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» » » संडे जज्बात-बेटे की मौत पर भगवान की मूर्तियां फेंकी थीं:शेखर सुमन बोले-आज की कॉमेडी में फूहड़ता, बेहूदगी चल रही, बहुत गुस्सा आता है

एक छोटा सा परिचय है मेरा, नाम है शेखर सुमन और मैं एक अभिनेता हूं। मैंने कॉमेडी अच्छे मकसद से की, लेकिन आज की कॉमेडी दिशाहीन है। उसमें छिछोरापन है। चार्ली चैपलिन ने द ग्रेट डिक्टेटर में कॉमेडी की थी, जिसके पीछे एक अच्छा मकसद और संदेश था। सोशल मीडिया पर कोई रोक-टोक नहीं है, जिसका जो मन कर रहा है, वो परोस रहा है। लोग वहां गालियां देते हैं। टीवी डिबेट्स में एंकर कूदते-उछलते हैं। लोगों के साथ बदतमीजी से पेश आते हैं। यह सब देखकर बहुत हैरानी होती है। आखिर समाज किधर जा रहा है? हम गाली-गलौज में ही लगे रहेंगे तो मोहब्बत कब करेंगे? मेरे बेटे आयुष का जब मौत हुई तो मैंने मंदिर जाना बंद कर दिया था, घर में रखी सारी मूर्तियां फेंक दी थीं, लेकिन धीरे-धीरे फिर से ईश्वर में भरोसा पैदा हुआ। दरअसल, मेरी कला की दुनिया दिल्ली के श्रीराम सेंटर से शुरू होती है, जब मैं पटना से वहां आया था। प्रोफेशनल स्टेज आर्टिस्ट था। गुजरे जमाने की एक्ट्रेस शम्मी जी एक फिल्म के लिए दिल्ली में खूबसूरत एक्टर की तलाश कर रही थीं। वह श्रीराम सेंटर आईं। सभी ने कहा कि शेखर को ले जाइए। फिर उनकी फिल्म में मुझे रोल मिला था। मैंने उसी समय शम्मी जी से उनका कॉन्टैक्ट नंबर मांग लिया था। जमीन पर गिरे एक कागज पर नोट करते हुए उनसे कहा था जब भी मुंबई आऊंगा तो आप मेरा फोन जरूर उठा लीजिएगा। मैंने उस कागज को दो साल संभाल कर रखा था। अगर वह खो जाता तो आज जहां हूं, वहां तक न पहुंचता। फिर दिल्ली से 80 के दशक में मुंबई आया और शम्मी जी को कॉल किया। उन्होंने कहा कि मैं आपको शशि कपूर से मिलाती हूं। शशि जी से मुलाकात के बाद लगभग 15 दिन में ही मुझे उत्सव जैसी सुपरहिट फिल्म मिल गई थी। बतौर अभिनेता मेरी खुशकिस्मती रही कि बाकी लोगों की तरह मुझे मुंबई में संघर्ष नहीं करना पड़ा। जैसे कि- मरीन लाइन या रेलवे के प्लेटफॉर्म पर रातें गुजारना या चने खाकर दिन गुजारना। मैं आज भी हैरान होता हूं कि मेरे साथ वह सब कैसे हुआ था। मुझे उत्सव फिल्म का नायक होने का गर्व है। इस फिल्म के लिए एक स्क्रीन टेस्ट हुआ था। पहले तो मुझे लगा था कि उस भूमिका के लिए मैं अकेला टेस्ट देने आया हूं, लेकिन स्क्रीन टेस्ट दिन 150 लड़के आए हुए थे, फिर मैं थोड़ा परेशान हो गया था। हालांकि टेस्ट के बाद फिल्म के निर्देशक गिरीश कर्नाड ने कहा कि सभी ने बहुत अच्छा किया है और अब सभी घर जा सकते हैं, सिवाय शेखर सुमन के। उस समय मेरा दिल धड़क रहा था, लेकिन यकीन हो गया था कि मेरा सिलेक्शन हो गया है। सभी के जाने के बाद गिरीश जी ने मुझसे कहा कि आपने कमाल कर दिया है, लेकिन अभी शशि कपूर और उनकी पत्नी भी इसे देखेंगी और फिल्म की एक्ट्रेस रेखा को भी हां करना है। उसके बाद शशि कपूर जी ने मुझे उत्सव फिल्म ऑफर कर दी। सब कुछ इतना जल्दी हो गया कि मुझे यकीन नहीं हो रहा था। हालांकि एक नए लड़के के लिए उस स्क्रीन टेस्ट की दहलीज तक पहुंचना भी कम नहीं था। उस समय भी मेरे जैसे लाखों, करोड़ों लड़के रहे होंगे जो मुझसे ज्यादा काबिल थे। मगर यही कहूंगा कि वह मेरी किस्मत थी कि मुझे चुना गया। मुझे याद है कि उत्सव फिल्म मिलने के बाद मैं पागलों की तरह मुंबई की सड़कों पर दौड़ रहा था। पृथ्वी थिएटर से सीधे भागते हुए मुंबई के अंधेरी में बहन के घर पहुंचा। उनका घर तीसरी मंजिल पर था, लेकिन खुशी के मारे मैं उस दिन 5वी मंजिल पर चढ़ गया था। दरवाजे की घंटी बजाई और खुलते ही जोर-जोर से कहने लगा कि मुझे फिल्म मिल गई है, तो उस घर में रहने वाले परिवार ने कहा कि आप गलत फ्लोर पर आ गए हैं। फिर मैं वापस तीसरी मंजिल पर गया। मेरी बहन भी खुशी से पागल हो गई थीं। उन्हें भी यकीन नहीं हो रहा था मुंबई आते ही मुझे कैसे इतनी जल्दी फिल्म मिल गई। उत्सव फिल्म में रेखा के साथ काम करना मेरे लिए बड़ी बात थी, जिन्हें स्कूल टाइम से देख रहा था। याद है कि शूटिंग का पहला दिन था। गिरीश कर्नाड ने मेरा हौसला बढ़ाते हुए कहा था कि घबराना नहीं है। सीन में आप और रेखा लेटे हुए बातें कर रहे हैं। आप कैरेक्टर में शेखर सुमन नहीं चारुदत्त हैं और रेखा वसंत सेना। ऐसा मत सोचना कि रेखा को कैसे आगोश में लूं, उनके ऊपर हाथ कैसे रखूं। वह बहुत प्रोफेशनल एक्ट्रेस हैं। फिर जब शूटिंग शुरू हुई तो मैंने रेखा के ऊपर हाथ रखा, रेखा ने गिरीश कर्नाड की तरफ देखा और बोलीं कि यह तो बहुत मंझा हुआ लगता है, इसे जरा भी डर नहीं लग रहा है। गिरीश कर्नाड ने मजाक में कहा- हां यह तकिया लेकर पूरे दिन इस सीन की प्रैक्टिस कर रहा था। उसके बाद तो सिलसिला ऐसा चला कि मैंने अलग-अलग किरदार निभाए। कुछ लोग कहते हैं कि मेरी कोई नकल नहीं करता। दरअसल, मेरी कोई छवि ही नहीं है। जिस दिन किसी कलाकार की छवि बन जाए, वह बतौर कलाकार उसी दिन खत्म हो जाता है। मेरे लिए हर किरदार पुनर्जन्म लेने जैसा होता है। जैसे कि उत्सव के बाद, नाचे मयूरी में मेरी नकारात्मक भूमिका रही, त्रिदेव में पत्रकार और हाल ही में संजय लीला भंसाली की नेटफ्लिक्स सीरीज हीरामंडी में नवाब जुल्फिकार की एक अलग भूमिका में। इन दिनों तो साहिर और अमृता प्रीतम की प्रेम कहानी पर एक नाटक कर रहा हूं। उसमें बेहतरीन उर्दू बोल रहा हूं। लोग देखकर दंग हैं कि आप वही हैं, जिसे मैंने फलां फिल्म में देखा था। दरअसल, इसके लिए बहुत मेहनत करनी पड़ती है। हर किरदार को 100 फीसदी ज्यादा देता हूं। जैसे- टेढ़ी बात प्रोग्राम में मैंने 52 किरदार अदा किए थे। कलाकार की शख्सियत पानी की तरह होनी चाहिए, जिसमें वह मिले, वैसा हो जाए। मैंने मूवर्स एंड शेकर्स शो में लालू जी की खूब मिमिक्री की। लोग कहते थे कि लालू जी आपसे नाराज हो जाएंगे, लेकिन एक शादी में जब लालू जी से मेरी मुलाकात हुई तो उन्होंने मुझे इतनी जोर से गले लगाया, जैसे मेरी सांस ही थम गई हो। लगा कि कहीं वह वाकई बदला तो नहीं ले रहे, लेकिन उन्होंने कहा- आप बोलें उससे पहले मैं ही बोल देता हूं 'एनी पब्लिसिटी इज ए गुड पब्लिसिटी' यानी हर पब्लिसिटी, अच्छी पब्लिसिटी होती है, आप मेरी मिमिक्री करते रहिए मुझे कोई परेशानी नहीं है। हालांकि एक बार बीजेपी नेता प्रमोद महाजन जरूर नाराज हो गए थे। दरअसल, पोल खोल नाम से एक शो करता था। उन्होंने मुझे फोन करके कहा- आप मेरे बारे में क्या बोल रहे? मेरे पॉलिटिकल करियर पर असर पड़ेगा। मैंने उन्हें समझाया था- देखिए मैं कोई नेता या टीवी एंकर नहीं हूं, कलाकार हूं। ये संवाद मेरा लिखा हुआ नहीं होता, मुझे तो यह काम सौंपा गया है और मैं उसे जिम्मेदारी से निभा रहा हूं। अगर इसे मैं नहीं करूंगा तो कोई और आकर करेगा। फिर वह समझ गए। वह शो जारी रहा। उस दौरान एक बार दिल्ली से फ्लाइट से आ रहा था। मेरे पीछे की सीट पर प्रमोद महाजन जी बैठे थे। उन्होंने पीछे से मेरे कंधे पर हाथ रखा। मैं मुड़ा तो वह मुझसे गले मिले और कहने लगे कि मैंने जो कुछ कहा था उसके लिए माफी चाहता हूं। अपने शब्द वापस लेता हूं। उसके बाद उन्हें मूवर्स एंड शेकर्स शो में बुलाया था। उन्होंने शो में बताया कि मैं ड्रम्स बजा लेता हूं। उस दिन उन्होंने शो पर ड्रम बजाकर दिखाया और उनका एक नया रूप देखने को मिला था। आज कॉमेडी देखता हूं तो लगता है कि ये दिशाहीन लोग हैं। ये रातोंरात शोहरत और पैसे के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं। फूहड़ता परोस रहे हैं, बेहूदगी और छिछोरापन चल रहा है। दरअसल, सोशल मीडिया का यही दुखद पहलू है कि यहां हर कोई रातोंरात फेमस होना चाहता है और बस लाइक्स और तारीफ चाहता है। आखिर छिछोरी कॉमेडी से मिली शोहरत बेमानी है। सोशल मीडिया पर वायरल होने का ट्रेंड है। यह वायरल फीवर की तरह है। जो चार-पांच दिन बाद खुद चला जाता है। इसी तरह की इनकी कॉमेडी का असर होता है। ये लोग समाज को क्या से क्या बना रहे हैं। बेशक, जमाना बदला है, नयापन होना चाहिए। मैं नहीं कहता कि आप बाबा बन जाइए, प्रवचन दीजिए, लेकिन भाषा पर नियंत्रण तो होना ही चाहिए। मैंने तो कॉमेडी बस एक प्रयोग के तौर पर की। मैं एक जहीन और गंभीर एक्टर हूं, लेकिन यह देखना चाहता था कि आखिर कॉमेडी का जायका क्या है। कुछ बातें तो हंस खेल कर भी कही जा सकती हैं। कॉमेडी का मकसद सिर्फ हंसाना नहीं है, जिसके लिए आप फूहड़ भी हो जाएं, गंदगी परोसें। यह सब देखकर गुस्सा, बहुत गुस्सा आता है। गंदा बोलना कॉमेडी नहीं होती। कॉमेडी के पीछे भी अच्छा मकसद होता है। उसमें एक एकेडमिक, आध्यात्मिक रिसर्च होनी चाहिए। आखिर आपने जो सोचा, उस सोच के पीछे कोई सोच ही नहीं, तो फिर वह सोच बेकार है। चार्ली चैपलिन भी कॉमेडी करते थे। उनकी कॉमेडी के पीछे भी कोई गहरी बात छिपी होती थी। खासकर, उनका द ग्रेट डिक्टेटर में रोल देखिए। कैसे वह अपने रोल में एक ग्लोब से खिलवाड़ करते हैं, उसे जूते के नीचे रखकर दुनिया को गहरा संदेश देना चाहते हैं। दरअसल, मेरे लिए ऊंचाई का मतलब ही गहराई है। आप जितना गहरा उतरेंगे, उतना ही खुद को ऊंचा पाएंगे। ऊंचाई का मतलब पहाड़ की चोटी पर पहुंचना नहीं होता। जब तक यह सब ध्यान में नहीं रखा जाएगा, गलतियां होंगी। मेरे लिए हंसी मायने नहीं रखती। मैं यह बात सख्ती से कह रहा हूं कि मेरा हंसी से ऐसा नाता है जैसे जमीन का आकाश से, लेकिन चूंकि यह मेरा प्रोफेशन है, इसलिए कॉमेडी करता हूं। मेरा काम हंसना या हंसाना नहीं है। दरअसल, यह किसी भी इंसान का काम नहीं होता। जिंदगी में नौ रस होते हैं, हर रस का स्वाद चखना होता है। कॉमेडी करना मेरी जिंदगी का हिस्सा नहीं था। मुझे पैसे चाहिए थे इसलिए किया। मेरे पास संजीदा काम होता तो कॉमेडी न करता। कॉमेडी बहुत सतही चीज होती है। उसमें गहराई नहीं होती। कई बार कोफ्त होती है। मूवर्स एंड शेकर्स जैसे चलते शो को मैंने छोड़ दिया। मैं हंसाने के लिए नहीं, दूसरे काम के लिए पैदा हुआ हूं। आज सोशल मीडिया पर कुछ भी कहने की छूट है। खुला खेल फर्रुखाबादी है। कोई कुछ भी बोल कर, किसी को गरिया कर चला जाता है। ऐसे लोग खुद को तुर्रम खां समझते हैं। आखिर ट्रोलिंग में क्या ही बहादुरी की बात है? आप गुमनाम चेहरे से आईडी बनाकर किसी को भी आकर गाली देते हैं। इसका मतलब है कि आप जाहिल और अनपढ़ इंसान हैं। इससे तो सिर्फ गाली-गलौज का समाज बनेगा। फिर हम एक-दूसरे से प्यार-मोहब्बत कब करेंगे? हर चीज में तल्खी, कड़वाहट, नफरत क्यों? आखिर हम किधर जा रहे हैं? आज हर जगह आक्रोश, गुस्सा दिख रहा है। टीवी डिबेट्स को देख लीजिए। उसमें एंकर की सबसे बड़ी गलती होती है। अगर वह बदतमीज है, तो सभी बदतमीज हो जाते हैं। वह शालीन रहे तो लोग खुद-ब-खुद शालीन रहते हैं। अगर एंकर ही कुर्सियों से उछल-उछल कर सभी को डांटेगा, जो कि उसका हक नहीं है तो डिबेट कैसे होगी? उसे तटस्थ रहना चाहिए। लेकिन वह लोगों पर चिल्लाए, पक्षपात करे, पूर्वाग्रह से ग्रसित हो तो स्थितियां और बिगड़ती चली जाएंगी। यह सब देखकर हैरानी होती है। खासतौर पर कलाकारों को नसीहत देना चाहूंगा कि आप जो पहनते हैं, बोलते हैं, करते हैं, उसका लोगों पर बड़ा असर होता है। हां मानता हूं कि कभी-कभी गलती हो जाती है, लेकिन पब्लिक के सामने सोच-समझ कर बोलें, वक्त लेकर बोलें। मेरे बड़े बेटे की असमय मौत हो गई। विडंबना है कि उसका नाम आयुष था, जिसका मतलब होता है लंबी आयु, लेकिन वह बहुत जल्दी हमें छोड़कर चला गया। उस वक्त लगा था कि जिंदगी बिखर गई, इसे अब कैसे समेटूंगा। मुझे याद है कि उस दिन मैं उसके बगल में बैठकर उसका हाथ पकड़े हुए था। जब वह दुनिया को अलविदा कहने वाला था तो उसे एक दिव्य रोशनी दिखाई दी, जिसके बारे में वह लगातार बातें कर रहा था। वह 9-10 साल का था। अचानक वह संस्कृत के श्लोक पढ़ने लगा, जो कि उसे आता ही नहीं था। उस समय उसे देखकर सब हैरान थे। जाने से पहले उसने मेरा हाथ पकड़ा और कहा कि पापा मुझे नहीं जाना है। उसे एहसास हो रहा था कि वह जा रहा है। उसने सबको आई लव यू कहा। आप समझ सकते हैं हमारे ऊपर क्या गुजरी होगी। लेकिन प्लीज मैं इन सब के बारे में बात नहीं करना चाहता, यह सब बहुत निजी है। लोग सुन सकते हैं, समझ सकते हैं, लेकिन मेरा दर्द महसूस नहीं कर पाएंगे। दर्द आपको ही सहना होता है। बस बेटे की मधुर स्मृतियां बची हैं। हम हर दिन उससे बात करते हैं। कभी मंदिर में, तो कभी किसी कमरे में। मैं इस वक्त आपके कैमरे की तरफ देख रहा हूं, लेकिन मुझे सिर्फ उसका चेहरा नजर आ रहा है और वह मुस्कुरा रहा है। अब मैं उसे मुस्कुरा कर याद करता हूं। इस तरह की त्रासदी का पहाड़ जब आप पर टूटता है तो सबसे पहले आपका विश्वास भगवान से उठता है। मन में आता है कि भगवान ने मेरे साथ ऐसा क्यों किया, मैंने तो हमेशा उनकी पूजा की है। मैंने सबसे पहले मंदिर जाना बंद कर दिया। घर में भगवान की जो भी प्रतिमा थी, सब फेंक दी। मैंने कहा- जब आप मेरे बेटे को नहीं बचा सके तो आप काहे के भगवान हो। उस समय अंदर बहुत गुस्सा था। मैं महीनों रोता रहा। अपने जज्बात काबू नहीं कर पा रहा था, लेकिन फिर धीरे-धीरे लगा कि मैं इस दुनिया में अकेला नहीं हूं। मेरे जैसे बहुत सारे लोगों के साथ ऐसा हुआ है। मैं तो चाहता हूं कि हम सब एक-दूसरे का साथ दें। एक-दूसरे का सहारा बनें। आखिर सब ऊपर वाला तय करता है। फिर जिंदगी में किरण नजर आई और दोबारा उठ खड़ा हुआ। हमारी आस्था फिर से भगवान में स्थापित हुई है। साहिर साहब ने कहा है न- जो मिल गया उसे ही मुकद्दर समझ लिया, जो खो गया मैं उसको भुलाता चला गया, मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया। दूसरे बेटे अध्ययन सुमन के साथ मेरे बहुत अच्छे रिश्ते हैं। बाप-बेटा हों या बाप-बेटी खूबसूरत रिश्ता होता ही है। वह मेरा बेटा है, दोस्त है, सह कलाकार भी। वह दिल में बसी ताकत, धड़कन है, जिसे हर वक्त महसूस करता हूं। जिस तरह से पत्नी आपको पूरा करती है, वैसे ही बच्चा भी आपको पूरा करता है। हम उसकी खुशी, जद्दोजहद, उसके आगे बढ़ने का हिस्सा होते हैं। उसके दुख में शामिल होते हैं, उसकी खुशी में खुश होते हैं, बदमाशियों पर उसे डांट भी देता हूं। उसके साथ बहुत हसीन सा इश्किया रिश्ता है। बच्चा न हो तो जिंदगी बेमतलब होती है। एक को खो दिया, लेकिन दूसरा उसकी भरपाई कर रहा है। मैं अध्ययन को लेकर बिल्कुल आश्वस्त हूं। वह सफल, प्रतिभावान, मेहनती है। वह एक अच्छा एक्टर, अच्छा बेटा, अच्छा संगीतकार, अच्छा एडिटर, अच्छा निर्देशक है। इसी तरह सभी बच्चों में खूबी होती है। कोई बच्चा खराब नहीं होता। उसे जैसी परवरिश मिलेगी, वैसा बनेगा। बच्चों को कभी सफलता-असफलता के तराजू में नहीं तौलना चाहिए। बतौर एक्टर मैं अध्ययन को लेकर गौरवान्वित हूं। वह तमीज वाला, बड़े दिल वाला लड़का है। एक्टर तो बहुत अच्छे होंगे, लेकिन अच्छे मिजाज वाले इंसान कम होते हैं। मैं तो कहूंगा कि सभी के बेटे तरक्की करें। कोई गरीब, बीमार न हो, किसी को परेशानी न हो, खूबसूरत समाज की कल्पना की जाए। अध्ययन से कहूंगा कि अपना ख्याल रखो, लोगों का भी ख्याल करो। हम अक्सर अपने दायरे में बंध जाते हैं, फिर कोई और दिखाई नहीं देता। एक लाइन है न- प्रभु मुझे इतनी ऊंचाई कभी मत देना कि गैरों को गले न लगा सकूं…। लोग एक्सीडेंट में मर जाते हैं, समुद्र बहा ले जाता है, आप जिंदा हैं यही बड़ी बात है। मैंने जिंदगी को कभी सफलता और असफलता के दायरे में नहीं देखा। अगर आप में हुनर है और आप मेहनत कर रहे हैं तो सफल होंगे ही। दरअसल, एक्टर कभी फ्लॉप नहीं होता, फ्लॉप होती हैं फिल्में। हमेशा प्रोजेक्ट फेल होते हैं, इंसान नहीं। कोई अगर कहे कि आप फेल हो गए, तो निराश नहीं होना चाहिए। असफलता जिंदगी की सीख होती है। जब जिंदगी में भारी सफलता आती है तो हम उसे सेलिब्रेट करते हैं। साहिर जी ने लिखा है- बर्बादियों का सोग मनाना फ़ुज़ूल था, बर्बादियों का जश्न मनाता चला गया। बड़ा परदा, छोटा परदा ये सब बीमार लोगों की सोच है। मैं पहला एक्टर हूं जो बड़े परदे से छोटे परदे यानी टीवी पर आया। बस एक्टर होना ही काफी होता है। जैसे शहर का डॉक्टर हो या गांव का, हर जगह वह एक जैसा इलाज करता है। शाहरुख खान, सुशांत सिंह राजपूत ये सभी टीवी से फिल्मों में गए। एक बार कांग्रेस से चुनाव लड़ा था। मुझे लगा अगर मेरे पास पावर होगी तो ज्यादा लोगों की मदद कर सकूंंगा। हालांकि चुनाव में लड़ना शब्द बेकार लगता है। आखिर लड़ना क्यों, मुझे लड़ाई पसंद नहीं है। फिलहाल मैं चुनाव में शामिल हुआ। दरअसल, समाज में गरीबी, गुरबत, लोगों की परेशानियां, टूटे दिल देखता हूं तो बहुत परेशान होता हूं। उस समय मेरी हालत महात्मा बुद्ध जैसी हो जाती है। कई बार तो लगा कि कह दूं कि यह मेरी जिम्मेदारी नहीं। आप गरीब हैं, आपका दुर्भाग्य है। आपके पास अस्पताल, शिक्षा नहीं है तो ये आपकी किस्मत है? लेकिन ऐसा सोचना सही नहीं है। हम सबको मिलकर चीजें ठीक करनी है। मुझे दुख है कि चुनाव नहीं जीत सका। लोग पार्टियां देखकर वोट देते हैं, इंसान को नहीं। जिस दिन लोग इंसान देखकर वोट देने लगेंगे, सब ठीक हो जाएगा। आज भी बिहार के लिए काम करना चाहता हूं, खासकर शिक्षा, स्वास्थ्य के लिए। बिहार को लेकर बहुत सेंटिमेंटल हूं। मेरी भावनाएं मेरी मां और पिता के लिए जो हैं, वही बिहार के लिए हैं। बिहार की मिट्‌टी में पैदा हुआ, उसी की एक कल्पना हूं- अदना सी छोटा सी। मैं ही क्यों, हर कोई अपनी जगहों को लेकर सेंटिमेंटल होता है। कभी-कभी जब मैं मुखर होकर बोलता हूं तो पत्नी कहती हैं कि क्यों बोल रहे हो? तब मैं सोचता हूं आखिर सभी चुप रहेंगे, तो बोलेगा कौन? फिर समाज में सुधार कैसे होगा? (बॉलीवुड अभिनेता शेखर सुमन ने अपने ये जज्बात भास्कर रिपोर्टर मनीषा भल्ला से साझा किए हैं।) ---------------------------------------------------------------------- 1- संडे जज्बात-मां की जिद पर मैं निर्भया के खिलाफ लड़ा:जानता था बवाल होगा, पर वो कहने लगीं-तुझे 9 महीने मैंने पाला है, दुनिया ने नहीं मैं एडवोकेट एपी सिंह। वही एपी सिंह, जिसने निर्भया के दोषियों का केस लड़ा। पाकिस्तान से आने वाली सीमा हैदर का केस लड़ा। निर्भया केस के बाद देशभर के लोग मुझे जानने लगे। वह केस मैंने मां के कहने पर लड़ा था। मां ने कहा था उन बच्चों की मांओं के लिए तुझे केस लड़ना होगा, जिनके पति आरोपी हैं। पूरी खबर यहां पढ़ें 2 संडे जज्बात-मैंने आतंकियों से कहा-तुम मेरा हौसला नहीं तोड़ पाए:एयरहोस्टेस थी, बम ब्लास्ट में चेहरा बर्बाद हो गया; आज भी छर्रे शरीर में धंसे हैं मेरा नाम निधि खुराना चापेकर है। मैं जेट एयरवेज की एयरहोस्टेस रही हूं। बेल्जियम की राजधानी ब्रसेल्स में हुए आतंकी हमले की सर्वाइवर हूं। उस बम ब्लास्ट में मेरा शरीर बर्बाद हो गया। चेहरा बुरी तरह खराब हो गया है। बम से निकले ब्लेड्स आज भी मेरे शरीर में धंसे हुए हैं, जो निकाले नहीं जा सकते। डॉक्टर कहते हैं इन्हें निकालने से नसें डैमेज हो जाएंगी। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें

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