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संजय दत्त@67: सलमान ने दी BMW, समुद्र में फेंकी चाबी:बिगड़ते देख इंदिरा गांधी ने कहा- बोर्डिंग स्कूल भेजो, राजेश खन्ना-ऋषि कपूर को पीटने पहुंचे थे

साल था 1994। मुंबई की ठाणे सेंट्रल जेल की सबसे कड़ी सुरक्षा वाली अंडा बैरक में बंद एक आरोपी रक्षाबंधन के दिन अपनी बहनों का इंतजार कर रहा था। लोहे की सलाखों के पीछे दोनों बहनों ने उसके हाथ पर राखी बांधी, लेकिन उस भाई की जेब पूरी तरह खाली थी। देने के लिए न कोई तोहफा था, न पैसे। कुछ पल तक वह चुप रहा। फिर जेल की कैंटीन से मिले दो-दो रुपए के चाय-नाश्ते के कूपन बहनों के हाथ में रख दिए और बोला, ‘मेरे पास फिलहाल यही है।’ यह वही शख्स था, जिसके नाम पर कभी सिनेमाघरों के बाहर भीड़ उमड़ती थी, जिसकी फिल्मों के पोस्टर शहरों में छाए रहते थे और जो करोड़ों लोगों का सुपरस्टार था, लेकिन वक्त ने ऐसी करवट बदली कि वही एक्टर जेल की चारदीवारी के भीतर अपनी बहनों को सिर्फ दो रुपए के कूपन ही दे सका। जी हां, हम बात कर रहे हैं बॉलीवुड के 'संजू बाबा' यानी संजय दत्त की। आज उनके 67वें जन्मदिन पर जानते हैं उनके कुछ अनसुने किस्से। इंदिरा गांधी की सलाह पर बोर्डिंग स्कूल भेजा गया संजय दत्त के जन्म के बाद सुनील दत्त और नरगिस ने अपने बेटे के नाम के लिए फिल्म पत्रिका 'शमा' के पाठकों से सुझाव मांगे थे। जिसके बाद देशभर से लगभग 15,000 से अधिक नाम आए थे। इसके बाद 'संजय' नाम आगरा की रहने वाली पुष्पा अग्रवाल ने सुझाया था। संजय बचपन से ही परिवार के सबसे लाड़ले थे। माता-पिता, नानी और रिश्तेदार उनकी हर इच्छा पूरी कर देते थे। इसी वजह से वे बेहद जिद्दी भी होते जा रहे थे। स्कूल हो या घर, हर जगह उन्हें विशेष तवज्जो मिलती थी। हालांकि, संजय सिर्फ जिद्दी नहीं थे, उनका दिल भी बहुत बड़ा था। एक बार दिल्ली में एक शादी के दौरान उन्होंने ठंड से कांप रहे एक गरीब बच्चे को अपना सूट उतारकर दे दिया था। लेकिन उनकी शरारतें परिवार की चिंता भी बढ़ा रही थीं। पत्रकार यासिर उस्मान द्वारा संजय दत्त पर लिखी गई किताब के मुताबिक छह साल की उम्र में उन्होंने पिता सुनील दत्त को सिगरेट पीते देखा और खुद भी सिगरेट पीने की जिद करने लगे। सुनील दत्त को लगा कि एक बार सिगरेट पीने के बाद बेटे का शौक खत्म हो जाएगा, लेकिन संजय ने पूरी सिगरेट पी ली। कुछ साल बाद वे घर आए मेहमानों की फेंकी हुई सिगरेट की बुझी हुई बटें बगीचे में छिपकर पीते हुए भी पकड़े गए। जिस पर पिता ने उनकी पिटाई की थी। ऐसे में सुनील दत्त को एहसास हुआ कि जरूरत से ज्यादा लाड़-प्यार और फिल्मी माहौल का संजय पर गलत असर पड़ रहा है। तभी यह फैसला किया गया कि संजय को किसी बोर्डिंग स्कूल भेज दिया जाए। इसके बाद परिवार की करीबी मित्र और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने सलाह दी कि संजय को मिलिट्री डिसिप्लिन के लिए हिमाचल प्रदेश के सनावर स्थित लॉरेंस स्कूल भेजा जाए। संजय जूतों में हेरोइन छिपाकर न्यूयॉर्क गए थे 1980 में संजय दत्त अपनी पहली फिल्म 'रॉकी' की शूटिंग में बिजी थे। इसी दौरान उनकी मां नरगिस की तबीयत बिगड़ गई और उन्हें मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में भर्ती कराया गया। नरगिस को पैंक्रियाटिक कैंसर था और उन्हें इलाज के लिए न्यूयॉर्क के मेमोरियल स्लोन केटरिंग कैंसर सेंटर ले जाना था। सुनील दत्त ने कांपती आवाज में अपने तीनों बच्चों संजय, नम्रता और प्रिया को बताया कि उनकी मां को कैंसर है। इसके बाद 'रॉकी' की शूटिंग रोक दी गई और 21 अगस्त 1980 को सुनील दत्त नरगिस को लेकर अमेरिका रवाना हो गए। न्यूयॉर्क में इलाज के दौरान नरगिस की कई सर्जरी हुईं, लेकिन ऑपरेशन के बाद लगातार खून बहने से वे कोमा में चली गईं। इसी दौरान संजय दत्त खुद भी नशे की लत से जूझ रहे थे। मां की गंभीर हालत के बावजूद वे ड्रग्स नहीं छोड़ पा रहे थे। यासिर उस्मान की किताब के मुताबिक, न्यूयॉर्क जाते समय वे अपने जूतों में करीब 30 ग्राम हेरोइन छिपाकर ले गए थे। बाद में उन्होंने स्वीकार किया था कि उस घटना को याद करके उन्हें शर्म आती है। यहां तक कि नशे की वजह से उन्हें अपनी मां के लिए खून दान करने की अनुमति भी नहीं मिली थी। 'रॉकी' के प्रीमियर में नरगिस की याद में कुर्सी खाली छोड़ी गई न्यूयॉर्क में करीब तीन महीने तक कोमा में रहने के बाद नरगिस को होश आया था। उनकी सबसे बड़ी इच्छा थी कि वे जल्द भारत लौटें और अपने बेटे की पहली फिल्म 'रॉकी' देखें। 6 मार्च 1981 को भारत लौटने के बाद 9 मार्च 1981 को सुनील दत्त उन्हें फिल्म 'रॉकी' दिखाने घर के प्रीव्यू थिएटर तक ले गए। कमजोरी के कारण वे पूरी फिल्म नहीं देख सकीं और सिर्फ सात रील देखने के बाद उन्हें वापस कमरे में ले जाना पड़ा, लेकिन जितना देखा, उससे वे बेहद खुश थीं। उन्हें विश्वास था कि उनका बेटा संजू बड़ा स्टार बनेगा। वहीं, संजय की डेब्यू फिल्म 'रॉकी' का प्रीमियर 7 मई 1981 को तय किया गया था। प्रीमियर से ठीक चार दिन पहले, 3 मई 1981 को नरगिस का निधन हो गया। इसके बाद फिल्म के प्रीमियर के दौरान सुनील दत्त ने थिएटर में संजय दत्त के बगल वाली कुर्सी नरगिस की याद में खाली रखी थी। ऋषि कपूर-राजेश खन्ना को पीटने पहुंच गए थे फिल्म 'रॉकी' की शूटिंग के दौरान संजय दत्त और एक्ट्रेस टीना मुनीम के बीच प्यार हुआ। इस रिश्ते में संजय बेहद पजेसिव बॉयफ्रेंड थे। दोनो का अफेयर लगभग 2 साल तक चला था। यासिर उस्मान की किताब के मुताबिक, फिल्म 'कर्ज' में टीना मुनीम ऋषि कपूर के साथ काम कर रही थीं। तब दोनों के बीच प्रेम संबंध होने की अफवाहें फैल गई थीं। इससे संजय इतने गुस्से में आ गए कि वे ऋषि कपूर की पिटाई करने के इरादे से उनके घर पहुंच गए थे। संजय ने एक्टर गुलशन ग्रोवर से भी अपने साथ चलने को कहा। गुलशन ने बाद में बताया था, संजय और मैं भाइयों जैसे थे। एक दिन उसने मुझसे कहा, 'चलो चिंटू (ऋषि कपूर) के घर चलते हैं, उसकी पिटाई करनी है।' हम वहां गए भी, लेकिन उनकी मंगेतर नीतूजी (नीतू सिंह) ने हमें समझाया कि चिंटू का कोई अफेयर नहीं है। इसके बाद हम वहां से लौट आए। बाद में फिल्म 'सौतन' की शूटिंग के बाद टीना मुनीम और राजेश खन्ना की नजदीकियों की खबरें फिल्म इंडस्ट्री में फैलने लगीं। बाद में संजय ने स्वीकार किया कि उन्हें यह बर्दाश्त नहीं हो रहा था कि टीना उन्हें छोड़कर किसी और के करीब चली जाएं। इसके बाद गुस्से में वे सीधे मेहबूब स्टूडियो पहुंच गए, जहां राजेश खन्ना शूटिंग कर रहे थे। संजय ने राजेश खन्ना के ठीक सामने कुर्सी खींचकर लगा ली और उन्हें लगातार घूरते रहे। बाद में खुद संजय ने स्वीकार किया कि अगर उस दिन राजेश खन्ना ने कुछ भी कहा होता, तो वे उन पर हमला कर देते, लेकिन राजेश खन्ना शांत बैठे रहे और कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। आखिरकार संजय वहां से लौट आए। संजय दत्त और रेखा की गुपचुप शादी की अफवाह उड़ी थी साल 1982 में अफवाह फैल गई कि संजय दत्त ने एक्ट्रेस रेखा से गुपचुप शादी कर ली। दरअसल, मशहूर फिल्म मैगजीन सिनेब्लिट्ज ने अपने कॉलम 'रिप ऑफ' में लिखा था, हमें अपने बेहद भरोसेमंद सूत्रों से पता चला है, जो होटल सी रॉक के आसपास मौजूद थे, कि संजय और रेखा ने अपनी कथित शादी के शुरुआती कुछ दिन वहीं साथ बिताए। अगर आप सोच रहे हैं कि होटल में किसी ने उन्हें क्यों नहीं देखा, तो याद रखिए कि वहां 'रूम सर्विस' जैसी सुविधा भी होती है। मैगजीन ने आगे लिखा था, संजय दत्त इन दिनों खुशी से फूले नहीं समा रहे हैं। उनकी अपनी 'कवयित्री' रेखा उनके लिए छोटी-छोटी प्रेम कविताएं लिख रही हैं, ‘तुम मेरी ताकत हो, मेरा सहारा हो, मेरे प्यारे से फूल हो।’ यासिर उस्मान की किताब के मुताबिक, इन खबरों से फिल्म इंडस्ट्री में सनसनी फैल गई। हालांकि, संजय दत्त और रेखा दोनों ने इन दावों को सिरे से खारिज कर दिया। एक इंटरव्यू में संजय ने साफ कहा था कि रेखा से मेरा कोई रिश्ता नहीं है। मेरी शादी की खबर पूरी तरह साजिश और झूठ है। यहां तक कि मेरी तथाकथित गुप्त शादी की कहानी भी गढ़ दी गई। संजय ने कहा था कि कुछ रिपोर्टों में तो यह तक लिखा गया कि शादी के 15 दिन बाद वे रेखा को अपने पिता सुनील दत्त से आशीर्वाद दिलाने ले गए, लेकिन सुनील दत्त ने उन्हें घर से बाहर निकाल दिया। संजय ने इन सभी दावों को मनगढ़ंत बताते हुए कहा था कि उन्होंने कभी रेखा से शादी नहीं की। उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें समझ नहीं आता कि उनका नाम रेखा के साथ क्यों जोड़ा जा रहा है, जबकि वे जानते हैं कि रेखा का रिश्ता फिल्म इंडस्ट्री के एक बड़े शख्स से है। संजय का मानना था कि यह अफवाह इसलिए भी फैली क्योंकि वे उस समय अस्पताल में भर्ती अमिताभ बच्चन से मिलने नहीं जा सके थे। जेल में बहनों को दो-दो रुपए के कूपन दिए थे साल था 1994 और महीना था जुलाई। अवैध रूप से हथियार रखने के मामले में संजय दत्त की अंतरिम जमानत अदालत ने रद्द कर दी और उन्हें ठाणे सेंट्रल जेल भेज दिया गया। उन्हें जेल की सबसे कड़ी सुरक्षा वाली अंडा बैरक में रखा गया। यह वही जगह थी, जहां खतरनाक अपराधियों और टाडा के आरोपियों को रखा जाता था। करीब 10x10 फीट की उस छोटी-सी कोठरी में न धूप आती थी और न ही बाहर की दुनिया दिखाई देती थी। एक छोटा-सा बल्ब, एक गद्दा और कोने में बिना फ्लश वाला शौचालय। संजय दत्त ने बाद में बताया था कि शुरुआती डेढ़ महीने तक उन्हें दूसरे कैदियों से मिलने तक की इजाजत नहीं थी। अकेलापन इतना बढ़ गया कि उन्होंने समय काटने के लिए चींटियों को घंटों चलते हुए देखना शुरू कर दिया था। बाहर पिता सुनील दत्त लगातार बेटे की जमानत के लिए नेताओं, वकीलों और अधिकारियों के चक्कर लगा रहे थे। बहनें प्रिया और नम्रता भी नियमित रूप से जेल जाती थीं, लेकिन अक्सर सिर्फ दूर से ही संजय को देख पाती थीं। वहीं, रक्षाबंधन पर बहनों ने जेल में उन्हें राखी बांधी। उस समय संजय के पास देने के लिए कोई गिप्ट नहीं था। उन्होंने अपनी बहनों को सिर्फ जेल की कैंटीन के दो-दो रुपए वाले चाय-नाश्ते के कूपन दिए और कहा था, ‘मेरे पास फिलहाल यही है।’ बेटी के एक्टिंग करने पर बोले थे- टांगें तोड़ दूंगा संजय दत्त की बड़ी बेटी त्रिशाला दत्त का जन्म 1988 में उनकी पहली पत्नी रिचा शर्मा से हुआ था। जब वह सिर्फ 8 साल की थीं, तब ब्रेन ट्यूमर के कारण उनकी मां का निधन हो गया। इसके बाद उनका पालन-पोषण न्यूयॉर्क में नाना-नानी ने किया। त्रिशाला कभी बॉलीवुड में अभिनेत्री बनना चाहती थीं, लेकिन संजय दत्त इसके सख्त खिलाफ थे। 2016 में फिल्म 'भूमि' के प्रमोशन के दौरान उन्होंने कहा था, ‘त्रिशाला एक्ट्रेस बनना चाहती थी और मैं उसकी टांगें तोड़ देना चाहता था।’ संजय दत्त ने यह भी कहा था, ‘मैंने उसे एक अच्छे कॉलेज में भेजने के लिए अपना बहुत समय और एनर्जी लगाई है। उसने फोरेंसिक साइंस में विशेषज्ञता हासिल की है और मुझे लगता है कि यह एक बेहतरीन करियर है।’ सलमान की BMW की चाबी समुद्र में फेंक दी थी संजय दत्त और सलमान खान की दोस्ती बॉलीवुड में मिसाल मानी जाती है। हालांकि, एक बार ऐसा भी हुआ था जब संजय दत्त, सलमान से नाराज हो गए थे। इस किस्से का खुलासा खुद सलमान ने रजत शर्मा के शो में किया था। सलमान ने बताया था कि सोहेल खान की फिल्म 'मैंने दिल तुझको दिया' में संजय दत्त ने दोस्ती की खातिर गेस्ट अपीयरेंस किया था। शूटिंग पूरी होने के बाद संजय दत्त सलमान के घर पहुंचे, जहां पार्टी चल रही थी। उसी दौरान सलमान के पास नई BMW M5 आई थी। वह संजय दत्त को बाहर ले गए और बोले, ‘बाबा, यह देश की पहली BMW M5 है और मैं चाहता हूं कि यह आपके पास हो।’ इतना सुनते ही संजय दत्त ने सलमान को धन्यवाद कहा, लेकिन अगले ही पल कार की चाबी उठाकर सीधे समुद्र में फेंक दी। चाबी समंदर में चली गई और क्योंकि कार की केवल एक ही चाबी थी, इसलिए वह कई दिनों तक घर के बाहर ही खड़ी रह गई। सलमान ने बताया था कि उस चाबी को ढूंढ़कर निकालने में पूरे चार दिन लगे थे। ………….. यह खबर भी पढ़ें… अमजद खान की पुण्यतिथि:डिलीवरी के बाद बीवी को घर लाने के पैसे नहीं थे; ₹1.27 करोड़ की फीस अटकी, परिवार ने अंडरवर्ल्ड की मदद ठुकराई ‘मैं वो आदमी था, जो रोज 4–5 घंटे कसरत करता था। बैडमिंटन खेलता था, फ्री-हैंड एक्सरसाइज करता था, वेट उठाता था... लेकिन फिर एक एक्सीडेंट हुआ और मैं तीन महीने तक बिस्तर पर पड़ा रहा।’ एक पुराने इंटरव्यू में दिवंगत एक्टर अमजद खान ने अपनी जिंदगी का सबसे दर्दनाक दौर याद करते हुए यह बात कही थी। पूरी खबर यहां पढ़ें…

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संजय दत्त@67: सलमान ने दी BMW, समुद्र में फेंकी चाबी:बिगड़ते देख इंदिरा गांधी ने कहा- बोर्डिंग स्कूल भेजो, राजेश खन्ना-ऋषि कपूर को पीटने पहुंचे थे

साल था 1994। मुंबई की ठाणे सेंट्रल जेल की सबसे कड़ी सुरक्षा वाली अंडा बैरक में बंद एक आरोपी रक्षाबंधन के दिन अपनी बहनों का इंतजार कर रहा था। लोहे की सलाखों के पीछे दोनों बहनों ने उसके हाथ पर राखी बांधी, लेकिन उस भाई की जेब पूरी तरह खाली थी। देने के लिए न कोई तोहफा था, न पैसे। कुछ पल तक वह चुप रहा। फिर जेल की कैंटीन से मिले दो-दो रुपए के चाय-नाश्ते के कूपन बहनों के हाथ में रख दिए और बोला, ‘मेरे पास फिलहाल यही है।’ यह वही शख्स था, जिसके नाम पर कभी सिनेमाघरों के बाहर भीड़ उमड़ती थी, जिसकी फिल्मों के पोस्टर शहरों में छाए रहते थे और जो करोड़ों लोगों का सुपरस्टार था, लेकिन वक्त ने ऐसी करवट बदली कि वही एक्टर जेल की चारदीवारी के भीतर अपनी बहनों को सिर्फ दो रुपए के कूपन ही दे सका। जी हां, हम बात कर रहे हैं बॉलीवुड के 'संजू बाबा' यानी संजय दत्त की। आज उनके 67वें जन्मदिन पर जानते हैं उनके कुछ अनसुने किस्से। इंदिरा गांधी की सलाह पर बोर्डिंग स्कूल भेजा गया संजय दत्त के जन्म के बाद सुनील दत्त और नरगिस ने अपने बेटे के नाम के लिए फिल्म पत्रिका 'शमा' के पाठकों से सुझाव मांगे थे। जिसके बाद देशभर से लगभग 15,000 से अधिक नाम आए थे। इसके बाद 'संजय' नाम आगरा की रहने वाली पुष्पा अग्रवाल ने सुझाया था। संजय बचपन से ही परिवार के सबसे लाड़ले थे। माता-पिता, नानी और रिश्तेदार उनकी हर इच्छा पूरी कर देते थे। इसी वजह से वे बेहद जिद्दी भी होते जा रहे थे। स्कूल हो या घर, हर जगह उन्हें विशेष तवज्जो मिलती थी। हालांकि, संजय सिर्फ जिद्दी नहीं थे, उनका दिल भी बहुत बड़ा था। एक बार दिल्ली में एक शादी के दौरान उन्होंने ठंड से कांप रहे एक गरीब बच्चे को अपना सूट उतारकर दे दिया था। लेकिन उनकी शरारतें परिवार की चिंता भी बढ़ा रही थीं। पत्रकार यासिर उस्मान द्वारा संजय दत्त पर लिखी गई किताब के मुताबिक छह साल की उम्र में उन्होंने पिता सुनील दत्त को सिगरेट पीते देखा और खुद भी सिगरेट पीने की जिद करने लगे। सुनील दत्त को लगा कि एक बार सिगरेट पीने के बाद बेटे का शौक खत्म हो जाएगा, लेकिन संजय ने पूरी सिगरेट पी ली। कुछ साल बाद वे घर आए मेहमानों की फेंकी हुई सिगरेट की बुझी हुई बटें बगीचे में छिपकर पीते हुए भी पकड़े गए। जिस पर पिता ने उनकी पिटाई की थी। ऐसे में सुनील दत्त को एहसास हुआ कि जरूरत से ज्यादा लाड़-प्यार और फिल्मी माहौल का संजय पर गलत असर पड़ रहा है। तभी यह फैसला किया गया कि संजय को किसी बोर्डिंग स्कूल भेज दिया जाए। इसके बाद परिवार की करीबी मित्र और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने सलाह दी कि संजय को मिलिट्री डिसिप्लिन के लिए हिमाचल प्रदेश के सनावर स्थित लॉरेंस स्कूल भेजा जाए। संजय जूतों में हेरोइन छिपाकर न्यूयॉर्क गए थे 1980 में संजय दत्त अपनी पहली फिल्म 'रॉकी' की शूटिंग में बिजी थे। इसी दौरान उनकी मां नरगिस की तबीयत बिगड़ गई और उन्हें मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में भर्ती कराया गया। नरगिस को पैंक्रियाटिक कैंसर था और उन्हें इलाज के लिए न्यूयॉर्क के मेमोरियल स्लोन केटरिंग कैंसर सेंटर ले जाना था। सुनील दत्त ने कांपती आवाज में अपने तीनों बच्चों संजय, नम्रता और प्रिया को बताया कि उनकी मां को कैंसर है। इसके बाद 'रॉकी' की शूटिंग रोक दी गई और 21 अगस्त 1980 को सुनील दत्त नरगिस को लेकर अमेरिका रवाना हो गए। न्यूयॉर्क में इलाज के दौरान नरगिस की कई सर्जरी हुईं, लेकिन ऑपरेशन के बाद लगातार खून बहने से वे कोमा में चली गईं। इसी दौरान संजय दत्त खुद भी नशे की लत से जूझ रहे थे। मां की गंभीर हालत के बावजूद वे ड्रग्स नहीं छोड़ पा रहे थे। यासिर उस्मान की किताब के मुताबिक, न्यूयॉर्क जाते समय वे अपने जूतों में करीब 30 ग्राम हेरोइन छिपाकर ले गए थे। बाद में उन्होंने स्वीकार किया था कि उस घटना को याद करके उन्हें शर्म आती है। यहां तक कि नशे की वजह से उन्हें अपनी मां के लिए खून दान करने की अनुमति भी नहीं मिली थी। 'रॉकी' के प्रीमियर में नरगिस की याद में कुर्सी खाली छोड़ी गई न्यूयॉर्क में करीब तीन महीने तक कोमा में रहने के बाद नरगिस को होश आया था। उनकी सबसे बड़ी इच्छा थी कि वे जल्द भारत लौटें और अपने बेटे की पहली फिल्म 'रॉकी' देखें। 6 मार्च 1981 को भारत लौटने के बाद 9 मार्च 1981 को सुनील दत्त उन्हें फिल्म 'रॉकी' दिखाने घर के प्रीव्यू थिएटर तक ले गए। कमजोरी के कारण वे पूरी फिल्म नहीं देख सकीं और सिर्फ सात रील देखने के बाद उन्हें वापस कमरे में ले जाना पड़ा, लेकिन जितना देखा, उससे वे बेहद खुश थीं। उन्हें विश्वास था कि उनका बेटा संजू बड़ा स्टार बनेगा। वहीं, संजय की डेब्यू फिल्म 'रॉकी' का प्रीमियर 7 मई 1981 को तय किया गया था। प्रीमियर से ठीक चार दिन पहले, 3 मई 1981 को नरगिस का निधन हो गया। इसके बाद फिल्म के प्रीमियर के दौरान सुनील दत्त ने थिएटर में संजय दत्त के बगल वाली कुर्सी नरगिस की याद में खाली रखी थी। ऋषि कपूर-राजेश खन्ना को पीटने पहुंच गए थे फिल्म 'रॉकी' की शूटिंग के दौरान संजय दत्त और एक्ट्रेस टीना मुनीम के बीच प्यार हुआ। इस रिश्ते में संजय बेहद पजेसिव बॉयफ्रेंड थे। दोनो का अफेयर लगभग 2 साल तक चला था। यासिर उस्मान की किताब के मुताबिक, फिल्म 'कर्ज' में टीना मुनीम ऋषि कपूर के साथ काम कर रही थीं। तब दोनों के बीच प्रेम संबंध होने की अफवाहें फैल गई थीं। इससे संजय इतने गुस्से में आ गए कि वे ऋषि कपूर की पिटाई करने के इरादे से उनके घर पहुंच गए थे। संजय ने एक्टर गुलशन ग्रोवर से भी अपने साथ चलने को कहा। गुलशन ने बाद में बताया था, संजय और मैं भाइयों जैसे थे। एक दिन उसने मुझसे कहा, 'चलो चिंटू (ऋषि कपूर) के घर चलते हैं, उसकी पिटाई करनी है।' हम वहां गए भी, लेकिन उनकी मंगेतर नीतूजी (नीतू सिंह) ने हमें समझाया कि चिंटू का कोई अफेयर नहीं है। इसके बाद हम वहां से लौट आए। बाद में फिल्म 'सौतन' की शूटिंग के बाद टीना मुनीम और राजेश खन्ना की नजदीकियों की खबरें फिल्म इंडस्ट्री में फैलने लगीं। बाद में संजय ने स्वीकार किया कि उन्हें यह बर्दाश्त नहीं हो रहा था कि टीना उन्हें छोड़कर किसी और के करीब चली जाएं। इसके बाद गुस्से में वे सीधे मेहबूब स्टूडियो पहुंच गए, जहां राजेश खन्ना शूटिंग कर रहे थे। संजय ने राजेश खन्ना के ठीक सामने कुर्सी खींचकर लगा ली और उन्हें लगातार घूरते रहे। बाद में खुद संजय ने स्वीकार किया कि अगर उस दिन राजेश खन्ना ने कुछ भी कहा होता, तो वे उन पर हमला कर देते, लेकिन राजेश खन्ना शांत बैठे रहे और कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। आखिरकार संजय वहां से लौट आए। संजय दत्त और रेखा की गुपचुप शादी की अफवाह उड़ी थी साल 1982 में अफवाह फैल गई कि संजय दत्त ने एक्ट्रेस रेखा से गुपचुप शादी कर ली। दरअसल, मशहूर फिल्म मैगजीन सिनेब्लिट्ज ने अपने कॉलम 'रिप ऑफ' में लिखा था, हमें अपने बेहद भरोसेमंद सूत्रों से पता चला है, जो होटल सी रॉक के आसपास मौजूद थे, कि संजय और रेखा ने अपनी कथित शादी के शुरुआती कुछ दिन वहीं साथ बिताए। अगर आप सोच रहे हैं कि होटल में किसी ने उन्हें क्यों नहीं देखा, तो याद रखिए कि वहां 'रूम सर्विस' जैसी सुविधा भी होती है। मैगजीन ने आगे लिखा था, संजय दत्त इन दिनों खुशी से फूले नहीं समा रहे हैं। उनकी अपनी 'कवयित्री' रेखा उनके लिए छोटी-छोटी प्रेम कविताएं लिख रही हैं, ‘तुम मेरी ताकत हो, मेरा सहारा हो, मेरे प्यारे से फूल हो।’ यासिर उस्मान की किताब के मुताबिक, इन खबरों से फिल्म इंडस्ट्री में सनसनी फैल गई। हालांकि, संजय दत्त और रेखा दोनों ने इन दावों को सिरे से खारिज कर दिया। एक इंटरव्यू में संजय ने साफ कहा था कि रेखा से मेरा कोई रिश्ता नहीं है। मेरी शादी की खबर पूरी तरह साजिश और झूठ है। यहां तक कि मेरी तथाकथित गुप्त शादी की कहानी भी गढ़ दी गई। संजय ने कहा था कि कुछ रिपोर्टों में तो यह तक लिखा गया कि शादी के 15 दिन बाद वे रेखा को अपने पिता सुनील दत्त से आशीर्वाद दिलाने ले गए, लेकिन सुनील दत्त ने उन्हें घर से बाहर निकाल दिया। संजय ने इन सभी दावों को मनगढ़ंत बताते हुए कहा था कि उन्होंने कभी रेखा से शादी नहीं की। उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें समझ नहीं आता कि उनका नाम रेखा के साथ क्यों जोड़ा जा रहा है, जबकि वे जानते हैं कि रेखा का रिश्ता फिल्म इंडस्ट्री के एक बड़े शख्स से है। संजय का मानना था कि यह अफवाह इसलिए भी फैली क्योंकि वे उस समय अस्पताल में भर्ती अमिताभ बच्चन से मिलने नहीं जा सके थे। जेल में बहनों को दो-दो रुपए के कूपन दिए थे साल था 1994 और महीना था जुलाई। अवैध रूप से हथियार रखने के मामले में संजय दत्त की अंतरिम जमानत अदालत ने रद्द कर दी और उन्हें ठाणे सेंट्रल जेल भेज दिया गया। उन्हें जेल की सबसे कड़ी सुरक्षा वाली अंडा बैरक में रखा गया। यह वही जगह थी, जहां खतरनाक अपराधियों और टाडा के आरोपियों को रखा जाता था। करीब 10x10 फीट की उस छोटी-सी कोठरी में न धूप आती थी और न ही बाहर की दुनिया दिखाई देती थी। एक छोटा-सा बल्ब, एक गद्दा और कोने में बिना फ्लश वाला शौचालय। संजय दत्त ने बाद में बताया था कि शुरुआती डेढ़ महीने तक उन्हें दूसरे कैदियों से मिलने तक की इजाजत नहीं थी। अकेलापन इतना बढ़ गया कि उन्होंने समय काटने के लिए चींटियों को घंटों चलते हुए देखना शुरू कर दिया था। बाहर पिता सुनील दत्त लगातार बेटे की जमानत के लिए नेताओं, वकीलों और अधिकारियों के चक्कर लगा रहे थे। बहनें प्रिया और नम्रता भी नियमित रूप से जेल जाती थीं, लेकिन अक्सर सिर्फ दूर से ही संजय को देख पाती थीं। वहीं, रक्षाबंधन पर बहनों ने जेल में उन्हें राखी बांधी। उस समय संजय के पास देने के लिए कोई गिप्ट नहीं था। उन्होंने अपनी बहनों को सिर्फ जेल की कैंटीन के दो-दो रुपए वाले चाय-नाश्ते के कूपन दिए और कहा था, ‘मेरे पास फिलहाल यही है।’ बेटी के एक्टिंग करने पर बोले थे- टांगें तोड़ दूंगा संजय दत्त की बड़ी बेटी त्रिशाला दत्त का जन्म 1988 में उनकी पहली पत्नी रिचा शर्मा से हुआ था। जब वह सिर्फ 8 साल की थीं, तब ब्रेन ट्यूमर के कारण उनकी मां का निधन हो गया। इसके बाद उनका पालन-पोषण न्यूयॉर्क में नाना-नानी ने किया। त्रिशाला कभी बॉलीवुड में अभिनेत्री बनना चाहती थीं, लेकिन संजय दत्त इसके सख्त खिलाफ थे। 2016 में फिल्म 'भूमि' के प्रमोशन के दौरान उन्होंने कहा था, ‘त्रिशाला एक्ट्रेस बनना चाहती थी और मैं उसकी टांगें तोड़ देना चाहता था।’ संजय दत्त ने यह भी कहा था, ‘मैंने उसे एक अच्छे कॉलेज में भेजने के लिए अपना बहुत समय और एनर्जी लगाई है। उसने फोरेंसिक साइंस में विशेषज्ञता हासिल की है और मुझे लगता है कि यह एक बेहतरीन करियर है।’ सलमान की BMW की चाबी समुद्र में फेंक दी थी संजय दत्त और सलमान खान की दोस्ती बॉलीवुड में मिसाल मानी जाती है। हालांकि, एक बार ऐसा भी हुआ था जब संजय दत्त, सलमान से नाराज हो गए थे। इस किस्से का खुलासा खुद सलमान ने रजत शर्मा के शो में किया था। सलमान ने बताया था कि सोहेल खान की फिल्म 'मैंने दिल तुझको दिया' में संजय दत्त ने दोस्ती की खातिर गेस्ट अपीयरेंस किया था। शूटिंग पूरी होने के बाद संजय दत्त सलमान के घर पहुंचे, जहां पार्टी चल रही थी। उसी दौरान सलमान के पास नई BMW M5 आई थी। वह संजय दत्त को बाहर ले गए और बोले, ‘बाबा, यह देश की पहली BMW M5 है और मैं चाहता हूं कि यह आपके पास हो।’ इतना सुनते ही संजय दत्त ने सलमान को धन्यवाद कहा, लेकिन अगले ही पल कार की चाबी उठाकर सीधे समुद्र में फेंक दी। चाबी समंदर में चली गई और क्योंकि कार की केवल एक ही चाबी थी, इसलिए वह कई दिनों तक घर के बाहर ही खड़ी रह गई। सलमान ने बताया था कि उस चाबी को ढूंढ़कर निकालने में पूरे चार दिन लगे थे। ………….. यह खबर भी पढ़ें… अमजद खान की पुण्यतिथि:डिलीवरी के बाद बीवी को घर लाने के पैसे नहीं थे; ₹1.27 करोड़ की फीस अटकी, परिवार ने अंडरवर्ल्ड की मदद ठुकराई ‘मैं वो आदमी था, जो रोज 4–5 घंटे कसरत करता था। बैडमिंटन खेलता था, फ्री-हैंड एक्सरसाइज करता था, वेट उठाता था... लेकिन फिर एक एक्सीडेंट हुआ और मैं तीन महीने तक बिस्तर पर पड़ा रहा।’ एक पुराने इंटरव्यू में दिवंगत एक्टर अमजद खान ने अपनी जिंदगी का सबसे दर्दनाक दौर याद करते हुए यह बात कही थी। पूरी खबर यहां पढ़ें…

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Update: Baltic shipwreck champagne was destined for Tsar Alexander II

Meticulous research into the bottles of champagne found in a shipwreck discovered in the Baltic sea south of the Swedish island of Öland in July 2024, has uncovered that they were destined for the table of Tsar Alexander II.

The well-preserved remains of the 19th century ship were found 190 feet deep by technical divers from the Baltictech Association. The ship stayed upright when it sank to the seabed, and the cold waters of the Baltic were ideal storage conditions for dozens of glass wine bottles and stoneware Selters mineral water bottles.

An expert in historic pottery identified the stamp on the Selters bottles as the emblem of the German Duchy of Nassau which the company used on its labels between 1836 and 1866. The cork on one of the Champagne bottles bore the faint imprint of Louis Roederer Champagne House of Reims.

Baltictech returned to the wreck site for a follow-up dive in 2025. They recovered a ceramic plate of the British Davenport company which could be dated to 1856. Since the plates didn’t linger in inventory, the ship must have begun its ill-fated voyage in late 1856 or early 1857.

All of this information helped Baltictech researchers to identify the ship as one sent by Adolf, Duke of Nassau, to Tsar Alexander. It was laden with champagne, mineral water, wine leather hides and porcelain. The champagne was an official state gift for the Tsar, who had ascended the throne when the Baltic was under blockade by Britain during the Crimean War. When Russia signed a treaty that ended the war in 1856, the blockade was lifted and heads of state like the Duke of Nassau hastened to reestablish relations.

The team reached out to Louis Roederer to find out more about the bottles, perform chemical analyses of the liquid inside the bottle and advise them on recovering a few samples. As luck would have it, one of Roederer’s champagne experts, Peter Liem, is also an experienced technical diver, so he was able to go down to the wreck and point specific bottles to recover. One was tested in Sweden, and several sent to Louis Roederer Champagne House in Reims for analysis.

The champagne contains 110 grams of sugar per liter and 12% alcohol and it is not just still drinkable, according to Peter Liem, it is “glorious:”

[P]atinated, authoritative, and immeasurably complex, this wine is not only alive, but downright vibrant and delicious to drink. It’s reminiscent of shiitake, saffron, kombu, saddle leather, cigar box, roasted coffee, with a fervent vitality and piercing intensity like a great amontillado. We believe that it’s from the 1857 vintage, although we are continuing to try to verify this for certain: if so, it was on its way to Tsar Alexander II in St. Petersburg.

Baltictech has requested a permit for a third exploration of the wreck. They hope to locate the ship’s bell and to excavate deep into the lowest levels of the cargo hold, looking for objects mentioned in the ship’s manifest that have yet to be found.



* This article was originally published here

Bill Oddie: Comedian who found nature a welcome refuge from mental illness

One of Britain's best known comedians and naturalists, his life was plagued by bouts of acute depression which saw many visits to psychiatric hospitals.

from BBC News https://ift.tt/ePGW24E

Bill Oddie: Comedian who found nature a welcome refuge from mental illness

One of Britain's best known comedians and naturalists, his life was plagued by bouts of acute depression which saw many visits to psychiatric hospitals.

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Archaeologists find gold in rubble at Vindonissa

The excavation of the site of Vindonissa, the first Roman military camp in Switzerland, has uncovered remains from the early formative period of the ancient camp, including the southern timber-and-earth wall, the legionary barracks building and the forge of the field smithy.

The southern defensive wall, located 230 feet from the wall of a later fortress, is long enough to give archaeologists new evidence of the size and layout of the first camp. The barracks was discovered in the west of the site under a later road. It was a structure 30 feet wide and at least 100 feet long. It had regularly-arranged rooms and ante-chambers. This was where the first legionaries who arrived in Switzerland lived before the construction of the permanent fortress.

Other structures found include the remains of a small building just inside the first camp wall that was likely a small workshop. Next to it was an even older building from Vindonissa’s first phase containing the hearth of a field forge.

Notable artifacts were discovered in debris layers outside the later permanent fortress walls. They include coins ranging in date from the Roman Republic through Late Antiquity, blacksmithing equipment, leatherworking tools and one stone of a Roman mill. Two metal fittings believed to be the handles of a scalpel, one carved in the shape of animal head, are now being conserved in the restoration laboratory.

One of the coins was unexpectedly valuable: a gold aureus minted during the reign of Tiberius. Coin finds at the site are typically bronze and silver. Another valuable object is a carnelian intaglio carved with an image of Victoria, goddess of victory, holding her staff and wreath.



* This article was originally published here

Decoding Charli XCX's new album, Music, Fashion, Film

The star's new album strips away artifice to examine her life after the phenomenal success of Brat.

from BBC News https://ift.tt/7gASuPt

5,000-year-old spear-throwers used to hunt camelids in Chile

Wooden hunting tools discovered in an ancient settlement in northern Chile’s Atacama Desert have been identified as spear-throwers used by the coastal peoples to hunt wild camelids. A recent study has reexamined them and the radiocarbon results date them to around 5,000 years ago. Archaeologists believe they were used to hunt guanacos and vicuñas, wild relatives of llamas who inhabited the area.

The spear-throwers from Caleta Huelén 42 analysed in new study. Photo courtesy Ballester, B., & de Souza, P. (2026).

A variety of wooden objects were discovered during excavations at Caleta Huelén 42 archaeological site between 1971 and 1973. The settlement was at the mouth of the Loa River, just a half mile from the Pacific coast. The Atacama Desert, one of the world’s driest, meets the ocean there. The arid conditions preserved organize materials, including 12 carved wood objects and other tools employed by the Late Archaic marine hunter-gatherers who lived there between 6000 and 4000 years ago.

Under dwelling floors and in densely-packed middens, archaeologists unearthed collective burials with grave goods including textiles, pipes and hunting tools, plus tools used to catch fish including fishing line, hooks, harpoons and weights.

The most complete example from Caleta Huelén 42 is approximately 28 centimetres long. It retains a carefully shaped handle and part of a bone hook secured with a loop of leather or sinew.

Seven of the nine studied objects share a recognisable design: a defined handle, a flattened central body and a narrower projection that once held or supported the dart. Some contain grooves that may have helped position the projectile, while two have small perforations near their handles, possibly for attaching a cord or improving the hunter’s grip.

They were not simple pieces of carved wood. Their makers combined dense hardwood with bone hooks, leather or sinew bindings and, in some cases, red pigment. The surfaces were scraped or polished until they became smooth and regular. The variety of components visible in the collection shows that these were carefully assembled technical instruments rather than roughly fashioned sticks.

That raised the question of what spear-throwers would have been used for by people who fished hunted marine animals. They already had specialized harpoons. Land animals, camelids specifically, were native to the region and their remains have been found at other coastal sites.

Some of their bones were transformed into tools used in the maritime economy, including components for harpoons and fishhooks. Hunting animals inland may therefore have supported life at the coast in ways that extended far beyond food.

Evidence from the interior Andes strengthens this interpretation. Rock art and archaeological finds show hunters using darts and spear-throwers to capture camelids. Similarities between the Chilean objects and a spear-thrower found roughly 500 kilometres away near the Doncellas River in north-western Argentina may also reflect exchanges of knowledge between coastal and inland communities.



* This article was originally published here

BBC's Fake or Fortune uncovers 'enormously important' painting worth £100,000

The painting by the 18th Century Scottish artist Katherine Read is thought to be worth more than £100,000.

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BBC's Fake or Fortune uncovers 'enormously important' painting worth £100,000

The painting by the 18th Century Scottish artist Katherine Read is thought to be worth more than £100,000.

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