांदी द्वार से भगवान महाकाल के दर्शन किए। इस दौरान उन्होंने जल अर्पित कर भगवान का स्मरण किया और लगातार महाकाल का जाप करते नजर आए। करीब 15 मिनट तक मंदिर परिसर में रहकर उन्होंने श्रद्धा के साथ दर्शन किए और देश-प्रदेश के कल्याण की कामना की। दर्शन के बाद रवि किशन ने कहा कि जब भी बाबा महाकाल के दिव्य दर्शन का अवसर मिलता है, जीवन धन्य हो जाता है। उन्होंने गोरखपुर की जनता के लिए विशेष रूप से भगवान महाकाल के चरणों में प्रार्थना की और सभी के स्वास्थ्य एवं समृद्धि की कामना की।

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शूटिंग रोकी तो मधुबाला को कटघरे तक ले पहुंचे बी.आर.चोपड़ा:प्रिंस ने भारत को समझने के लिए इनकी फिल्म देखी, जवाहरलाल नेहरू ने लिखी चिट्ठी

22 अप्रैल 1914 आज से ठीक 112 साल पहले अखण्ड भारत के पंजाब में पीडब्ल्यू डी में सरकारी नौकरी करने वाले विलायती राज चोपड़ा के घर बेटे बलदेव का जन्म हुआ। बलदेव राज चोपड़ा, 6 भाई-बहनों के परिवार में दूसरे नंबर पर थे। पढ़ाई में अव्वल रहने वाले बलदेव के लिए पिता ने बचपन से सोच रखा था कि इसे सरकारी अफसर बनाऊंगा। समय बीता और तैयारी शुरू कर दी गई। पाकिस्तान के लाहौर गवर्नमेंट कॉलेज में इंग्लिश में मास्टर डिग्री लेते हुए उनका इंडियन सिविल सर्विस का फॉर्म भरवाया गया। पिता को उम्मीद थी कि बेटा परीक्षा निकाल लेगा, लेकिन परीक्षा की तारीखों से ठीक पहले बलदेव की तबीयत ऐसी बिगड़ी की पूरी तैयारी में पानी फिर गया। परीक्षा दी, परिणाम आए तो वो फेल हो चुके थे। बलदेव खूब रोए। पिता ने समझाया, कुछ दिनों के लिए लंदन चले जाए, 6 महीनें बाद फिर तारीख है, तब पेपर दे देना। रोते हुए बच्चे ने एक ही जवाब दिया- अब कभी सरकारी नौकरी नहीं करूंगा। सरकारी नौकरी का सपना चूर-चूर हो गया, लेकिन किसे पता था कि वही लड़का एक दिन हिंदी सिनेमा में इतिहास रच देगा। वो फेल होने वाला लड़का था बलदेव राज चोपड़ा, जिसे देश बी.आर.चोपड़ा नाम से जानता है। जिसकी फिल्मों की तारीफ तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू तक किया करते थे। भारत-पाकिस्तान के बंटवारे के दंगों के बीच हिंदी सिनेमा में कदम रखने वाले बी.आर.चोपड़ा ने हमराज, नया दौर, साधना, निकाह, कानून जैसी कई सुपरहिट फिल्में बनाईं। समय से आगे चलने वाली कहानियां और सस्पेंस, किरदारों की कहानियों ने दर्शकों को खूब बांधे रखा और फिर 1988 में उन्होंने टीवी शो महाभारत बनाया, तो भगवान और पौराणिक कथा को घर-घर पहुंचातकर इतिहास ही रच दिया। लोग शो शुरू होने से पहले चप्पल उतारकर, जमीन पर हाथ जोड़े बैठते, तो कुछ टीवी की आरती उतारते। वो शो, जिसके नाम आज भी विश्व रिकॉर्ड है। इस कामयाबी के सफर में बी.आर.चोपड़ा की जिद और स्वाभिमान भी चर्चा में रहा। कभी शूटिंग में खलल पैदा करने वालीं मधुबाला को कठघरे में खड़ा किया, तो कभी गोविंदा जैसे स्टार को ऑफिस से बाहर भगाय दिया। बी.आर. चोपड़ा की आज 112 वीं बर्थ एनिवर्सरी है, इस खास मौके पर पढ़िए, उनके फिल्मों में आने और इतिहास रचने से जुड़े कुछ चुनिंदा किस्से- किस्सा-1, अखबार के लिए लिखते थे, दोस्तों के कहने पर फिल्म बनाई तो हुआ नुकसान कॉलेज के दिनों में बी.आर.चोपड़ा ने कलकत्ता के वैराइटी अखबार के लिए लिखना शुरू कर दिया। उनका पहला आर्टिकल फिल्मों पर था। एक आर्टिकल में फिल्म बनाने वाले कलाकारों को ललकारते हुए उन्होंने लिखा, कुछ अच्छा बनाओ, कहानी डालो, समाज को बताओ की समाज में क्या चल रहा है, क्या दिक्कतें हैं। आर्टिकल कलकत्ता भेजा, लेकिन वो छपा ही नहीं। अगले 3 आर्टिकल भी छपे नहीं। तीसरे हफ्ते उन्हें एक पार्सल मिला, जिसमें वैराइटी अखबार की एक प्रति थी, जिसमें उनके पिछले तीनों आर्टिक्ल थे। इसके साथ एडिटर का एक माफीनामा भी था। लिखने का सिलसिला चल निकला। 1944 में बी.आर.चोपड़ा न्यू स्टार फिल्म प्रोडक्शन कंपनी की सिने हैराल्ड मैगजीन के लिए लिखने लगे। जब आजादी की लड़ाई से तनाव बढ़ने लगा, तो बचने के लिए बी.आर.चोपड़ा जालंधर के पैतृक घर में रहने लगे। वहां 150 लोग और ठहरे हुए थे। एक रोज पिता के कुछ दोस्तों ने उन्हें हिंदी सिनेमा की फिल्मों में पैसे लगाने का सुझाव दिया। 5 दोस्त और जुड़ गए। सभी ने फिल्म करवट बनाई, जो बुरी तरह फ्लॉप हो गई। बी.आर.चोपड़ा की पूरी कमाई खत्म हो गई। किस्सा-2, नुकसान के बाद फिर अखबार में काम करने की अर्जी दी फिल्म प्रोडक्शन में नुकसान होने के बाद बी.आर.चोपड़ा ने तय किया कि अब वो अखबार में काम करेंगे। तब हिंदुस्तान टाइम्स के एडिटर उनके अंकल दुर्गा दास थे। खत लिखा, तो जवाब मिला, बॉम्बे आ जाओ, लेकिन हारकर मत आना। बी.आर.चोपड़ा सोच में थे कि क्या किया जाए, वो पैरिसियन कैफे में चाय पीने गए। चाय पी ही रहे थे कि आवाज आई- अरे चोपड़ा साहब क्या कर रहे हैं। उन्होंने थकी सी आवाज में कहा- चाय पी रहे हैं। उस शख्स ने फिर कहा- क्या कर रहा है तू। इस पर बी.आर.चोपड़ा ने गुस्से में कहा- कर ही क्या सकता हूं, न पैसा है न ढेला है, न अनुभव है। कहां से करूं कुछ। इस पर उस शख्स ने कहा- एक काम कर, कुछ तो कर। स्टोरी ले ले कम से कम। वो शख्स थे, आई.एस.जौहर। उस दौर के जाने-माने एक्टर और कॉमेडियन। उस स्टोरी पर बी.आर.चोपड़ा ने लाहौर में फिल्म चांदनी चौक बनाना शुरू किया। शूटिंग शुरू हुई ही थी कि बंटवारे में दंगे ऐसे भड़के की शूटिंग बंद करनी पड़ी। वो बॉम्बे जाकर बसे, जहां दोस्तों की सलाह पर उन्होंने दोबारा फिल्ममेकिंग शुरू की। दो नाकामी के बाद 1951 की उनकी बतौर डायरेक्टर फिल्म अफसाना चल निकली। इस फिल्म में अशोक कुमार ने डबल रोल निभाया। कहा जाता है कि डबल रोल का ट्रेंड यही फिल्म लाई थी। ये फिल्म पहले दिलीप कुमार को ऑफर हुई थी, लेकिन उन्होंने ये कहते हुए इनकार कर दिया कि वो जज के रोल में फिट नहीं बैठेंगे। आगे बी.आर.चोपड़ा ने हमराज, कानून जैसी कई हिट फिल्में बनाईं। किस्सा-3, संजीव कुमार ने ठंडे-ठंडे पानी से गाने में वजन घटाने का वादा कर वजन बढ़ाया साल 1978 में बी.आर.चोपड़ा ने फिल्म पति पत्नी और वो बनाई, जिसमें संजीव कुमार लीड रोल में थे। फिल्म का गाना ठंडे-ठंडे पानी में के लिए संजीव कुमार को शर्टलेस होकर बच्चे के साथ बैठकर नहाना था। बिना कपड़ो के बैठने में संजीव कुमार का पेट काफी दिख रहा था। उन्होंने शूटिंग शुरू होने के बाद बी.आर.चोपड़ा से कहा, देखिए, मेरा पेट बहुत निकल गया है, क्यों न हम इस गाने की शूटिंग आखिर में करें। तब तक मैं वजन घटा लूंगा। बी.आर.चोपड़ा उनकी जिद पर मान गए। अगले ही दिन से संजीव कुमार ने डाइटिंग शुरू कर दी। अगले दिन सेट पर उनके लिए खाने में सिर्फ सलाद और सूप आया। उन्होंने खाना खाया और बी.आर.चोपड़ा से कहा- चोपड़ा अब मैं थोड़ी देर सो जाता हूं। थोड़ी देर बाद चोपड़ा साहब का लंच आया। जैसे ही वो खोला गया, तो उसमें फिश करी और चावल थे। खूशबू आते ही संजीव कुमार उठ खड़े हुए और कहा- आज के दिन डाइटिंग छोड़ देता हूं। ऐसा ही उन्होंने रोज किया। वो पहले सलाद खाते और फिर दूसरों के घर से आने वाला लजीज खाना। एक महीने बाद जब उस गाने की शूटिंग की बारी आई, तो संजीव कुमार का वजन पहले से भी कहीं ज्यादा बढ़ा हुआ था। मजबूरन उन्हें तोंद के साथ ही शूटिंग करनी पड़ी। ये गाना उस समय काफी हिट रहा, जिसे आज भी सुना जाता है। किस्सा-4, फिल्म देखकर विधवा लड़की के पिता ने बदली सोच, करवाई दूसरी शादी एक दिन बी.आर.चोपड़ा अपने दफ्तर में बैठे थे कि तभी एक आदमी आकर उनके कदमों में गिर गया। बी.आर.चोपड़ा ने वजह पूछी तो उसने कहा, मैं एक छोटे से गांव का हैडमास्टर हूं, मेरी बेटी की 8 महीने पहले शादी हुई थी। बदकिस्मती से 3 महीने बाद ही उसके पति की मौत हो गई। मैं उसे घर ले आया। हम घर से निकलते नहीं थे। हमें लगा दुनिया खत्म हो गई है। खाना-पीना भी लगभग बंद कर दिया था। एक दिन मेरे स्कूल का दूसरा हैडमास्टर आया और कहा, चलो तुम्हें सिनेमा ले चलूं। मैंने उसे कहा- मेरी बेटी विधवा है, मैं सिनेमा देखना छोड़ चुका हूं। उसने कहा, कब तक छिपे रहोगे, कभी तो बाहर निकलोगे। हैडमास्टर ने कहानी आगे सुनाते हुए बी.आर.चोपड़ा से कहा- साहब, मैं पिक्चर देखने चला गया, पिक्चर थी, हमराज। उसमें एक गाना था, न मुंह छुपा के जियो और न सिर झुका के जियो। गमों का दौर भी आए तो मुस्कुरा के जियो। घर आकर मैंने बेटी से कहा, देखो, जिंदगी तो चलने का नाम है, रुकने का नहीं। आगे उस शख्स ने कहा, चोपड़ा साहब, मैं आज इसलिए आपके पैरों पर हूं। मैंने फिल्म देखी, मैंने अपनी बेटी की दूसरी शादी करवा दी। आज वो बहुत खुश है। मैं भी बहुत खुश हूं। इसलिए आपको धन्यवाद देने आया हूं। किस्सा-5, शूटिंग रुकी तो मधुबाला के खिलाफ कर दिया केस 50 के दशक में मधुबाला और दिलीप कुमार रिलेशनशिप में थे। फिल्म इंसानियत (1955) के प्रीमियर में साथ पहुंचकर दोनों रिश्ते पर मुहर लगा चुके थे। हालांकि तब ये खबरें भी थीं कि मधुबाला के पिता इस रिश्ते के बेहद खिलाफ हैं। दरअसल, 1956 में खबरें आईं कि दोनों शादी कर सकते हैं, दिलीप कुमार ने ये शर्त रखी थी कि शादी के बाद मधुबाला फिल्मों में काम नहीं करेंगी। शादी के बाद इनकम रुकने डर से मधुबाला के पिता अताउल्लाह खान इस शादी के खिलाफ थे। मधुबाला पर कई पाबंदियां लगीं और उन्हें दिलीप कुमार से अलग-अलग रखने के लिए कहा जाने लगा। इसी समय बी.आर.चोपड़ा ने मधुबाला को 32 हजार रुपए का साइनिंग अमाउंट देकर दिलीप कुमार के साथ फिल्म नया दौर में साइन किया। फिल्म की 15 दिनों की शूटिंग मुंबई में हुई, जिसके बाद आगे की शूटिंग भोपाल में होनी थी। जब ये बात मधुबाला के पिता तक पहुंची तो उन्होंने एक्ट्रेस को भेजने से साफ इनकार कर दिया। उन्हें लगा कि दिलीप कुमार ने मुंबई में पाबंदियां बढ़ने पर भोपाल में शूटिंग करने का दबाव बनाया है, जिससे वो मधुबाला के करीब रह सकें। पिता के दबाव में मधुबाला को भी मानना ही पड़ा। लेकिन इस बात से फिल्म के डायरेक्टर और प्रोड्यूसर बी.आर.चोपड़ा जमकर नाराज हुए। मधुबाला शूटिंग में नहीं पहुंचीं, तो बी.आर.चोपड़ा ने मुंबई के गिरगांव के मजिकस्ट्रेट कोर्ट में उनके खिलाफ शिकायत दर्ज कर दी। धोखाधड़ी और कॉन्ट्रैक्ट तोड़ने का आरोप लगाते हुए उन्होंने 32 हजार रुपए वापस मांगे। उस समय बी.आर.चोपड़ा वैराइटी मैग्जीन के एडिटर थे। उन्होंने इस विवाद पर वैराइटी मैगजीन में दो पन्नों का लेख भी लिखा। साथ ही उन्होंने मधुबाला की एक बड़ी सी तस्वीर में लाल काटने का निशान लगाया और लिखा कि अब उनकी जगह वैजयंतीमाला हीरोइन होंगी। मीडिया ने इस खबर को खूब उछाला और मधुबाला की बदनामी हुई। जब सुनवाई शुरू हुई, तो मधुबाला को कटघरे में खड़ा किया। गवाह के तौर पर दिलीप कुमार को बुलाया गया। मधुबाला, उनके साथ रिश्ते में थे, उन्हें उम्मीद थी कि दिलीप कुमार साथ देंगे, लेकिन उल्टा उन्होंने सबके सामने कहा कि मधुबाला पिता के डर से शूटिंग के लिए भोपाल नहीं आईं। अपने खिलाफ गवाही सुनकर एक्ट्रेस टूट गईं। केस 4 महीने रहा, लेकिन बी.आर.चोपड़ा ने बाद में केस वापस ले लिया। लेकिन इस विवाद के बाद मधुबाला को सोहनी महेवाल और सवेरा जैसी फिल्मों से भी निकाल दिया गया। ये फिल्म जबरदस्त हिट रही। विवाद खत्म होने के बाद मधुबाला चाहती थीं कि दिलीप कुमार उनके पिता से माफी मांगे, लेकिन उन्होंने माफी मांगने से इनकार किया और रिश्ता भी खत्म कर लिया। किस्सा-6, प्रिंस फिलिप भारत आए तो देखी बी.आर.चोपड़ा की फिल्म, जवाहरलाल नेहरू ने लिखी चिट्ठी बी.आर.चोपड़ा उस दौर के ऐसे फिल्ममेकर थे, जो समाजिक मुद्दों को फिल्मों के जरिए जनता तक पहुंचाते थे। चाहे कानून हो, हमराज हो, निकाह या नया दौर। फिल्म नया दौर 1957 में रिलीज हुई थी। फिल्म रिलीज हुए कुछ दिन हुए ही थे कि एक रोज बी.आर.चोपड़ा के दफ्तर में प्राइम मिनिस्टर की ऑफिस से चिट्ठी आई हुई थी। ऑफिस के तमाम लोग घबराए हुए थे। बी.आर.चोपड़ा भी डर गए कि ऐसा तो मैंने कुछ नहीं बनाया, जिस पर सरकार को आपत्ति हो। चिट्ठी खोली गई, तो वो तत्कालीन प्राइम मिनिस्टर जवाहरलाल नेहरू ने भेजी थी। उसमें लिखा था, डियर चोपड़ा। ड्यूक ऑफ एडनबर्ग प्रिंस फिलिप (क्वीन एलिजाबेथ के पति) भारत आए हुए थे। उन्हें गांव का जीवन समझने के लिए एक फिल्म दिखाई जानी थी। किसी ने कहा कि नया दौर दिखा दो। मैंने सोचा 15 मिनट तक उन्हें फिल्म दिखा दूंगा। लेकिन फिल्म जब चली तो इतनी अच्छी थी कि मैं पूरी फिल्म देखे बिना वहां से उठ नहीं सका। किस्सा- 7, महाभारत ठुकराने पर गोविंदा को ऑफिस से भगाया, मां को कहे अपशब्द गोविंदा की मां निर्मला देवी पटियाला घराने की सिंगर थीं और पिता अरुण आहूजा भी फिल्ममेकर हुआ करते थे। शुरुआत में गोविंदा अपने डांस की सीडी प्रोड्यूसर्स के दफ्तर पहुंचाते थे। आखिरकार 1986 में उन्हें पहली फिल्म लव 86 मिल गई। गोविंदा के परिवार के करीबी गूफी पेंटल उस समय बी.आर.चोपड़ा के निर्देशन में बन रहे महाभारत शो की कास्टिंग कर रहे थे। एक दिन गोविंदा गूफी पेंटल की पत्नी के एक काम के सिलसिले में उनके घर पहुंचे। बी.आर.चोपड़ा भी वहीं थे। उन्होंने गोविंदा को देखा और कहा, हमने तुम्हें अभिमन्यू के रोल के लिए सिलेक्ट किया है। लेकिन तब गोविंदा की मां ने उन्हें फिल्मों में काम करने के लिए ही कहा था। गोविंदा ने कहा- सर मं नहूं करूंगा। मेरी मां ने मना किया है। इस पर बी.आर.चोपड़ा ने पूछा- क्या हैं तुम्हारी मां। जवाब मिला- साध्वी हैं। गेरुवा वस्त्र पहनती हैं, जो कहती हैं, वही करता हूं। फिल्म लाइन तो सेकेंड्री है। जब गोविंदा ने इनकार किया तो, बी.आर.चोपड़ा ने कहा- तुम्हारी मां पागल हैं। इस पर गोविंदा चिढ़ गए। उन्होंने कहा, उनकी पहली फिल्म शारदा थी, 9 फिल्में कर चुकी हैं, आपकी भी सीनियर हैं। डेडी भी आपके सीनियर हैं। मैं स्ट्रगल कर रहा हूं, जो वो कहती हैं, वही होता है। गोविंदा की मां ये सब सुनकर नाराज हुईं। उन्होंने कहा, जाओ, उनके सामने एक्टिंग करते हुे कहना, आपकी सोच मैं खा गया। गोविंदा ने यही किया। वो उनके दफ्तर गए और कहा- मैं आपकी सोच खा गया। बी.आर.चोपड़ा चिढ़ गए। उन्होंने तुरंत अपने गार्ड्स से कहा, इसे बाहर निकालो, ये पागल है। गोविंदा ने तब कहा, देखिए, आप गोविंदा को बाहर निकाल रहे हैं। 4 नेशनल अवॉर्ड जीते, पद्मभूषण से भी सम्मानित हुए बी.आर.चोपड़ा को फिल्म कानून, धर्मपुत्र, गुमराह और हमराज के लिए 4 नेशनल अवॉर्ड मिले हैं। इसके अलावा उन्हें 1998 में दादा साहेब फाल्के अवॉर्ड से भी सम्मानित किया जा चुका है। साल 2001 में बी.आर.चोपड़ा को पद्मभूषण से सम्मानित किया गया है। इनके अलावा उनके पास 2 फिल्मफेयर अवॉर्ड भी हैं।

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शूटिंग रोकी तो मधुबाला को कटघरे तक ले पहुंचे बी.आर.चोपड़ा:प्रिंस ने भारत को समझने के लिए इनकी फिल्म देखी, जवाहरलाल नेहरू ने लिखी चिट्ठी

22 अप्रैल 1914 आज से ठीक 112 साल पहले अखण्ड भारत के पंजाब में पीडब्ल्यू डी में सरकारी नौकरी करने वाले विलायती राज चोपड़ा के घर बेटे बलदेव का जन्म हुआ। बलदेव राज चोपड़ा, 6 भाई-बहनों के परिवार में दूसरे नंबर पर थे। पढ़ाई में अव्वल रहने वाले बलदेव के लिए पिता ने बचपन से सोच रखा था कि इसे सरकारी अफसर बनाऊंगा। समय बीता और तैयारी शुरू कर दी गई। पाकिस्तान के लाहौर गवर्नमेंट कॉलेज में इंग्लिश में मास्टर डिग्री लेते हुए उनका इंडियन सिविल सर्विस का फॉर्म भरवाया गया। पिता को उम्मीद थी कि बेटा परीक्षा निकाल लेगा, लेकिन परीक्षा की तारीखों से ठीक पहले बलदेव की तबीयत ऐसी बिगड़ी की पूरी तैयारी में पानी फिर गया। परीक्षा दी, परिणाम आए तो वो फेल हो चुके थे। बलदेव खूब रोए। पिता ने समझाया, कुछ दिनों के लिए लंदन चले जाए, 6 महीनें बाद फिर तारीख है, तब पेपर दे देना। रोते हुए बच्चे ने एक ही जवाब दिया- अब कभी सरकारी नौकरी नहीं करूंगा। सरकारी नौकरी का सपना चूर-चूर हो गया, लेकिन किसे पता था कि वही लड़का एक दिन हिंदी सिनेमा में इतिहास रच देगा। वो फेल होने वाला लड़का था बलदेव राज चोपड़ा, जिसे देश बी.आर.चोपड़ा नाम से जानता है। जिसकी फिल्मों की तारीफ तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू तक किया करते थे। भारत-पाकिस्तान के बंटवारे के दंगों के बीच हिंदी सिनेमा में कदम रखने वाले बी.आर.चोपड़ा ने हमराज, नया दौर, साधना, निकाह, कानून जैसी कई सुपरहिट फिल्में बनाईं। समय से आगे चलने वाली कहानियां और सस्पेंस, किरदारों की कहानियों ने दर्शकों को खूब बांधे रखा और फिर 1988 में उन्होंने टीवी शो महाभारत बनाया, तो भगवान और पौराणिक कथा को घर-घर पहुंचातकर इतिहास ही रच दिया। लोग शो शुरू होने से पहले चप्पल उतारकर, जमीन पर हाथ जोड़े बैठते, तो कुछ टीवी की आरती उतारते। वो शो, जिसके नाम आज भी विश्व रिकॉर्ड है। इस कामयाबी के सफर में बी.आर.चोपड़ा की जिद और स्वाभिमान भी चर्चा में रहा। कभी शूटिंग में खलल पैदा करने वालीं मधुबाला को कठघरे में खड़ा किया, तो कभी गोविंदा जैसे स्टार को ऑफिस से बाहर भगाय दिया। बी.आर. चोपड़ा की आज 112 वीं बर्थ एनिवर्सरी है, इस खास मौके पर पढ़िए, उनके फिल्मों में आने और इतिहास रचने से जुड़े कुछ चुनिंदा किस्से- किस्सा-1, अखबार के लिए लिखते थे, दोस्तों के कहने पर फिल्म बनाई तो हुआ नुकसान कॉलेज के दिनों में बी.आर.चोपड़ा ने कलकत्ता के वैराइटी अखबार के लिए लिखना शुरू कर दिया। उनका पहला आर्टिकल फिल्मों पर था। एक आर्टिकल में फिल्म बनाने वाले कलाकारों को ललकारते हुए उन्होंने लिखा, कुछ अच्छा बनाओ, कहानी डालो, समाज को बताओ की समाज में क्या चल रहा है, क्या दिक्कतें हैं। आर्टिकल कलकत्ता भेजा, लेकिन वो छपा ही नहीं। अगले 3 आर्टिकल भी छपे नहीं। तीसरे हफ्ते उन्हें एक पार्सल मिला, जिसमें वैराइटी अखबार की एक प्रति थी, जिसमें उनके पिछले तीनों आर्टिक्ल थे। इसके साथ एडिटर का एक माफीनामा भी था। लिखने का सिलसिला चल निकला। 1944 में बी.आर.चोपड़ा न्यू स्टार फिल्म प्रोडक्शन कंपनी की सिने हैराल्ड मैगजीन के लिए लिखने लगे। जब आजादी की लड़ाई से तनाव बढ़ने लगा, तो बचने के लिए बी.आर.चोपड़ा जालंधर के पैतृक घर में रहने लगे। वहां 150 लोग और ठहरे हुए थे। एक रोज पिता के कुछ दोस्तों ने उन्हें हिंदी सिनेमा की फिल्मों में पैसे लगाने का सुझाव दिया। 5 दोस्त और जुड़ गए। सभी ने फिल्म करवट बनाई, जो बुरी तरह फ्लॉप हो गई। बी.आर.चोपड़ा की पूरी कमाई खत्म हो गई। किस्सा-2, नुकसान के बाद फिर अखबार में काम करने की अर्जी दी फिल्म प्रोडक्शन में नुकसान होने के बाद बी.आर.चोपड़ा ने तय किया कि अब वो अखबार में काम करेंगे। तब हिंदुस्तान टाइम्स के एडिटर उनके अंकल दुर्गा दास थे। खत लिखा, तो जवाब मिला, बॉम्बे आ जाओ, लेकिन हारकर मत आना। बी.आर.चोपड़ा सोच में थे कि क्या किया जाए, वो पैरिसियन कैफे में चाय पीने गए। चाय पी ही रहे थे कि आवाज आई- अरे चोपड़ा साहब क्या कर रहे हैं। उन्होंने थकी सी आवाज में कहा- चाय पी रहे हैं। उस शख्स ने फिर कहा- क्या कर रहा है तू। इस पर बी.आर.चोपड़ा ने गुस्से में कहा- कर ही क्या सकता हूं, न पैसा है न ढेला है, न अनुभव है। कहां से करूं कुछ। इस पर उस शख्स ने कहा- एक काम कर, कुछ तो कर। स्टोरी ले ले कम से कम। वो शख्स थे, आई.एस.जौहर। उस दौर के जाने-माने एक्टर और कॉमेडियन। उस स्टोरी पर बी.आर.चोपड़ा ने लाहौर में फिल्म चांदनी चौक बनाना शुरू किया। शूटिंग शुरू हुई ही थी कि बंटवारे में दंगे ऐसे भड़के की शूटिंग बंद करनी पड़ी। वो बॉम्बे जाकर बसे, जहां दोस्तों की सलाह पर उन्होंने दोबारा फिल्ममेकिंग शुरू की। दो नाकामी के बाद 1951 की उनकी बतौर डायरेक्टर फिल्म अफसाना चल निकली। इस फिल्म में अशोक कुमार ने डबल रोल निभाया। कहा जाता है कि डबल रोल का ट्रेंड यही फिल्म लाई थी। ये फिल्म पहले दिलीप कुमार को ऑफर हुई थी, लेकिन उन्होंने ये कहते हुए इनकार कर दिया कि वो जज के रोल में फिट नहीं बैठेंगे। आगे बी.आर.चोपड़ा ने हमराज, कानून जैसी कई हिट फिल्में बनाईं। किस्सा-3, संजीव कुमार ने ठंडे-ठंडे पानी से गाने में वजन घटाने का वादा कर वजन बढ़ाया साल 1978 में बी.आर.चोपड़ा ने फिल्म पति पत्नी और वो बनाई, जिसमें संजीव कुमार लीड रोल में थे। फिल्म का गाना ठंडे-ठंडे पानी में के लिए संजीव कुमार को शर्टलेस होकर बच्चे के साथ बैठकर नहाना था। बिना कपड़ो के बैठने में संजीव कुमार का पेट काफी दिख रहा था। उन्होंने शूटिंग शुरू होने के बाद बी.आर.चोपड़ा से कहा, देखिए, मेरा पेट बहुत निकल गया है, क्यों न हम इस गाने की शूटिंग आखिर में करें। तब तक मैं वजन घटा लूंगा। बी.आर.चोपड़ा उनकी जिद पर मान गए। अगले ही दिन से संजीव कुमार ने डाइटिंग शुरू कर दी। अगले दिन सेट पर उनके लिए खाने में सिर्फ सलाद और सूप आया। उन्होंने खाना खाया और बी.आर.चोपड़ा से कहा- चोपड़ा अब मैं थोड़ी देर सो जाता हूं। थोड़ी देर बाद चोपड़ा साहब का लंच आया। जैसे ही वो खोला गया, तो उसमें फिश करी और चावल थे। खूशबू आते ही संजीव कुमार उठ खड़े हुए और कहा- आज के दिन डाइटिंग छोड़ देता हूं। ऐसा ही उन्होंने रोज किया। वो पहले सलाद खाते और फिर दूसरों के घर से आने वाला लजीज खाना। एक महीने बाद जब उस गाने की शूटिंग की बारी आई, तो संजीव कुमार का वजन पहले से भी कहीं ज्यादा बढ़ा हुआ था। मजबूरन उन्हें तोंद के साथ ही शूटिंग करनी पड़ी। ये गाना उस समय काफी हिट रहा, जिसे आज भी सुना जाता है। किस्सा-4, फिल्म देखकर विधवा लड़की के पिता ने बदली सोच, करवाई दूसरी शादी एक दिन बी.आर.चोपड़ा अपने दफ्तर में बैठे थे कि तभी एक आदमी आकर उनके कदमों में गिर गया। बी.आर.चोपड़ा ने वजह पूछी तो उसने कहा, मैं एक छोटे से गांव का हैडमास्टर हूं, मेरी बेटी की 8 महीने पहले शादी हुई थी। बदकिस्मती से 3 महीने बाद ही उसके पति की मौत हो गई। मैं उसे घर ले आया। हम घर से निकलते नहीं थे। हमें लगा दुनिया खत्म हो गई है। खाना-पीना भी लगभग बंद कर दिया था। एक दिन मेरे स्कूल का दूसरा हैडमास्टर आया और कहा, चलो तुम्हें सिनेमा ले चलूं। मैंने उसे कहा- मेरी बेटी विधवा है, मैं सिनेमा देखना छोड़ चुका हूं। उसने कहा, कब तक छिपे रहोगे, कभी तो बाहर निकलोगे। हैडमास्टर ने कहानी आगे सुनाते हुए बी.आर.चोपड़ा से कहा- साहब, मैं पिक्चर देखने चला गया, पिक्चर थी, हमराज। उसमें एक गाना था, न मुंह छुपा के जियो और न सिर झुका के जियो। गमों का दौर भी आए तो मुस्कुरा के जियो। घर आकर मैंने बेटी से कहा, देखो, जिंदगी तो चलने का नाम है, रुकने का नहीं। आगे उस शख्स ने कहा, चोपड़ा साहब, मैं आज इसलिए आपके पैरों पर हूं। मैंने फिल्म देखी, मैंने अपनी बेटी की दूसरी शादी करवा दी। आज वो बहुत खुश है। मैं भी बहुत खुश हूं। इसलिए आपको धन्यवाद देने आया हूं। किस्सा-5, शूटिंग रुकी तो मधुबाला के खिलाफ कर दिया केस 50 के दशक में मधुबाला और दिलीप कुमार रिलेशनशिप में थे। फिल्म इंसानियत (1955) के प्रीमियर में साथ पहुंचकर दोनों रिश्ते पर मुहर लगा चुके थे। हालांकि तब ये खबरें भी थीं कि मधुबाला के पिता इस रिश्ते के बेहद खिलाफ हैं। दरअसल, 1956 में खबरें आईं कि दोनों शादी कर सकते हैं, दिलीप कुमार ने ये शर्त रखी थी कि शादी के बाद मधुबाला फिल्मों में काम नहीं करेंगी। शादी के बाद इनकम रुकने डर से मधुबाला के पिता अताउल्लाह खान इस शादी के खिलाफ थे। मधुबाला पर कई पाबंदियां लगीं और उन्हें दिलीप कुमार से अलग-अलग रखने के लिए कहा जाने लगा। इसी समय बी.आर.चोपड़ा ने मधुबाला को 32 हजार रुपए का साइनिंग अमाउंट देकर दिलीप कुमार के साथ फिल्म नया दौर में साइन किया। फिल्म की 15 दिनों की शूटिंग मुंबई में हुई, जिसके बाद आगे की शूटिंग भोपाल में होनी थी। जब ये बात मधुबाला के पिता तक पहुंची तो उन्होंने एक्ट्रेस को भेजने से साफ इनकार कर दिया। उन्हें लगा कि दिलीप कुमार ने मुंबई में पाबंदियां बढ़ने पर भोपाल में शूटिंग करने का दबाव बनाया है, जिससे वो मधुबाला के करीब रह सकें। पिता के दबाव में मधुबाला को भी मानना ही पड़ा। लेकिन इस बात से फिल्म के डायरेक्टर और प्रोड्यूसर बी.आर.चोपड़ा जमकर नाराज हुए। मधुबाला शूटिंग में नहीं पहुंचीं, तो बी.आर.चोपड़ा ने मुंबई के गिरगांव के मजिकस्ट्रेट कोर्ट में उनके खिलाफ शिकायत दर्ज कर दी। धोखाधड़ी और कॉन्ट्रैक्ट तोड़ने का आरोप लगाते हुए उन्होंने 32 हजार रुपए वापस मांगे। उस समय बी.आर.चोपड़ा वैराइटी मैग्जीन के एडिटर थे। उन्होंने इस विवाद पर वैराइटी मैगजीन में दो पन्नों का लेख भी लिखा। साथ ही उन्होंने मधुबाला की एक बड़ी सी तस्वीर में लाल काटने का निशान लगाया और लिखा कि अब उनकी जगह वैजयंतीमाला हीरोइन होंगी। मीडिया ने इस खबर को खूब उछाला और मधुबाला की बदनामी हुई। जब सुनवाई शुरू हुई, तो मधुबाला को कटघरे में खड़ा किया। गवाह के तौर पर दिलीप कुमार को बुलाया गया। मधुबाला, उनके साथ रिश्ते में थे, उन्हें उम्मीद थी कि दिलीप कुमार साथ देंगे, लेकिन उल्टा उन्होंने सबके सामने कहा कि मधुबाला पिता के डर से शूटिंग के लिए भोपाल नहीं आईं। अपने खिलाफ गवाही सुनकर एक्ट्रेस टूट गईं। केस 4 महीने रहा, लेकिन बी.आर.चोपड़ा ने बाद में केस वापस ले लिया। लेकिन इस विवाद के बाद मधुबाला को सोहनी महेवाल और सवेरा जैसी फिल्मों से भी निकाल दिया गया। ये फिल्म जबरदस्त हिट रही। विवाद खत्म होने के बाद मधुबाला चाहती थीं कि दिलीप कुमार उनके पिता से माफी मांगे, लेकिन उन्होंने माफी मांगने से इनकार किया और रिश्ता भी खत्म कर लिया। किस्सा-6, प्रिंस फिलिप भारत आए तो देखी बी.आर.चोपड़ा की फिल्म, जवाहरलाल नेहरू ने लिखी चिट्ठी बी.आर.चोपड़ा उस दौर के ऐसे फिल्ममेकर थे, जो समाजिक मुद्दों को फिल्मों के जरिए जनता तक पहुंचाते थे। चाहे कानून हो, हमराज हो, निकाह या नया दौर। फिल्म नया दौर 1957 में रिलीज हुई थी। फिल्म रिलीज हुए कुछ दिन हुए ही थे कि एक रोज बी.आर.चोपड़ा के दफ्तर में प्राइम मिनिस्टर की ऑफिस से चिट्ठी आई हुई थी। ऑफिस के तमाम लोग घबराए हुए थे। बी.आर.चोपड़ा भी डर गए कि ऐसा तो मैंने कुछ नहीं बनाया, जिस पर सरकार को आपत्ति हो। चिट्ठी खोली गई, तो वो तत्कालीन प्राइम मिनिस्टर जवाहरलाल नेहरू ने भेजी थी। उसमें लिखा था, डियर चोपड़ा। ड्यूक ऑफ एडनबर्ग प्रिंस फिलिप (क्वीन एलिजाबेथ के पति) भारत आए हुए थे। उन्हें गांव का जीवन समझने के लिए एक फिल्म दिखाई जानी थी। किसी ने कहा कि नया दौर दिखा दो। मैंने सोचा 15 मिनट तक उन्हें फिल्म दिखा दूंगा। लेकिन फिल्म जब चली तो इतनी अच्छी थी कि मैं पूरी फिल्म देखे बिना वहां से उठ नहीं सका। किस्सा- 7, महाभारत ठुकराने पर गोविंदा को ऑफिस से भगाया, मां को कहे अपशब्द गोविंदा की मां निर्मला देवी पटियाला घराने की सिंगर थीं और पिता अरुण आहूजा भी फिल्ममेकर हुआ करते थे। शुरुआत में गोविंदा अपने डांस की सीडी प्रोड्यूसर्स के दफ्तर पहुंचाते थे। आखिरकार 1986 में उन्हें पहली फिल्म लव 86 मिल गई। गोविंदा के परिवार के करीबी गूफी पेंटल उस समय बी.आर.चोपड़ा के निर्देशन में बन रहे महाभारत शो की कास्टिंग कर रहे थे। एक दिन गोविंदा गूफी पेंटल की पत्नी के एक काम के सिलसिले में उनके घर पहुंचे। बी.आर.चोपड़ा भी वहीं थे। उन्होंने गोविंदा को देखा और कहा, हमने तुम्हें अभिमन्यू के रोल के लिए सिलेक्ट किया है। लेकिन तब गोविंदा की मां ने उन्हें फिल्मों में काम करने के लिए ही कहा था। गोविंदा ने कहा- सर मं नहूं करूंगा। मेरी मां ने मना किया है। इस पर बी.आर.चोपड़ा ने पूछा- क्या हैं तुम्हारी मां। जवाब मिला- साध्वी हैं। गेरुवा वस्त्र पहनती हैं, जो कहती हैं, वही करता हूं। फिल्म लाइन तो सेकेंड्री है। जब गोविंदा ने इनकार किया तो, बी.आर.चोपड़ा ने कहा- तुम्हारी मां पागल हैं। इस पर गोविंदा चिढ़ गए। उन्होंने कहा, उनकी पहली फिल्म शारदा थी, 9 फिल्में कर चुकी हैं, आपकी भी सीनियर हैं। डेडी भी आपके सीनियर हैं। मैं स्ट्रगल कर रहा हूं, जो वो कहती हैं, वही होता है। गोविंदा की मां ये सब सुनकर नाराज हुईं। उन्होंने कहा, जाओ, उनके सामने एक्टिंग करते हुे कहना, आपकी सोच मैं खा गया। गोविंदा ने यही किया। वो उनके दफ्तर गए और कहा- मैं आपकी सोच खा गया। बी.आर.चोपड़ा चिढ़ गए। उन्होंने तुरंत अपने गार्ड्स से कहा, इसे बाहर निकालो, ये पागल है। गोविंदा ने तब कहा, देखिए, आप गोविंदा को बाहर निकाल रहे हैं। 4 नेशनल अवॉर्ड जीते, पद्मभूषण से भी सम्मानित हुए बी.आर.चोपड़ा को फिल्म कानून, धर्मपुत्र, गुमराह और हमराज के लिए 4 नेशनल अवॉर्ड मिले हैं। इसके अलावा उन्हें 1998 में दादा साहेब फाल्के अवॉर्ड से भी सम्मानित किया जा चुका है। साल 2001 में बी.आर.चोपड़ा को पद्मभूषण से सम्मानित किया गया है। इनके अलावा उनके पास 2 फिल्मफेयर अवॉर्ड भी हैं।

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Bronze Age ring hoard found in Dresden

A hoard of six bronze rings dating to the Late Bronze Age (ca. 1300-1100 B.C.) has been discovered in Dresden. Volunteer metal detectorist Ronald Meißner, who is certified by the State Office for Archaeology of Saxony (LfA) to survey sites of potential archaeological interest found the hoard near Wilschdorf, a northwestern district on the city limits of Dresden. He left them in the ground and immediately reported the discovery to the LfA. Archaeologists were dispatched to the find site to excavate the hoard.

They recovered six ribbed rings and one fragment. Two of them are twisted arm rings with overlapping ends. The terminals are straight-sided, decorated with incised circles. The other four are leg rings. They have twisted ribs on one side, and flat interiors where they could touch the body. The terminals are open. The total weight of the rings is 837.2 grams (29.5 oz).

The discovered ensemble is a typical, intentionally deposited hoard find from the Late Bronze Age. Why people hid these elaborately crafted pieces of jewelry, undoubtedly of considerable material value, over 3,000 years ago, and what significance this act held, has long been a subject of debate. However, it seems certain that these were not treasures hidden during times of hardship, which their owners were unable to retrieve.

During the Bronze Age, the knowledge of metal deposits, metal production, and the control of trade routes led to the formation of new hierarchies and centers of power, transforming society. The fact that numerous comparable bronze hoards, some with a regular composition, have been found in Central Europe suggests that these were deliberate, ritually defined offerings – possibly to deities unknown to us today.

The rings are now being cleaned, catalogued and conserved. LfA archaeologists will study them further and hope to narrow down the dating by analyzing the decoration style.

State archaeologist Dr. Regina Smolnik: “As a research institution, the State Office for Archaeology Saxony will intensively study this find and place it in connection with other finds from this interesting period in order to further complete the picture of one of Saxony’s most important periods of prosperity.”



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Twenty goals and a burning yellow card - the best bits from Sidemen charity match

A sold-out Wembley Stadium watched the Sidemen FC charity match, which raised £6.2 million.

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Twenty goals and a burning yellow card - the best bits from Sidemen charity match

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Iliad fragment found in Roman-era mummy

A papyrus fragment of Homer’s epic The Iliad has been discovered inside the wrappings of Roman-era mummy. The mummy was found in a necropolis the ancient site of Oxyrhynchus (modern-day El-Bahnasa) in Egypt’s Minya Governorate. Archaeologists were able to remove the papyrus and identify the text as the “Index of Ships,” a description of the Greek forces arrayed against Troy from Book 2 of the Iliad.

A joint Spanish-Egyptian team from the University of Barcelona and the Institute of the Ancient Near East unearthed a number of mummies from the Roman-era necropolis, some in wooden coffins, some wrapped in bandages decorated with geometric patterns, three with gold tongues and one with a copper tongue placed inside their mouths. A few of the deceased had traces of gold leaf that had been applied to them after mummification.

Additional gold and copper tongues were found in the excavation of tomb number 65. Deteriorated mummified remains were unearthed in a hypogeum (underground chamber) of the tomb, revealing the tongue inserts. There were also several painted wooden coffins, but they too are poorly preserved as a result of the tomb have been looted in antiquity.

There were also finds in the older section of the cemetery.

Professor Mohamed Abdel-Badi, Head of the Egyptian Antiquities Sector at the Supreme Council of Antiquities, explained that excavations east of Ptolemaic Tomb No. 67 revealed a trench containing three limestone burial chambers.

These chambers housed the cremated remains of adults and an infant, as well as animal remains, notably cats, wrapped in cloth.

The team also discovered a collection of small terracotta and bronze statues, including representations of the god Harpocrates and a figure of Cupid. […]

For his part, Hisham el-Leithy, Secretary-General of the Supreme Council of Antiquities, added that the site offers valuable insights into burial traditions in Bahnasa during the Greek and Roman eras.



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Former Radio 1 DJ and Live Aid presenter Andy Kershaw dies aged 66

The broadcaster was known for his eclectic taste and for helping champion world music on BBC Radio 1.

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एक्टर ने जबरदस्ती एक्ट्रेस को बीफ खिलाने की कोशिश की:भड़के फैंस, सफाई में मुस्लिम एक्टर शियास ने एक्ट्रेस की बीफ सर्व करते वीडियो जारी की

मलयाली एक्टर और मॉडल शियास करीम पर जबरदस्ती एक्ट्रेस को बीफ खिलाने के आरोप लगे हैं। इस घटना का एक वीडियो भी तेजी से वायरल हो रहा है, जिसके बाद उनकी जमकर आलोचना भी की जा रही है। एक्टर शियास करीम का एक वीडियो सामने आया है, जिसमें वो और एक्ट्रेस अनुमोल अनुकुट्टी, एक पार्टी में बुफे से खाना लेते नजर आ रहे हैं। एक्ट्रेस अनुमोल आगे चलती हुईं खाना निकाल रही हैं, तभी उनके पीछे खड़े एक्टर शियास उनसे बार-बार पूछते हैं- बीफ खाएगी। एक्ट्रेस ने साफ इनकार किया, तो एक्टर ने उनका मजाक भी बनाया। मना करने के बावजूद शियाज जबरदस्ती बार-बार पूछते हैं। इस पर एक्ट्रेस उन्हें नजरअंदाज करते हुए आगे निकल गईं। बता दें कि सामने आए वीडियो में एक्ट्रेस बीफ खाती नजर नहीं आई हैं और न ही शियास ने उनकी प्लेट में सर्व किया है। हालांकि इसके बावजूद एक्टर की सोशल मीडिया पर जमकर आलोचना हो रही है। कुछ लोगों का कहना है कि मुस्लिम शियास को वैसे ही पोर्क खाने के लिए मजबूर करना चाहिए, जैसे वो अनुमोल को बीफ खाने के लिए कर रहे हैं। एक्टर के सपोर्ट में उतरे कई यूजर्स वीडियो सामने आने के बाद जहां कई लोग शियाज के लिए भद्दी भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं, वहीं कुछ सोशल मीडिया यूजर्स ऐसे भी हैं, जो ये दावा कर रहे हैं कि एक्ट्रेस अनुमोली बीफ खाती हैं। अनुमोल की कई तस्वीरें भी वायरल की जा रही हैं, जिनमें वो खुद अपने हाथों से बीफ सर्व करती दिखी हैं। कुछ यूजर्स का ये भी कहना है कि केरल में बीफ खाना आम है और वहां 80-90 प्रतिशत हिंदू भी बीफ खाते हैं, ऐसे में मामले को गलत रूप देना बिल्कुल गलत है। विवाद बढ़ने पर एक्टर ने दी सफाई आलोचना होने और विवाद बढ़ने के बाद एक्टर शियाज करीम ने सफाई देते हुए ऑफिशियल इंस्टाग्राम से एक वीडियो पोस्ट की है, जिसमें वो साफ कह रहे हैं कि एक्ट्रेस अनुमोल बीफ खाती हैं, इसलिए उन्हें ऑफर किया गया था। शियाज ने इंस्टाग्राम पर एक स्टोरी भी पोस्ट की है, जिसमें अनुमोली खुद बीफ खाती और सर्व करती नजर आई हैं। इसके अलावा भी उन्होंने बीफ की कई डिशेज के वीडियो पोस्ट किए हैं। बता दें कि शियास को बिग बॉस मलयाली सीजन 1 से पहचान मिली थी। इससे पहले भी वो विवादों में रह चुके हैं। 2024 में उनकी जिम ट्रेनर ने उन पर शादी का झासा देकर रेप करने के आरोप लगाए थे। वहीं एक्ट्रेस अनुमाल अनुकट्टी ने बिग बॉस मलयाली सीजन 7 जीता है।

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Ten-panel folding screen to be restored in Korea

A set of 19th century paintings depicting the Chilbosan (Seven Jeweled Mountain) mountain range in northeastern Korea now in the collection of the Metropolitan Museum of Art has returned to Korea for a comprehensive conservation and remounting treatment.

Chilbosan was famed for its distinctive natural features — high craggy peaks, deep valleys, waterfalls, unique rock formations — which attracted tourists going back to the 16th century. These paintings were made by an unknown artist in fine-line brushstrokes and washes of ink on cotton canvas. They are meticulously realistic, identifying 40 sites in the mountain range by name.

When it was acquired by the Metropolitan Museum of Art in 2020, the set was in ten separate scrolls, but it was originally a ten-panel folding screen. The Overseas Korean Cultural Heritage Foundation with the support of the Samsung Foundation of Culture intend to restore the work to its original format. The panels have been transferred to the Leeum Museum of Art in Seoul, which is renowned for its collection of traditional Korean art.

Chilbosan (Seven Jeweled Mountain), 19th century, Joseon dynasty (1392–1910), Korea. Set of 10 paintings previously in folding screen format; ink on cotton. Image (each): 47 5/8 × 11 1/8 in. (121 × 28.3 cm). The Metropolitan Museum of Art, Purchase, Friends of Asian Art Gifts, 2020, 2020.118a-j



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तीसरी हाईएस्ट ग्रॉसिंग भारतीय फिल्म बनी धुरंधर 2:दुनियाभर में कमाई ₹1748.91 करोड़ हुई, पुष्पा 2 को पीछे छोड़ा, सिर्फ दंगल और बाहुबली 2 आगे

धुरंधर 2 दुनिया भर में तीसरी सबसे ज्यादा कमाई करने वाली भारतीय फिल्म बन गई। फिल्म की दुनिया भर में कमाई 1,748.91 करोड़ रुपए हो गई। इसने 1,742.10 करोड़ रुपए कमाने वाली अल्लू अर्जुन की फिल्म पुष्पा 2 को पीछे छोड़ दिया। अब यह सिर्फ दंगल (₹2070 करोड़) और बाहुबली 2 (₹1,788.06 करोड़) से पीछे है। ट्रेड वेबसाइट सैकनिल्क के अनुसार, फिल्म ने रिलीज के 31वें दिन भारत में 4.65 करोड़ रुपए का नेट कलेक्शन किया। फिल्म का कुल भारत नेट कलेक्शन अब 1,110.47 करोड़ रुपए तक पहुंच गया, जबकि भारत में इसका ग्रॉस कलेक्शन 1,329.31 करोड़ रुपए हो गया। ग्रॉस कलेक्शन टिकट से कुल कमाई और नेट कलेक्शन टैक्स के बाद की कमाई होती है। ओवरसीज में फिल्म ने 31वें दिन 1.10 करोड़ रुपए की कमाई की। इसके साथ ही फिल्म का कुल ओवरसीज ग्रॉस कलेक्शन 419.60 करोड़ रुपए तक पहुंच गया। वहीं, फिल्म का वर्ल्डवाइड ग्रॉस कलेक्शन अब 1,748.91 करोड़ रुपए हो चुका है। फिल्म की कमाई में पांचवें हफ्ते में गिरावट देखने को मिली है, लेकिन वीकेंड पर इसमें हल्की बढ़त हुई। 30वें दिन जहां फिल्म ने 2.70 करोड़ रुपए का नेट कलेक्शन किया था, वहीं 31वें दिन यह बढ़कर 4.65 करोड़ रुपए हो गया। फिल्म के हिंदी वर्जन ने 31वें दिन 4.50 करोड़ रुपए का सबसे ज्यादा कलेक्शन किया, जबकि तमिल में 6 लाख रुपए, तेलुगु में 7 लाख रुपए और कन्नड़ में 2 लाख रुपए का नेट कलेक्शन हुआ। धुरंधर को शानदार रिस्पॉन्स मिला था धुरंधर के पहले पार्ट ने भारत और अंतरराष्ट्रीय बॉक्स ऑफिस पर शानदार प्रदर्शन किया और दुनियाभर में करीब 1,307 करोड़ रुपए कमाए। भारत में फिल्म का ग्रॉस कलेक्शन 1,005.85 करोड़ रुपए रहा, जबकि नेट कलेक्शन लगभग 840 करोड़ रुपए हुआ। विदेशी बाजारों में भी फिल्म को जबरदस्त रिस्पॉन्स मिला। ओवरसीज में इसने करीब 299.5 करोड़ रुपए कमाए। अमेरिका और कनाडा में 193.06 करोड़ रुपए से ज्यादा की कमाई कर बाहुबली 2 का रिकॉर्ड भी तोड़ा। --------------------- धुरंधर 2 से जुड़ी ये खबर भी पढ़ें… धुरंधर 2 रिव्यू; रणवीर की फिर दमदार परफॉर्मेंस: नोटबंदी और राजनीतिक कड़ियों से जुड़ी कहानी, जानिए कैसी है फिल्म रणवीर सिंह की फिल्म ‘धुरंधर: द रिवेंज’ यानी धुरंधर 2 पहले पार्ट की ब्लॉकबस्टर सफलता के बाद बड़े स्केल पर लौटी है। इस बार फिल्म सिर्फ गैंगवार या बदले की कहानी नहीं रहती, बल्कि नोटबंदी से लेकर देश की कई बड़ी घटनाओं को जोड़ते हुए एक बड़ा नैरेटिव पेश करती है। पूरी खबर यहां पढ़ें…

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तीसरी हाईएस्ट ग्रॉसिंग भारतीय फिल्म बनी धुरंधर 2:दुनियाभर में कमाई ₹1748.91 करोड़ हुई, पुष्पा 2 को पीछे छोड़ा, सिर्फ दंगल और बाहुबली 2 आगे

धुरंधर 2 दुनिया भर में तीसरी सबसे ज्यादा कमाई करने वाली भारतीय फिल्म बन गई। फिल्म की दुनिया भर में कमाई 1,748.91 करोड़ रुपए हो गई। इसने 1,742.10 करोड़ रुपए कमाने वाली अल्लू अर्जुन की फिल्म पुष्पा 2 को पीछे छोड़ दिया। अब यह सिर्फ दंगल (₹2070 करोड़) और बाहुबली 2 (₹1,788.06 करोड़) से पीछे है। ट्रेड वेबसाइट सैकनिल्क के अनुसार, फिल्म ने रिलीज के 31वें दिन भारत में 4.65 करोड़ रुपए का नेट कलेक्शन किया। फिल्म का कुल भारत नेट कलेक्शन अब 1,110.47 करोड़ रुपए तक पहुंच गया, जबकि भारत में इसका ग्रॉस कलेक्शन 1,329.31 करोड़ रुपए हो गया। ग्रॉस कलेक्शन टिकट से कुल कमाई और नेट कलेक्शन टैक्स के बाद की कमाई होती है। ओवरसीज में फिल्म ने 31वें दिन 1.10 करोड़ रुपए की कमाई की। इसके साथ ही फिल्म का कुल ओवरसीज ग्रॉस कलेक्शन 419.60 करोड़ रुपए तक पहुंच गया। वहीं, फिल्म का वर्ल्डवाइड ग्रॉस कलेक्शन अब 1,748.91 करोड़ रुपए हो चुका है। फिल्म की कमाई में पांचवें हफ्ते में गिरावट देखने को मिली है, लेकिन वीकेंड पर इसमें हल्की बढ़त हुई। 30वें दिन जहां फिल्म ने 2.70 करोड़ रुपए का नेट कलेक्शन किया था, वहीं 31वें दिन यह बढ़कर 4.65 करोड़ रुपए हो गया। फिल्म के हिंदी वर्जन ने 31वें दिन 4.50 करोड़ रुपए का सबसे ज्यादा कलेक्शन किया, जबकि तमिल में 6 लाख रुपए, तेलुगु में 7 लाख रुपए और कन्नड़ में 2 लाख रुपए का नेट कलेक्शन हुआ। धुरंधर को शानदार रिस्पॉन्स मिला था धुरंधर के पहले पार्ट ने भारत और अंतरराष्ट्रीय बॉक्स ऑफिस पर शानदार प्रदर्शन किया और दुनियाभर में करीब 1,307 करोड़ रुपए कमाए। भारत में फिल्म का ग्रॉस कलेक्शन 1,005.85 करोड़ रुपए रहा, जबकि नेट कलेक्शन लगभग 840 करोड़ रुपए हुआ। विदेशी बाजारों में भी फिल्म को जबरदस्त रिस्पॉन्स मिला। ओवरसीज में इसने करीब 299.5 करोड़ रुपए कमाए। अमेरिका और कनाडा में 193.06 करोड़ रुपए से ज्यादा की कमाई कर बाहुबली 2 का रिकॉर्ड भी तोड़ा। --------------------- धुरंधर 2 से जुड़ी ये खबर भी पढ़ें… धुरंधर 2 रिव्यू; रणवीर की फिर दमदार परफॉर्मेंस: नोटबंदी और राजनीतिक कड़ियों से जुड़ी कहानी, जानिए कैसी है फिल्म रणवीर सिंह की फिल्म ‘धुरंधर: द रिवेंज’ यानी धुरंधर 2 पहले पार्ट की ब्लॉकबस्टर सफलता के बाद बड़े स्केल पर लौटी है। इस बार फिल्म सिर्फ गैंगवार या बदले की कहानी नहीं रहती, बल्कि नोटबंदी से लेकर देश की कई बड़ी घटनाओं को जोड़ते हुए एक बड़ा नैरेटिव पेश करती है। पूरी खबर यहां पढ़ें…

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The Pitt star on 'graphic' reality of hit show and rumours Clooney helped him get role

Gerran Howell is yet to get to the bottom of claims that George Clooney helped him secure his part.

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The Pitt star on 'graphic' reality of hit show and rumours Clooney helped him get role

Gerran Howell is yet to get to the bottom of claims that George Clooney helped him secure his part.

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17th c. Dutch cannon found in modern ship being scrapped

A 17th century bronze cannon made in the Netherlands and 11 cannon balls were discovered in a modern ship that was being dismantled in Izmir, Turkey. The cannon and balls have gone on display at the Izmir Culture and Arts Factory.

The modern ship had been transported to Izmir to be broken up for scrap. Workers found the cannon in the ship’s restaurant and notified cultural heritage authorities. Archaeologists from the Izmir Museum examined the cannon and determined that it was made in the Netherlands in the 17th century.

At that time, the Netherlands had a sophisticated, powerful navy and was at the forefront of European artillery production in cast bronze and later iron. Foundries in Rotterdam, Amsterdam, The Hague, Delft and Utrecht produced cannon for the Netherlands fleet and for export. The seals of their foundries on the barrel were valued as a mark of quality in their time, and today they identify the producers and year of production. The Izmir cannon bears the mark of the Ouderogge family foundry and dates it to 1634.

Once the origins were determined, Turkey’s cultural heritage ministry contacted their counterparts in the Netherlands to discuss whether the cannon and balls should be repatriated. The Netherlands decided they should remain in Turkey for conservation and exhibition.

Dutch Ambassador to Ankara, Joep Wijnands, also stated that he knew the artifacts were in safe hands, saying , “We have a 400-year relationship. This has become a beautiful example of solidarity between the two countries. It is wonderful that such an artifact has been recovered from the ship.”



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Christine Baranski says West End debut is a 'dream come true'

The US actress will star opposite Richard E Grant in a new production of Noel Coward's comedy Hay Fever.

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Is the UK finally waking up to the power of video games?

The UK's biggest video games awards cap off a week of big announcements, but will they change anything?

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Middle schooler finds coin from Troy in Berlin

A 13-year-old on a walk in the Spandau district of Berlin discovered a rare ancient bronze coin from Troy. It dates to between 281 and 261 B.C. and was issued by the mint at Ilion (Classical and Hellenistic era Troy). Now on display at the PETRI Museum, it is the first Greek antiquity ever discovered inside the city of Berlin.

The city of Ilion during the period when this coin was minted is known as Troy VIII by archaeologists, a numbering system based on the excavation layers. It was built by Greek colonists within the remaining walls of the Hittite-era Bronze Age Troy VI citadel (ca. 1500 B.C.). From its founding in 700 B.C., Troy VIII prospered and grew. Its temple of Athena Ilias was a major regional religious center, and it drew tourists from all over the Classical world to pay homage to the tombs of the heroes of Homeric legend. Alexander the Great himself visited the temple and made sacrificial offerings at the tombs.

By the Hellenistic period, its yearly Panathenaia festival attracted large numbers pilgrims and did brisk trade at the associated market. That made it a target for the Gauls when they invaded Greece and the Balkans in 278 B.C., as did its crumbling walls, still the same ones built in the 1500s B.C. by the northern Anatolian occupants of Troy VI. They sacked it, but the city still stood until 85 B.C. when it was besieged and destroyed by the Roman general Gaius Flavius Fimbria during the civil war between partisans of Gaius Marius and Lucius Cornelius Sulla.

The coin features the patron deity of Ilion on both sides. The obverse has a profile portrait of the goddess Athena wearing the Corinthian helmet that is one of her most characteristic attributes. The reverse show Athena Ilias wearing a kalathos (headdress) holding aloft a spear in her right hand and a spindle in her left. It is 12mm in diameter and weighs seven grams.

At first, archaeologists wondered if the coin was a “modern loss”—perhaps dropped by a collector in recent years. However, a professional excavation of the discovery site suggests a much deeper connection.

The field was found to be a multi-layered historical site, containing Bronze Age and Iron Age burial remains, Roman-era artifacts, and even a medieval Slavic knife fitting. This “archaeological context” suggests the coin likely arrived in the region centuries ago, rather than falling out of someone’s pocket last week.

The presence of a Trojan coin in Northern Europe poses a fascinating puzzle. Historians believe it likely traveled along ancient trade routes. The Mediterranean and the Baltic regions were linked by the Amber Road, where southern merchants traded goods for precious northern amber (which the Greeks called elektron).

Interestingly, because the coin is made of bronze rather than gold or silver, it had very low material value. This suggests it wasn’t used for a major business transaction. Instead, its discovery near burial remains hints at a symbolic or ritual use—perhaps kept as a charm, a souvenir of a long journey, or an offering to the dead.



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शादी पर बोले विजय वर्मा - ‘उम्मीद पर दुनिया टिकी:मटका किंग की स्टारकास्ट बोली- भावनाओं को दबाकर नहीं रख सकते, यही हमें जिंदा रखती है

मटका किंग अपनी दमदार कहानी और 60-70 के दशक की पृष्ठभूमि पर आधारित है। इस सीरीज में जुए की दुनिया के जरिए पहचान, इज्जत और सत्ता के खेल को दिखाने की कोशिश की गई है। इसी बीच दैनिक भास्कर ने फिल्म के डायरेक्टर नागराज मंजुले और स्टारकास्ट विजय वर्मा, कृतिका कामरा और साईं तम्हंकर से खास बातचीत की। इस दौरान सभी ने न सिर्फ अपने किरदारों के बारे में खुलकर बात की, बल्कि सीरीज की कहानी, उसके दौर और उसके सामाजिक पहलुओं पर भी दिलचस्प बातें साझा कीं। यह सीरीज सिर्फ एक खेल की नहीं, बल्कि उस दौर और उससे जुड़े लोगों की कहानी को सामने लाने का प्रयास है। नागराज मंजुले- आप हमेशा समाज को रॉ और अनफिल्टर्ड तरीके से दिखाते हैं। मटका किंग में आपने क्या एक्सप्लोर किया है? यह कहानी सिर्फ जुए के खेल की नहीं है, बल्कि उस दुनिया की है जो इसके इर्द-गिर्द बनती है। हम जानते हैं कि मटका खेला जाता था, लेकिन जो लोग इसे खेलते थे, उनकी जिंदगी कैसी थी, यह कम लोग जानते हैं। यह खेल कैसे इतना बड़ा और आकर्षक बना हमने उसी समाज, उस दौर और उन लोगों की कहानी बताने की कोशिश की है। 60-70 के दशक को पर्दे पर जीवंत बनाना कितना चुनौतीपूर्ण रहा और इतनी दमदार स्टारकास्ट के साथ काम करने का आपका अनुभव कैसा रहा? नागराज मंजुले- यह ज्यादा मुश्किल से पहले सोचने का काम होता है। जब आप उस दौर को लिख लेते हैं, तो पूरी टीम उसे साकार करने में जुट जाती है। हमारे पास कॉस्ट्यूम, प्रोडक्शन डिजाइन, म्यूजिक और डीओपी जैसे विभागों में बेहद टैलेंटेड लोग थे, जिन्होंने मिलकर उस समय को जीवंत बनाने की कोशिश की। वहीं स्टारकास्ट के साथ काम करने का अनुभव शानदार रहा, पहली बार इतने बड़े और नामी कलाकारों के साथ काम किया। हर किरदार मजबूत है, ऐसा लगता है जैसे हर खिलाड़ी अपने आप में मैच जिताने वाला है। स्क्रिप्ट में ऐसा क्या खास था और आपके किरदार में ऐसी कौन-सी बात थी, जिसकी वजह से आपने तुरंत इस प्रोजेक्ट के लिए हां कह दी और आप उससे कितना रिलेट कर पाए? विजय वर्मा- सबसे बड़ी वजह थी नागराज मंजुले के साथ काम करने का मौका। मैं उनके काम का हमेशा से फैन रहा हूं, और उनके साथ काम करना अपने आप में खास अनुभव है। स्क्रिप्ट में जो किरदार था, उसमें एक शांत लेकिन गहरी इंटेंसिटी है वह अपने काम को पूरी ईमानदारी से करता है, लेकिन जिस दुनिया का वह हिस्सा है, उसे समाज खुलकर स्वीकार नहीं करता, यही उसका सबसे बड़ा संघर्ष है। जहां तक रिलेट करने की बात है, यह एक लगातार चलने वाली प्रक्रिया रही कभी मैं किरदार के बहुत करीब महसूस करता था, तो कभी उससे दूर। कई बार ऐसा भी हुआ कि हम दोनों कहीं बीच में आकर मिले, और वहीं से उस किरदार को समझने का रास्ता बना। ट्रेलर में आपके किरदार के रिश्तों में एक जटिलता और कई परतें नजर आती हैं, इसके बारे में आप क्या कहना चाहेंगी? कृतिका कामरा- इस कहानी में सभी किरदार और उनके रिश्ते जटिल हैं। मेरा किरदार गुलरुख दुबाश एक अलग दुनिया से आता है, लेकिन उसे इस खेल और विजय के किरदार की दुनिया आकर्षित करती है। उसकी अपनी कमियां और इच्छाएं हैं, जो उसे इस सफर का हिस्सा बनाती हैं। आपके किरदार में कितनी लेयर्स देखने को मिलेंगी? साईं तम्हंकर- बहुत सारी लेयर्स हैं। मेरा किरदार ‘बरखा’ ऐसा है जो अपनी भावनाओं को दबाकर नहीं रख सकती। अगर वह कुछ महसूस करती है, तो उसे व्यक्त करना जरूरी है। यह उसकी सबसे बड़ी खासियत है। आजकल ओटीटी और सिनेमा में महिला किरदारों को ज्यादा गहराई मिल रही है। इस पर आपकी राय? साईं तम्हंकर- यह बहुत अच्छा बदलाव है। अब महिला किरदार सिर्फ सजावट नहीं हैं, बल्कि कहानी का अहम हिस्सा हैं। हालांकि अभी भी सुधार की गुंजाइश है। ट्रेलर में एक लाइन है ‘जिंदगी उम्मीद पर टिकी है’। आपकी जिंदगी में उम्मीद का क्या मतलब है? नागराज मंजुले- बस चलते रहना चाहिए। उम्मीद यही है कि आगे अच्छा होगा। विजय वर्मा- मुश्किल वक्त में सिर्फ उम्मीद ही साथ देती है। समय हमेशा बदलता है, और यही भरोसा हमें आगे बढ़ाता है। कृतिका कामरा- उम्मीद ही वह भावना है जो हमें जिंदा रखती है। अगर उम्मीद नहीं, तो कुछ भी नहीं। साईं तम्हंकर- उम्मीद जीवन की ड्राइविंग फोर्स है। इसके बिना जीना मुश्किल है। आखिरी सवाल दर्शक जानना चाहते हैं कि विजय वर्मा कब तक सिंगल रहने वाले हैं? विजय वर्मा- दुनिया उम्मीद पर टिकी है… फिलहाल उम्मीद ही पेट्रोल है!

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भूत बंगला में अक्षय के प्रैंक से कर्जदार बनीं वामिका-मिथिला:सेट पर गेम्स, बॉन्डिंग और डिसिप्लिन ने दिया यादगार एक्सपीरियंस

हॉरर-कॉमेडी फिल्म ‘भूत बंगला’ की स्टार कास्ट में शामिल वामिका गब्बी और मिथिला पालकर ने दैनिक भास्कर से खास बातचीत में अपने शूटिंग अनुभव साझा किए हैं। दोनों ने बताया कि सेट पर जहां एक तरफ प्रोफेशनल डिसिप्लिन था, वहीं दूसरी तरफ मस्ती और हल्के-फुल्के माहौल की कोई कमी नहीं थी। अक्षय कुमार के मजेदार प्रैंक्स और पूरी टीम की बॉन्डिंग ने शूट को यादगार बना दिया। साथ ही, दोनों अभिनेत्रियों ने अपनी जर्नी, शुरुआती संघर्ष और इंडस्ट्री में अपने अनुभवों पर भी खुलकर बात की है। फिल्म की शूटिंग के दौरान सेट का माहौल कैसा था? वामिका गब्बी- बिल्कुल, बाहर से देखने पर यही लगता है कि सब कुछ मस्ती-मजाक में हुआ होगा। लेकिन असल में सेट पर बहुत सीरियस काम भी चल रहा था। हां, मस्ती बहुत होती थी और वही माहौल हमें और सहज बना देता था। मेरे लिए तो ये एक फैमिली जैसा एक्सपीरियंस बन गया था। आपका किरदार कैसा है? क्या ये एक टिपिकल बहन है या उसमें कोई ट्विस्ट भी देखने को मिलेगा? मिथिला पलकर- मैं ज्यादा कुछ बताना नहीं चाहूंगी, वो तो आपको फिल्म देखकर ही पता चलेगा। लेकिन हां, ये एक ऐसी बहन है जिसकी कोई भी जिद हो, उसका भाई उसे जरूर पूरा करता है उनके रिश्ते में वही खूबसूरती है। इतने बड़े कलाकारों के साथ काम करना जैसे अक्षय कुमार, परेश रावल और निर्देशक प्रियदर्शन कैसा अनुभव रहा? वामिका गब्बी- शुरुआत में थोड़ा इंटिमिडेशन था क्योंकि मैंने उन्हें हमेशा स्क्रीन पर देखा है। लेकिन सेट पर उन्होंने माहौल इतना आसान और कम्फर्टेबल बना दिया कि कभी ऐसा नहीं लगा कि मैं इतने बड़े लोगों के साथ काम कर रही हूं। हर कोई बहुत सपोर्टिव था। इतने टैलेंटेड लोगों के बीच रहना ही अपने आप में एक सीख है। उनकी एनर्जी, उनका काम करने का तरीका सब कुछ बहुत इंस्पायरिंग था। अपने किरदार की तैयारी के दौरान कोई चैलेंज आया? मिथिला पलकर- नहीं, क्योंकि प्रियदर्शन सर ने सब कुछ बहुत आसान बना दिया। उन्होंने मुझे हर चीज में गाइड किया, जैसे हैंड-होल्डिंग करते हुए। मेरा सिर्फ एक ही डर था इतने बड़े कलाकारों के सामने परफॉर्म करना, लेकिन उन्होंने वो भी आसान कर दिया। इतने बड़े स्टार कास्ट के साथ काम करने का अनुभव और आपकी पर्सनल जर्नी यूट्यूब से फिल्मों तक,आप इसे कैसे देखती हैं? मिथिला पलकर- सच कहूं तो विश्वास ही नहीं होता है। इतने लेजेंड्स के साथ काम करना एक सपना जैसा है। शुरुआत में थोड़ा डर था, लेकिन सभी ने बहुत प्यार से अपनाया। जहां तक मेरी जर्नी की बात है, मेरा हमेशा से एक ही गोल था एक अच्छा एक्टर बनना। इंटरनेट ने मुझे बहुत कुछ दिया है और उसी की वजह से मुझे ये मौका भी मिला। मैं बस अच्छा काम करना चाहती हूं, चाहे वो किसी भी भाषा या प्लेटफॉर्म पर हो। सेट पर अक्षय कुमार के मशहूर प्रैंक्स का अनुभव कैसा रहा? क्या आप भी कभी उनका शिकार बनीं? वामिका गब्बी- एक सीन था जहां मुझे टेबल पर जंप करना था। मैं पूरी तैयारी के साथ शॉट दे रही थी, तभी अक्षय सर ने मुझे हल्का सा पुश कर दिया और मैं पूरी तरह चौंक गई! सब लोग हंसने लगे और मुझे तब समझ आया कि ये एक प्रैंक था। इसके अलावा हम सब सेट पर कार्ड्स, लूडो और अलग-अलग गेम्स खेलते थे। एक लेजर गेम भी खेलते थे, जिसमें ऊपर लगे बॉक्स पर निशाना लगाना होता था। उसमें तो मैं हारते-हारते करीब 12,000 रुपये की ‘कर्जदार’ हो गई थी! मिथिला पलकर- नहीं, मेरे साथ उन्होंने कोई प्रैंक नहीं किया। शायद वो एक प्रोटेक्टिव भाई की तरह थे। लेकिन हम सेट पर बहुत गेम्स खेलते थे जैसे लूडो। उसमें मैंने काफी पैसे हार दिए थे! लेकिन आखिरी दिन अक्षय सर के साथ खेलते-खेलते मैंने सब जीत लिए और मेरा ‘कर्ज’ उतर गया।

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अर्जुन रामपाल की 14 फिल्में फ्लॉप, किराया नहीं दे पाए:मॉडल से एक्टर बने; निगेटिव रोल्स से स्टारडम मिला, 'धुरंधर' ने किस्मत बदली

एक समय बॉलीवुड में अपनी स्टाइल और शानदार स्क्रीन प्रेजेंस के लिए पहचाने जाने वाले अर्जुन रामपाल का करियर उतार-चढ़ाव भरा रहा। मॉडलिंग से फिल्मों में आए अर्जुन ने शुरुआत में पहचान बनाई, लेकिन लंबे समय तक उनकी कई फिल्में बॉक्स ऑफिस पर असफल रहीं। इस दौर में उन्हें आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ा और घर का किराया भरना भी मुश्किल हो गया था। करीब 14 फिल्मों की असफलता ने उनके करियर पर सवाल खड़े किए, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। संघर्ष के दौर में उन्होंने खुद को तराशा और अभिनय पर काम जारी रखा। समय के साथ उन्हें ‘रॉक ऑन’ जैसी फिल्मों से सराहना मिली और अब ‘धुरंधर’ के जरिए उनकी किस्मत फिर चमकती नजर आ रही है। आज की सक्सेस स्टोरी में अर्जुन रामपाल के करियर और निजी जीवन से जुड़ी बातें जानते हैं। सेना का अनुशासन और मां के संस्कारों का उनके व्यक्तित्व पर गहरा प्रभाव अर्जुन रामपाल का जन्म 26 नवंबर 1972 को जबलपुर, मध्य प्रदेश में हुआ था। उनका शुरुआती जीवन दिल्ली में बीता, जहां उन्होंने पढ़ाई पूरी की। उनके पिता अमरजीत रामपाल भारतीय सेना में अधिकारी थे, जबकि उनकी मां ग्वेन रामपाल स्कूल टीचर थीं। सेना के अनुशासन और मां के संस्कारों ने उनके व्यक्तित्व पर गहरा असर डाला। इसी वजह से उनमें अनुशासन और जिम्मेदारी की भावना बचपन से ही मजबूत होती गई। अर्जुन रामपाल ने दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदू कॉलेज से अर्थशास्त्र में स्नातक किया। पढ़ाई के दौरान उनकी रुचि फैशन और विज्ञापनों की ओर बढ़ी। शुरुआत में उनका इरादा मॉडलिंग में आने का नहीं था, लेकिन उनकी पर्सनालिटी और लुक्स ने उन्हें इस ओर खींच लिया। मिस इंडिया और मॉडल मेहर जेसिया ने मॉडलिंग इंडस्ट्री से परिचित कराया दरअसल एक पार्टी में उनकी मुलाकात पूर्व मिस इंडिया और मॉडल मेहर जेसिया से हुई। उन्होंने उन्हें मॉडलिंग इंडस्ट्री से परिचित कराया और आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। इसके बाद उन्होंने बड़े फैशन डिजाइनर्स और ब्रांड्स के लिए रैंप वॉक शुरू किया और जल्द ही भारत के वे प्रमुख मेल मॉडल्स में शामिल हो गए। 1990 के दशक में वे कई विज्ञापनों और फैशन शोज का हिस्सा बने। इससे उनकी पहचान तेजी से बढ़ी और बॉलीवुड में आने से पहले ही उन्होंने मॉडलिंग में मजबूत नाम बना लिया। पहली फिल्म में मनीषा कोइराला के साथ मौका मिला मॉडलिंग के दौरान उनकी स्क्रीन प्रेजेंस और विज्ञापनों की लोकप्रियता ने फिल्म इंडस्ट्री का ध्यान खींचा। इसी दौरान अशोक मेहता ने उन्हें फिल्म ‘मोक्ष’ (2001) में मनीषा कोइराला के अपोजिट कास्ट किया। दूसरी फिल्म ‘प्यार इश्क और मोहब्बत’ में निर्देशक राजीव राय ने उन्हें एक विज्ञापन में देखा और प्रभावित होकर कास्ट किया। हालांकि यह फिल्म ‘मोक्ष’ से पहले रिलीज हुई थी। इसमें अर्जुन रामपाल के साथ सुनील शेट्टी, आफताब शिवदासनी और कीर्ति रेड्डी नजर आए। घर का किराया भरने के भी पैसे नहीं थे पॉप डायरीज को दिए इंटरव्यू में अर्जुन ने बताया था- मैं अपने करियर की शुरुआत में एक बेहद सफल मॉडल था। उसी दौरान अशोक मेहता मेरे पास फिल्म ‘मोक्ष’ लेकर आए, जिसमें मुझे शानदार अभिनेत्री मनीषा कोइराला के साथ काम करने का मौका मिला। उस समय वह अपने करियर के शिखर पर थीं। मुझे याद है, हम चंबल घाटी में एक सीन शूट कर रहे थे। जब मैंने शूटिंग का फुटेज देखा, तो खुद को देखकर मुझे खुद से ही नफरत हो गई। मैंने सोचा, ‘हे भगवान, मैं कितना खराब दिख रहा हूं।’ उसी वक्त मैंने फैसला किया कि अब मैं मॉडलिंग नहीं करूंगा। लेकिन मुझे बिल्कुल अंदाजा नहीं था कि इस फिल्म को बनने में छह साल लग जाएंगे। उस दौरान मेरे पास आय का कोई स्रोत नहीं था। मैं मुंबई के अंधेरी स्थित सेवन बंगलों में रहता था। मेरे मकान मालिक सरदारजी बहुत अच्छे इंसान थे। हर महीने की पहली तारीख को वे आते, मुझे देखते और मैं उन्हें देखता। वे मुस्कुराकर पूछते, ‘नहीं है ना?’ और मैं सिर हिला देता। तब वे कहते, ‘कोई बात नहीं, तू दे देगा।’ जिंदगी में ऐसे अच्छे लोग और ऐसे पल बहुत मायने रखते हैं।” फेस ऑफ द ईयर पुरस्कार से सम्मानित किया गया बहरहाल, ‘मोक्ष’ और ‘प्यार इश्क और मोहब्बत’ बॉक्स ऑफिस पर अपेक्षित सफलता हासिल नहीं कर सकीं, लेकिन आलोचकों ने अर्जुन रामपाल के अभिनय और स्क्रीन प्रेजेंस की सराहना की। इससे उन्हें इंडस्ट्री में संभावनाशील अभिनेता के रूप में देखा जाने लगा। बैक टू बैक 14 फ्लॉप फिल्में दीं ‘मोक्ष’ और ‘प्यार इश्क और मोहब्बत’ के बाद अर्जुन रामपाल ने ‘दीवानापन’, ‘तहजीब’, ‘दिल है तुम्हारा’, ‘दिल का रिश्ता’, ‘असंभव’, ‘वादा’, ‘आंखें’, ‘हमको तुमसे प्यार है’, ‘यकीन’, ‘डरना जरूरी है’, ‘ऐलान’ और ‘एक अजनबी’ जैसी फिल्मों में काम किया। लेकिन इन फिल्मों को कमर्शियल सफलता नहीं मिली। ‘दिल है तुम्हारा’ की कहानी और संगीत को पसंद किया गया था। अर्जुन रामपाल को अक्सर स्टाइलिश हीरो के तौर पर देखा गया, न कि गंभीर अभिनेता के रूप में। हालांकि उन्होंने हार नहीं मानी और अलग-अलग किरदारों में खुद को आजमाते रहे। विलेन अवतार ने स्टारडम दिलाया शाहरुख खान की ‘डॉन’ (2006) में अर्जुन रामपाल ने अपने निगेटिव किरदार से दर्शकों और समीक्षकों का ध्यान खींचा। इस फिल्म में उन्होंने सख्त और प्रभावशाली किरदार निभाया, जिसने उनकी स्टाइलिश हीरो वाली छवि से अलग एक गंभीर अभिनेता की पहचान मजबूत की। इसके बाद ‘ओम शांति ओम’ (2007) में उनका विलेन अवतार और ज्यादा चर्चा में रहा। इस फिल्म में उनके किरदार की स्क्रीन प्रेजेंस, डायलॉग डिलीवरी और खलनायक वाली ऊर्जा को पसंद किया गया। इसी वजह से उन्हें सिर्फ मॉडल-टर्न-एक्टर नहीं, बल्कि ऐसे अभिनेता के तौर पर देखा जाने लगा जो निगेटिव भूमिकाओं में मजबूत असर छोड़ सकता है। उनके विलेन अवतार ने उन्हें स्टारडम दिलाया। रॉक ऑन के लिए नेशनल अवॉर्ड मिला 'रॉक ऑन’ अर्जुन रामपाल के करियर का बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुई। इस फिल्म में फरहान अख्तर, प्राची देसाई, ल्यूक केनी और पूरब कोहली भी थे, लेकिन अर्जुन रामपाल ने अपने गहरे किरदार से खास पहचान बनाई। इस फिल्म से पहले तक उन्हें अक्सर स्टाइलिश चेहरे के रूप में देखा जाता था, लेकिन ‘रॉक ऑन’ ने यह धारणा बदल दी। फिल्म में उनके अभिनय ने दिखाया कि वे ग्लैमर या निगेटिव रोल तक सीमित नहीं हैं, बल्कि भावनात्मक और परिपक्व किरदार भी असरदार तरीके से निभा सकते हैं। ‘रॉक ऑन’ बॉक्स ऑफिस पर सफल रही और दर्शकों ने इसकी कहानी, संगीत और कलाकारों की परफॉर्मेंस को सराहा। इसी फिल्म के लिए अर्जुन रामपाल को बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर का नेशनल फिल्म अवॉर्ड मिला, जिससे वे एक गंभीर और प्रतिभाशाली अभिनेता के रूप में स्थापित हो गए। मल्टीस्टारर फिल्मों का अहम चेहरा बने अर्जुन रामपाल को ‘रॉक ऑन’ के लिए नेशनल अवॉर्ड मिलने के बाद मजबूत अभिनेता के तौर पर देखा जाने लगा। इस फिल्म ने उनके करियर को नई दिशा दी, लेकिन इसके बाद उनका सफर लगातार सफल नहीं रहा। ‘हाउसफुल’ और ‘राजनीति’ सफल रहीं, जबकि ‘वी आर फेमिली’ और ‘रा: वन’ औसत रहीं। हालांकि इस दौर में वे मल्टीस्टारर फिल्मों का अहम चेहरा बने और इंडस्ट्री में उनकी मांग बढ़ी। लेकिन 2012 के बाद उनकी फिल्मों का प्रदर्शन गिरता गया। कई बड़े प्रोजेक्ट्स बॉक्स ऑफिस पर नहीं चले। ‘इनकार’, ‘डी-डे’, ‘सत्याग्रह’, ‘रॉक ऑन 2’, ‘डैडी’ और ‘पलटन’ असफल रहीं। ‘डैडी’ के प्रोड्यूसर अर्जुन रामपाल खुद थे। लगातार असफल फिल्मों ने उनके स्टारडम को कमजोर कर दिया और वह बॉक्स ऑफिस पर भरोसेमंद नाम नहीं रह पाए। बहरहाल, असफल फिल्मों पर अर्जुन रामपाल का नजरिया कुछ अलग ही है। उनका मानना है कि हर असफलता केवल एक रुकावट नहीं होती है। फ्लॉप फिल्मों के बाद OTT प्लेटफॉर्म की ओर कदम बढ़ाया फिल्मों में ग्राफ नीचे जाने के बाद अर्जुन रामपाल ने ओटीटी पर अपनी नई शुरुआत की, जहां उन्हें नए तरह के किरदार निभाने का मौका मिला। ‘द फाइनल कॉल’ में उन्होंने पायलट का इमोशनल और साइकॉलॉजिकल किरदार निभाया, जिसे दर्शकों ने सराहा। ‘लंदन फाइल्स’ में उन्होंने जांच अधिकारी की भूमिका निभाई, जिसमें उनकी इंटेंस एक्टिंग की तारीफ हुई। OTT पर उन्हें फिल्मों के मुकाबले ज्यादा सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली। ‘धुरंधर’ से मिली बड़ी पहचान इंडस्ट्री में माना जाता है कि OTT पर काम करने के बाद कलाकारों को नए और मजबूत किरदारों के ऑफर मिलते हैं। अर्जुन रामपाल के साथ भी ऐसा ही हुआ। उनकी हालिया स्क्रीन प्रेजेंस और गंभीर भूमिकाओं ने फिल्ममेकर्स का ध्यान खींचा। इसके बाद उन्हें बड़े प्रोजेक्ट्स में शामिल किया गया। इसी कड़ी में उनका नाम फिल्म ‘धुरंधर’ से जुड़ा, जो उनके करियर का महत्वपूर्ण मोड़ माना जा रहा है। ‘धुरंधर’ में अर्जुन रामपाल ने मेजर इकबाल का किरदार निभाया है, जिसे 26/11 हमलों के मास्टरमाइंड के रूप में दिखाया गया है। इस किरदार के जरिए उन्होंने उस दर्द को अभिनय में उतारा, जिसे वे सालों से महसूस कर रहे थे। अर्जुन रामपाल कहते हैं कि जब निर्देशक आदित्य दर ने उन्हें ‘धुरंधर’ की कहानी सुनाई, तो 26/11 से जुड़ा सीन सुनते ही उन्होंने फिल्म करने का फैसला कर लिया। उनके मुताबिक, उसी समय उन्हें लगा कि यह उनके अंदर की पीड़ा और गुस्से को बाहर निकालने का मौका है। अर्जुन रामपाल ने कहा कि 26 नवंबर 2008 का दिन उनकी जिंदगी का सबसे डरावना दिन था। यह उनका 36वां जन्मदिन था और वह दोस्तों के साथ जश्न मनाने निकले थे। वे वर्ली के एक होटल में रुके, जहां अचानक धमाके की आवाज सुनाई दी। शुरुआत में लगा कि गैंगवार हुआ है, लेकिन कुछ ही देर में पूरे शहर में आतंक फैल गया। उन्होंने बताया कि होटल को तुरंत बंद कर दिया गया और सभी को अंदर रहने के निर्देश दिए गए। बाहर हालात बेहद खराब थे। रामपाल ने कहा, “मेरे जन्मदिन पर मैंने 26/11 की भयावहता अपनी आंखों से देखी।” इस घटना का उन पर गहरा मानसिक असर पड़ा। अगले दिन घर लौटते समय उन्हें कई बार गाड़ी रोकनी पड़ी, क्योंकि उनकी तबीयत खराब हो रही थी। ______________________________________ पिछले हफ्ते की सक्सेस स्टोरी पढ़िए... रणवीर सिंह ने कास्टिंग काउच का सामना किया:थिएटर में झाड़ू-पोंछा लगाया, उनकी दोनों धुरंधर की कुल कमाई लगभग 3 हजार करोड़ रुपए बचपन से अमिताभ बच्चन जैसा बनने का सपना देखने वाले रणवीर सिंह का सफर संघर्ष, जुनून और आत्मविश्वास की मिसाल है। फिल्मों में जगह बनाने के दौरान उन्हें कास्टिंग काउच का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने समझौता करने से इनकार कर दिया।पूरी खबर पढ़ें..

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Bronze Age jewelry hoard found during wind farm construction

A hoard of Bronze Age jewelry has been discovered during construction of wind turbines near Wolfenbüttel in Lower Saxony, Germany. No archaeological sites had been found before in the area where the windfarm was to be built, but a review determined there was a high probability that previously unknown ones might emerge, so archaeologists were engaged to supervise and survey the site alongside construction. The prediction was borne out, with 412 significant archaeological features unearthed in 13 months, several of them of high scientific value with the Bronze Age jewelry hoard at the top of the list.

Important finds include two very well-preserved house foundations from the Linear Pottery culture dating to the mid-6th millennium B.C. The Linear Pottery culture built the first farming settlements in Lower Saxony, so the remains, artifacts and soil samples recovered from this period will provide new insights into the earliest settlements in the region.

The Roman period was well-represented with finds including wheel-thrown pottery, the skeletal remains of dogs that were buried in a group, likely for ritual purposes, metal artifacts and an exceptional intact three-layered bone comb from the 4th/5th century A.D. inlaid with bronze rivets. This type of comb was highly prized personal possessions and were often used as grave goods. They rarely survive intact, however, because they were placed on funeral pyres and burned with the deceased’s body, leaving them in charred fragments.

The most significant find was discovered during construction of one of the wind turbine platforms. Objects of bronze and amber were found close together. Archaeologists lifted them in a large soil block so the delicate objects could be excavated in laboratory conditions.

The find consists of a hoard of Bronze Age jewelry dating from around 1500 to 1300 BC. For the northern Harz foothills, this is the first Bronze Age hoard find since 1967 and the only one excavated according to modern scientific standards, as the archaeologists explain. The jewelry belonged to at least three high-ranking women and was possibly buried as a religious offering. Among the pieces are decorated neck rings, arm spirals, and bronze ornamental plates, as well as at least two disc pins.

A necklace made of more than 156 amber beads is particularly outstanding and, so far, unique. It is the largest single find of Bronze Age amber in Lower Saxony to date, according to the State Office for Heritage Management. Amber was collected during the Neolithic and Bronze Ages, primarily along the Baltic coasts of Scandinavia and the Baltic region. The organic material was highly prized in many cultures for its “sunny” color and transparency and was traded via long-distance trade networks as far as the Mediterranean and beyond. In most places, only members of the political and religious elite could afford jewelry made of imported amber. The exact origin of the amber beads in the necklace recently discovered in the Harz foothills has yet to be determined. The State Office reports that the analysis of the fragile finds has only just begun.



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Jessie Ware on the 'hyper-surreal' high of her first arena tour

The singer will play three UK arenas later this year, 14 years after her first album came out.

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Jessie Ware on the 'hyper-surreal' high of her first arena tour

The singer will play three UK arenas later this year, 14 years after her first album came out.

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Matching fragments of Silla stele reunited

Two fragments of a stele from Korea’s ancient Silla kingdom have been reunited at the Gyeongju National Museum after 83 years. The reunited fragments will be on display in a special exhibition through August 17th.

The first fragment was discovered in 1937 on the Wolseong Palace site, the remains of a Silla royal palace in Gyeongju built in the 4th century. It was small, just 13.62 cm wide, 11.13 cm high, 9.75 cm thick (5.4 x 4.4 x 3.8 inches), and had a few characters inscribed on it, but only “存” meaning “exist” could be conclusively identified as the rest were damaged and incomplete. It has been in the collection of the Gyeongju National Museum since its discovery.

In 2020, the second fragment was unearthed during the excavation of the defensive moat that once surrounded the palace. This fragment was larger, 16.47 cm wide, 16.58 cm high and 13.67 cm thick (6.48 x 6.52 x 5.38 inches). It is inscribed with characters including “貢” (tribute), “白” (white), “不” (not), “天” (heaven), and “渡” (cross).

The connection to the earlier discovery was not immediately evident, but in 2024, researchers recalled the previous stone and noted the similarities between the two. Analysis of the stones found that they were both the same type — alkali granite quarried from the Namsan Mountain in Gyeongju — and 3D scans of the fragments found that their broken edges fit together perfectly. When the two pieces were joined, the half characters at the edges completed and the character “稱” (call) was identified.

The calligraphy style is atypical for a Silla inscription. It’s a clerical script (yeoseo) rather than the standard haeseo script usually seen on Silla stele. No other Silla texts written in yeoseo have been found before. Epigraphy experts hypothesize that the fragment may originate with the Goguryeo kingdom’s 5th century expedition to Silla territory, when it sent reinforcements by request to fend off attacks from the two other Korean kingdoms (Baekje, Gaya) and Japan.

However, scholars caution against drawing conclusions based solely on script style, noting that writing styles cannot be tied to a single state or era. Given that the fragments were excavated from the Wolseong Palace Site, some argue that the stele may still have been commissioned by Silla.

The fragments, along with 3D scan data, deciphered inscriptions, and comparative materials with the Stele of King Gwanggaeto the Great, will be on display at the Treasury of the Silla Millennium inside the Gyeongju National Museum from Monday to Aug. 17.

“We hope additional fragments will be discovered to help reveal more about the identity of this stele,” said Kim Hyeon-hee, head of the curatorial research division at the Gyeongju National Museum.



* This article was originally published here

Doctor Who star Ncuti Gatwa to receive honorary doctorate

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Lost seal of Edward the Confessor found after 40 years

A seal impression on wax made by 11th century Anglo-Saxon king Edward the Confessor has been found after disappearing more than 40 years ago. A new study of the rediscovered seal impression has now been published in the journal Early Medieval England and its Neighbours.

The seal of Edward the Confessor is the only authentic royal seal from before the Norman Conquest, and there are only three genuine impressions of it known to survive. (There are five others that were thought to be authentic until researchers in the 1950s proved they were forgeries made at Westminster Abbey in the first half of the 12th century.) One is in the British Library attached to a Christ Church writ. It dates to between 1052 and 1066. Another is on a Westminster writ dating to between 1062 and 1066. Third is probably the oldest, originally attached to a writ of 1053-1057 and then in 1059 reused on a charter donating the manor of Taynton in Oxfordshire to the Abbey of Saint-Denis just north of Paris.

Despite its age and travel history, the Saint-Denis impression is by far the best preserved of the three. For centuries the seal impression and the document it authenticated had been kept in the monastery of Saint-Denis in northern Paris. It was removed to the newly-established French National Archives by the Revolutionary government in the 1790s. It was cast there in the 1830s to make a hardier copy of the impression and was extensively published by English scholars. One of them noted in 1957 that the seal had become detached from the charter.

It wasn’t published again until the mid-1980s, but when scholars applied to the curator of the seal collection, they were told the seal was lost with no explanation. The loss of so special an item, of pivotal interest to both English and French history, caused much dismay in the scholarly community at the time. It turns out it wasn’t stolen or destroyed, but simply misplaced. It was rediscovered in 2021 in the Sceaux détachés (detached seals) section of Archives, stored in an individual box. While there are no records explaining the move, the seal was likely moved during conservation of the parchment and someone simply failed to stick a Post-It note to the document to let people know where the seal had been moved to.

The seal impression was made on a round of brown wax and affixed to a parchment tongue. The obverse depicts Edward the Confessor on his throne holding a fleur-de-lis scepter in his right hand and an orb in his left. The surviving inscription (a little chunk is missing from the top) reads: EADVVARDI ANGLORVM BASIL[EI]. The reverse again shows the king enthroned, but he holds a different scepter in his right hand and a sword in his left. Different parts of the legend survive, allowing the full inscription to be pieced together: [SIGI]LLVM EADVVARDI ANGLORV[RVM BASILEI] (Seal of Edward King of the English).

Not only is it the oldest surviving royal wax seal impression from England, but it is also the oldest known example of a hanging wax seal of the “majesty” type, meaning with a monarch holding a sword, from the Latin West. It contains multiple icons of imperial authority, Byzantine and Western, as well as distinctly British elements. Scholars believe Edward was adopting this assemblage of imagery to convey a new vision of powerful kingship.

Considering the seal itself, the two authors [of the study] say that the inscription ‘Anglorum basileus’ – the latter term being the title used for the Byzantine emperor – was “if not a nod to Byzantine traditions of rule” then a likely reinterpretation of their venerable style. And the inclusion of a sword on one side of the seal is also evocative of contemporary Byzantine coins that depicted sword-bearing rulers, such as Constantine the Great.

“You might think that it’s self-evident that a sword should be a royal attribute,” said Dr Dorandeu. “But at this point in English history, it’s almost not been used. We do see it, however, in the Byzantine coinage, where it had been introduced no more than five to ten years earlier. So, this suggests strong connections with, and quick responses to, Byzantine iconography, either directly or as it was transmitted through Europe.”

In the paper, the authors consider the seal in relation to the emergence of a new type of document called the writ-charter – used by kings to grant land or rights and simultaneously command local officials to enforce that grant. Records show that seven originals and numerous copies survive from Edward’s reign, compared with no originals and a handful of copies before it.

“The writ-charter, in its classic form as a sealed document, is almost certainly a novelty of Edward’s reign,” said Professor Roach. “And we are seeing a new kind of seal to authenticate this new document. Edward is adopting a continental form of authentication, which sits perfectly alongside the iconography of the seal itself, and his own hegemonic ambitions.”



* This article was originally published here