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Phallus fingernail cleaner found in Gloucestershire

Of the many, many, MANY Roman phallus finds I’ve written about over the years, this is a first: a Roman nail cleaner on one end and a phallus on the other. It was discovered near Cheltenham in Gloucestershire, during a preventative archaeology excavation ahead of improvements to the M5 highway junction.

The fingernail cleaner has a flat blade, rectangular in cross-section, with a groove running down the center of its full length that opens to a double-pronged terminal. The forked end was used to clean under fingernails. The top of the blade is mounted to the base of the phallus, welcomed by a pair of spherical testicles. The shaft the phallus tapers in slightly from the wider base, then widens again at the glans. A hanging loop is mounted on the top side of the phallus about midway down the shaft.

This type of cleaner dates to around 300-400 A.D. and examples of them have been found in Gloucestershire, Leicestershire and Lincolnshire. None of them had a phallus attached however, which makes this tool perform a double function. It’s both a fingernail cleaner and a talisman that protects the wearer. In Roman culture, phalluses were believed to hold apotropaic powers: the power to ward off evil, curses and bad luck.

A second notable late Roman artifact was unearthed near the phallic manicure tool: a copper alloy belt buckle. A long rectangular plate of sheet metal was bent around the flat part of a D-shaped buckle and riveted together at the ends with two rivets. This design allows the buckle to rotate in the looped plate and move comfortably when worn.

The plate is decorated with a border of overlapping dots to create what looks like a straight line. Open circles with dots in the center are stamped all along the border lines. The center of the plate is stamped with the same circle and dot motif, but this time they’re placed in rows of two and three and connected with straight lines. This gives it a foliate, vine-line look. The apex of the curved side of the D is also stamped with circle and dots and a lozenge shape.



* This article was originally published here

'अभी तो उसको एक थप्पड़ पड़ा है':संजय सिंह ने कंगना रनोट पर साधा निशाना, बोले- जेपी नड्डा जी अपनी सांसद को समझाइए

संसद में गुरुवार को आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने भाजपा सांसद कंगना रनोट का नाम लिए बिना उन पर निशाना साधा। संजय सिंह ने सदन में कहा, "इनकी एक सांसद हैं। उन्होंने किसान आंदोलन में किसानों को गालियां दीं। नौजवानों के आंदोलन में नौजवानों के लिए इतनी भद्दी टिप्पणी की, मान्यवर, इस सदन के अंदर मैं कह नहीं सकता।" उन्होंने आगे कहा, "हमारी बच्चियों के चरित्र के ऊपर सवाल उठाया गया।" इसके बाद संजय सिंह ने कहा, "मैं जेपी नड्डा जी से निवेदन करना चाहता हूं, समझाइए अपने उस सांसद को।" अपने भाषण के दौरान संजय सिंह ने कहा, "अभी तो उसको एक थप्पड़ पड़ा। सिर्फ पांच उंगलियों के निशान पड़े थे। ऐसी बात करोगे... तो तुम्हारी सरकार को इस देश का नौजवान... पकड़ के गटर में डालने का काम करेगा।" कंगना ने क्या कहा था दरअसल, हाल ही में कंगना ने एक इंस्टाग्राम स्टोरी में लिखा था, "सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात युवा हिंदू महिलाओं का व्यवहार है। वे स्वतंत्र और करियर बनाने वाली महिलाओं की जिंदगी की नकल करना चाहती हैं, लेकिन उस आजादी को कमाना नहीं चाहतीं। जो महिलाएं वास्तव में स्वतंत्र होती हैं, वे विद्रोही फैसले लेती हैं, बेबाक राय रखती हैं, परंपराओं से हटकर करियर चुनती हैं और अपने हर फैसले की जिम्मेदारी भी खुद उठाती हैं, क्योंकि वे अपने दम पर जीवन जीती हैं। वे यह सब अपने माता-पिता या परिवार की कीमत पर नहीं करतीं। यह तथाकथित पश्चिमी सोच वाली भारतीय महिलाओं की नई पीढ़ी है, जिन्हें मैं 'जनरेशन गटर' कहती हूं।" वहीं, कंगना के 'जनरेशन गटर' वाले बयान को लेकर सोनू सूद ने कहा कि अगर कंगना ने ऐसा कहा है, तो यह बहुत शर्मनाक है। मीडिया से बातचीत के दौरान सोनू सूद ने कहा कि उन्होंने कंगना का पूरा बयान नहीं सुना है, लेकिन इस तरह की बयानबाजी से बचना चाहिए। सोनू ने कहा, ये युवा ही हैं जो कलाकारों को बनाते हैं और आपको इस मुकाम तक पहुंचने में मदद करते हैं। जब तक वे आपके साथ खड़े हैं, आप आगे बढ़ते रहेंगे। पूरी खबर यहां पढ़ें… …………… कंगना रनोट से जुड़ी यह खबर भी पढ़ें… 'मैं थोड़ा-बहुत यंग ऋतिक रोशन जैसा दिखता हूं':सौरव दास बोले- दोस्त ने की तुलना, कंगना रनोट के साथ कॉफी पर जाने को तैयार हैं भाजपा सांसद और एक्ट्रेस कंगना रनोट के साथ चल रही बयानबाजी के बीच सीजेपी प्रवक्ता सौरव दास ने कहा कि उनके एक दोस्त ने उनसे कहा कि वह यंग ऋतिक रोशन जैसे दिखते हैं। पूरी खबर यहां पढ़ें…

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सोनू सूद ने बच्चों के साथ मनाया जन्मदिन:केक काटकर बांटी खुशियां, ऑफिस के बाहर उमड़े फैंस; तस्वीरें खिंचवाईं

बॉलीवुड अभिनेता और समाजसेवी सोनू सूद ने अपना जन्मदिन सादगी के साथ मनाया। मुंबई स्थित उनके कार्यालय के बाहर सुबह से ही बड़ी संख्या में प्रशंसक उन्हें बधाई देने पहुंचे। सोनू सूद ने अपने चाहने वालों से मुलाकात कर उनके प्यार और शुभकामनाओं के लिए आभार जताया। जन्मदिन का सबसे खास पल तब रहा, जब उन्होंने जरूरतमंद बच्चों के साथ केक काटकर खुशियां साझा कीं। सोनू सूद के जन्मदिन पर उनके कार्यालय के बाहर उत्सव जैसा माहौल नजर आया। अभिनेता ने सभी का अभिवादन स्वीकार किया, उनसे बातचीत की और कई लोगों के साथ तस्वीरें भी खिंचवाईं। फैंस का उत्साह दिखाता है कि सोनू सूद केवल एक अभिनेता ही नहीं, बल्कि लोगों के बीच अपनी अलग पहचान रखने वाले शख्स भी हैं। बच्चों के साथ बांटी खुशियां इस जन्मदिन की सबसे भावुक तस्वीरें उस समय सामने आईं, जब सोनू सूद ने जरूरतमंद बच्चों के साथ केक काटकर खुशियां साझा कीं। उन्होंने बच्चों के साथ समय बिताया और उन्हें अपने खास दिन का हिस्सा बनाया। यह पहल उनके सामाजिक सरोकारों और लोगों के प्रति संवेदनशीलता को दर्शाती है। समाजसेवा से बनाई अलग पहचान 30 जुलाई 1973 को पंजाब के मोगा में जन्मे सोनू सूद ने फिल्मों के साथ-साथ समाजसेवा के क्षेत्र में भी अपनी अलग पहचान बनाई है। कोरोना महामारी के दौरान जरूरतमंद लोगों की मदद कर उन्होंने लाखों लोगों का भरोसा जीता। आज भी वे शिक्षा, इलाज और रोजगार जैसी जरूरतों में लोगों की सहायता के लिए सक्रिय रहते हैं।

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मुमताज@79, अमिताभ के लिए छोड़ी मर्सिडीज:शम्मी कपूर का प्रपोजल ठुकराया लेकिन सालों बाद उनकी पत्नी के कहने पर आखिरी बार मिलने पहुंची, जानिए किस्से

70-80 के दशक की मशहूर एक्ट्रेस मुमताज आज 79 साल की हो चुकी हैं। उस दौर में मुमताज की वो पॉपुलैरिटी थी कि उनके फिल्मों में पहने गए कपड़े ट्रेंड बन जाते थे। खूबसूरती ऐसी थी कि यश चोपड़ा, शम्मी कपूर जैसे लोग भी उन्हें शादी का प्रस्ताव देने से कतराते नहीं थे। लेकिन काम और करियर के लिए जुनूनी मुमताज हर प्रस्ताव ठुकरा देती थीं। हालांकि एक समय ऐसा भी था जब कुछ बी-ग्रेड फिल्मों में काम करने की वजह से शशि कपूर, जीतेंद्र जैसे बड़े एक्टर्स उनके साथ फिल्में करने से इनकार कर दिया करते थे। आज मुमताज के बर्थडे के खास मौके पर पढ़िए, उनके करियर और जिंदगी से जुड़े कुछ अनसुने किस्से- किस्सा-1 लता मंगेशकर की गोद में बैठकर देखीं फिल्में, कहती थीं- आंटी अगली बार भी बुलाना 31 जुलाई 1947 में मुमताज का जन्म हैदराबाद के ड्रायफ्रूट वेंडर अब्दुल समाज अख्सरी के घर हुआ। परिवार ईरान से ताल्लुक रखता था। पिता ईमामों के खानदान से थे। मुमताज महज एक साल की थीं, जब माता-पिता अलग हो गए। मां ने ही फिल्मों में बतौर जूनियर आर्टिस्ट काम कर मुमताज और बड़ी बहन मलका की अकेले परवरिश की। कुछ समय बाद मां बॉम्बे आकर बसीं। मुमताज भी अक्सर उनके साथ सेट पर जातीं। सेट पर हंसती खेलतीं मुमताज को महज 5 साल की उम्र में बतौर बाल कलाकार फिल्म संसार में काम करने मिला। आगे वो चाइल्ड आर्टिस्ट के तौर पर यास्मीन (1955), सोने की चिड़िया (1958), लाजवंती (1958), तलाक (1958) जैसी कई फिल्मों में नजर आईं। फिल्मों में काम मिलने से घर की आर्थिक स्थिति सुधरी और मुमताज मां के साथ वाल्केश्वर स्थित बिल्डिंग में आकर रहने लगीं। उनके ठीक ऊपर लता मंगेशकर का घर था, जहां 16MM पर फिल्में दिखाई जाती थीं। एक ही इंडस्ट्री से होने के चलते लता नन्हीं मुमताज को काफी लाड़ देती थीं। जब भी घर में फिल्म शुरू करतीं तो मुमताज को भी घर बुला लेतीं। लता उन्हें गोद में बैठाकर फिल्म दिखातीं और वो जल्द ही सो जाती थीं। लेकिन जाते हुए हर बार कहतीं- आंटी जब भी फिल्म देखो, मुझे भी बुला लेना। कई बार तो लता मंगेशकर के भाई उन्हें सोती हुई हालत में घर छोड़ने जाते थे। किस्सा-2 सेट पर मिली मां की मौत की खबर, डायरेक्टर से पूछा- क्या मैं जा सकती हूं दिन भर फिल्मों के सेट पर बिताते हुए जल्द ही उन्होंने परिवार की जिम्मेदारी उठानी शुरू कर दी। 12 की उम्र में उन्हें जमीन के तारे (1960) में कैरेक्टर रोल मिल गया। इस फिल्म में उनकी परफॉर्मेंस देखने के बाद मशहूर डायरेक्टर वी.शांताराम ने उन्हें फिल्म स्त्री में अच्छा रोल दिया। एक दिन मुमताज फिल्म स्त्री के सेट पर पहुंचीं। मुमताज डांस का शॉट दे ही रही थीं कि घर से खबर आई- ‘मां नहीं रहीं।’ 13 साल की मुमताज चुप खड़ी हो गईं और थोड़ी देर बाद डायरेक्टर वी.शांताराम से कहा- 'क्या करूं अन्ना?' वी.शांताराम हड़बड़ाए और कहा- ‘तुम्हें जरूर जाना चाहिए।’ मुमताज तुरंत हैदराबाद के लिए रवाना हुईं। जनाजे में शामिल हुईं और अगले दिन ही फिर सेट पर आ गईं। इस पर मुमताज ने रेडियो नशा को दिए इंटरव्यू में कहा था, उस जमाने में कोई मर भी जाए और अगर प्रोड्यूसर का सेट लगा है, तो आपको जाना ही पड़ेगा। आप प्रोड्यूसर को कंगाल नहीं कर सकते, क्योंकि उनके बाद दूसरे प्रोड्यूसर का सेट लगना है। किस्सा- 3 महमूद ने खूबसूरती देख फिल्म ऑफर की, शशि कपूर ने बी-ग्रेड एक्ट्रेस कहकर ठुकराया 14 साल की उम्र में मुमताज ने फिल्म गहरा दाग में काम किया था। फिल्म में उन्होंने हीरो राजेंद्र कुमार की बहन का रोल किया था। इसी समय उन्हें 1963 की फिल्म फौलाद में रेसलर दारा सिंह के साथ पहला लीड रोल मिला। दारा सिंह का कद देखकर कोई हीरोइन काम करने के लिए तैयार नहीं थीं, ऐसे में मुमताज को ये रोल दिया गया। जोड़ी हिट रही और फिर मुमताज को दारा सिंह के साथ एक के बाद एक कुल 16 फिल्में मिलीं। इन फिल्मों के अलावा मुमताज ने कई बी-ग्रेड फिल्मों में भी काम किया, हालांकि उन्हें खास पहचान नहीं मिली। मुमताज की बड़ी बहन मलका भी फिल्मों में आईं और कॉमेडियन-एक्टर महमूद के साथ कई फिल्में कीं। एक दिन महमूद काम के सिलसिले में मलका से मिलने पहुंचे, तो उनकी नजर मुमताज पर पड़ी। देखने में बेहद खूबसूरत मुमताज को वो एक टक देखते रहे। जब महमूद को फिल्म प्यार किए जा में शशि कपूर, किशोर कुमार के साथ कास्ट किया गया, तो उन्होंने अपने अपोजिट मुमताज को ही कास्ट किया। हालांकि फिल्म में उनका रोल छोटा था। एक दिन फिल्म की शूटिंग के दौरान महमूद ने शशि कपूर से कहा कि वो अपनी आने वाली फिल्मों में मुमताज को कास्ट करें। शशि कपूर ने तल्ख अंदाज में जवाब दिया, नहीं, मैं उस एक्ट्रेस को कभी अपनी हीरोइन नहीं बनाऊंगा, जिसने दारा सिंह के साथ बी-ग्रेड फिल्म की। किसे पता था कि ये बी-ग्रेड फिल्मों की वो एक्ट्रेस जल्द ही टॉप और हाईएस्ट पेड एक्ट्रेस बन जाएगी। किस्सा- 4 महमूद की जिद पर दिलीप कुमार की हीरोइन बनीं मुमताज प्यार किए जा फिल्म में साथ काम करने के बाद महमूद अपनी हर फिल्म में मुमताज को अपोजिट रोल देने लगे। वो भांप चुके थे कि मुमताज में टॉप एक्ट्रेस बनने का हुनर और जज्बा है। वो दूसरे हीरो को भी मुमताज के साथ काम करने की सलाह देते थे। जब महमूद को पता चला कि दिलीप कुमार फिल्म राम और श्याम कर रहे हैं, जिसमें उनका डबल रोल है, तो वो सीधे मुमताज की सिफारिश करने पहुंच गए। तब दिलीप कुमार आरके स्टूडियो में शूट कर रहे थे। महमूद उनके पास गए और कहा- एक नई लड़की है, बहुत टैलेंटेड है, उसके साथ काम कर लीजिए। दिलीप कुमार ने जवाब दिया- ‘अभी मैं व्यस्त हूं, लंच ब्रेक में लड़की की फोटो लेकर आना।’ महमूद हड़बड़ाहट में एक स्टूडियो गए और मुमताज के गाने की पूरी रील उठा लाए। लंच ब्रेक में उन्होंने दिलीप कुमार को मुमताज की रील दिखाई तो उन्होंने कहा- ‘यार महमूद, लड़की तो बहुत अच्छी दिखती है, खूबसूरत है, डांस भी करती है, बड़ी प्यारी लड़की है। मैं करूंगा। डबल रोल है, एक वहीदा है, दूसरी मुमताज होगी।’ फिल्म राम और श्याम हिट रही और मुमताज को देशभर में पहचान मिल गई। किस्सा- 5 जीतेंद्र ने साथ काम करने से किया इनकार, डायरेक्टर बोले- ऐतराज है तो हीरो बदलूंगा, हीरोइन नहीं फिल्म राम और श्याम रिलीज होने से पहले मुमताज को फिल्म बंद जो बन गए मोती (1967) में काम मिला, जीतेंद्र और डायरेक्टर वी.शांताराम की बेटी राजश्री लीड रोल में थीं और मुमताज को साइड रोल मिला था। फिल्म की शूटिंग शुरू होने से ठीक पहले राजश्री की शादी तय हो गई और उन्होंने फिल्म छोड़ दी। ऐसे में वी.शांताराम ने मुमताज को ही फिल्म में लीड रोल दिया। जैसे ही ये खबर जीतेंद्र को मिली, तो उन्होंने तुरंत डायरेक्टर को कॉल कर ऐतराज जताया। उन्होंने कहा- ‘उसको हीरोइन क्यों बनाया, कोई और हीरोइन ढूंढिए।’ जवाब मिला- ‘हीरोइन तो मुमताज ही होगी, आपको दिक्कत है, तो आप फिल्म छोड़ दो।’ वो वी.शांताराम ही थे, जिन्होंने जीतेंद्र को हीरो बनाया था, तो जीतेंद्र को मजबूरन फिल्म करनी ही पड़ी। इसी तरह साल 1969 की फिल्म दो रास्ते में शशि कपूर को कास्ट किया गया। बाद में जब मुमताज की कास्टिंग हुई तो शशि कपूर ने फिल्म छोड़ दी। इस फिल्म में बाद में राजेश खन्ना को साइन किया गया। फिल्म का गाना बिंदिया चमकेगी, चूड़ी खनकेगी काफी हिट हुआ था। किस्सा-6 अमिताभ के लिए छोड़ दी अपनी मर्सिडीज अमिताभ बच्चन इंडस्ट्री में नए थे, जब उन्हें मुमताज के साथ फिल्म बंधे हाथ में काम मिला। मुमताज तब काफी पॉपुलर हो चुकी थीं। उनकी कामयाबी का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जब अमिताभ बच्चन साधारण कार से आते थे, तब मुमताज मर्सिडीज से सेट पर आती थीं। अमिताभ को उनकी कार बहुत पसंद थी। एक दिन उन्होंने साथ काम करने वालों से कहा- मुझे ये कार पसंद है, देखना एक दिन मैं भी मर्सिडीज चलाऊंगा। किसी तरह ये बाद मुमताज के कानों तक पहुंची। उस दिन जब वो शूटिंग पूरी कर निकलीं, तो अमिताभ की कार ले गईं और अपनी वहीं सेट पर छोड़ दी। अमिताभ बाहर आए, तो उन्हें अपनी कार नहीं मिली। आसपास पूछा, तो गार्ड ने बताया कि मुमताज अपनी कार आपके लिए छोड़ गई हैं, जिससे आप इसे चला लें। अमिताभ उनकी कार घर ले गए और इस तरह मुमताज ने अमिताभ की इच्छा पूरी कर दी। किस्सा- 7 शम्मी कपूर ने प्रपोज किया, तो राज कपूर ने मेरा नाम जोकर से निकाला हिट फिल्में देते हुए मुमताज बड़ी एक्ट्रेस बन गईं। इसी समय 1968 में उन्हें शम्मी कपूर के साथ फिल्म ब्रह्मचारी में कास्ट किया गया। साथ काम करते हुए दोनों एक दूसरे को पसंद करने लगे।। रिलीज के बाद फिल्म सुपरहिट हुई और इसके गाने आज कल तेरे मेरे प्यार के चर्चे, चक्के में चक्का, चक्के पे गाड़ी काफी हिट हुए। फिल्म रिलीज के कुछ समय बाद शम्मी कपूर और मुमताज रिलेशनशिप में आ गए। कुछ समय बाद शम्मी कपूर ने उन्हें शादी का प्रस्ताव दिया। मुमताज भी शादी करना चाहती थीं, लेकिन राज कपूर ने शर्त रखी कि अगर शादी करनी है, तो मुमताज को फिल्मों में काम करना बंद करना पड़ेगा, हमारे घर की बहुएं काम नहीं करेंगी। मुमताज उस समय करियर के पीक पर थीं और घर की जिम्मेदारी होने के चलते वो काम नहीं छोड़ना चाहती थीं। शम्मी कपूर ने उनके परिवार को आर्थिक मदद देने का वादा भी किया, लेकिन मुमताज ने करियर के लिए प्यार की कुर्बानी दे दी। जिस समय मुमताज और शम्मी कपूर की शादी की बात चल रही थी, तभी राज कपूर ने उन्हें फिल्म मेरा नाम जोकर में फिरंगी महिला के रोल में कास्ट किया था। जैसे ही उन्हें पता चला कि शम्मी उनसे शादी करना चाहते हैं, राज कपूर ने मुमताज को फिल्म से निकाल दिया। राज कपूर ने मुमताज से कहा था- मैं तुम्हें नहीं ले सकता। घर के लोगों को ऐसा खुला रोल नहीं दूंगा। मुमताज की जगह बाद में रशियन एक्ट्रेस सेनिया को कास्ट किया गया था। किस्सा- 8 फिल्म में देव आनंद की बहन बनने से किया इनकार मुमताज ने 1971 की फिल्म तेरे मेरे सपने में देव आनंद के साथ काम किया। कुछ साल बाद उन्हें फिल्म हरे रामा हरे कृष्णा मिली, लेकिन कहा गया कि उन्हें देव साहब की बहन का किरदार निभाना है। मुमताज ने तुरंत मना कर दिया। कहा- मैं इतने रोमांटिक हीरो की बहन का रोल हरगिज नहीं करूंगी। उनकी ये बात सुनकर देव आनंद खूब हंसे और कहा- फिल्म में काम तो तुम करोगी, लेकिन मेरी हीरोइन बन कर। बाद में जीनत अमान को बहन का रोल दिया गया और मुमताज ने देव आनंद के साथ लीड रोल किया। ये फिल्म जबरदस्त हिट रही थी। किस्सा- 9 दूसरे हीरो के साथ काम करने पर नाराज हो जाते थे राजेश खन्ना राजेश खन्ना और मुमताज की दोस्ती बहुत गहरी थी। जब कभी मुमताज किसी दूसरे एक्टर के साथ फिल्म साइन कर लेतीं तो राजेश खन्ना इस बात से नाराज हो जाते थे। इस पर मुमताज उनसे कहतीं- आप भी तो दूसरी एक्ट्रेस के साथ फिल्में साइन कर लेते हैं, मैं तो नाराज नहीं होती। अपनी इसी आदत से वो राजेश खन्ना को मना लेती थीं। किस्सा-10 24 की उम्र में शादी कर छोड़ी फिल्में, ससुराल ने काम करने से रोका मुमताज करियर के पीक पर थीं, जब घरवालों ने उनका रिश्ता युगांडा के रईस बिजनेसमैन मयूर माधवानी से तय कर दिया। रूढ़िवादी मुस्लिम परिवार में जल्दी शादी करवाने का रिवाज था। घरवालों ने दबाव दिया, तो मुमताज न नहीं कह सकीं। उन्होंने ज्यादातर फिल्मों का साइनिंग अमाउंट लौटा दिया और जो अधूरी फिल्में थीं, उनकी शूटिंग पूरी की। 1974 में उनकी मयूर से शादी हुई और वो युगांडा जाकर बस गईं। शादी से पहले ही उनके पति के भाई ने साफ कह दिया कि मुमताज को फिल्मों में काम करना छोड़ना होगा। शादी के बाद उनका 3-4 बार मिसकैरेज हुआ था। उनकी दो बेटियां हैं, जिनका नाम नताशा और तान्या है। उनकी बड़ी बेटी नताशा की शादी एक्टर फरदीन खान से हुई है। फरदीन के पिता फिरोज खान और मुमताज करीबी दोस्त हैं। किस्सा- 11 मौत से पहले शम्मी कपूर ने रखी मुमताज से मिलने की इच्छा, मिलीं तो रो पड़ीं साल 2010 में मुमताज भारत में थीं, जब उनके पास शम्मी कपूर की पत्नी नीला देवी का कॉल आया। नीला ने उन्हें कहा कि शम्मी कपूर की इच्छा है कि आप उनकी बर्थडे पार्टी में आएं। मुमताज ने जवाब दिया- मैं जरूर आऊंगी। जैसे ही वो पार्टी में पहुंची, तो देखा शम्मी कपूर शराब पी रहे हैं। इस बात की जानकारी फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े हर शख्स को थी कि शम्मी कपूर की तबीयत कई महीनों से बिगड़ी हुई है। मुमताज पास पहुंचीं और कहा- ‘अगर आपकी तबीयत ठीक नहीं है तो आप शराब क्यों पी रहे हैं।’ शम्मी कपूर ने जवाब में कहा- ‘मैं ज्यादा दिनों तक नहीं जीने वाला।’ मुमताज को उस दिन ही पता चला कि शम्मी कपूर चंद महीनों के ही मेहमान हैं। वो भावुक हो गईं और कहा- ‘आप पी सकते हैं। एंजॉय योरसेल्फ। ’ कुछ देर बाद मुमताज वहां से चली गईं। जाते हुए बस कहा- ‘अपना ख्याल रखना।’

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मुमताज@79, अमिताभ के लिए छोड़ी मर्सिडीज:शम्मी कपूर का प्रपोजल ठुकराया लेकिन सालों बाद उनकी पत्नी के कहने पर आखिरी बार मिलने पहुंची, जानिए किस्से

70-80 के दशक की मशहूर एक्ट्रेस मुमताज आज 79 साल की हो चुकी हैं। उस दौर में मुमताज की वो पॉपुलैरिटी थी कि उनके फिल्मों में पहने गए कपड़े ट्रेंड बन जाते थे। खूबसूरती ऐसी थी कि यश चोपड़ा, शम्मी कपूर जैसे लोग भी उन्हें शादी का प्रस्ताव देने से कतराते नहीं थे। लेकिन काम और करियर के लिए जुनूनी मुमताज हर प्रस्ताव ठुकरा देती थीं। हालांकि एक समय ऐसा भी था जब कुछ बी-ग्रेड फिल्मों में काम करने की वजह से शशि कपूर, जीतेंद्र जैसे बड़े एक्टर्स उनके साथ फिल्में करने से इनकार कर दिया करते थे। आज मुमताज के बर्थडे के खास मौके पर पढ़िए, उनके करियर और जिंदगी से जुड़े कुछ अनसुने किस्से- किस्सा-1 लता मंगेशकर की गोद में बैठकर देखीं फिल्में, कहती थीं- आंटी अगली बार भी बुलाना 31 जुलाई 1947 में मुमताज का जन्म हैदराबाद के ड्रायफ्रूट वेंडर अब्दुल समाज अख्सरी के घर हुआ। परिवार ईरान से ताल्लुक रखता था। पिता ईमामों के खानदान से थे। मुमताज महज एक साल की थीं, जब माता-पिता अलग हो गए। मां ने ही फिल्मों में बतौर जूनियर आर्टिस्ट काम कर मुमताज और बड़ी बहन मलका की अकेले परवरिश की। कुछ समय बाद मां बॉम्बे आकर बसीं। मुमताज भी अक्सर उनके साथ सेट पर जातीं। सेट पर हंसती खेलतीं मुमताज को महज 5 साल की उम्र में बतौर बाल कलाकार फिल्म संसार में काम करने मिला। आगे वो चाइल्ड आर्टिस्ट के तौर पर यास्मीन (1955), सोने की चिड़िया (1958), लाजवंती (1958), तलाक (1958) जैसी कई फिल्मों में नजर आईं। फिल्मों में काम मिलने से घर की आर्थिक स्थिति सुधरी और मुमताज मां के साथ वाल्केश्वर स्थित बिल्डिंग में आकर रहने लगीं। उनके ठीक ऊपर लता मंगेशकर का घर था, जहां 16MM पर फिल्में दिखाई जाती थीं। एक ही इंडस्ट्री से होने के चलते लता नन्हीं मुमताज को काफी लाड़ देती थीं। जब भी घर में फिल्म शुरू करतीं तो मुमताज को भी घर बुला लेतीं। लता उन्हें गोद में बैठाकर फिल्म दिखातीं और वो जल्द ही सो जाती थीं। लेकिन जाते हुए हर बार कहतीं- आंटी जब भी फिल्म देखो, मुझे भी बुला लेना। कई बार तो लता मंगेशकर के भाई उन्हें सोती हुई हालत में घर छोड़ने जाते थे। किस्सा-2 सेट पर मिली मां की मौत की खबर, डायरेक्टर से पूछा- क्या मैं जा सकती हूं दिन भर फिल्मों के सेट पर बिताते हुए जल्द ही उन्होंने परिवार की जिम्मेदारी उठानी शुरू कर दी। 12 की उम्र में उन्हें जमीन के तारे (1960) में कैरेक्टर रोल मिल गया। इस फिल्म में उनकी परफॉर्मेंस देखने के बाद मशहूर डायरेक्टर वी.शांताराम ने उन्हें फिल्म स्त्री में अच्छा रोल दिया। एक दिन मुमताज फिल्म स्त्री के सेट पर पहुंचीं। मुमताज डांस का शॉट दे ही रही थीं कि घर से खबर आई- ‘मां नहीं रहीं।’ 13 साल की मुमताज चुप खड़ी हो गईं और थोड़ी देर बाद डायरेक्टर वी.शांताराम से कहा- 'क्या करूं अन्ना?' वी.शांताराम हड़बड़ाए और कहा- ‘तुम्हें जरूर जाना चाहिए।’ मुमताज तुरंत हैदराबाद के लिए रवाना हुईं। जनाजे में शामिल हुईं और अगले दिन ही फिर सेट पर आ गईं। इस पर मुमताज ने रेडियो नशा को दिए इंटरव्यू में कहा था, उस जमाने में कोई मर भी जाए और अगर प्रोड्यूसर का सेट लगा है, तो आपको जाना ही पड़ेगा। आप प्रोड्यूसर को कंगाल नहीं कर सकते, क्योंकि उनके बाद दूसरे प्रोड्यूसर का सेट लगना है। किस्सा- 3 महमूद ने खूबसूरती देख फिल्म ऑफर की, शशि कपूर ने बी-ग्रेड एक्ट्रेस कहकर ठुकराया 14 साल की उम्र में मुमताज ने फिल्म गहरा दाग में काम किया था। फिल्म में उन्होंने हीरो राजेंद्र कुमार की बहन का रोल किया था। इसी समय उन्हें 1963 की फिल्म फौलाद में रेसलर दारा सिंह के साथ पहला लीड रोल मिला। दारा सिंह का कद देखकर कोई हीरोइन काम करने के लिए तैयार नहीं थीं, ऐसे में मुमताज को ये रोल दिया गया। जोड़ी हिट रही और फिर मुमताज को दारा सिंह के साथ एक के बाद एक कुल 16 फिल्में मिलीं। इन फिल्मों के अलावा मुमताज ने कई बी-ग्रेड फिल्मों में भी काम किया, हालांकि उन्हें खास पहचान नहीं मिली। मुमताज की बड़ी बहन मलका भी फिल्मों में आईं और कॉमेडियन-एक्टर महमूद के साथ कई फिल्में कीं। एक दिन महमूद काम के सिलसिले में मलका से मिलने पहुंचे, तो उनकी नजर मुमताज पर पड़ी। देखने में बेहद खूबसूरत मुमताज को वो एक टक देखते रहे। जब महमूद को फिल्म प्यार किए जा में शशि कपूर, किशोर कुमार के साथ कास्ट किया गया, तो उन्होंने अपने अपोजिट मुमताज को ही कास्ट किया। हालांकि फिल्म में उनका रोल छोटा था। एक दिन फिल्म की शूटिंग के दौरान महमूद ने शशि कपूर से कहा कि वो अपनी आने वाली फिल्मों में मुमताज को कास्ट करें। शशि कपूर ने तल्ख अंदाज में जवाब दिया, नहीं, मैं उस एक्ट्रेस को कभी अपनी हीरोइन नहीं बनाऊंगा, जिसने दारा सिंह के साथ बी-ग्रेड फिल्म की। किसे पता था कि ये बी-ग्रेड फिल्मों की वो एक्ट्रेस जल्द ही टॉप और हाईएस्ट पेड एक्ट्रेस बन जाएगी। किस्सा- 4 महमूद की जिद पर दिलीप कुमार की हीरोइन बनीं मुमताज प्यार किए जा फिल्म में साथ काम करने के बाद महमूद अपनी हर फिल्म में मुमताज को अपोजिट रोल देने लगे। वो भांप चुके थे कि मुमताज में टॉप एक्ट्रेस बनने का हुनर और जज्बा है। वो दूसरे हीरो को भी मुमताज के साथ काम करने की सलाह देते थे। जब महमूद को पता चला कि दिलीप कुमार फिल्म राम और श्याम कर रहे हैं, जिसमें उनका डबल रोल है, तो वो सीधे मुमताज की सिफारिश करने पहुंच गए। तब दिलीप कुमार आरके स्टूडियो में शूट कर रहे थे। महमूद उनके पास गए और कहा- एक नई लड़की है, बहुत टैलेंटेड है, उसके साथ काम कर लीजिए। दिलीप कुमार ने जवाब दिया- ‘अभी मैं व्यस्त हूं, लंच ब्रेक में लड़की की फोटो लेकर आना।’ महमूद हड़बड़ाहट में एक स्टूडियो गए और मुमताज के गाने की पूरी रील उठा लाए। लंच ब्रेक में उन्होंने दिलीप कुमार को मुमताज की रील दिखाई तो उन्होंने कहा- ‘यार महमूद, लड़की तो बहुत अच्छी दिखती है, खूबसूरत है, डांस भी करती है, बड़ी प्यारी लड़की है। मैं करूंगा। डबल रोल है, एक वहीदा है, दूसरी मुमताज होगी।’ फिल्म राम और श्याम हिट रही और मुमताज को देशभर में पहचान मिल गई। किस्सा- 5 जीतेंद्र ने साथ काम करने से किया इनकार, डायरेक्टर बोले- ऐतराज है तो हीरो बदलूंगा, हीरोइन नहीं फिल्म राम और श्याम रिलीज होने से पहले मुमताज को फिल्म बंद जो बन गए मोती (1967) में काम मिला, जीतेंद्र और डायरेक्टर वी.शांताराम की बेटी राजश्री लीड रोल में थीं और मुमताज को साइड रोल मिला था। फिल्म की शूटिंग शुरू होने से ठीक पहले राजश्री की शादी तय हो गई और उन्होंने फिल्म छोड़ दी। ऐसे में वी.शांताराम ने मुमताज को ही फिल्म में लीड रोल दिया। जैसे ही ये खबर जीतेंद्र को मिली, तो उन्होंने तुरंत डायरेक्टर को कॉल कर ऐतराज जताया। उन्होंने कहा- ‘उसको हीरोइन क्यों बनाया, कोई और हीरोइन ढूंढिए।’ जवाब मिला- ‘हीरोइन तो मुमताज ही होगी, आपको दिक्कत है, तो आप फिल्म छोड़ दो।’ वो वी.शांताराम ही थे, जिन्होंने जीतेंद्र को हीरो बनाया था, तो जीतेंद्र को मजबूरन फिल्म करनी ही पड़ी। इसी तरह साल 1969 की फिल्म दो रास्ते में शशि कपूर को कास्ट किया गया। बाद में जब मुमताज की कास्टिंग हुई तो शशि कपूर ने फिल्म छोड़ दी। इस फिल्म में बाद में राजेश खन्ना को साइन किया गया। फिल्म का गाना बिंदिया चमकेगी, चूड़ी खनकेगी काफी हिट हुआ था। किस्सा-6 अमिताभ के लिए छोड़ दी अपनी मर्सिडीज अमिताभ बच्चन इंडस्ट्री में नए थे, जब उन्हें मुमताज के साथ फिल्म बंधे हाथ में काम मिला। मुमताज तब काफी पॉपुलर हो चुकी थीं। उनकी कामयाबी का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जब अमिताभ बच्चन साधारण कार से आते थे, तब मुमताज मर्सिडीज से सेट पर आती थीं। अमिताभ को उनकी कार बहुत पसंद थी। एक दिन उन्होंने साथ काम करने वालों से कहा- मुझे ये कार पसंद है, देखना एक दिन मैं भी मर्सिडीज चलाऊंगा। किसी तरह ये बाद मुमताज के कानों तक पहुंची। उस दिन जब वो शूटिंग पूरी कर निकलीं, तो अमिताभ की कार ले गईं और अपनी वहीं सेट पर छोड़ दी। अमिताभ बाहर आए, तो उन्हें अपनी कार नहीं मिली। आसपास पूछा, तो गार्ड ने बताया कि मुमताज अपनी कार आपके लिए छोड़ गई हैं, जिससे आप इसे चला लें। अमिताभ उनकी कार घर ले गए और इस तरह मुमताज ने अमिताभ की इच्छा पूरी कर दी। किस्सा- 7 शम्मी कपूर ने प्रपोज किया, तो राज कपूर ने मेरा नाम जोकर से निकाला हिट फिल्में देते हुए मुमताज बड़ी एक्ट्रेस बन गईं। इसी समय 1968 में उन्हें शम्मी कपूर के साथ फिल्म ब्रह्मचारी में कास्ट किया गया। साथ काम करते हुए दोनों एक दूसरे को पसंद करने लगे।। रिलीज के बाद फिल्म सुपरहिट हुई और इसके गाने आज कल तेरे मेरे प्यार के चर्चे, चक्के में चक्का, चक्के पे गाड़ी काफी हिट हुए। फिल्म रिलीज के कुछ समय बाद शम्मी कपूर और मुमताज रिलेशनशिप में आ गए। कुछ समय बाद शम्मी कपूर ने उन्हें शादी का प्रस्ताव दिया। मुमताज भी शादी करना चाहती थीं, लेकिन राज कपूर ने शर्त रखी कि अगर शादी करनी है, तो मुमताज को फिल्मों में काम करना बंद करना पड़ेगा, हमारे घर की बहुएं काम नहीं करेंगी। मुमताज उस समय करियर के पीक पर थीं और घर की जिम्मेदारी होने के चलते वो काम नहीं छोड़ना चाहती थीं। शम्मी कपूर ने उनके परिवार को आर्थिक मदद देने का वादा भी किया, लेकिन मुमताज ने करियर के लिए प्यार की कुर्बानी दे दी। जिस समय मुमताज और शम्मी कपूर की शादी की बात चल रही थी, तभी राज कपूर ने उन्हें फिल्म मेरा नाम जोकर में फिरंगी महिला के रोल में कास्ट किया था। जैसे ही उन्हें पता चला कि शम्मी उनसे शादी करना चाहते हैं, राज कपूर ने मुमताज को फिल्म से निकाल दिया। राज कपूर ने मुमताज से कहा था- मैं तुम्हें नहीं ले सकता। घर के लोगों को ऐसा खुला रोल नहीं दूंगा। मुमताज की जगह बाद में रशियन एक्ट्रेस सेनिया को कास्ट किया गया था। किस्सा- 8 फिल्म में देव आनंद की बहन बनने से किया इनकार मुमताज ने 1971 की फिल्म तेरे मेरे सपने में देव आनंद के साथ काम किया। कुछ साल बाद उन्हें फिल्म हरे रामा हरे कृष्णा मिली, लेकिन कहा गया कि उन्हें देव साहब की बहन का किरदार निभाना है। मुमताज ने तुरंत मना कर दिया। कहा- मैं इतने रोमांटिक हीरो की बहन का रोल हरगिज नहीं करूंगी। उनकी ये बात सुनकर देव आनंद खूब हंसे और कहा- फिल्म में काम तो तुम करोगी, लेकिन मेरी हीरोइन बन कर। बाद में जीनत अमान को बहन का रोल दिया गया और मुमताज ने देव आनंद के साथ लीड रोल किया। ये फिल्म जबरदस्त हिट रही थी। किस्सा- 9 दूसरे हीरो के साथ काम करने पर नाराज हो जाते थे राजेश खन्ना राजेश खन्ना और मुमताज की दोस्ती बहुत गहरी थी। जब कभी मुमताज किसी दूसरे एक्टर के साथ फिल्म साइन कर लेतीं तो राजेश खन्ना इस बात से नाराज हो जाते थे। इस पर मुमताज उनसे कहतीं- आप भी तो दूसरी एक्ट्रेस के साथ फिल्में साइन कर लेते हैं, मैं तो नाराज नहीं होती। अपनी इसी आदत से वो राजेश खन्ना को मना लेती थीं। किस्सा-10 24 की उम्र में शादी कर छोड़ी फिल्में, ससुराल ने काम करने से रोका मुमताज करियर के पीक पर थीं, जब घरवालों ने उनका रिश्ता युगांडा के रईस बिजनेसमैन मयूर माधवानी से तय कर दिया। रूढ़िवादी मुस्लिम परिवार में जल्दी शादी करवाने का रिवाज था। घरवालों ने दबाव दिया, तो मुमताज न नहीं कह सकीं। उन्होंने ज्यादातर फिल्मों का साइनिंग अमाउंट लौटा दिया और जो अधूरी फिल्में थीं, उनकी शूटिंग पूरी की। 1974 में उनकी मयूर से शादी हुई और वो युगांडा जाकर बस गईं। शादी से पहले ही उनके पति के भाई ने साफ कह दिया कि मुमताज को फिल्मों में काम करना छोड़ना होगा। शादी के बाद उनका 3-4 बार मिसकैरेज हुआ था। उनकी दो बेटियां हैं, जिनका नाम नताशा और तान्या है। उनकी बड़ी बेटी नताशा की शादी एक्टर फरदीन खान से हुई है। फरदीन के पिता फिरोज खान और मुमताज करीबी दोस्त हैं। किस्सा- 11 मौत से पहले शम्मी कपूर ने रखी मुमताज से मिलने की इच्छा, मिलीं तो रो पड़ीं साल 2010 में मुमताज भारत में थीं, जब उनके पास शम्मी कपूर की पत्नी नीला देवी का कॉल आया। नीला ने उन्हें कहा कि शम्मी कपूर की इच्छा है कि आप उनकी बर्थडे पार्टी में आएं। मुमताज ने जवाब दिया- मैं जरूर आऊंगी। जैसे ही वो पार्टी में पहुंची, तो देखा शम्मी कपूर शराब पी रहे हैं। इस बात की जानकारी फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े हर शख्स को थी कि शम्मी कपूर की तबीयत कई महीनों से बिगड़ी हुई है। मुमताज पास पहुंचीं और कहा- ‘अगर आपकी तबीयत ठीक नहीं है तो आप शराब क्यों पी रहे हैं।’ शम्मी कपूर ने जवाब में कहा- ‘मैं ज्यादा दिनों तक नहीं जीने वाला।’ मुमताज को उस दिन ही पता चला कि शम्मी कपूर चंद महीनों के ही मेहमान हैं। वो भावुक हो गईं और कहा- ‘आप पी सकते हैं। एंजॉय योरसेल्फ। ’ कुछ देर बाद मुमताज वहां से चली गईं। जाते हुए बस कहा- ‘अपना ख्याल रखना।’

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Tiny mammoth ivory bird figurines found at Hohle Fels cave

The Hohle Fels Cave in the Swabian Alps of southwestern Germany has yielded two more mammoth ivory figurines: tiny birds that despite their small size are carved with intricate anatomical details. One of them is a bird at rest, the other with wings outstretched, although one of the wings has broken off. They weigh just 1.3 and .7 grams each and may have been carried as talismans by the hunters who occupied the cave 40,000 years ago.

The newly discovered birds are remarkably small. At two centimeters long, one centimeter wide, and half a centimeter high, the bird with outstretched wings is even the smallest of all the Ice Age artworks known to date in the World Heritage region. Most other Ice Age figures measure between three and nine centimeters. Despite their small size, the birds are exceptionally well-crafted: the resting bird has striking round eyes, the other a distinctive beak, and parallel markings on its wings that represent the bird’s plumage. “Here, the mammoth tusk wasn’t simply used to create some simplified form of a bird’s body,” says [research director Professor Nicholas Conard from the Department of Prehistory and Early History at the University of Tübingen], “here, precise observations of nature were translated into figures whose wealth of detail even allows for an examination of which bird species is depicted and what it is doing.”

While the majority of the Ice Age animal figurines are depicted in a static pose, the bird figurines exhibit specific behaviors. Professor Conard’s team interprets the resting bird, with its outstretched, flattened posture, head drawn close to its body, and legs tucked in, as possibly brooding. For the animal with the widely spread wings and elongated neck, interpretations range from flying or landing on the water to threatening or displaying courtship. Just as the animals’ body language cannot be definitively determined, so too can the species of bird. They may be ptarmigan, whose bone remains are frequently found in the region’s archaeological record; however, the researchers are also considering other pheasant-like birds such as the capercaillie or certain birds of prey.

This discovery brings the number of carved birds found at the UNESCO World Heritage site in the Achtal valley to three. (A water bird was discovered there 25 years ago.) No birds have been found at any of the other three Paleolithic sites in the area even though a plethora of other carved animals are represented.

The Hohle Fels cave is home to some of the most extraordinary Paleolithic ivory artifacts including the Venus of Schelklingen, the oldest known human figurative art, the world’s oldest flutes and a unique rope-making tool. The birds will be displayed at the Blaubeuren Museum of Prehistory and Ice Age Art, the museum built near the Stone Age caves to showcase the artifacts found there, until April 3, 2027.



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Zendaya on working with Tom Holland in Spider-Man: ‘When you’re best friends it’s easy’

The couple walked the white carpet at the London premiere of their latest film, Spiderman: Brand New Day.

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Amy Winehouse's dad ordered to pay £1m by court

Mitch Winehouse must pay nearly £1m to two of his daughter's friends over the auctioning of items.

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Evidence found of final battle between Rome and indigenous Catalonians

Archaeologists from the Autonomous University of Barcelona (AUB) have discovered a Roman military camp from the final battle of the indigenous Iberian Ceretani revolt at Collet de Jovell in the eastern Pyrenees Mountains of Catalonia. The battle location was previously believed to have been further west, but the artifacts found at the site conclusively link it to the final suppression of the Ceretani in 39 B.C., shifting the last fight firmly into ancient Cerdanya, their ancestral territory.

Cassius Dio wrote about the uprising and its brutal consequences in Roman History, Book XLVIII, Chapter 42:

There was another [revolt] on the part of the Cerretani in Spain, and they were subjugated by Calvinus after he had met with a preliminary success and also a reverse, — the latter through his lieutenant, who was ambushed by the barbarians and deserted by his soldiers. Calvinus undertook no operation against the enemy until he had punished these deserters; calling them together as if for some other purpose, he made the rest of the army surround them, and then put to death every tenth man in two centuries and punished many of the centurions, including the one who was serving in the primus pilus, as it is called.⁠ After doing this and gaining, like Marcus Crassus, a reputation for his disciplining of his army, he set out against his opponents and with no great difficulty vanquished them.

The Calvinus Dio is talking about was the governor of Hispania Citerior, Gnaeus Domitius Calvinus, and the punishment he inflicted on the troops who fled was the infamous decimation. In this case Dio claims it did the trick, as the Ceretani uprising was rapidly suppressed after the ambush.

The recovered materials—including both clavi caligae (iron studs from Roman legionary sandals) and other militaria (sling bullets, fibulae, coins, etc.)—date the site to the second half of the 1st century BCE. However, the discovery of two inscribed sling bullets has allowed for much more precise dating. Researchers identify the inscription preserved on two of these bullets—CN(eus) D(omitius)—with Gn. Domitius Calvinus, Augustus’s representative in the province of Hispania Citerior in 39 BCE and commander of the troops that fought against the Ceretani. The team’s main hypothesis is that the site corresponds to a Roman military camp linked to the fighting during that episode, situated at a strategic point of access to the Cerdanya plain.

This clash was not just the last fight of the Ceretani revolt. It is the last documented armed conflict between any of the indigenous peoples of Catalonia and Rome. After their defeat, Ceretani settlements were targeted for destruction by Rome and abandoned.



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हरियाणा के सिंगर बोले- एथेनॉल वाले VIDEO पर धमकियां मिलीं:बिल दिखाकर कहा- डिफेंडर सच में खराब हुई, मैं कोई एजेंडा नहीं चला रहा

हरियाणा के रहने वाले सिंगर रेशम सिंह अनमोल ने दावा किया है कि खराब पेट्रोल की वजह से डिफेंडर खराब होने संबंधी वीडियो वायरल होने के बाद से उन्हें लगातार धमकियां मिल रही हैं। इसे लेकर उन्होंने सोशल मीडिया पर एक नया वीडियो जारी कर सफाई दी है। रेशम ने कहा, "मेरी गाड़ी सच में खराब हुई थी। मैंने कंपनी के सर्विस सेंटर में जाकर उसे ठीक कराया और मेरे पास उसका बिल भी है। कुछ लोग कह रहे हैं कि मैं एजेंडा चला रहा हूं या पैसे लेकर एथेनॉल के खिलाफ वीडियो बना रहा हूं, जबकि ऐसा बिल्कुल नहीं है। मुझे जब कहीं भी प्योर पेट्रोल नहीं मिला, तब परेशान होकर मैंने वह वीडियो बनाया था।" दो पॉइंट में जानिए सिंगर ने क्या कहा… 'प्रोपेगेंडा फैलाने की बात कर रहे लोग' रेशम सिंह अनमोल ने कहा, “दो-तीन दिन पहले मैंने एक वीडियो अपलोड किया था, जिसमें बताया था कि खराब पेट्रोल की वजह से मेरी डिफेंडर में दिक्कत आ गई थी। इसके बाद से मुझे कई लोगों के फोन आ रहे हैं। कोई कह रहा है कि मैं प्रोपेगेंडा फैला रहा हूं, कोई इसे मेरा एजेंडा बता रहा है। कुछ लोग यह भी कह रहे हैं कि मैंने पैसे लेकर वीडियो बनाया है। वहीं, कुछ लोग मुझे धमकियां भी दे रहे हैं।” ‘27 मई को खराब हुई थी मेरी डिफेंडर’ रेशम ने आगे कहा, "मैं यह साफ करना चाहता हूं कि यह दिक्कत अभी नहीं आई। मेरी डिफेंडर 27 मई को खराब हुई थी। यह उसका बिल भी है। कंपनी ने उसमें नया फ्यूल पंप लगाया था। वीडियो मैंने उस दिन बनाया, जब मुझे प्योर पेट्रोल नहीं मिला। मैं पांच-छह पेट्रोल पंपों पर गया, लेकिन कहीं भी XP100 या XP95 नहीं मिला। परेशान होकर मैंने वह वीडियो बनाया था।" ‘पंपों पर एथेनॉल की जानकारी लिखी होनी चाहिए’ रेशम ने कहा, "जब हम पेट्रोल पंप पर जाकर पूछते हैं कि XP95 में कितने प्रतिशत एथेनॉल है, तो हर जगह अलग-अलग जवाब मिलता है। कोई 8 प्रतिशत बताता है तो कोई 5 प्रतिशत। मैं सरकार से अपील करता हूं कि हर पेट्रोल पंप पर नोटिस लगाया जाए, ताकि लोगों को पता चल सके कि पेट्रोल में कितना एथेनॉल है। आम लोग इस वजह से काफी परेशान हैं। मेरे वीडियो के बाद भी बहुत से लोगों के मैसेज आए हैं। मैंने कोई प्रोपेगेंडा नहीं फैलाया है। हमारे लिए सभी राजनीतिक पार्टियां एक जैसी हैं।" अब जानिए सिंगर के भाई ने दैनिक भास्कर को क्या बताया... बाढ़ में खराब हुई रेंज रोवर, फिर खरीदी डिफेंडर रेशम सिंह अनमोल के बड़े भाई और नंबरदार डॉ. निर्मल सिंह नकटपुर ने बताया कि पहले अनमोल के पास रेंज रोवर स्पोर्ट्स थी। 2025 में पंजाब में आई बाढ़ के दौरान राहत कार्य करते समय गाड़ी पहले पेड़ की टहनी से क्षतिग्रस्त हुई, फिर बाढ़ के पानी में फिसल गई। इसके बाद 7 नवंबर 2025 को अनमोल ने करीब 1.55 करोड़ रुपए में सफेद रंग की डिफेंडर-110 खरीदी। अनमोल को ट्रैक्टर ज्यादा पसंद हैं, लेकिन यह गाड़ी उन्होंने शौक से खरीदी थी। शो जाते समय खराब हुई गाड़ी, फिर वायरल हुआ वीडियो नकटपुर ने बताया कि 27 मई 2026 को शो के लिए जाते समय रास्ते में डिफेंडर अचानक बंद हो गई। कंपनी की सलाह पर गाड़ी को दादा मोटर्स, चंडीगढ़ ले जाया गया, जहां जांच में फ्यूल पंप खराब मिला और उसे बदल दिया गया। चार दिन पहले जब अनमोल छात्रों के जंतर-मंतर धरने में समर्थन देने चंडीगढ़ से दिल्ली जा रहे थे, तब उन्हें पांच पेट्रोल पंपों पर भी XP100 हाई-स्पीड पेट्रोल नहीं मिला। इसी के बाद उन्होंने वीडियो रिकॉर्ड किया, जो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। ---------------------------- ये खबर भी पढ़ें :- हरियाणा के सिंगर बोले-E20 पेट्रोल से नई डिफेंडर खराब हुई:गाड़ी का फ्यूल पंप बदलवाना पड़ा; 8 महीने पहले ₹1.55 करोड़ में खरीदी देशभर में E20 पेट्रोल को लेकर माइलेज घटने, इंजन खराब होने और मेंटेनेंस खर्च बढ़ने जैसे दावे किए जा रहे हैं। इसी बीच, हरियाणा के रहने वाले पंजाबी सिंगर रेशम सिंह अनमोल का एक वीडियो चर्चा में है। इसमें वह 8 महीने पहले खरीदी करीब 1.55 करोड़ रुपए की अपनी डिफेंडर-110 के रास्ते में अचानक बंद होने का किस्सा बता रहे हैं। पढ़ें पूरी खबर…

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संजय दत्त@67: सलमान ने दी BMW, समुद्र में फेंकी चाबी:बिगड़ते देख इंदिरा गांधी ने कहा- बोर्डिंग स्कूल भेजो, राजेश खन्ना-ऋषि कपूर को पीटने पहुंचे थे

साल था 1994। मुंबई की ठाणे सेंट्रल जेल की सबसे कड़ी सुरक्षा वाली अंडा बैरक में बंद एक आरोपी रक्षाबंधन के दिन अपनी बहनों का इंतजार कर रहा था। लोहे की सलाखों के पीछे दोनों बहनों ने उसके हाथ पर राखी बांधी, लेकिन उस भाई की जेब पूरी तरह खाली थी। देने के लिए न कोई तोहफा था, न पैसे। कुछ पल तक वह चुप रहा। फिर जेल की कैंटीन से मिले दो-दो रुपए के चाय-नाश्ते के कूपन बहनों के हाथ में रख दिए और बोला, ‘मेरे पास फिलहाल यही है।’ यह वही शख्स था, जिसके नाम पर कभी सिनेमाघरों के बाहर भीड़ उमड़ती थी, जिसकी फिल्मों के पोस्टर शहरों में छाए रहते थे और जो करोड़ों लोगों का सुपरस्टार था, लेकिन वक्त ने ऐसी करवट बदली कि वही एक्टर जेल की चारदीवारी के भीतर अपनी बहनों को सिर्फ दो रुपए के कूपन ही दे सका। जी हां, हम बात कर रहे हैं बॉलीवुड के 'संजू बाबा' यानी संजय दत्त की। आज उनके 67वें जन्मदिन पर जानते हैं उनके कुछ अनसुने किस्से। इंदिरा गांधी की सलाह पर बोर्डिंग स्कूल भेजा गया संजय दत्त के जन्म के बाद सुनील दत्त और नरगिस ने अपने बेटे के नाम के लिए फिल्म पत्रिका 'शमा' के पाठकों से सुझाव मांगे थे। जिसके बाद देशभर से लगभग 15,000 से अधिक नाम आए थे। इसके बाद 'संजय' नाम आगरा की रहने वाली पुष्पा अग्रवाल ने सुझाया था। संजय बचपन से ही परिवार के सबसे लाड़ले थे। माता-पिता, नानी और रिश्तेदार उनकी हर इच्छा पूरी कर देते थे। इसी वजह से वे बेहद जिद्दी भी होते जा रहे थे। स्कूल हो या घर, हर जगह उन्हें विशेष तवज्जो मिलती थी। हालांकि, संजय सिर्फ जिद्दी नहीं थे, उनका दिल भी बहुत बड़ा था। एक बार दिल्ली में एक शादी के दौरान उन्होंने ठंड से कांप रहे एक गरीब बच्चे को अपना सूट उतारकर दे दिया था। लेकिन उनकी शरारतें परिवार की चिंता भी बढ़ा रही थीं। पत्रकार यासिर उस्मान द्वारा संजय दत्त पर लिखी गई किताब के मुताबिक छह साल की उम्र में उन्होंने पिता सुनील दत्त को सिगरेट पीते देखा और खुद भी सिगरेट पीने की जिद करने लगे। सुनील दत्त को लगा कि एक बार सिगरेट पीने के बाद बेटे का शौक खत्म हो जाएगा, लेकिन संजय ने पूरी सिगरेट पी ली। कुछ साल बाद वे घर आए मेहमानों की फेंकी हुई सिगरेट की बुझी हुई बटें बगीचे में छिपकर पीते हुए भी पकड़े गए। जिस पर पिता ने उनकी पिटाई की थी। ऐसे में सुनील दत्त को एहसास हुआ कि जरूरत से ज्यादा लाड़-प्यार और फिल्मी माहौल का संजय पर गलत असर पड़ रहा है। तभी यह फैसला किया गया कि संजय को किसी बोर्डिंग स्कूल भेज दिया जाए। इसके बाद परिवार की करीबी मित्र और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने सलाह दी कि संजय को मिलिट्री डिसिप्लिन के लिए हिमाचल प्रदेश के सनावर स्थित लॉरेंस स्कूल भेजा जाए। संजय जूतों में हेरोइन छिपाकर न्यूयॉर्क गए थे 1980 में संजय दत्त अपनी पहली फिल्म 'रॉकी' की शूटिंग में बिजी थे। इसी दौरान उनकी मां नरगिस की तबीयत बिगड़ गई और उन्हें मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में भर्ती कराया गया। नरगिस को पैंक्रियाटिक कैंसर था और उन्हें इलाज के लिए न्यूयॉर्क के मेमोरियल स्लोन केटरिंग कैंसर सेंटर ले जाना था। सुनील दत्त ने कांपती आवाज में अपने तीनों बच्चों संजय, नम्रता और प्रिया को बताया कि उनकी मां को कैंसर है। इसके बाद 'रॉकी' की शूटिंग रोक दी गई और 21 अगस्त 1980 को सुनील दत्त नरगिस को लेकर अमेरिका रवाना हो गए। न्यूयॉर्क में इलाज के दौरान नरगिस की कई सर्जरी हुईं, लेकिन ऑपरेशन के बाद लगातार खून बहने से वे कोमा में चली गईं। इसी दौरान संजय दत्त खुद भी नशे की लत से जूझ रहे थे। मां की गंभीर हालत के बावजूद वे ड्रग्स नहीं छोड़ पा रहे थे। यासिर उस्मान की किताब के मुताबिक, न्यूयॉर्क जाते समय वे अपने जूतों में करीब 30 ग्राम हेरोइन छिपाकर ले गए थे। बाद में उन्होंने स्वीकार किया था कि उस घटना को याद करके उन्हें शर्म आती है। यहां तक कि नशे की वजह से उन्हें अपनी मां के लिए खून दान करने की अनुमति भी नहीं मिली थी। 'रॉकी' के प्रीमियर में नरगिस की याद में कुर्सी खाली छोड़ी गई न्यूयॉर्क में करीब तीन महीने तक कोमा में रहने के बाद नरगिस को होश आया था। उनकी सबसे बड़ी इच्छा थी कि वे जल्द भारत लौटें और अपने बेटे की पहली फिल्म 'रॉकी' देखें। 6 मार्च 1981 को भारत लौटने के बाद 9 मार्च 1981 को सुनील दत्त उन्हें फिल्म 'रॉकी' दिखाने घर के प्रीव्यू थिएटर तक ले गए। कमजोरी के कारण वे पूरी फिल्म नहीं देख सकीं और सिर्फ सात रील देखने के बाद उन्हें वापस कमरे में ले जाना पड़ा, लेकिन जितना देखा, उससे वे बेहद खुश थीं। उन्हें विश्वास था कि उनका बेटा संजू बड़ा स्टार बनेगा। वहीं, संजय की डेब्यू फिल्म 'रॉकी' का प्रीमियर 7 मई 1981 को तय किया गया था। प्रीमियर से ठीक चार दिन पहले, 3 मई 1981 को नरगिस का निधन हो गया। इसके बाद फिल्म के प्रीमियर के दौरान सुनील दत्त ने थिएटर में संजय दत्त के बगल वाली कुर्सी नरगिस की याद में खाली रखी थी। ऋषि कपूर-राजेश खन्ना को पीटने पहुंच गए थे फिल्म 'रॉकी' की शूटिंग के दौरान संजय दत्त और एक्ट्रेस टीना मुनीम के बीच प्यार हुआ। इस रिश्ते में संजय बेहद पजेसिव बॉयफ्रेंड थे। दोनो का अफेयर लगभग 2 साल तक चला था। यासिर उस्मान की किताब के मुताबिक, फिल्म 'कर्ज' में टीना मुनीम ऋषि कपूर के साथ काम कर रही थीं। तब दोनों के बीच प्रेम संबंध होने की अफवाहें फैल गई थीं। इससे संजय इतने गुस्से में आ गए कि वे ऋषि कपूर की पिटाई करने के इरादे से उनके घर पहुंच गए थे। संजय ने एक्टर गुलशन ग्रोवर से भी अपने साथ चलने को कहा। गुलशन ने बाद में बताया था, संजय और मैं भाइयों जैसे थे। एक दिन उसने मुझसे कहा, 'चलो चिंटू (ऋषि कपूर) के घर चलते हैं, उसकी पिटाई करनी है।' हम वहां गए भी, लेकिन उनकी मंगेतर नीतूजी (नीतू सिंह) ने हमें समझाया कि चिंटू का कोई अफेयर नहीं है। इसके बाद हम वहां से लौट आए। बाद में फिल्म 'सौतन' की शूटिंग के बाद टीना मुनीम और राजेश खन्ना की नजदीकियों की खबरें फिल्म इंडस्ट्री में फैलने लगीं। बाद में संजय ने स्वीकार किया कि उन्हें यह बर्दाश्त नहीं हो रहा था कि टीना उन्हें छोड़कर किसी और के करीब चली जाएं। इसके बाद गुस्से में वे सीधे मेहबूब स्टूडियो पहुंच गए, जहां राजेश खन्ना शूटिंग कर रहे थे। संजय ने राजेश खन्ना के ठीक सामने कुर्सी खींचकर लगा ली और उन्हें लगातार घूरते रहे। बाद में खुद संजय ने स्वीकार किया कि अगर उस दिन राजेश खन्ना ने कुछ भी कहा होता, तो वे उन पर हमला कर देते, लेकिन राजेश खन्ना शांत बैठे रहे और कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। आखिरकार संजय वहां से लौट आए। संजय दत्त और रेखा की गुपचुप शादी की अफवाह उड़ी थी साल 1982 में अफवाह फैल गई कि संजय दत्त ने एक्ट्रेस रेखा से गुपचुप शादी कर ली। दरअसल, मशहूर फिल्म मैगजीन सिनेब्लिट्ज ने अपने कॉलम 'रिप ऑफ' में लिखा था, हमें अपने बेहद भरोसेमंद सूत्रों से पता चला है, जो होटल सी रॉक के आसपास मौजूद थे, कि संजय और रेखा ने अपनी कथित शादी के शुरुआती कुछ दिन वहीं साथ बिताए। अगर आप सोच रहे हैं कि होटल में किसी ने उन्हें क्यों नहीं देखा, तो याद रखिए कि वहां 'रूम सर्विस' जैसी सुविधा भी होती है। मैगजीन ने आगे लिखा था, संजय दत्त इन दिनों खुशी से फूले नहीं समा रहे हैं। उनकी अपनी 'कवयित्री' रेखा उनके लिए छोटी-छोटी प्रेम कविताएं लिख रही हैं, ‘तुम मेरी ताकत हो, मेरा सहारा हो, मेरे प्यारे से फूल हो।’ यासिर उस्मान की किताब के मुताबिक, इन खबरों से फिल्म इंडस्ट्री में सनसनी फैल गई। हालांकि, संजय दत्त और रेखा दोनों ने इन दावों को सिरे से खारिज कर दिया। एक इंटरव्यू में संजय ने साफ कहा था कि रेखा से मेरा कोई रिश्ता नहीं है। मेरी शादी की खबर पूरी तरह साजिश और झूठ है। यहां तक कि मेरी तथाकथित गुप्त शादी की कहानी भी गढ़ दी गई। संजय ने कहा था कि कुछ रिपोर्टों में तो यह तक लिखा गया कि शादी के 15 दिन बाद वे रेखा को अपने पिता सुनील दत्त से आशीर्वाद दिलाने ले गए, लेकिन सुनील दत्त ने उन्हें घर से बाहर निकाल दिया। संजय ने इन सभी दावों को मनगढ़ंत बताते हुए कहा था कि उन्होंने कभी रेखा से शादी नहीं की। उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें समझ नहीं आता कि उनका नाम रेखा के साथ क्यों जोड़ा जा रहा है, जबकि वे जानते हैं कि रेखा का रिश्ता फिल्म इंडस्ट्री के एक बड़े शख्स से है। संजय का मानना था कि यह अफवाह इसलिए भी फैली क्योंकि वे उस समय अस्पताल में भर्ती अमिताभ बच्चन से मिलने नहीं जा सके थे। जेल में बहनों को दो-दो रुपए के कूपन दिए थे साल था 1994 और महीना था जुलाई। अवैध रूप से हथियार रखने के मामले में संजय दत्त की अंतरिम जमानत अदालत ने रद्द कर दी और उन्हें ठाणे सेंट्रल जेल भेज दिया गया। उन्हें जेल की सबसे कड़ी सुरक्षा वाली अंडा बैरक में रखा गया। यह वही जगह थी, जहां खतरनाक अपराधियों और टाडा के आरोपियों को रखा जाता था। करीब 10x10 फीट की उस छोटी-सी कोठरी में न धूप आती थी और न ही बाहर की दुनिया दिखाई देती थी। एक छोटा-सा बल्ब, एक गद्दा और कोने में बिना फ्लश वाला शौचालय। संजय दत्त ने बाद में बताया था कि शुरुआती डेढ़ महीने तक उन्हें दूसरे कैदियों से मिलने तक की इजाजत नहीं थी। अकेलापन इतना बढ़ गया कि उन्होंने समय काटने के लिए चींटियों को घंटों चलते हुए देखना शुरू कर दिया था। बाहर पिता सुनील दत्त लगातार बेटे की जमानत के लिए नेताओं, वकीलों और अधिकारियों के चक्कर लगा रहे थे। बहनें प्रिया और नम्रता भी नियमित रूप से जेल जाती थीं, लेकिन अक्सर सिर्फ दूर से ही संजय को देख पाती थीं। वहीं, रक्षाबंधन पर बहनों ने जेल में उन्हें राखी बांधी। उस समय संजय के पास देने के लिए कोई गिप्ट नहीं था। उन्होंने अपनी बहनों को सिर्फ जेल की कैंटीन के दो-दो रुपए वाले चाय-नाश्ते के कूपन दिए और कहा था, ‘मेरे पास फिलहाल यही है।’ बेटी के एक्टिंग करने पर बोले थे- टांगें तोड़ दूंगा संजय दत्त की बड़ी बेटी त्रिशाला दत्त का जन्म 1988 में उनकी पहली पत्नी रिचा शर्मा से हुआ था। जब वह सिर्फ 8 साल की थीं, तब ब्रेन ट्यूमर के कारण उनकी मां का निधन हो गया। इसके बाद उनका पालन-पोषण न्यूयॉर्क में नाना-नानी ने किया। त्रिशाला कभी बॉलीवुड में अभिनेत्री बनना चाहती थीं, लेकिन संजय दत्त इसके सख्त खिलाफ थे। 2016 में फिल्म 'भूमि' के प्रमोशन के दौरान उन्होंने कहा था, ‘त्रिशाला एक्ट्रेस बनना चाहती थी और मैं उसकी टांगें तोड़ देना चाहता था।’ संजय दत्त ने यह भी कहा था, ‘मैंने उसे एक अच्छे कॉलेज में भेजने के लिए अपना बहुत समय और एनर्जी लगाई है। उसने फोरेंसिक साइंस में विशेषज्ञता हासिल की है और मुझे लगता है कि यह एक बेहतरीन करियर है।’ सलमान की BMW की चाबी समुद्र में फेंक दी थी संजय दत्त और सलमान खान की दोस्ती बॉलीवुड में मिसाल मानी जाती है। हालांकि, एक बार ऐसा भी हुआ था जब संजय दत्त, सलमान से नाराज हो गए थे। इस किस्से का खुलासा खुद सलमान ने रजत शर्मा के शो में किया था। सलमान ने बताया था कि सोहेल खान की फिल्म 'मैंने दिल तुझको दिया' में संजय दत्त ने दोस्ती की खातिर गेस्ट अपीयरेंस किया था। शूटिंग पूरी होने के बाद संजय दत्त सलमान के घर पहुंचे, जहां पार्टी चल रही थी। उसी दौरान सलमान के पास नई BMW M5 आई थी। वह संजय दत्त को बाहर ले गए और बोले, ‘बाबा, यह देश की पहली BMW M5 है और मैं चाहता हूं कि यह आपके पास हो।’ इतना सुनते ही संजय दत्त ने सलमान को धन्यवाद कहा, लेकिन अगले ही पल कार की चाबी उठाकर सीधे समुद्र में फेंक दी। चाबी समंदर में चली गई और क्योंकि कार की केवल एक ही चाबी थी, इसलिए वह कई दिनों तक घर के बाहर ही खड़ी रह गई। सलमान ने बताया था कि उस चाबी को ढूंढ़कर निकालने में पूरे चार दिन लगे थे। ………….. यह खबर भी पढ़ें… अमजद खान की पुण्यतिथि:डिलीवरी के बाद बीवी को घर लाने के पैसे नहीं थे; ₹1.27 करोड़ की फीस अटकी, परिवार ने अंडरवर्ल्ड की मदद ठुकराई ‘मैं वो आदमी था, जो रोज 4–5 घंटे कसरत करता था। बैडमिंटन खेलता था, फ्री-हैंड एक्सरसाइज करता था, वेट उठाता था... लेकिन फिर एक एक्सीडेंट हुआ और मैं तीन महीने तक बिस्तर पर पड़ा रहा।’ एक पुराने इंटरव्यू में दिवंगत एक्टर अमजद खान ने अपनी जिंदगी का सबसे दर्दनाक दौर याद करते हुए यह बात कही थी। पूरी खबर यहां पढ़ें…

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संजय दत्त@67: सलमान ने दी BMW, समुद्र में फेंकी चाबी:बिगड़ते देख इंदिरा गांधी ने कहा- बोर्डिंग स्कूल भेजो, राजेश खन्ना-ऋषि कपूर को पीटने पहुंचे थे

साल था 1994। मुंबई की ठाणे सेंट्रल जेल की सबसे कड़ी सुरक्षा वाली अंडा बैरक में बंद एक आरोपी रक्षाबंधन के दिन अपनी बहनों का इंतजार कर रहा था। लोहे की सलाखों के पीछे दोनों बहनों ने उसके हाथ पर राखी बांधी, लेकिन उस भाई की जेब पूरी तरह खाली थी। देने के लिए न कोई तोहफा था, न पैसे। कुछ पल तक वह चुप रहा। फिर जेल की कैंटीन से मिले दो-दो रुपए के चाय-नाश्ते के कूपन बहनों के हाथ में रख दिए और बोला, ‘मेरे पास फिलहाल यही है।’ यह वही शख्स था, जिसके नाम पर कभी सिनेमाघरों के बाहर भीड़ उमड़ती थी, जिसकी फिल्मों के पोस्टर शहरों में छाए रहते थे और जो करोड़ों लोगों का सुपरस्टार था, लेकिन वक्त ने ऐसी करवट बदली कि वही एक्टर जेल की चारदीवारी के भीतर अपनी बहनों को सिर्फ दो रुपए के कूपन ही दे सका। जी हां, हम बात कर रहे हैं बॉलीवुड के 'संजू बाबा' यानी संजय दत्त की। आज उनके 67वें जन्मदिन पर जानते हैं उनके कुछ अनसुने किस्से। इंदिरा गांधी की सलाह पर बोर्डिंग स्कूल भेजा गया संजय दत्त के जन्म के बाद सुनील दत्त और नरगिस ने अपने बेटे के नाम के लिए फिल्म पत्रिका 'शमा' के पाठकों से सुझाव मांगे थे। जिसके बाद देशभर से लगभग 15,000 से अधिक नाम आए थे। इसके बाद 'संजय' नाम आगरा की रहने वाली पुष्पा अग्रवाल ने सुझाया था। संजय बचपन से ही परिवार के सबसे लाड़ले थे। माता-पिता, नानी और रिश्तेदार उनकी हर इच्छा पूरी कर देते थे। इसी वजह से वे बेहद जिद्दी भी होते जा रहे थे। स्कूल हो या घर, हर जगह उन्हें विशेष तवज्जो मिलती थी। हालांकि, संजय सिर्फ जिद्दी नहीं थे, उनका दिल भी बहुत बड़ा था। एक बार दिल्ली में एक शादी के दौरान उन्होंने ठंड से कांप रहे एक गरीब बच्चे को अपना सूट उतारकर दे दिया था। लेकिन उनकी शरारतें परिवार की चिंता भी बढ़ा रही थीं। पत्रकार यासिर उस्मान द्वारा संजय दत्त पर लिखी गई किताब के मुताबिक छह साल की उम्र में उन्होंने पिता सुनील दत्त को सिगरेट पीते देखा और खुद भी सिगरेट पीने की जिद करने लगे। सुनील दत्त को लगा कि एक बार सिगरेट पीने के बाद बेटे का शौक खत्म हो जाएगा, लेकिन संजय ने पूरी सिगरेट पी ली। कुछ साल बाद वे घर आए मेहमानों की फेंकी हुई सिगरेट की बुझी हुई बटें बगीचे में छिपकर पीते हुए भी पकड़े गए। जिस पर पिता ने उनकी पिटाई की थी। ऐसे में सुनील दत्त को एहसास हुआ कि जरूरत से ज्यादा लाड़-प्यार और फिल्मी माहौल का संजय पर गलत असर पड़ रहा है। तभी यह फैसला किया गया कि संजय को किसी बोर्डिंग स्कूल भेज दिया जाए। इसके बाद परिवार की करीबी मित्र और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने सलाह दी कि संजय को मिलिट्री डिसिप्लिन के लिए हिमाचल प्रदेश के सनावर स्थित लॉरेंस स्कूल भेजा जाए। संजय जूतों में हेरोइन छिपाकर न्यूयॉर्क गए थे 1980 में संजय दत्त अपनी पहली फिल्म 'रॉकी' की शूटिंग में बिजी थे। इसी दौरान उनकी मां नरगिस की तबीयत बिगड़ गई और उन्हें मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में भर्ती कराया गया। नरगिस को पैंक्रियाटिक कैंसर था और उन्हें इलाज के लिए न्यूयॉर्क के मेमोरियल स्लोन केटरिंग कैंसर सेंटर ले जाना था। सुनील दत्त ने कांपती आवाज में अपने तीनों बच्चों संजय, नम्रता और प्रिया को बताया कि उनकी मां को कैंसर है। इसके बाद 'रॉकी' की शूटिंग रोक दी गई और 21 अगस्त 1980 को सुनील दत्त नरगिस को लेकर अमेरिका रवाना हो गए। न्यूयॉर्क में इलाज के दौरान नरगिस की कई सर्जरी हुईं, लेकिन ऑपरेशन के बाद लगातार खून बहने से वे कोमा में चली गईं। इसी दौरान संजय दत्त खुद भी नशे की लत से जूझ रहे थे। मां की गंभीर हालत के बावजूद वे ड्रग्स नहीं छोड़ पा रहे थे। यासिर उस्मान की किताब के मुताबिक, न्यूयॉर्क जाते समय वे अपने जूतों में करीब 30 ग्राम हेरोइन छिपाकर ले गए थे। बाद में उन्होंने स्वीकार किया था कि उस घटना को याद करके उन्हें शर्म आती है। यहां तक कि नशे की वजह से उन्हें अपनी मां के लिए खून दान करने की अनुमति भी नहीं मिली थी। 'रॉकी' के प्रीमियर में नरगिस की याद में कुर्सी खाली छोड़ी गई न्यूयॉर्क में करीब तीन महीने तक कोमा में रहने के बाद नरगिस को होश आया था। उनकी सबसे बड़ी इच्छा थी कि वे जल्द भारत लौटें और अपने बेटे की पहली फिल्म 'रॉकी' देखें। 6 मार्च 1981 को भारत लौटने के बाद 9 मार्च 1981 को सुनील दत्त उन्हें फिल्म 'रॉकी' दिखाने घर के प्रीव्यू थिएटर तक ले गए। कमजोरी के कारण वे पूरी फिल्म नहीं देख सकीं और सिर्फ सात रील देखने के बाद उन्हें वापस कमरे में ले जाना पड़ा, लेकिन जितना देखा, उससे वे बेहद खुश थीं। उन्हें विश्वास था कि उनका बेटा संजू बड़ा स्टार बनेगा। वहीं, संजय की डेब्यू फिल्म 'रॉकी' का प्रीमियर 7 मई 1981 को तय किया गया था। प्रीमियर से ठीक चार दिन पहले, 3 मई 1981 को नरगिस का निधन हो गया। इसके बाद फिल्म के प्रीमियर के दौरान सुनील दत्त ने थिएटर में संजय दत्त के बगल वाली कुर्सी नरगिस की याद में खाली रखी थी। ऋषि कपूर-राजेश खन्ना को पीटने पहुंच गए थे फिल्म 'रॉकी' की शूटिंग के दौरान संजय दत्त और एक्ट्रेस टीना मुनीम के बीच प्यार हुआ। इस रिश्ते में संजय बेहद पजेसिव बॉयफ्रेंड थे। दोनो का अफेयर लगभग 2 साल तक चला था। यासिर उस्मान की किताब के मुताबिक, फिल्म 'कर्ज' में टीना मुनीम ऋषि कपूर के साथ काम कर रही थीं। तब दोनों के बीच प्रेम संबंध होने की अफवाहें फैल गई थीं। इससे संजय इतने गुस्से में आ गए कि वे ऋषि कपूर की पिटाई करने के इरादे से उनके घर पहुंच गए थे। संजय ने एक्टर गुलशन ग्रोवर से भी अपने साथ चलने को कहा। गुलशन ने बाद में बताया था, संजय और मैं भाइयों जैसे थे। एक दिन उसने मुझसे कहा, 'चलो चिंटू (ऋषि कपूर) के घर चलते हैं, उसकी पिटाई करनी है।' हम वहां गए भी, लेकिन उनकी मंगेतर नीतूजी (नीतू सिंह) ने हमें समझाया कि चिंटू का कोई अफेयर नहीं है। इसके बाद हम वहां से लौट आए। बाद में फिल्म 'सौतन' की शूटिंग के बाद टीना मुनीम और राजेश खन्ना की नजदीकियों की खबरें फिल्म इंडस्ट्री में फैलने लगीं। बाद में संजय ने स्वीकार किया कि उन्हें यह बर्दाश्त नहीं हो रहा था कि टीना उन्हें छोड़कर किसी और के करीब चली जाएं। इसके बाद गुस्से में वे सीधे मेहबूब स्टूडियो पहुंच गए, जहां राजेश खन्ना शूटिंग कर रहे थे। संजय ने राजेश खन्ना के ठीक सामने कुर्सी खींचकर लगा ली और उन्हें लगातार घूरते रहे। बाद में खुद संजय ने स्वीकार किया कि अगर उस दिन राजेश खन्ना ने कुछ भी कहा होता, तो वे उन पर हमला कर देते, लेकिन राजेश खन्ना शांत बैठे रहे और कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। आखिरकार संजय वहां से लौट आए। संजय दत्त और रेखा की गुपचुप शादी की अफवाह उड़ी थी साल 1982 में अफवाह फैल गई कि संजय दत्त ने एक्ट्रेस रेखा से गुपचुप शादी कर ली। दरअसल, मशहूर फिल्म मैगजीन सिनेब्लिट्ज ने अपने कॉलम 'रिप ऑफ' में लिखा था, हमें अपने बेहद भरोसेमंद सूत्रों से पता चला है, जो होटल सी रॉक के आसपास मौजूद थे, कि संजय और रेखा ने अपनी कथित शादी के शुरुआती कुछ दिन वहीं साथ बिताए। अगर आप सोच रहे हैं कि होटल में किसी ने उन्हें क्यों नहीं देखा, तो याद रखिए कि वहां 'रूम सर्विस' जैसी सुविधा भी होती है। मैगजीन ने आगे लिखा था, संजय दत्त इन दिनों खुशी से फूले नहीं समा रहे हैं। उनकी अपनी 'कवयित्री' रेखा उनके लिए छोटी-छोटी प्रेम कविताएं लिख रही हैं, ‘तुम मेरी ताकत हो, मेरा सहारा हो, मेरे प्यारे से फूल हो।’ यासिर उस्मान की किताब के मुताबिक, इन खबरों से फिल्म इंडस्ट्री में सनसनी फैल गई। हालांकि, संजय दत्त और रेखा दोनों ने इन दावों को सिरे से खारिज कर दिया। एक इंटरव्यू में संजय ने साफ कहा था कि रेखा से मेरा कोई रिश्ता नहीं है। मेरी शादी की खबर पूरी तरह साजिश और झूठ है। यहां तक कि मेरी तथाकथित गुप्त शादी की कहानी भी गढ़ दी गई। संजय ने कहा था कि कुछ रिपोर्टों में तो यह तक लिखा गया कि शादी के 15 दिन बाद वे रेखा को अपने पिता सुनील दत्त से आशीर्वाद दिलाने ले गए, लेकिन सुनील दत्त ने उन्हें घर से बाहर निकाल दिया। संजय ने इन सभी दावों को मनगढ़ंत बताते हुए कहा था कि उन्होंने कभी रेखा से शादी नहीं की। उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें समझ नहीं आता कि उनका नाम रेखा के साथ क्यों जोड़ा जा रहा है, जबकि वे जानते हैं कि रेखा का रिश्ता फिल्म इंडस्ट्री के एक बड़े शख्स से है। संजय का मानना था कि यह अफवाह इसलिए भी फैली क्योंकि वे उस समय अस्पताल में भर्ती अमिताभ बच्चन से मिलने नहीं जा सके थे। जेल में बहनों को दो-दो रुपए के कूपन दिए थे साल था 1994 और महीना था जुलाई। अवैध रूप से हथियार रखने के मामले में संजय दत्त की अंतरिम जमानत अदालत ने रद्द कर दी और उन्हें ठाणे सेंट्रल जेल भेज दिया गया। उन्हें जेल की सबसे कड़ी सुरक्षा वाली अंडा बैरक में रखा गया। यह वही जगह थी, जहां खतरनाक अपराधियों और टाडा के आरोपियों को रखा जाता था। करीब 10x10 फीट की उस छोटी-सी कोठरी में न धूप आती थी और न ही बाहर की दुनिया दिखाई देती थी। एक छोटा-सा बल्ब, एक गद्दा और कोने में बिना फ्लश वाला शौचालय। संजय दत्त ने बाद में बताया था कि शुरुआती डेढ़ महीने तक उन्हें दूसरे कैदियों से मिलने तक की इजाजत नहीं थी। अकेलापन इतना बढ़ गया कि उन्होंने समय काटने के लिए चींटियों को घंटों चलते हुए देखना शुरू कर दिया था। बाहर पिता सुनील दत्त लगातार बेटे की जमानत के लिए नेताओं, वकीलों और अधिकारियों के चक्कर लगा रहे थे। बहनें प्रिया और नम्रता भी नियमित रूप से जेल जाती थीं, लेकिन अक्सर सिर्फ दूर से ही संजय को देख पाती थीं। वहीं, रक्षाबंधन पर बहनों ने जेल में उन्हें राखी बांधी। उस समय संजय के पास देने के लिए कोई गिप्ट नहीं था। उन्होंने अपनी बहनों को सिर्फ जेल की कैंटीन के दो-दो रुपए वाले चाय-नाश्ते के कूपन दिए और कहा था, ‘मेरे पास फिलहाल यही है।’ बेटी के एक्टिंग करने पर बोले थे- टांगें तोड़ दूंगा संजय दत्त की बड़ी बेटी त्रिशाला दत्त का जन्म 1988 में उनकी पहली पत्नी रिचा शर्मा से हुआ था। जब वह सिर्फ 8 साल की थीं, तब ब्रेन ट्यूमर के कारण उनकी मां का निधन हो गया। इसके बाद उनका पालन-पोषण न्यूयॉर्क में नाना-नानी ने किया। त्रिशाला कभी बॉलीवुड में अभिनेत्री बनना चाहती थीं, लेकिन संजय दत्त इसके सख्त खिलाफ थे। 2016 में फिल्म 'भूमि' के प्रमोशन के दौरान उन्होंने कहा था, ‘त्रिशाला एक्ट्रेस बनना चाहती थी और मैं उसकी टांगें तोड़ देना चाहता था।’ संजय दत्त ने यह भी कहा था, ‘मैंने उसे एक अच्छे कॉलेज में भेजने के लिए अपना बहुत समय और एनर्जी लगाई है। उसने फोरेंसिक साइंस में विशेषज्ञता हासिल की है और मुझे लगता है कि यह एक बेहतरीन करियर है।’ सलमान की BMW की चाबी समुद्र में फेंक दी थी संजय दत्त और सलमान खान की दोस्ती बॉलीवुड में मिसाल मानी जाती है। हालांकि, एक बार ऐसा भी हुआ था जब संजय दत्त, सलमान से नाराज हो गए थे। इस किस्से का खुलासा खुद सलमान ने रजत शर्मा के शो में किया था। सलमान ने बताया था कि सोहेल खान की फिल्म 'मैंने दिल तुझको दिया' में संजय दत्त ने दोस्ती की खातिर गेस्ट अपीयरेंस किया था। शूटिंग पूरी होने के बाद संजय दत्त सलमान के घर पहुंचे, जहां पार्टी चल रही थी। उसी दौरान सलमान के पास नई BMW M5 आई थी। वह संजय दत्त को बाहर ले गए और बोले, ‘बाबा, यह देश की पहली BMW M5 है और मैं चाहता हूं कि यह आपके पास हो।’ इतना सुनते ही संजय दत्त ने सलमान को धन्यवाद कहा, लेकिन अगले ही पल कार की चाबी उठाकर सीधे समुद्र में फेंक दी। चाबी समंदर में चली गई और क्योंकि कार की केवल एक ही चाबी थी, इसलिए वह कई दिनों तक घर के बाहर ही खड़ी रह गई। सलमान ने बताया था कि उस चाबी को ढूंढ़कर निकालने में पूरे चार दिन लगे थे। ………….. यह खबर भी पढ़ें… अमजद खान की पुण्यतिथि:डिलीवरी के बाद बीवी को घर लाने के पैसे नहीं थे; ₹1.27 करोड़ की फीस अटकी, परिवार ने अंडरवर्ल्ड की मदद ठुकराई ‘मैं वो आदमी था, जो रोज 4–5 घंटे कसरत करता था। बैडमिंटन खेलता था, फ्री-हैंड एक्सरसाइज करता था, वेट उठाता था... लेकिन फिर एक एक्सीडेंट हुआ और मैं तीन महीने तक बिस्तर पर पड़ा रहा।’ एक पुराने इंटरव्यू में दिवंगत एक्टर अमजद खान ने अपनी जिंदगी का सबसे दर्दनाक दौर याद करते हुए यह बात कही थी। पूरी खबर यहां पढ़ें…

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Update: Baltic shipwreck champagne was destined for Tsar Alexander II

Meticulous research into the bottles of champagne found in a shipwreck discovered in the Baltic sea south of the Swedish island of Öland in July 2024, has uncovered that they were destined for the table of Tsar Alexander II.

The well-preserved remains of the 19th century ship were found 190 feet deep by technical divers from the Baltictech Association. The ship stayed upright when it sank to the seabed, and the cold waters of the Baltic were ideal storage conditions for dozens of glass wine bottles and stoneware Selters mineral water bottles.

An expert in historic pottery identified the stamp on the Selters bottles as the emblem of the German Duchy of Nassau which the company used on its labels between 1836 and 1866. The cork on one of the Champagne bottles bore the faint imprint of Louis Roederer Champagne House of Reims.

Baltictech returned to the wreck site for a follow-up dive in 2025. They recovered a ceramic plate of the British Davenport company which could be dated to 1856. Since the plates didn’t linger in inventory, the ship must have begun its ill-fated voyage in late 1856 or early 1857.

All of this information helped Baltictech researchers to identify the ship as one sent by Adolf, Duke of Nassau, to Tsar Alexander. It was laden with champagne, mineral water, wine leather hides and porcelain. The champagne was an official state gift for the Tsar, who had ascended the throne when the Baltic was under blockade by Britain during the Crimean War. When Russia signed a treaty that ended the war in 1856, the blockade was lifted and heads of state like the Duke of Nassau hastened to reestablish relations.

The team reached out to Louis Roederer to find out more about the bottles, perform chemical analyses of the liquid inside the bottle and advise them on recovering a few samples. As luck would have it, one of Roederer’s champagne experts, Peter Liem, is also an experienced technical diver, so he was able to go down to the wreck and point specific bottles to recover. One was tested in Sweden, and several sent to Louis Roederer Champagne House in Reims for analysis.

The champagne contains 110 grams of sugar per liter and 12% alcohol and it is not just still drinkable, according to Peter Liem, it is “glorious:”

[P]atinated, authoritative, and immeasurably complex, this wine is not only alive, but downright vibrant and delicious to drink. It’s reminiscent of shiitake, saffron, kombu, saddle leather, cigar box, roasted coffee, with a fervent vitality and piercing intensity like a great amontillado. We believe that it’s from the 1857 vintage, although we are continuing to try to verify this for certain: if so, it was on its way to Tsar Alexander II in St. Petersburg.

Baltictech has requested a permit for a third exploration of the wreck. They hope to locate the ship’s bell and to excavate deep into the lowest levels of the cargo hold, looking for objects mentioned in the ship’s manifest that have yet to be found.



* This article was originally published here

Bill Oddie: Comedian who found nature a welcome refuge from mental illness

One of Britain's best known comedians and naturalists, his life was plagued by bouts of acute depression which saw many visits to psychiatric hospitals.

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Bill Oddie: Comedian who found nature a welcome refuge from mental illness

One of Britain's best known comedians and naturalists, his life was plagued by bouts of acute depression which saw many visits to psychiatric hospitals.

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Archaeologists find gold in rubble at Vindonissa

The excavation of the site of Vindonissa, the first Roman military camp in Switzerland, has uncovered remains from the early formative period of the ancient camp, including the southern timber-and-earth wall, the legionary barracks building and the forge of the field smithy.

The southern defensive wall, located 230 feet from the wall of a later fortress, is long enough to give archaeologists new evidence of the size and layout of the first camp. The barracks was discovered in the west of the site under a later road. It was a structure 30 feet wide and at least 100 feet long. It had regularly-arranged rooms and ante-chambers. This was where the first legionaries who arrived in Switzerland lived before the construction of the permanent fortress.

Other structures found include the remains of a small building just inside the first camp wall that was likely a small workshop. Next to it was an even older building from Vindonissa’s first phase containing the hearth of a field forge.

Notable artifacts were discovered in debris layers outside the later permanent fortress walls. They include coins ranging in date from the Roman Republic through Late Antiquity, blacksmithing equipment, leatherworking tools and one stone of a Roman mill. Two metal fittings believed to be the handles of a scalpel, one carved in the shape of animal head, are now being conserved in the restoration laboratory.

One of the coins was unexpectedly valuable: a gold aureus minted during the reign of Tiberius. Coin finds at the site are typically bronze and silver. Another valuable object is a carnelian intaglio carved with an image of Victoria, goddess of victory, holding her staff and wreath.



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Decoding Charli XCX's new album, Music, Fashion, Film

The star's new album strips away artifice to examine her life after the phenomenal success of Brat.

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5,000-year-old spear-throwers used to hunt camelids in Chile

Wooden hunting tools discovered in an ancient settlement in northern Chile’s Atacama Desert have been identified as spear-throwers used by the coastal peoples to hunt wild camelids. A recent study has reexamined them and the radiocarbon results date them to around 5,000 years ago. Archaeologists believe they were used to hunt guanacos and vicuñas, wild relatives of llamas who inhabited the area.

The spear-throwers from Caleta Huelén 42 analysed in new study. Photo courtesy Ballester, B., & de Souza, P. (2026).

A variety of wooden objects were discovered during excavations at Caleta Huelén 42 archaeological site between 1971 and 1973. The settlement was at the mouth of the Loa River, just a half mile from the Pacific coast. The Atacama Desert, one of the world’s driest, meets the ocean there. The arid conditions preserved organize materials, including 12 carved wood objects and other tools employed by the Late Archaic marine hunter-gatherers who lived there between 6000 and 4000 years ago.

Under dwelling floors and in densely-packed middens, archaeologists unearthed collective burials with grave goods including textiles, pipes and hunting tools, plus tools used to catch fish including fishing line, hooks, harpoons and weights.

The most complete example from Caleta Huelén 42 is approximately 28 centimetres long. It retains a carefully shaped handle and part of a bone hook secured with a loop of leather or sinew.

Seven of the nine studied objects share a recognisable design: a defined handle, a flattened central body and a narrower projection that once held or supported the dart. Some contain grooves that may have helped position the projectile, while two have small perforations near their handles, possibly for attaching a cord or improving the hunter’s grip.

They were not simple pieces of carved wood. Their makers combined dense hardwood with bone hooks, leather or sinew bindings and, in some cases, red pigment. The surfaces were scraped or polished until they became smooth and regular. The variety of components visible in the collection shows that these were carefully assembled technical instruments rather than roughly fashioned sticks.

That raised the question of what spear-throwers would have been used for by people who fished hunted marine animals. They already had specialized harpoons. Land animals, camelids specifically, were native to the region and their remains have been found at other coastal sites.

Some of their bones were transformed into tools used in the maritime economy, including components for harpoons and fishhooks. Hunting animals inland may therefore have supported life at the coast in ways that extended far beyond food.

Evidence from the interior Andes strengthens this interpretation. Rock art and archaeological finds show hunters using darts and spear-throwers to capture camelids. Similarities between the Chilean objects and a spear-thrower found roughly 500 kilometres away near the Doncellas River in north-western Argentina may also reflect exchanges of knowledge between coastal and inland communities.



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BBC's Fake or Fortune uncovers 'enormously important' painting worth £100,000

The painting by the 18th Century Scottish artist Katherine Read is thought to be worth more than £100,000.

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The painting by the 18th Century Scottish artist Katherine Read is thought to be worth more than £100,000.

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Gold jewelry, signet ring found on Byzantine shipwreck

Archaeologists have discovered a shipwreck off the coast of Croatia containing an extraordinary wealth of gold jewelry, coins, pottery and a signet ring that may have belonged to one of the most important functionaries in the Byzantine Empire. It dates to the late 7th or early 8th century, a period from which few written records have survived, making this discovery all the more important.

When the ship sank off of Mljet island in the Adriatic Sea, it was carrying commercial cargo and a likely high-ranking Byzantine official as a passenger. Mljet was located on an active shipping route between Western and Eastern Europe, linking northern Italian cities including Ravenna and Venice to Constantinople and other Byzantine cities of the Near East. Despite the maritime activity, only one other Byzantine wreck has been found, and it dates to the 11th century so this one is much older.

The remains of the ship were first surveyed in 2014 by a team of underwater archaeologist with the Croatian Conservation Institute. The shapes of the amphorae made it clear that this was a Byzantine ship from the 8th century. Located at a depth of 460 feet on a steep seabed, conditions were so challenging dives could only be done over a few weeks during the summer. A decade of slow, targeted excavations ensued. Every stage — sectioning, documentation, excavation — took longer than it would have in an easier spot to ensure that best archaeological practices were followed. The most recent maritime exploration discovered a unique treasure of men’s gold jewelry and fittings.

The most remarkable finds include four gold belt sets, gold buckles and decorative belt ends adorned with emeralds, rubies and pearls. These luxurious objects once decorated the leather belts of senior Byzantine dignitaries. According to the Institute, comparable items have never previously been discovered at an underwater archaeological site in the Mediterranean.

Researchers also recovered gold coins depicting four emperors from the Heraclian dynasty, dating from the end of the 7th century. The coins are particularly important because they may help archaeologists establish more precisely when the ship sank.

One of the most intriguing discoveries is a gold ring bearing the image of an emperor from the Heraclian dynasty. Such a ring could only have belonged to someone at the highest level of the Byzantine state or military administration—an individual authorised to seal imperial documents.

The ship also carried standard commercial goods, like amphorae used to transport oil and wine, ceramic dishware like bowls, jugs and plates, ivory game tokens and dice. Archaeologists believe the ship may have been on a diplomatic mission, to deliver tribute to an ally. One of the gold belts is very similar to one found in an Avar tomb on the mainland, suggesting the objects were manufactured in the same workshop and then sold.



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Meta glasses banned by Comic-Con promoter after 'secret filming'

A number of guests said they would be reluctant to appear at conventions again after cases of recordings taking place without their knowledge.

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Hoard of Roman Republic denarii found in central Germany

A unique group of silver denarii from the time of the Roman Republic has been discovered in Halle, central Germany. There are only five coins, but they are of oversized archaeological significance because this the first documented hoard of Republic-era coins found in Saxony-Anhalt. As there are no coins from the imperial era in the group, archaeologists believe the coins arrived in Halle at the turn of the millennium or just after.

The hoard was discovered in 2025 by metal detectorist volunteer archaeologist Dirk Braungardt. They were grouped in a very small area, but had likely been moved apart from their original deposit cluster by plowing, erosion of animal activity. No remains of a container were found; archaeologists believe they were probably buried in a purse that has decomposed.

The coins are all silver denarii and they were already very old when they reached Germany. The oldest dates to 148 B.C. The remaining four were minted between 82 and 79 B.C. They are heavily worn and were clearly in circulation for many years.

It is striking that four of the five coins were minted within a very short period (82 to 79 BC). Also noteworthy is the presence of three so-called serrati, denarii with a serrated edge – in two cases even bearing graffiti. The purpose of the serration is disputed. It is debated whether it served as proof that the coin was made entirely of silver, as protection against clipping, or purely for decorative purposes. The historian Tacitus describes a predilection for such coins among the Germanic tribes. However, this seems rather unlikely in light of all the Roman coin finds discovered so far in the Barbaricum.

Republican denarii were legal tender and used through the end of the 1st century A.D., although there was no monetary economy in what is now Saxony-Anhalt when the coins likely arrived there, so they didn’t circulate as currency. Instead, they probably reached Halle from long-distance trade, diplomatic gifts, tribute or military loot.

This find is of particular significance for Saxony-Anhalt. To date, only 19 republican coins are known from the present-day territory of the state. Almost all were discovered as individual finds. Imperial-era coins have also been found at more than half of the sites. […]

The find is also of great significance in a supra-regional comparison. While considerably more Republican denarii have been documented in Thuringia and Lower Saxony, both as individual finds and as components of hoards, their density decreases significantly to the northeast.



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