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‘Tis the season for boxes of body parts

Earlier this month, a person or persons unknown left a glass display case containing human remains in front of the Rhineland-Palatinate General Directorate for Cultural Heritage (GDKE) archaeological showcase in Speyer, Germany. The remains inside the case include skull parts, a mummified leg and textile fragments.

Display case with human remains ca 1,000 years old. Photo courtesy Rhineland-Palatinate Police Headquarters.

Staff called the police who confiscated the case. At first they thought it was a Halloween prank, but forensic pathologists examined the remains and determined they are at least 1,000 years old. After the police released a public request for information on October 23rd, the person who dropped the human remains and ran contacted the authorities the next day. He explained that the case had belonged to his now-deceased mother. She claimed that she found the remains decades ago in South America and brough them back to Germany. When the family was cleaning out her stuff, they decided it would be wrong to just trash this awkward assemblage, so they put it in front of the GDKE’s archaeological exhibit.

It makes an odd kind of sense, I suppose, and they clearly were hoping the GDKE archaeologists would give their random body parts a new home without running the risk of rejection, hence the secret deposit. As it happens, the GDKE does not in fact accept body parts of unknown origin for examination or storage. They only handle the ones they find in excavations.

Dropping mummified remains and running does not appear to be a crime, neither is owning them. If they had tried to sell them, that would definitely be a criminal offense, but obviously that did not occur here. Before the responsible parties came forward, police were pursuing the possibility that the case had been stolen from a museum or private collection, but found no evidence of any such items missing from anywhere. They have now investigated the explanation they’ve been given of the origins of the remains and it is credible. The police still intend to forward the report to the public prosecutor’s office for review, although no charges are expected to be filed.

Coincidentally, the Rhineland-Palatinate state parliament just passed a new law allowing people to choose their preferred form of burial. Previously, there was a legal requirement that (with exemptions for religious reasons) all deceased be inhumed in coffins or cremated and their ashes placed in urns for burial in cemeteries. The new law gives people the option of bringing ashes home, processing a portion of them into memorial pieces like gemstones or ceramics, scattering ashes outside of a cemetery or in designated locations on the state’s four major rivers (the Rhine, Moselle, Lahn and Saar). Bodies can also be shrouded and buried without a coffin.



* This article was originally published here

Backstabbing, dirty work and an iconic exit speech in Celebrity Traitors

It was the Alan Carr show again, as the comedian tackled a terrifying bridge in the latest episode of The Celebrity Traitors.

from BBC News https://ift.tt/GWzMwb8

गुलशन देवैया की शुरुआती तीन फिल्में नॉमिनेट हुईं:अवॉर्ड न मिलने पर छलका दर्द; शाहरुख खान की पार्टी में झिझके, ‘कांतारा’ से भरी नई उड़ान

गुलशन देवैया का बेंगलुरु से मुंबई तक का सफर आसान नहीं था, लेकिन उन्होंने अपने सपनों को कभी छोड़ा नहीं। फैशन इंडस्ट्री से थिएटर और फिर सिनेमा तक पहुंचे गुलशन की मेहनत, ईमानदारी और संवेदनशीलता ने उन्हें खास बनाया। उनकी तीन फिल्मों को नॉमिनेशन मिला, पर अवॉर्ड हाथ नहीं आया, जिसने उन्हें सिखाया कि फिल्मों में सफलता सिर्फ पुरस्कार नहीं बल्कि आत्मविश्वास और सच्चाई होती है। अनुराग कश्यप जैसे दिग्गजों का भरोसा और उनके अनुभवों में मिलने वाली चुनौतियां गुलशन की प्रतिभा को परखने का जरिया रहीं। साथ ही, शाहरुख खान की पार्टी में व्यक्तिगत छोटे-छोटे जेस्चर ने उनका दिल जीता। गुलशन का मानना है कि असली सफलता नाम और पैसा नहीं, बल्कि मन की शांति और ईमानदारी से जीवन जीना है। बहरहाल, गुलशन इन दिनों 'कांतारा चैप्टर वन' की सक्सेस को एन्जॉय कर रहे हैं। आज की सक्सेस स्टोरी में आइए जानें गुलशन देवैया के जीवन और करियर से जुड़ी कुछ खास बातें- फैशन डिजाइनर से निखरे थिएटर के मंच पर पहुंचे गुलशन 28 मई 1978 को बेंगलुरु में जन्मे गुलशन देवैया के पिता देवैया भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL) में कार्यरत थे। उनकी मां पुष्पलता जॉब के साथ-साथ थिएटर भी करती थीं। गुलशन ने अपनी प्राथमिक शिक्षा बेंगलुरु के क्लूनी कॉन्वेंट और सेंट जोसेफ इंडियन हाई स्कूल से पूरी की और बाद में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फैशन टेक्नोलॉजी (NIFT) से ग्रेजुएशन किया। गुलशन देवैया ने फैशन इंडस्ट्री में दस साल तक काम किया। लेकिन उनका असली झुकाव थिएटर और एक्टिंग की ओर था। बेंगलुरु में अंग्रेजी थिएटर में छोटे-छोटे रोल करके उन्होंने अभिनय में अपनी रुचि विकसित की। 30 वर्ष की उम्र में मुंबई आए। मुंबई आने के बाद थिएटर में उन्होंने अभिनय की बारीकियां सीखीं। किताबों, अनुभवों और लगातार कोशिशों ने उन्हें बिना किसी एक्टिंग स्कूल में गए तैयार किया। मुंबई आकर उन्होंने अनुराग कश्यप की फिल्म 'दैट गर्ल इन यलो बूट' (2010) से अपने फिल्मी करियर की शुरुआत की। वर्सोवा की गलियों में मिली पहली फिल्म अनुराग कश्यप की फिल्म का जिक्र करते हुए गुलशन कहते हैं- इस फिल्म की कहानी अनुराग कश्यप और कल्कि ने मिलकर लिखी। कल्कि को मैं पहले से जानता था। एक दिन उनका फोन आया तो उस वक्त मैं एक ऑडिशन देने के बाद वर्सोवा की गलियों मे घूम रहा था। मन खट्टा था क्योंकि मेरा ऑडिशन खराब गया था। बिना कुछ ज्यादा पूछे मैं चला गया। वहां अनुराग कश्यप मिले, उन्होंने एक दृश्य समझाया और कहा कि जब ऑडिशन के लिए तैयार हो तो बता देना। तीन-चार दिन बाद मैंने ऑडिशन दिया। अनुराग को पसंद आया और मुझे फिल्म के लिए फाइनल कर लिया गया। संघर्ष से संवेदना तक- सच्चाई और आत्मविश्वास की जर्नी मुंबई की चमकदार दुनिया में सच्चे बने रहना मुश्किल है, पर गुलशन देवैया ने यह साबित किया कि जब इंसान अपनी जड़ों और सोच के प्रति ईमानदार रहता है, तब उसकी पहचान देर-सबेर जरूर होती है। फैशन की दुनिया से सिनेमा के परदे तक, गुलशन का सफर आत्मविश्वास, संवेदना और वास्तविकता की खोज का रहा है। शुरुआत और सोच की स्पष्टता बेंगलुरु से मुंबई आने पर गुलशन के भीतर एक बात बिल्कुल साफ थी कि उन्हें बनावटीपन से दूर रहना है। उन्होंने तय किया कि इंडस्ट्री की गॉसिप और ‘राय’ उनके मन पर असर नहीं डालेगी। उनके लिए करियर का मतलब स्टेटस नहीं, बल्कि “आजादी ” है- अपना रास्ता खुद चुनने की स्वतंत्रता। तीन फिल्में नॉमिनेशन में थीं, पर अवॉर्ड नहीं मिला ‘दैट गर्ल इन यलो बूट्स’ के बाद गुलशन ने ‘शैतान’ और ‘दम मारो दम’ जैसी फिल्में कीं। तीनों फिल्मों को बेस्ट डेब्यू के लिए नॉमिनेट किया गया था। गुलशन कहते हैं- डेब्यू के वक्त लगा था कि बेस्ट डेब्यू अवॉर्ड मुझे ही मिलेगा, लेकिन नहीं मिला। मेरे डेब्यू साल में तीन फिल्में रिलीज हुईं- 'दैट गर्ल इन यलो बूट्स', 'शैतान' और 'दम मारो दम'। तीनों के रिव्यू अच्छे थे, हर किरदार अलग था, फिर भी अवॉर्ड नहीं मिला। तब समझ आया कि यहां अवॉर्ड्स सब्जेक्टिव होते हैं। उस समय कई लोगों का नामांकन ऐलान ही नहीं हुआ था। माहौल थोड़ा चैरिटी इवेंट टाइप का हो गया था, माधुरी दीक्षित वहीं स्टेज पर थीं। शायद टाइम खत्म हो गया था, इसलिए सपोर्टिंग एक्टर और डेब्यू जैसी कैटेगरीज का ऐलान नहीं हो पाया। मुझे पता ही नहीं था कि मेरा नाम नॉमिनेशन में है। शाहरुख ने जब स्टेज पर सभी नॉमिनीज को बुलाया, तो विद्युत जामवाल चला गया क्योंकि उसे पहले से बताया गया था। मुझे किसी ने नहीं बताया, इसलिए मैं नहीं गया। बाद में लोगों ने पूछा तो पता चला कि मेरा भी नाम था। थोड़ा दुख हुआ, लेकिन किसी ने जानबूझकर नहीं किया। अब मैं ऐसी बातों को गंभीरता से नहीं लेता। फिल्म ‘फोर्स’ के लिए मैंने भी ऑडिशन दिया था, पर वह रोल विद्युत के लिए सही था। मेरी तीन फिल्में नॉमिनेशन में थीं, लगा था जीतूंगा, लेकिन कोई बात नहीं। शाहरुख खान की पार्टी में बहुत अनकंफर्टेबल फील किया अवॉर्ड के बाद शाहरुख खान ने अपने घर पर पार्टी रखी थी। बहुत अनकंफर्टेबल फील कर रहा था। इतने बड़े लोग थे- शाहरुख, गौरी, करण जौहर, फरहान अख्तर... मुझे लगा मैं वहां फिट नहीं हूं। पर सब बहुत अच्छे थे। शाहरुख और गौरी ने बहुत ग्रेसफुल तरीके से ट्रीट किया। पार्टीज- इवेंट्स नेटवर्किंग के लिए फायदेमंद होते हैं गुलशन पार्टीज को नेटवर्किंग के लिए अच्छा मानते हैं। वह कहते हैं- कई बार लोग आपको जानते नहीं, तो पार्टी या किसी इवेंट में मिलने से पहचान बनती है। जैसे मैं राकेश ओमप्रकाश मेहरा से एक पूजा में मिला था। मैंने उन्हें अपना परिचय देते हुए कहा- "सर, मैं गुलशन देवैया हूं, अच्छा एक्टर हूं, मेरे बारे में गूगल कर लीजिए।" वो मुस्कुराए, लेकिन उसके बाद कुछ काम तो नहीं आया, पर मैंने उन पर एक अच्छा इम्प्रेशन जरूर छोड़ा। मुझे लगा- कम से कम मैंने ईमानदारी से खुद को पेश किया। इसलिए मैं कहता हूं, पार्टीज या ऐसे इवेंट्स नेटवर्किंग के लिए फायदेमंद होते हैं। 'दैट गर्ल इन यलो बूट्स' ने बदली जिंदगी अनुराग कश्यप की फिल्म ‘दैट गर्ल इन यलो बूट्स’ गुलशन के लिए निर्णायक मोड़ थी। कठिन सीन, लगातार टेक्स्ट और इम्प्रोवाइजेशन की आजादी ने उन्हें एक “सीरियस एक्टर” के रूप में स्थापित किया। इस फिल्म का जिक्र करते हुए गुलशन कहते हैं- फिल्म का पहला दिन मेरे लिए यादगार रहा। उस रात मैं सो नहीं सका क्योंकि अगले दिन का सीन बार-बार दिमाग में चल रहा था। सीन में मुझे एक किरदार को पकड़कर पीटना था- लेकिन सब कुछ इम्प्रोवाइज था, कोई डायलॉग नहीं लिखा गया था। अनुराग कश्यप का भरोसा ही असली ताकत था अनुराग कश्यप ने मुझे पूरी जिम्मेदारी दी। उन्होंने कहा नहीं, लेकिन महसूस कराया कि उन्हें मुझ पर भरोसा है। सेट पर सब कुछ सहज था, किसी ने यह नहीं जताया कि मैं नया हूं। शूट के बाद लगा कि कुछ अच्छा किया है। जो भरोसा अनुराग ने किया, मैं उस पर खरा उतरा। पहले वसंत बाला को लगा था कि यह रोल किसी उम्रदराज एक्टर को देना चाहिए, लेकिन अनुराग ने मुझ पर विश्वास किया। उस दिन मुझे महसूस हुआ कि मैंने अपनी काबिलियत साबित की है। रोहन सिप्पी के सेट पर परफेक्शन की मजबूरी, आजादी सीमित थी लेकिन हर डायरेक्टर का तरीका ऐसा नहीं होता। जैसे जब मैंने ‘दैट गर्ल इन यलो बूट्स’ के बाद रोहन सिप्पी के साथ फिल्म ‘दम मारो दम’ में काम किया, तो वहां सारा कुछ सेट था। किरदार और सीन पहले से लिखे हुए थे, उन्हीं के हिसाब से चलना था। हां, थोड़ा बहुत इम्प्रोवाइज करने की गुंजाइश थी, लेकिन एक तय दायरे में। रोहन सिप्पी हर टेक का टाइम देखते थे कि कितने सेकेंड में सीन खत्म होना चाहिए। अगर आप ज्यादा इधर-उधर जाएंगे, तो सीन उस टाइमिंग से बाहर निकल जाता। यानी वहां परफेक्शन और टाइमिंग दोनों जरूरी थे, आजादी कम थी। संजय लीला भंसाली की अच्छाइयों से ज्यादा गुस्सा याद रहता है करियर की शुरुआत में अनुराग कश्यप, रोहन सिप्पी और संजय लीला भंसाली जैसे दिग्गज निर्देशकों के साथ काम कर चुके गुलशन, संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘गोलियों की रास लीला राम-लीला’ में भंसाली के साथ अपने अनुभव को साझा करते हुए कहते हैं- भंसाली सर अपने काम को लेकर बहुत पैशनेट हैं, अपनी फिल्मों और काम को लेकर पूरी तरह जुड़ जाते हैं। जब दूसरों में वैसा जोश नहीं देखते, तो फ्रस्ट्रेट हो जाते हैं, लेकिन वो दिल के बहुत अच्छे हैं। सबको प्यार से खिलाते हैं, ध्यान रखते हैं। बस लोग उनकी अच्छाइयां नहीं, गुस्से की बातें ज्यादा याद रखते हैं। फिल्म ने छिपी ‘चुप उदासी’ को बाहर लाने का मौका दिया गुलशन देवैया कहते हैं- मेरे किए हुए सभी किरदारों में से, “8 A.M. in Metro” का प्रीतम मेरे सबसे करीब है। वह बहुत प्यारा किरदार है। उसमें एक तरह की चुप सी उदासी है, जो मुझे लगता है मेरे अंदर भी है। उस भावना को मैंने अपने अभिनय में बाहर लाने की कोशिश की। इसलिए प्रीतम मुझे मेरे असली रूप के सबसे करीब लगता है। अगर मैं अपनी जिंदगी के कुछ पहलू खोजूं, तो उनमें प्रीतम जैसा बहुत कुछ है। उस फिल्म के बाद कई लोग मुझे निजी संदेश भेजते हैं। वो अपने मन की बातें लिखते हैं- किसी चीज के खोने, जीवन और मृत्यु के अनुभवों के बारे में। ये बहुत व्यक्तिगत संदेश होते हैं, इसलिए मैं उन्हें शेयर नहीं करना चाहता। आज भी रोज “8 A.M. in Metro” को देखने के बाद लोग मैसेज करते हैं- मुझे और सैयामी खेर को भी। ‘कांतारा चैप्टर वन’ बना करियर का टर्निंग पॉइंट ऋषभ शेट्टी के साथ ‘कांतारा चैप्टर वन’ गुलशन के करियर का मजबूत कदम साबित हुआ। ‘राजा कुलशेखर’ का किरदार बुद्धिमत्ता, अय्याशी, आलस्य- इन सबके विरोधाभासी शेड्स लिए हुए था। वे कहते हैं कि उन्होंने इसे किसी खास व्यक्ति से प्रेरित होकर नहीं किया, बल्कि कल्पना और जीवन-अनुभवों के मिश्रण से गढ़ा। हर दृश्य में वे निर्देशक से चर्चा करते, रिहर्सलों में नए प्रयोग करते और कई बार को-एक्टर्स की ऊर्जा से प्रेरित होकर सीन को अलग रूप दे देते। गुलशन मानते हैं कि कोई भी किरदार केवल एक्टर का नहीं होता, बल्कि सेट पर मौजूद टीम का सामूहिक निर्माण होता है। ऋषभ शेट्टी, शनिल, अनिरुद्ध और अन्य राइटर के इनपुट ने उनके अभिनय को गहराई दी। घोड़े पर सवार आग और भीड़ वाले सीक्वेंस में उन्होंने खुद ट्रेनिंग लेकर शूट पूरा किया, जिसे वे अपने जीवन का सबसे कठिन अनुभव मानते हैं। कांतारा धर्म नहीं, संवेदना की भाषा है कांतारा की संस्कृति और ‘दैव आराधना’ पर गुलशन गहराई से बात करते हैं। वे कहते हैं कि बचपन में वे दैव पूजा के आयोजन देखते थे, जहां लोग देवता से सवाल पूछने के लिए घंटों खड़े रहते थे। उनके नानाजी उन्हें वहां ले जाते थे, उनकी मां के स्वास्थ्य के लिए दैव से आशीर्वाद मांगते थे। एक बार उन्होंने खुद सवाल किया था, जिसका उत्तर मलयालम में मिला। आज भी उन्हें याद नहीं कि देव ने क्या कहा, पर वह अनुभव हमेशा के लिए स्मृति में अंकित है। गुलशन मानते हैं कि ‘कांतारा’ का असर सिर्फ धर्म से नहीं जुड़ा, बल्कि यह संवेदना की भाषा है। भले कोई नास्तिक हो, लेकिन फिल्म का क्लाइमैक्स देखकर हर कोई कुछ महसूस करता है। यही तो सिनेमा है, भाषा या संस्कृति से परे एक फीलिंग। इरफान खान और मनोज बाजपेयी से मिली प्रेरणा गुलशन अपने रोल मॉडल में इरफान खान और मनोज बाजपेयी का जिक्र करते हुए कहते हैं- इरफान सर से पहली बार मिला तो उन्होंने कहा- ‘अरे, मैं जानता हूं तुम्हें।’ उन्होंने गले लगाया। बस वही पल, वही सबसे खूबसूरत कॉम्प्लिमेंट था।” ‘सत्या’ देखने के बाद मनोज बाजपेयी के अभिनय ने उन्हें एक्टिंग की ओर खींचा। गुलशन कहते हैं- मनोज जी ने हमारे जैसे कई लोगों के भीतर दबे सपनों को जगाया। नसीरुद्दीन शाह ने पार्टी में सबके सामने तारीफ की बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता नसीरुद्दीन शाह से पहली मुलाकात का जिक्र करते हुए गुलशन देवैया कहते हैं- ‘दैट गर्ल इन यलो बूट्स’ में नसीर सर के साथ मेरा कोई सीन नहीं था। उन दिनों फिल्म 'डर्टी पिक्चर' हिट हुई थी और एक दोस्त के साथ मैं इसकी सक्सेस पार्टी में चला गया। वहां नसीर साहब मिल गए। मैंने उन्हें बताया कि मैंने आपकी फिल्म में काम किया है। उन्होंने फिल्म का नाम और मेरे किरदार के बारे में पूछा। जैसे ही मैंने किरदार का हवाला दिया वह उठकर खड़े हो गए और बोले अरे, तुम! फिर सबके सामने उन्होंने मेरी खूब तारीफ की। मां का थप्पड़ भी था प्यार भरा, बचपन से ही रंगों-संगीत में दिखी उनकी चमक गुलशन ने अपनी मां के बारे में बड़ी भावुक बात कही- "वो अगर मुझे थप्पड़ भी मार दें, तो भी वो मेरी सबसे प्यारी रहेंगी।" मां के साथ उनका रिश्ता सिर्फ प्यार का नहीं, समझ और सम्मान का भी था। बचपन के दिनों में स्कूल में ही उनकी कला, संगीत और ड्रॉइंग में गहरी रुचि दिखने लगी थी। जब वह रंगों से कुछ रचते या कोई धुन बजाते, तो मां प्यार से कहतीं- "देखो, मेरा बच्चा तो कलाकार बन जाएगा!" उनकी हर छोटी सफलता पर मां की आंखों में चमक आ जाती थी। शायद इसी उजाले ने उनके भीतर एक सच्चे कलाकार को जन्म किया। इंटिमेट सीन से पहले साफ बातचीत जरूरी है गुलशन देवैया ने फिल्म "हंटर" (2015) में कई बोल्ड और मजेदार सीन किए थे। इस फिल्म में उन्होंने राधिका आप्टे के साथ काम किया और उनके इंटिमेट सीन उस समय खूब चर्चा में रहे थे। गुलशन का कहना है कि ऐसे सीन करते समय सबसे जरूरी है साफ-साफ बात करना ताकि दोनों एक्टर्स को असहज महसूस न हो। दीपिका पादुकोण और जान्हवी कपूर जैसे को-स्टार्स के साथ उनका अनुभव हमेशा प्रोफेशनल और सम्मानजनक रहा है। रिश्ते काम से अलग रखता हूं, असफलता से सीखा जीना गुलशन इंडस्ट्री में रिश्तों को स्पष्ट रूप से अलग रखते हैं- “काम के रिश्ते अलग, असली दोस्ती अलग।”अनुराग कश्यप के प्रति गहरी कृतज्ञता जताते हुए वे कहते हैं- “वो मेरे शुभचिंतक हैं, लेकिन मैं उन्हें दोस्त नहीं कह सकता क्योंकि मैं उनका बहुत सम्मान करता हूं।” गुलशन के मुताबिक असली संघर्ष सीखने का था। ‘’बाहर से आने वाले को सिस्टम समझने में वक्त लगता है। मुझे 30 से 40 की उम्र में वो सब सीखना पड़ा जो दूसरों ने 15 से 25 में सीखा।” उन्होंने हर असफलता को सीख में बदला और मानसिक दृढ़ता को अपनी ताकत बनाया। *********************** पिछले हफ्ते की सक्सेस स्टोरी पढ़िए... श्याम बेनेगल की फिल्म से लॉन्च हुईं रूपल पटेल:बेटे के लिए छोड़ी इंडस्ट्री, पीएम का पत्र देख घबराईं, दृष्टिहीन फैन से मिलीं, छलके आंसू मुंबई में जन्मी और पली-बढ़ी अभिनेत्री रूपल पटेल ने एनएसडी से निकलने के बाद श्याम बेनेगल की फिल्मों से करियर शुरू किया और सादगी, ईमानदारी व अनुशासन को हमेशा अपना बल माना। जॉइंट फैमिली की परवरिश से मिली संवेदनशीलता के चलते उन्होंने बेटे की परवरिश के लिए अभिनय से 10 साल का ब्रेक लिया, पर किस्मत ने उन्हें दोबारा चमकाया — जब एक पुराने स्पॉट बॉय का कॉल उनके करियर की नई शुरुआत बन गया।पूरी खबर पढ़ें..

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Kerry Katona on coping with fame after Atomic Kitten

The former Atomic Kitten member talks about the difficulty of being in the public eye after leaving the girlband.

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How Has Space Exploration Changed History?

How Has Space Exploration Changed History? JamesHoare

* This article was originally published here

मिथुन की बहू मदालसा ने बताया क्यों छोड़ी साउथ इंडस्ट्री:कास्टिंग काउच जैसे एक्सपीरियंस पर कहा- मैं 17 साल की थी बहुत असहज महूसस हुआ, उठकर चली गई

मिथुन चक्रवर्ती की बहू मदालसा शर्मा ने साउथ इंडस्ट्री से महज 16 साल की उम्र में एक्टिंग करियर की शुरुआत की थी। हालांकि जल्द ही वो बॉलीवुड से जुड़ गईं। अब हाल ही में एक इंटरव्यू में मदालसा ने बताया है कि साउथ इंडस्ट्री में हुए एक असहज एक्सपीरियंस के चलते उन्होंने साउथ इंडस्ट्री छोड़कर बॉलीवुड का रुख किया था। मदालसा शर्मा ने हाल ही में पिंकविला को दिए इंटरव्यू में साउथ इंडस्ट्री छोड़ने पर कहा, 'मैं सिर्फ 16 साल की थी जब मैंने (साउथ इंडस्ट्री में) काम शुरू किया था और फिर हैदराबाद, चेन्नई, रामोजी फिल्म सिटी वगैरह में रहना होता था, तो मुझे घर की, पेरेंट्स की बहुत याद आती थी। इसलिए मैंने सोचना शुरू किया कि अब मुंबई पर थोड़ा फोकस करना चाहिए। इतने साल साउथ को दे दिए, अब शायद मुंबई को समय देने का वक्त आ गया है।' 'इसके अलावा, कुछ अनुभव मेरे लिए थोड़े बुरे भी रहे। मुझे लगा कि शायद मैं नहीं कर सकूंगी, मैं वो रास्ता नहीं ले सकूंगी। जब हम बात करते हैं कास्टिंग काउच जैसी चीजों की, मेरा मानना है कि यह हर इंडस्ट्री में किसी-न-किसी रूप में मौजूद होती हैं, चाहे वो फिल्म हो, कोई कॉर्पोरेट दफ्तर हो या किसी और क्षेत्र में। हर करियर में, कभी-कभी लोग ऐसी स्थितियों का सामना करते हैं। मुझे एक पॉइंट पर निराशा हुई थी। मुझे एक कन्वर्सेशन ने असहज कर दिया था। कोई एक्सपीरियंस नहीं था, लेकिन उस बातचीत ने मुझे बहुत अनकम्फर्टेबल कर दिया था।' आगे मदालसा ने कहा, 'मुझे ठीक-ठीक याद नहीं कि वो बातचीत क्या थी, मैं तब सिर्फ 17 साल की थी। बस इतना याद है कि मुझे बहुत असहज महसूस हुआ, मैं वहां से उठकर चली गई और खुद से कहा, “अब वापस बॉम्बे चलते हैं।”फिर मैंने तय किया कि अब यहां काम करूंगी, वो ही काम करूंगी जो मुझे सचमुच करना है। लेकिन उस समय थोड़ा निराशा हावी हो गई थी और मैंने ठान लिया कि अब बॉलीवुड पर फोकस करते है, अपने घर-परिवार के पास रहना है।' बता दें कि मदालसा शर्मा ने साल 2009 की तेलुगु फिल्म फिटिंग मास्टर से करियर की शुरुआत की थी। इसके अलावा वो कन्नड़, तमिल फिल्मों में भी नजर आई हैं। इसके अलावा उन्होंने सम्राट एंड को, दिल साला सनकी, करतूत और द बंगाल फाइल्स जैसी हिंदी फिल्मों में भी काम किया है। हालांकि फिल्मों से ज्यादा मदालसा को टीवी शो अनुपमा से पहचान मिली थी।

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बैटल ऑफ गलवान में हुई अमिताभ बच्चन की एंट्री!:सलमान खान की फिल्म के सेट से सामने आई तस्वीर, गोविंदा ने भी शुरू की है शूटिंग

सलमान खान की मोस्ट अवेटेड फिल्म में अमिताभ बच्चन के होने की खबरें हैं। दरअसल, हाल ही में एक तस्वीर सामने आई है, जिसमें अमिताभ बच्चन फिल्म के डायरेक्टर अपूर्वा लखिया के साथ फिल्म बैटल ऑफ गलवान के सेट पर नजर आए हैं। डायरेक्टर अपूर्व लखिया ने हाल ही में अपने आधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट से अमिताभ बच्चन के साथ एक तस्वीर शेयर कर लिखा है, सोचिए वो मुझे क्या कह रहे हैं। हैशटैग लीजेंट ऑन द सेट टुडे। अमिताभ बच्चन। तस्वीर सामने आने के बाद से ही कयास लगाए जाने लगे कि अमिताभ बच्चन की फिल्म में एंट्री हो चुकी है। हालांकि इस बात पर अब तक कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। अगर ऐसा होता है, तो ये अमिताभ बच्चन और सलमान की साथ में चौथी फिल्म होगी। दोनों ने फिल्मों बाबूल, बागबान, गॉड तुस्सी ग्रेट हो जैसी फिल्मों में साथ काम किया है। इसके अलावा फिल्म हैलो ब्रदर मिें भी अमिताभ बच्चन वॉइस नरेटर थे। गोविंदा और सलमान भी 18 साल बाद साथ लौटे हाल ही में गोविंदा ने भी फिल्म बैटल ऑफ गलवान फिल्म की शूटिंग शुरू की है। इस फिल्म के जरिए गोविंदा और सलमान की जोड़ी 18 साल बाद बड़े पर्दे पर लौट रही है। इससे पहले दोनों साल 2007 की फिल्मों पार्टनर और सलाम-ए-इश्क में साथ काम कर चुके हैं। इसके अलावा सलमान ने गोविंदा की फिल्म दिवाने मस्ताने में भी स्पेशल अपीयरेंस दी थी। अपूर्वा लखिया के निर्देशन में बन रही फिल्म बैटल ऑफ गलवान की शूटिंग लगभग पूरी हो चुकी है। फिल्म का दूसरा शेड्यूल 10 अक्टूबर मुंबई में शुरू हुआ है। इस फिल्म में सलमान खान के अलावा चित्रांगदा सिंह, अंकुर भाटिया, अभिलाश चौधरी, विपिन भारद्वाज, सिद्धार्थ मूली और जेन शो भी अहम किरदारों में हैं। फिल्म अगले साल बड़े पर्दे पर रिलीज हो सकती है। कैसी होगी फिल्म की कहानी? ये फिल्म लद्दाख के LAC के पास स्थित गलवान घाटी में भारत-चीन के बीच बिना हथियारों के हुई झड़प की कहानी है। 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद यह इलाका संवेदनशील बना रहा। 2020 की शुरुआत में दोनों देशों के सैनिक LAC के कई हिस्सों में आमने-सामने आने लगे थे। चीन की सेना (PLA) ने गलवान इलाके में ढांचे और टेंट लगाना शुरू किया, जिस पर भारत ने आपत्ति जताई। 15 जून 2020 की रात, भारतीय सेना की 16 बिहार रेजिमेंट के सैनिक कर्नल संतोष बाबू के नेतृत्व में गलवान घाटी में चीन के सैनिकों से बातचीत करने गए ताकि विवाद कम किया जा सके। बातचीत हिंसक झड़प में बदल गई, दोनों पक्षों ने बिना हथियारों के लाठियों, लोहे की छड़ों और पत्थरों से एक-दूसरे पर हमला किया। इस भिड़ंत में 20 भारतीय सैनिक शहीद हुए, जिनमें कर्नल संतोष बाबू भी शामिल थे। चीन ने अपने कम से कम 4 सैनिकों की मौत की पुष्टि की, हालांकि भारत का कहना था कि संख्या अधिक थी। इस लड़ाई के नेतृत्व करने वाले कर्नल संतोश बाबू का किरदार सलमान खान निभा रहे हैं।

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कंगना को महिला बोली- माफी का टाइम 4 साल पहले:MP ने मुझे खराब किया, बस में धक्के खाने पड़े; अदालत ने तोड़ा घमंड

किसान आंदोलन में महिला को 100 रुपए में धरने पर बैठनी वाली कहने पर कंगना रनौट ने बठिंडा कोर्ट में माफी मांग ली है। लेकिन इसके बाद भी कंगना की मुश्किलें कम होती नहीं दिख रही है। मामले में पीड़ित महिला महेंद्र कौर ने दैनिक भास्कर एप से बातचीत में कहा कि अब कंगना का अहंकार टूटा है। वे तो गाड़ियों से कोर्ट आ जाती है, मगर मुझे बसों में धक्के खाकर दिल्ली और चंडीगढ़ के चक्कर लगाने पड़ते हैं। बता दें कंगना जिस मामले में पेश हुई, वह साल 2021 का है, जब किसान आंदोलन चल रहा था। उस दौरान कंगना ने बठिंडा के गांव बहादुरगढ़ जंडिया की रहने वाली 87 वर्षीय बुजुर्ग किसान महिंदर कौर को 100-100 रुपए लेकर धरने में शामिल होने वाली महिला बताते हुए ट्वीट किया था। इसके खिलाफ महिंदर कौर ने कोर्ट में केस दर्ज करवाया था। महेंद्र कौर ने कहा- माफी का टाइम चार साल पहिलां सी हुण ता केस लड़ा गी (माफी का टाइम पहले था, मैं अब केस लड़ूंगी)। महिला ने अपनी शिकायत में क्या कहा... 27 अक्टूबर को बठिंडा कोर्ट में पेश हुई कंगना कंगना 27 अक्टूबर को बठिंडा कोर्ट में पेश हुई थी। कोर्ट से बाहर आने पर उन्होंने कहा कि पूरे मामले में गलतफहमी हुई। उन्होंने कहा, मैंने माता जी (महेंद्र कौर) के पति को भी संदेश दिया है कि मैं सपने में भी ऐसा कुछ नहीं सोच सकती, जितना बड़ा मुद्दा यह बन गया है। हर माता मेरे लिए, चाहे वह हिमाचल की हो, चाहे पंजाब की हो, मेरे लिए पूजनीय हैं। उन्होंने दावा किया कि यह एक 'मीम' था जिसमें कई महिलाएं शामिल थीं और किसी एक व्यक्ति विशेष को लेकर कोई टिप्पणी नहीं की गई थी। अगर माता जी को कोई ठेस पहुँची है तो उसको लेकर मुझे दुख है। अब विस्तार से पूरा मामला पढ़िए... कंगना रनोट ने महिला किसान पर की थी टिप्पणी कंगना ने किसान आंदोलन के दौरान एक ट्वीट करते हुए लिखा था कि- किसान आंदोलन में महिलाएं 100 रुपए में शामिल होती हैं। कंगना ने किसान आंदोलन को लेकर एक पोस्ट पर कमेंट भी किया था। इसमें एक बुजुर्ग महिला की फोटो थी। एक्ट्रेस ने लिखा, 'हाहाहा, ये वही दादी है, जिसे टाइम मैग्जीन में भारत की पावरफुल महिला होने पर फीचर किया गया था। वो 100 रुपए में उपलब्ध है। पाकिस्तानी पत्रकारों ने भारत के लिए शर्मनाक तरीके से इंटरनेशनल पीआर को हाईजैक कर लिया है। हमें इंटरनेशनल लेवल पर बोलने के लिए अपने ही लोगों की जरूरत है।’​​​​​​ 4 जनवरी 2021 को किया था केस दायर बठिंडा के गांव बहादुरगढ़ में रहने वाली महिंदर कौर (81) ने कंगना के ट्वीट के बाद 4 जनवरी 2021 को मानहानि का केस दायर किया था। करीब 13 महीने सुनवाई चली, जिसके बाद बठिंडा की अदालत ने कंगना को समन जारी करते हुए पेश होने का आदेश दिया था। इसके बाद कंगना ने पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में राहत की याचिका दायर की थी, जिसे खारिज कर दिया गया। इसके बाद वह सुप्रीम कोर्ट पहुंचीं। जहां से भी कंगना को राहत नहीं मिली। अब उन्हें बठिंडा कोर्ट में पेश होने के लिए कहा गया। 2024 में महिला कॉन्स्टेबल ने मार दिया था थप्पड़ मंडी सीट से लोकसभा चुनाव जीतने के बाद कंगना को 6 जून 2024 को चंडीगढ़ एयरपोर्ट पर CISF की महिला कॉन्स्टेबल कुलविंदर कौर ने थप्पड़ मार दिया था। महिला कर्मचारी ने थप्पड़ मारने का कारण भी बताया था। उसने बताया था कि कंगना ने महिला किसानों को 100-100 रुपए लेकर धरने पर बैठने वाली कहा था। धरने में उसकी मां भी मौजूद थी। महिला कॉन्स्टेबल पर कोई FIR नहीं हुई थी। इस मामले में DSP एयरपोर्ट ने बताया था कि कंगना ने इस मामले में कोई शिकायत नहीं दर्ज करवाई।

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दिलजीत ने अमिताभ से कहा-आपकी फिल्म पसंद नहीं आई:KBC में पंजाबी सिंगर बोले- सौदागर में आप गुड़ बेचते रहे, हमने सोचा मार-धाड़ होगी

पंजाबी सिंगर और एक्टर दिलजीत दोसांझ ने KBC में अमिताभ बच्चन को कहा कि आपकी एक फिल्म सौदागर मुझे अच्छी नहीं लगी। KBC का एक टीजर रिलीज हुआ है। इसमें दिलजीत अमिताभ बच्चन से मजाक करते नजर आ रहे हैं। हॉट सीट पर बैठे दिलजीत अमिताभ बच्चन को कहते हैं कि जब आपकी फिल्में आती थी तो मैं बहुत खुश होता था। आपकी फिल्मों में मार-धाड़ होती थी जो मुझे बहुत अच्छी लगती थीं। मैं आपकी फिल्मों का इंतजार करता था। बता दें कि कौन बनेगा करोड़पति शो में एक्टर-सिंगर दिलजीत दोसांझ भाग ले रहे हैं। 31 अक्टूबर को रात 9 बजे दिलजीत का ये एपिसोड आएगा। इससे पहले चैनल ने इसका टीजर रिलीज किया है। अब पढ़िए टीजर में दिलजीत की 3 बड़ी बातें... मैं हूं पंजाब गीत गाते स्टेज पर पहुंचे दिलजीत दोसांझ के कौन बनेगा करोड़पति शो के दो टीजर रिलीज हो चुके हैं। पहले टीजर में दिलजीत दोसांझ मैं हूं पंजाब गीत गाते हुए स्टेज पर अमिताभ बच्चन के सामने आते हैं। इस पर अमिताभ बच्चन कहते हैं कि मैं पंजाब दे पुत्तर दिलजीत दोसांझ का हार्दिक अभिनंदन करता हूं। इसके बाद दिलजीत अमिताभ बच्चन के पैर छूते हैं। अमिताभ बच्चन उनको गले से लगाते हैं और हॉट सीट पर बैठाते हैं। अमिताभ बच्चन के पैर छूने को लेकर कंट्रोवर्सी भी KBC में अमिताभ बच्चन के पैर छूने पर दिलजीत दोसांझ को आतंकी गुरपतवंत सिंह पन्नू ने धमकी दी है। इसे लेकर पन्नू ने कुछ लोगों को वॉयस कॉल की है। इसमें उसने दिलजीत को धमकी दी। कॉल में पन्नू ने 1984 सिख दंगों में अमिताभ बच्चन की भूमिका का भी जिक्र किया है। हांलाकि दैनिक भास्कर इसकी पुष्टि नहीं करता है। ऑस्ट्रेलिया के सिडनी शो से पहले भी विवाद इससे पहले दिलजीत के ऑस्ट्रेलिया के सिडनी में हुए स्टेडियम कॉन्सर्ट में किरपाण को लेकर विवाद हुआ था। कॉन्सर्ट में हजारों प्रशंसक उमड़े। लेकिन आयोजन में सिख युवकों को किरपाण लेकर अंदर न जाने देने के लिए रोक दिया गया। उन्होंने इसका विरोध किया तो उन्हें बाहर कर दिया गया।

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‘El Generalísimo’ by Giles Tremlett book review

‘El Generalísimo’ by Giles Tremlett book review JamesHoare

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What Is Premanand Ji Maharaj's Health Condition? How To Manage & Identify Symptoms Of Autosomal Dominant Polycystic Kidney Disease

Premanandji Maharaj's Kidney Health: Vrindavan-based spiritual leader is followed by many for his guidance. However, he has been battling serious health challenges involving his kidneys for quite some time now.

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‘बसीर के साथ मेरा रिश्ता अब खत्म’:BB 19 से निकलने के बाद नेहल बोलीं-अमाल दोगला है छोड़ूंगी नहीं

‘बिग बॉस सीजन 19’ से हाल ही में बाहर आईं कंटेस्टेंट नेहल चुडासमा ने शो के बाद अपने रिश्तों और घर के अंदर हुई कंट्रोवर्सीज पर खुलकर बात की। उन्होंने बसीर, फरहाना, अमाल मलिक और तान्या मित्तल जैसे हाउस मेट्स को लेकर कई चौंकाने वाले खुलासे किए।इस खास बातचीत में नेहल ने बताया कि बसीर के साथ उनका रिश्ता कितना सच्चा था, फरहाना से दोस्ती में क्या गलतफहमी हुई, और आखिर किसे वह शो का असली विनर मानती हैं। नेहल, आपके और बसीर के रिश्ते पर कई सवाल उठ रहे हैं। लोग इसे फेक लव कह रहे हैं। क्या ये रिश्ता रियल था ? हमारी ‘बिग बॉस’ के अंदर बहुत अच्छी दोस्ती थी। एक प्यार भरा कनेक्शन हमने एक-दूसरे के साथ शेयर किया, जो शायद ही मैंने किसी और के साथ किया हो। बस शुरुआत में थोड़ी-सी मिसअंडरस्टेंडिंग थी, लेकिन बाद में चीजें क्लियर हुईं और बसीर के साथ एक अच्छा कंफर्ट था। शो से बाहर आने के बाद हम दोनों ने कुछ ऐसी वीडियोज देखीं जिन्हें देखकर थोड़ा शॉक लगा, और इसलिए अब हमारी बात बंद है। कुछ ऐसी बातें उन्होंने कही थीं जो मुझे पसंद नहीं आईं। शायद कुछ टाइम बाद हम कभी साथ बैठकर इस पर बात करें, क्योंकि अभी सौ लोगों से मिलना है और बहुत काम हैं। लेकिन हां, अगर वो कभी सामने से आकर इस पर बात करें तो मुझे चीजें क्लियर करने में कोई दिक्कत नहीं है, और अगर नहीं आएंगे तो आप हमें अब कभी भी साथ नहीं देखेंगे। बसीर के फैंस आपको टारगेट कर ‘बैड लक’ और बसीर के घर से एविक्ट होने का कारण बता रहे हैं। क्या कहना चाहेंगी इस पर? अगर मैं बैड लक होती तो ये बात सबसे पहले बसीर को पता चलती, ना कि किसी और को। अगर बसीर का मेरी वजह से गेम ड्रॉप हो रहा था तो उसे समझ जाना चाहिए था और मुझसे दूरी बना लेनी चाहिए थी लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। वो पहले भी इस तरह के शो कर चुका है। बस चीजें इसलिए हमारे बीच खराब हुईं क्योंकि फरहाना का थोड़ा ‘बच्चा दिमाग’ है। उसने मेरे सामने बसीर को लेकर कुछ ऐसे कमेंट कर दिए जो बसीर को पता चलने के बाद अच्छे नहीं लगे। मेरे अंदर बसीर को लेकर सॉफ्ट कॉर्नर था, और मैं फरहाना को ऐसा बोलने से मना करती थी लेकिन उसने मेरी सुनी ही नहीं। फरहाना भट्ट से आपकी दोस्ती शो में लगभग खत्म होती दिखी, लेकिन अचानक से बाहर आकर आप उनके लिए सोशल मीडिया पर पोस्ट कर रही हैं और वो आपके लिए रो रही हैं। देखिए, प्यार की बात ही यही है कि वो कभी खत्म नहीं होता। वक्त के साथ दरारें जरूर आ जाती हैं। हमारी दोस्ती सच्ची थी और हमेशा दिल में रहेगी। मैं चाहूंगी कि फरहाना ही शो जीते और मैं उसे बाहर से जरूर सपोर्ट करूंगी। अमाल मलिक कैसा गेम खेल रहे हैं? क्या जिस तरह से ‘बिग बॉस’ से बाहर आए कंटेस्टेंट उन्हें ‘दोगला’ बोल रहे हैं, आपको भी लगता है कि वो ऐसे ही हैं? अमाल मलिक बहुत ही ज्यादा दोगले हैं। जब मैं ‘सीक्रेट रूम’ से बाहर निकली थी, तो मेरे पास मौका था उनकी असलियत सभी के सामने लाने का लेकिन न जाने मैंने ऐसा क्यों नहीं किया। अब अगर मुझे मौका मिलेगा तो मैं उन्हें छोड़ूंगी नहीं। चाहे वो बसीर हो या जीशान, सबके साथ ही अमाल मलिक ने दोगलापन किया है, जो अब ‘बिग बॉस’ से निकलने के बाद सबको साफ दिख रहा है। आपने घर में तान्या मित्तल के साथ काफी दिन बिताए हैं। क्या वो वैसी ही हैं जैसी वो शो में दिखती थीं? क्या वो सच में एक नंबर की झूठी हैं? मुझे तो लगता है कि तान्या मित्तल ‘बिग बॉस’ के घर से बाहर आने के बाद मीडिया को इंटरव्यू ही नहीं देंगी। ये सोचकर कि कहीं उनकी पोल न खुल जाए। या फिर हो सकता है कि दे भी दें, क्योंकि तान्या मित्तल बहुत शातिर हैं। उन्हें अच्छे से पता है कि कैसे चीजों को अपने हिसाब से मोड़ना है। क्या लगता है, कौन होगा ‘बिग बॉस सीजन 19’ का विनर? और अगर आप नहीं तो किसे इस हफ्ते घर से एविक्ट होना चाहिए था? मुझे लगता है कि मेरी जगह इस हफ्ते ‘बिग बॉस’ से प्रणित को एविक्ट होना चाहिए था और रही बात ‘बिग बॉस’ के विनर की, तो मुझे लगता है फरहाना या गौरव में से ही कोई विनर होगा। ये दोनों ही बहुत स्ट्रॉन्ग प्लेयर्स हैं।

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टीवी सेट पर फर्श पर सोए हैं हितेन तेजवानी:एक्टर ने बताया - शो के लिए 22 घंटे तक बिना ब्रेक काम किया है

टीवी एक्टर हितेन तेजवानी ने हाल ही में अपने करियर को लेकर कई बातें शेयर कीं। उन्होंने बताया कि टीवी इंडस्ट्री में टिके रहना कितना मुश्किल होता है। हितेन ने कहा कि कभी-कभी उन्हें 22 घंटे तक बिना ब्रेक काम किया है और वो सेट पर ही फर्श पर सोए हैं। हितेन तेजवानी ने सिद्धार्थ कन्नन से बातचीत में कहा, “मैंने पिछले 25 साल में बहुत मेहनत की है। जब मैंने काम शुरू किया, तो मैं सिर्फ नहाने और कपड़े बदलने के लिए घर जाता था। मैंने कई ड्राइवर रखे, लेकिन सब भाग गए क्योंकि वो मेरे काम के घंटे झेल नहीं पाए। मैं खुद गाड़ी चलाता था और अक्सर ड्राइव करते हुए नींद लग जाती थी। एक बार तो मैंने कार डिवाइडर में मार दी थी, लेकिन भगवान की कृपा से कुछ नहीं हुआ।” उन्होंने बताया कि एक बार उन्होंने लगातार एक महीने तक डबल शिफ्ट में काम किया था। उन्होंने कहा “लगातार 30 दिन मैंने 30 एक्स्ट्रा शिफ्ट कीं। उस वक्त जब मैंने खुद जाकर 1 लाख रुपए का चेक लिया, तो बहुत खुशी हुई। मैंने सोचा अगर मैं किसी आम नौकरी में होता, तो शायद इतनी जल्दी इतनी कमाई नहीं कर पाता।” हितेन ने आगे बताया कि टीवी शूटिंग का टाइमटेबल सिर्फ नाम का होता है। उन्होंने कहा, “हमारी शिफ्ट सुबह 9 बजे से रात 9 बजे तक की होती थी, लेकिन शूटिंग अक्सर सुबह 5 बजे तक चलती थी। कई बार अगली शिफ्ट 7 बजे शुरू हो जाती थी। यानी करीब 22 घंटे काम करना पड़ता था। कुछ क्रू मेंबर लाइट्स बंद कर देते थे ताकि मैं थोड़ी देर सो सकूं, और मैं वहीं सेट के फर्श पर सो जाता था।” अब कैमरा सब कुछ कैद कर लेता है: हितेन वहीं हितेन ने कहा कि अब ऐसा काम करना मुश्किल है क्योंकि अब कैमरा सब कुछ कैद कर लेता है, यहां तक कि अगर कोई थका हुआ है तो वो भी साफ दिखता है। दीपिका पादुकोण की कथित 8 घंटे की शिफ्ट की मांग पर बात करते हुए हितेन ने कहा, “मुझे लगता है काम और प्राइवेट लाइफ का बैलेंस बहुत जरूरी है। दीपिका मां हैं और ये अच्छी बात है कि वो अपने काम के घंटे को लेकर साफ हैं। कुछ लोग कॉन्ट्रैक्ट साइन करते वक्त हां बोल देते हैं और बाद में सेट पर दिक्कतें पैदा करते हैं।” हितेन ने बताया कि टीवी इंडस्ट्री में काम का बहुत प्रेशर होता है। “मैंने कई बार 72 घंटे लगातार काम किया है। एक बार 30 दिन का शेड्यूल था, लेकिन मुझे 45 दिन की पेमेंट मिली क्योंकि मेरी पहली शिफ्ट सुबह 7 से शाम 7 तक होती थी और दूसरी शाम 7 से रात 2 बजे तक चलती थी।”

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The Transformations of Fernand Braudel

The Transformations of Fernand Braudel JamesHoare

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TV presenter with stage 4 breast cancer faces 'battle' for care

The S4C presenter says she is determined to live as long as possible to be with her children.

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‘The Second Emancipation’ by Howard W. French

‘The Second Emancipation’ by Howard W. French JamesHoare

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पीयूष पांडे के फ्यूनरल में हंसती दिखीं भांजी इशिता:आलोचना होने पर इला अरुण की बेटी की सफाई, कहा- शोक का दिखावा नहीं कर सकते

एड गुरु पीयूष पांडे का 23 अक्टूबर को निधन हो गया। उनके अंतिम संस्कार में अमिताभ बच्चन, इला अरुण, मनोज पहवा समेत कई कलाकार शामिल हुए। पीयूष पांडे के अंतिम संस्कार से उनकी बहन इला अरुण की बेटी इशिता अरुण का एक वीडियो सामने आया था, जिसमें वो मुस्कुराती हुई नजर आईं। वीडियो खूब वायरल हुआ और इशिता की जमकर आलोचना होने लगी। अब इशिता ने विवाद बढ़ने पर सफाई दी है। इशिता अरुण ने अपने ऑफिशियल इंस्टाग्राम अकाउंट के स्टोरी सेक्शन में मामा पीयूष के फ्यूनरल में हंसने पर सफाई देते हुए लिखा, "शोक कोई एक तय तरीका नहीं होता। और जब आप ऐसे इंसान को अलविदा कह रहे हों जो सबसे जोर से हंसता था, तो उसे हंसी के जरिए याद करना अपमानित करना नहीं है। यह उसका सिलसिला है, एक आदत है, एक एहसास है कि वह असल में कौन थे।" आगे इशिता ने उस पेज का वीडियो शेयर किया, जिसके द्वारा शेयर किए गए वीडियो पर उन्हें ट्रोल किया गया। आगे उस पेज को लताड़ लगाते हुए इशिता ने लिखा है, "जो आपने देखा, वो हम उनकी कही हुई बात पर हंस रहे थे, ऐसी बात जो सिर्फ वही कह सकते थे। अगर आप उन्हें जरा भी जानते होते, तो यह समझाने की जरूरत ही नहीं पड़ती।" आगे उन्होंने लिखा, "हम शोक का दिखावा नहीं करते। हम अजनबियों को सहज महसूस कराने के लिए अपनी यादों को दबाते नहीं हैं। हम उन्हें सच्चाई से याद करते हैं, हंसी, हिम्मत और खुद जिंदगी के रूप में। अगली बार कमेंट करने से पहले कहानी को जान लीजिए।" बताते चलें कि पीयूष पांडे, पॉपुलर सिंगर इला अरुण के भाई थे। इला अरुण ने उनके निधन के बाद दैनिक भास्कर को दिए इंटरव्यू में कहा, पीयूष पांडे की कला में हमारे माता-पिता और परिवार के सांस्कृतिक मूल्यों की छाप थी। चाहे एशियन पेंट्स का प्रसिद्ध विज्ञापन हो या उनकी कोई अन्य रचना, वह हमेशा संस्कृति से जुड़े रहने की बात करते थे। 'हर घर कुछ कहता है' लाइन का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि पीयूष पांडे हमेशा मानते थे कि घर दीवारों से नहीं, बल्कि व्यक्तियों से बनते हैं।

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समय रैना ने नेत्रहीन का मजाक उड़ाने पर मांगी माफी:बर्थडे पोस्ट में कहा- शो से हुई तकलीफ के लिए गहरा अफसोस, आपकी ताकत हमारी प्रेरणा है

इंडियाज गॉट लेटेंट में पेरेंट्स पर अश्लील टिप्पणी किए जाने से हुए विवाद के अलावा समय रैना के खिलाफ स्टैंड अप कॉमेडी शो में एक नेत्रहीन नवजात का मजाक उड़ाने के भी आरोप लगे थे। फरवरी में हुए विवाद के बाद समय ने अब अपने बर्थडे के मौके पर सार्वजनिक रूप से माफी मांगी है। समय रैना ने अपने ऑफिशियल इंस्टाग्राम अकाउंट से स्टोरी पोस्ट कर लिखा है, "आज मेरा बर्थडे है, और सिर्फ अपनी खुशी मनाने के बजाय, मैं इस खास दिन का इस्तेमाल उन लोगों से माफी मांगने के लिए करना चाहता हूं जो दिव्यांग हैं।" आगे समय ने लिखा है "हम, समय रैना, विपुल गोयल, सोनाली ठक्कर, निशांत तंवर और बलराज घोष, अपने शो से हुई तकलीफ के लिए गहरा अफसोस जताते हैं। आगे से हम और ज्यादा सावधान रहेंगे और समाज में दिव्यांग समुदाय द्वारा झेली जाने वाली चुनौतियों के बारे में जागरूकता फैलाने की पूरी कोशिश करेंगे। आपकी ताकत हमें बेहतर बनने की प्रेरणा देती है।" क्या है पूरा मामला? फरवरी में आए इंडियाज गॉट लेटेंट शो के एपिसोड में रणवीर अलाहबादिया ने पेरेंट्स पर अश्लील कमेंट किया था, जिसके बाद उनके साथ-साथ शो से जुड़े सभी लोगों के खिलाफ शिकायत दर्ज हुई थी। ये मामला चल ही रहा था कि एनजीओ ने समय रैना पर स्टैंड-अप कॉमेडी शो में स्पाइनल मस्क्यूलर अट्रॉफी (SMA) से पीड़ित एक नेत्रहीन नवजात का मजाक उड़ाने का आरोप लगा दिया। याचिका में फाउंडेशन ने कोर्ट को बताया था कि दस महीने पहले समय रैना ने दैट कॉमेडी क्लब में स्टैंडअप में कहा था- 'देखो चैरिटी अच्छी बात है, करनी चाहिए। मैं एक चैरिटी देख रहा था, जिसमें एक दो महीने का बच्चा है, जिसे कुछ तो क्रेजी हो गया है। जिसके इलाज के लिए उसे 16 करोड़ रुपए का इंजेक्शन चाहिए। समय ने शो में बैठी एक महिला से सवाल किया- मैम, आप बताइए, अगर आप वो मां होतीं और आपके बैंक में 16 करोड़ रुपए आ जाते। एक बार तो अपने पति को देखकर बोलती ना कि मंहगाई बढ़ रही है, क्योंकि कोई गांरटी नहीं है कि वो बच्चा उस इंजेक्शन के बाद भी बचेगा। मर भी सकता है। सोचो इंजेक्शन के बाद मर गया। उससे भी खराब सोचो कि 16 करोड़ के इंजेक्शन के बाद बच्चा बच गया, फिर बड़ा होकर बोले कि मैं पोएट बनना चाहता हूं। फाउंडेशन की याचिका पर पहली सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे कंटेंट को परेशान करने वाला बताया। जस्टिस सूर्यकांत ने कहा था- हम इन आरोपों से सचमुच परेशान हैं, हम ऐसे मामलों को रिकॉर्ड में रखते हैं। संबंधित व्यक्तियों को शामिल करके उपाय सुझाएंगे, फिर हम देखेंगे। बाद में ये कहते हुए समय रैना को इस मामले में राहत दी गई थी कि उन्हें अपनी पहचान और सोशल मीडिया फैन फॉलोविंग का इस्तेमाल दिव्यांग लोगों के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए करना होगा।

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जयपुर में कार की छत पर चढ़े एक्टर हर्षवर्धन राणे:बोले- आप जैसी ऑडियंस ने नेपोटिज्म मिटा दिया, मैंने अपना वादा निभाया

एक दीवाने की दीवानियत फिल्म का सक्सेस मनाने एक्टर हर्षवर्धन राणे जयपुर के राजमंदिर पहुंचे, यहां दीवाने के लिए ऑडियंस की दीवानियत खास अंदाज में नजर आई। फैंस के बीच हर्षवर्धन का जोश देखते ही बनता था। वे अपनी कार की छत पर चढ़ गए और करीब 10 मिनट तक हाथ हिलाकर फैंस का अभिवादन करते रहे। फैंस भी उन्हें देखने और सेल्फी लेने के लिए बेताब नजर आए। हर्षवर्धन ने न केवल सबका अभिवादन किया बल्कि कार के चारों तरफ फोटो और हैंडशेक करते हुए उनका प्यार स्वीकार किया। राजमंदिर की बालकनी से हर्षवर्धन ने फिल्म की सफलता पर ऑडियंस से कहा- आप जैसी ऑडियंस ने बॉलीवुड से नेपोटिज्म शब्द मिटा दिया है। इस दिवाली दो नॉन-फिल्मी बैकग्राउंड वाले एक्टर्स की फिल्में लगी हैं। मेरी और आयुष्मान खुराना की। आप लोग हमें ऐसे ही प्यार दीजिए और आयुष्मान को भी सपोर्ट कीजिए। हर्षवर्धन के साथ एक्ट्रेस सोनम बाजवा, एक्टर शाद रंधावा और डायरेक्टर मिलाप जावेरी भी मौजूद रहे। फिल्म के को-प्रोड्यूसर राघव शर्मा पूरे इवेंट की व्यवस्थाओं को संभालते नजर आए। यूसुफ ने संभाली हर्षवर्धन राणे की सुरक्षा आलिया भट्ट के सिक्योरिटी इंचार्ज यूसुफ ने अभिनेता हर्षवर्धन राणे की सुरक्षा का जिम्मा संभाला। अहमदाबाद और कोटा से होते हुए हर्षवर्धन का यह इंडिया टूर जयपुर पहुंचा, जहां उनका स्वागत किसी सुपरस्टार की तरह हुआ। प्रशंसकों से हर्षवर्धन राणे का वादा जयपुर में प्रशंसकों को संबोधित करते हुए हर्षवर्धन ने कहा, "जब 'सनम तेरी कसम' री-रिलीज हुई थी, तो आपने टिकट खरीदकर उसे हिट बनाया। अब इस फिल्म को भी आप लोगों ने प्यार से टिकट खरीदकर हिट कर दिया। एक हफ्ते पहले जब मैं राजमंदिर आया था, तब मैंने वादा किया था कि अगर आप लोग टिकट लेकर फिल्म देखोगे तो मैं जयपुर जरूर आऊंगा। आपने वादा निभाया, मैंने भी निभाया।" फिल्म की टीम ने ऑडियंस से मुलाकात की हर्षवर्धन राणे और उनकी टीम को शाम 6:30 बजे वर्ल्ड ट्रेड पार्क (WTP) स्थित सिनेपोलिस पहुंचना था, लेकिन कोटा से देरी होने के कारण वे पहले राजमंदिर पहुंचे। जयपुर में लगभग 3.5 घंटे की देरी के बाद टीम रात 10 बजे WTP पहुंची। टीम के आने तक आधे से ज्यादा दर्शक जा चुके थे, जिसके बाद सिनेपोलिस टीम ने अगले शो का इंतजार कर रही ऑडियंस को ऑडी में बिठाया और फिर फिल्म की टीम ने ऑडियंस से मुलाकात की।

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'मैं थक गया हूं, रिटायर होना चाहता हूं':एक्टर जेडी मजेठिया ने बताया सतीश शाह से आखिरी बार फोन पर क्या बात हुई थी

एक्टर सतीश शाह का शनिवार दोपहर निधन हो गया। वे 74 साल के थे और किडनी से जुड़ी समस्या से जूझ रहे थे। सतीश शाह के निधन पर दुख व्यक्त करते हुए एक्टर जमनादास मजेठिया उर्फ जेडी मजेठिया ने दैनिक भास्कर से बात करते हुए उनके बारे में कई बाते शेयर कीं। उन्होंने सतीश शाह को केवल एक एक्टर नहीं बल्कि एक शानदार व्यक्ति और मित्र के रूप में याद किया। जेडी मजेठिया ने बताया कि सतीश शाह के लिए 'इंद्रवदन' का किरदार सिर्फ स्क्रीन पर ही नहीं बल्कि असली जिंदगी में भी उनके व्यक्तित्व का प्रतीक था। कैसे सतीश शाह की 'इंद्रवदन' के रोल में कास्टिंग हुई थी जेडी मजेठिया ने बताया कि 'साराभाई वर्सेज साराभाई' के लिए सतीश शाह की कास्टिंग कोई लंबी प्रक्रिया नहीं थी। उनके लिए यह रोल बेस्ट था। इस रोल में मिडिल क्लास और हाई सोसाइटी के बीच के गैप को मजाकिया अंदाज में पेश करना था। वह पिता का रोल निभा रहे थे, जो बेटे की पत्नी को चिढ़ाने में पीछे न हटे, लेकिन दिल के बहुत सच्चे और प्यारे थे। सतीश शाह को मिलकर स्क्रिप्ट सुनाई गई और उन्होंने तुरंत हां कर दिया था। जेडी मजेठिया ने कहा, "आज भी मैं कहता हूं कि इंद्रवदन के रोल में मुझे कोई और नजर नहीं आता। उनकी टाइमिंग, सहजता और अदाकारी लाजवाब थी। यह रोल सिर्फ उनके लिए बना था।" पर्दे के पीछे का इंद्रवदन जेडी मजेठिया ने बताया कि सतीश शाह सिर्फ पर्दे पर ही नहीं बल्कि रियल लाइफ में भी 'इंद्रवदन' थे। वह पढ़े-लिखे और बहुत ख्याल रखने वाले इंसान थे। उनके साथ बातचीत करने पर ऐसा लगता था जैसे किसी ज्ञान के भंडार से बात हो रही हो। वह बहुत अच्छे श्रोता थे और हमेशा दूसरों का सम्मान करते थे। सेट पर अनुशासन और पारिवारिक माहौल सेट के माहौल के बारे में बात करते हुए जेडी मजेठिया ने बताया कि टीवी शूटिंग का शेड्यूल काफी हेक्टिक होता है, लेकिन सतीश शाह का नियम था कि वह एक शिफ्ट में काम करेंगे। उनके अनुशासन और प्रोफेशनलिज्म का हमेशा सम्मान किया गया। जेडी मजेठिया ने आगे बताया कि सेट पर उनका व्यवहार सभी के लिए प्रेरणादायक था। 13-14 महीने की शूटिंग में भी माहौल हमेशा खुशहाल और पारिवारिक बना रहा। 'साराभाई वर्सेज साराभाई' के अनुभव पर बात करते हुए जेडी मजेठिया ने बताया कि पहला सीजन डेढ़ से ढाई साल चला, जबकि दूसरा सीजन लगभग डेढ़ महीना चला। सतीश शाह की सादगी, सरलता और विनम्रता सभी को प्रभावित करती थी। खाने का शौक और दोस्तों व सहकर्मियों के साथ समय बिताना उन्हें पसंद था। वह गुजराती खाना विशेष रूप से पसंद करते थे। अंतिम मुलाकात और रिटायरमेंट की इच्छा जेडी मजेठिया ने बताया कि उन्होंने गुरुवार को सतीश शाह से मिलने का प्लान बनाया था, लेकिन मुलाकात नहीं हो पाई। सतीश शाह ने फोन पर कहा था, "यार, मैं थक गया हूं।" फिर उन्होंने कहा, "मैं रिटायर होना चाहता हूं।" शायद वह थोड़ा आराम करना चाहते थे, फिर वे सो गए। हम उनके घर के नीचे तक पहुंचे थे, लेकिन वापस लौट गए। कॉमेडी और ज्ञान का अद्भुत मिश्रण जेडी मजेठिया ने बताया कि सतीश शाह केवल हास्य कलाकार नहीं थे, बल्कि ज्ञान के सागर थे। वह कई विषय पर जानकारी रखते थे। विश्व संगीत, इतिहास, विज्ञान या पक्षियों की सैकड़ों प्रजातियों का ज्ञान। उनके घर की बाल्कनी में कई पक्षी आते थे और वह उनके व्यवहार और प्रजातियों की पहचान कर सकते थे। पक्षियों के लिए उनका प्यार और देखभाल अद्वितीय था।

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Take a virtual tour inside a 17th c. Dutch doll’s house

Last week, the Rijksmuseum opened a new exhibition, At Home in the 17th Century, an immersive look on the domestic life of the Dutch Golden Age. It consists of nine diorama-style galleries designed by artist Steef de Jong that allow visitors to experience life in the 17th century home progressing from morning to night.

The exhibition zooms in on the lives of a variety of people, such as the Boudaen Courten family from Zeeland province. Many items belonging to members of this family have survived, including gilded furniture, portraits and one very remarkable relic: a bladder stone retrieved in a major medical procedure. All these objects will be on view together for the first time in centuries. We also take a peek into the world of the Utrecht artist Joachim Wtewael. In 1628 he painted a portrait of his daughter Eva, seated at a table that still exists. The painting presents Eva as the epitome of the ideal housewife, with a sewing cushion on her lap and a prayer book on the table. This vision of her future unfortunately never became reality. She died seven years after the completion of the painting and never married. The painting will be on show together with the table and the matching linen cupboard.

The exhibition takes a multifaceted look at how people lived in the 17th century. Together with Archeologie West-Friesland, the curators have studied the contents of the 17th-century cesspit at the home of the mayor of Hoorn and his family, the Soncks. The cookware, the crockery and the food waste tell us the story of what was on the family dining table, offering detailed insights into their eating habits. Cesspits found on Vlooienburg island in Amsterdam, by contrast, reveal that Portuguese immigrants to the city brought with them their own earthenware, and their own flavours.

The Doll’s House of Petronella Oortman is the centerpiece of the exhibition. Created in the late 17th century into the early 18th (ca. 1686 – ca. 1710), the doll’s house was not a toy or playhouse. It had tiny dolls in it, most of them now lost, alas, but they were not for kids to play pretend with. It was a meticulously rendered miniature version of a wealthy home of the period. Every possible detail was included, from sewing scissors to wallpaper to books of real music.

To celebrate this masterpiece of miniaturization, the museum has created a masterpiece of digital experience: an online tour of the house guided by the voice of Helena Bonham Carter. The online exhibition brings you inside every room of the doll’s house. It’s like Fantastic Voyage only you’ve been shrunk to fit into an elegant 17th century Dutch interior instead of the body of an injured scientist. The art on the walls, the wood paneling, the cane chairs, the cushions, the door knobs, the 1cm teacups, the porcelain spittoons on the floor next to the game table with a backgammon round in progress, the books, a curio cabinet full of tiny shells, the fruit on the kitchen counter, the fully-stocked cellar hidden in a drawer, baskets of peat briquets to burn for cooking and heating, a working threaded spinning wheel, monogrammed linen napkins, everything is jaw-droppingly realistic rendering in detail. You can’t even tell it’s miniaturized when you’re inside the house.

After the introduction, you can click on individual rooms to navigate, or you can play the whole tour and go along for the ride with Helena Bonham Carter as your guide. I highly recommend the latter, because the planned route is smartly laid out with a consistent through-line and clear transitions.



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रवीना टंडन@51, फिल्मों में नहीं किया किस सीन:शादी से पहले रखी शर्त, बेटियों को गोद लेने पर हुई आलोचना; जानें एक्ट्रेस के बड़े फैसले

‘मस्त मस्त गर्ल’ के नाम से मशहूर रवीना टंडन न सिर्फ अपनी एक्टिंग बल्कि बेबाक अंदाज के लिए भी जानी जाती हैं। पहली ही फिल्म पत्थर के फूल से एक्ट्रेस को हिंदी सिनेमा में अलग पहचान मिल गई थी, लेकिन उन्होंने हमेशा अपने सिद्धांतों और शर्तों पर ही काम किया। रवीना ने कभी भी फिल्मों में किसिंग सीन नहीं किया। एक बार ऐसा हुआ कि एक हीरो के होंठ उनके होंठों से टच हो गए थे, तो एक्ट्रेस ने तुरंत ब्रश किया और उन्हें उल्टी तक आ गई थी। आज रवीना टंडन के 51वें जन्मदिन के मौके पर जानते हैं उनके जीवन के कुछ बड़े फैसलों के बारे में… सलमान की फिल्म से किया डेब्यू, मिली पहचान रवीना टंडन का जन्म 26 अक्टूबर 1974 में मशहूर फिल्म निर्देशक रवि टंडन के घर हुआ था। दिलचस्प बात यह है कि फिल्मों में उनका डेब्यू कराने का श्रेय सलमान खान को जाता है। किरण जुनेजा के चैट शो ‘इनसाइड टॉक’ में रवीना ने सलमान से अपनी पहली मुलाकात का किस्सा शेयर किया। उन्होंने बताया कि जब वह प्रह्लाद कक्कड़ के साथ इंटर्नशिप कर रही थीं, तभी उन्हें पहली फिल्म ‘पत्थर के फूल’ का ऑफर मिला था। एक दिन उनके दोस्त बंटी ने अचानक उन्हें ऑफिस के बाहर बुलाया और सलमान से मिलवाया। उस समय सलमान जी.पी. सिप्पी के प्रोडक्शन में बन रही अपनी नई फिल्म ‘पत्थर के फूल’ के लिए एक नए चेहरे की तलाश में थे। बंटी ने सलमान से कहा कि वह एक बार रवीना को देख लें। शायद उनकी तलाश यहीं खत्म हो जाए। बस वहीं रवीना और सलमान की मुलाकात हुई और रवीना को फिल्म ‘पत्थर के फूल’ ऑफर हो गई। रवीना बताती हैं कि जब उन्होंने अपनी कॉलेज फ्रेंड्स को यह खबर दी कि उन्हें सलमान खान के साथ फिल्म मिली है, तो सभी सहेलियां खुशी से झूम उठीं और उन्हें फिल्म साइन करने के लिए प्रोत्साहित करने लगीं। आखिरकार रवीना ने अपने पापा से इजाजत ली और फिल्म के लिए ‘हां’ कह दी। इसके बाद 17 साल की उम्र में रवीना ने बॉलीवुड में डेब्यू किया और पहली ही फिल्म हिट साबित हुई, जिससे उन्हें हिंदी सिनेमा में पहचान भी मिल गई। 21 की उम्र में दो बेटियों को लिया गोद, लोगों ने लगाए कई आरोप डेब्यू के बाद से ही रवीना टंडन का फिल्मी करियर शानदार चल रहा था। उनकी फिल्में लगातार हिट हो रही थीं और वह सफलता की ऊंचाइयों पर थीं, लेकिन इसी बीच महज 21 साल की उम्र (साल 1995) में उन्होंने एक ऐसा कदम उठाया जिसने सभी को हैरान कर दिया। एक्ट्रेस ने दो बेटियों पूजा और छाया को गोद ले लिया। इस फैसले के बाद रवीना को कई तरह की आलोचनाओं का सामना करना पड़ा। हिंदुस्तान टाइम्स से बातचीत में उन्होंने उस दौर को याद करते हुए कहा था, जब मैंने पूजा और छाया को गोद लिया, तब वे 8 और 11 साल की थीं। उस वक्त लोगों ने कहना शुरू कर दिया कि ये मेरे अपने बच्चे हैं, जो मैंने शादी से पहले छिपाए हुए थे, लेकिन मेरा सवाल था जब मैं 21 साल की थी और वे 8 और 11 साल की थीं, तो मैंने उन्हें कब जन्म दिया? क्या जब मैं 11 या 12 साल की थी तब? रवीना ने आगे कहा- कुछ नेक आंटियों ने तो यहां तक पूछा कि अब मुझसे शादी कौन करेगा, क्योंकि मेरे पास पहले से ही बच्चे हैं, लेकिन मेरा मानना था कि जो मुझसे सच में प्यार करेगा, वह मेरी बेटियों, मेरे पालतू जानवरों और मेरी हर चीज से प्यार करेगा। ट्रोलिंग तो आज भी होती है। आप कुछ भी कर लो, लोग बोलेंगे ही। ऐसे लोगों पर ध्यान नहीं देना चाहिए। बता दें कि रवीना की गोद ली बेटी छाया एक इवेंट मैनेजर है, वहीं पूजा एयर होस्टेस है। फिल्मों में नो किसिंग पॉलिसी को किया फॉलो सलमान खान और रवीना टंडन के बीच एक दिलचस्प समानता यह है कि दोनों ने अपने करियर में कभी भी ऑन-स्क्रीन किसिंग सीन नहीं दिए हैं। रवीना ने हमेशा अपनी ‘नो किसिंग पॉलिसी’ को फॉलो किया। उनका मानना था कि किसिंग जैसी चीजें बहुत निजी होती हैं और वह पर्दे पर ऐसे सीन करने में सहज नहीं थीं। जब भी वह कोई फिल्म साइन करती थीं, तो पहले से ही शर्त रख देती थीं कि उनसे कभी भी किसिंग सीन नहीं करवाया जाएगा। हालांकि एक बार फिल्म अभय की शूटिंग के दौरान एक घटना हो गई। लहरें रेट्रो से बातचीत में रवीना ने बताया, मुझे याद है एक बार मैं अपने को-एक्टर के साथ थोड़ा रफ सीन कर रही थी। उसी दौरान गलती से उनके लिप्स मेरे लिप्स से टच हो गए। यह बिल्कुल अनजाने में हुआ था। सीन खत्म होते ही मैं अपने कमरे में गई और उल्टी कर दी, क्योंकि मैं बहुत अनकम्फर्टेबल महसूस कर रही थी। मैंने अपने दांत ब्रश किए और सौ बार चेहरा धोया। छोटे कपड़ों के कारण ठुकराई शाहरुख की फिल्म रवीना टंडन और शाहरुख खान ने साथ में ये लम्हे जुदाई के, जादू, जमाना दीवाना और पहला नशा जैसी फिल्मों में काम किया, लेकिन इसके बाद भी उन्होंने एक्टर के साथ ऑफर हुई एक और फिल्म ठुकरा दी थी, जिसकी वजह थी छोटे कपड़े। रवीना ने कहा, मुझे शाहरुख खान की एक फिल्म में शॉर्ट ड्रेस पहनने को कहा गया था। मैंने साफ मना कर दिया। मैं उस फिल्म का नाम लेना नहीं चाहूंगी। मुझे लगता है कि सुंदर दिखने के लिए छोटे कपड़े पहनना जरूरी नहीं है। मेकअप और ड्रेसिंग स्टाइल अच्छी होगी, तो सुंदरता अपने आप निखरकर सामने आएगी। रणवीर सिंह को निकलवाया था सेट से बाहर साल 1994 में आई फिल्म मोहरा सुपरहिट साबित हुई थी। इस फिल्म में रवीना के साथ अक्षय कुमार नजर आए थे। इस फिल्म का गाना ‘टिप-टिप बरसा पानी’ ब्लॉकबस्टर हुआ था। इस गाने से रवीना को रातों-रात डांसिंग क्वीन का टैग मिल गया था, लेकिन रवीना के इस गाने से एक दिलचस्प किस्सा भी जुड़ा है। रवीना ने एक इंटरव्यू में बताया था कि इस गाने की शूटिंग के दौरान रणवीर सिंह भी सेट पर मौजूद थे और एक्ट्रेस ने उन्हें बाहर जाने का ऑर्डर दिया था। रवीना ने बताया कि रणवीर उस वक्त काफी छोटे थे और शरारती भी थे। टिप-टिप बरसा गाना बेहद सेंशुअल था। मेरा मानना है कि ऐसे सीन्स देखने की एक उम्र होती है जो रणवीर की उस दौरान नहीं थी। मैंने प्रोड्यूसर से रिक्वेस्ट की थी कि सेट पर सिर्फ पेरेंट्स को ही रहने दिया जाए और बच्चों को बाहर भेज दिया जाए, इसलिए रणवीर को सेट से बाहर भेज दिया गया था। मुंबई में लोकल ट्रेन में छेड़छाड़ का शिकार हुई थीं रवीना रवीना टंडन हमेशा अपने बेबाक अंदाज के लिए जानी जाती हैं। जब महाराष्ट्र में ‘आरे मेट्रो 3 कारशेड’ का मुद्दा गरमाया हुआ था, तब रवीना ने भी इसका विरोध किया था। उन्होंने ट्विटर पर पोस्ट करते हुए अपना विरोध जताया था। उनकी पोस्ट पर एक यूजर ने उनसे पूछा कि क्या वे जानती हैं कि मुंबई में ट्रैवल करने के लिए मिडिल क्लास को कितना संघर्ष करना पड़ता है। इस पर रवीना ने जवाब किया, टीनएजर्स के दिनों में मैंने लोकल ट्रेन और बसों से सफर किया है। छेड़छाड़ का शिकार हुई, चुटकी काटी गई वह सब कुछ हुआ जिससे ज्यादातर महिलाएं गुजरती हैं। साल 1992 में मैंने अपनी पहली कार खरीदी। विकास को कोई रोक नहीं रहा है, लेकिन हमें जिम्मेदारी भी लेनी होगी। सिर्फ किसी एक प्रोजेक्ट के लिए नहीं, बल्कि हर बार जब हरे-भरे जंगलों को काटा जाएगा, जो पर्यावरण और वन्यजीवों के लिए सुरक्षित घर हैं, हमें इस पर ध्यान देना होगा। एक नजर रवीना टंडन के बचपन और लव लाइफ पर… पिता की तरह डायरेक्टर बनना चाहती थीं रवीना रवीना टंडन के पिता रवि टंडन हिंदी सिनेमा के जाने-माने डायरेक्टर और प्रोड्यूसर थे। उन्होंने ऋषि कपूर और नीतू सिंह की खेल खेल में, अनहोनी, राजेश खन्ना की नजराना, अमिताभ बच्चन की मजबूर के अलावा खुद्दार और जिंदगी जैसी फिल्मों का निर्देशन किया। ऐसे में रवीना को भी बचपन से ही पिता की तरह डायरेक्टर बनने का सपना था। फराह खान से बातचीत में एक्ट्रेस ने बताया था, मैं विज्ञापन बनाना चाहती थी। मैंने कभी हीरोइन बनने के बारे में नहीं सोचा। इतना ही नहीं, आप यकीन नहीं करेंगे, बचपन में मैं बहुत मोटी थी। बालों में तेल लगाकर दो चोटी बनाकर स्कूल जाती थी। किसी को नहीं लगा था कि मैं कभी एक्ट्रेस बन पाऊंगी। मेरे से ज्यादा मेरा भाई एक्टिंग में इंटरेस्टेड था। रवीना की हुई थी बॉडी शेमिंग रवीना टंडन 90 के दशक में फिल्मी पर्दे पर छाई हुई थीं, लेकिन एक समय ऐसा भी था जब उनकी बॉडी शेमिंग तक की गई। एएनआई को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा, 90s की गॉसिप मैगजीन बहुत ही घटिया थीं। मेरे बारे में बहुत सारी बातें लिखी गई थीं। कभी 'थंडर थाइज' कहा गया, तो कभी मिस ये, कभी मिस वो, और कभी 90 किलो की। दरअसल, मैं उस वक्त मोटी थी। मैंने 16 साल की उम्र में अपना करियर शुरू किया था और सच में, मैं एकदम मोटी थी। हालांकि अब मुझे फर्क नहीं पड़ता। मुझे ऐसे रहना पसंद है और ऐसे ही अच्छा लगता है। अक्षय कुमार से जुड़ा था नाम, दोनों की सगाई भी हुई अक्षय कुमार और रवीना टंडन की ऑन-स्क्रीन केमिस्ट्री 90 के दशक में खूब चर्चा में रही। 1994 में आई ब्लॉकबस्टर फिल्म मोहरा के बाद उनके अफेयर की खबरें सुर्खियों में आईं। कहा जाता है कि अक्षय चाहते थे कि रवीना घर पर रहें और परिवार को प्राथमिकता दें। सिमी गरेवाल के शो में रवीना ने बताया था, मेरी सगाई एक ऐसे इंसान से हुई थी, जिसे मैं जानती थी और मैं यही चाहती थी कि एक सिंपल लाइफ जिया जाए। मैंने काम शादी से पहले ही छोड़ दिया था क्योंकि हमने सोचा था कि जब मेरी शूटिंग का आखिरी दिन आ जाएगा, तब हम शादी कर लेंगे। एक बार जब मैंने अपना करियर शुरू किया, तो उसने मुझे इसे छोड़ने के लिए कहा, लेकिन मैंने कहा, एक बार मैंने तुम्हें अपने करियर के ऊपर चुना था, अब मैं अपने करियर को तुम्हारे ऊपर चुनूंगी। करियर के पीक पर, रवीना ने साल 2004 में बिजनेसमैन अनिल थडानी से शादी कर ली। शादी से पहले रवीना ने अनिल के सामने एक शर्त रखी थी। उनका कहना था कि 21 साल की उम्र में उन्होंने जिन दो बेटियों को गोद लिया था, वे भी उनके साथ ही रहेंगी। -------------------- बॉलीवुड की यह खबर भी पढ़ें.. मलाइका अरोड़ा @52, माचिस की डिब्बी जैसे घर में रहीं:आत्मसम्मान और मानसिक शांति के लिए तलाक लिया, अर्जुन से अलग होकर आत्म-खोज में जुटीं मलाइका अरोड़ा की कहानी सिर्फ ग्लैमर नहीं, आत्मसम्मान और पुनर्जन्म का प्रतीक है। उनका बचपन बहुत गरीबी में गुजरा। पूरी खबर पढ़े..

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असम का कमरकुची बना सिंगर जुबीन का स्मारक स्थल:गांव में हर रोज 5 से 10 हजार लोग पहुंच रहे; अबतक 5 लाख गमछे चढ़े

सिंगर जुबीन गर्ग की मौत 19 सितंबर को सिंगापुर में डूबने से हो गई थी। 23 सितंबर को सोनापुर जिले के कमरकुची में उनका अंतिम संस्कार हुआ था। गुवाहाटी से 31 किमी दूर इस गांव में 10 बीघा के करीब जमीन को जुबीन का 'देवालय' सा मान लिया गया है। अब यहां हर रोज 5 से 10 लोग उनकी समाधि पर पहुंच रहे हैं। कई ऐसे भी हैं जो यहां 500-800 किमी दूर से पहुंच रहे हैं। इनमें हर उम्र के लोग शामिल हैं। जुबीन ने 52 की उम्र तक 40 हजार से ज्यादा गाने खुद लिखे और गाए। जुबीन के अंतिम संस्कार के बाद से इन 36 दिनों में उनकी समाधि पर अब तक 5 लाख से ज्यादा असमिया गमछे चढ़ाए जा चुके हैं। हजारों चिट्ठियां जुबीन के नाम पर यहां चढ़ाई जा चुकी हैं। यहां आने वाले लोग भी वही गमछा पहने नजर आते हैं, क्योंकि जुबीन अपनी असमिया पहचान के लिए इसे चूमते थे। इन गमछों में वही बातें लिखी हैं, जिन्होंने जुबीन को 'असम का लाड़ला' बनाया। गमछों पर लिखा है- जय जुबीन दा। जुबीन के समाधि स्थल की 3 तस्वीरें.... समाधि पर आने वाले लोग क्या बोले... जिस रोमांटिक गाने को हमेशा गाते थे जुबीन, वो अब प्रार्थना बना जुबीन अपने कार्यक्रमों में एक खास असमिया गाना जरूर गाते थे- ‘मायाविनी रातिर बुकुत’। इसे गाने के बाद इतना जरूर कहते थे- जब मरूंगा, तो पूरे असम में यह गाना बजा देना। वैसे यह एक रोमांटिक गीत है, लेकिन आज असमिया जाति के लिए यह एक प्रार्थना बन गई है। पूरे असम में इसकी धुन सुनी जा सकती है। स्मारक स्थल पर यह 24 घंटे बजता है। .......................... जुबीन डेथ केस से जुड़ी ये खबर भी पढ़ें.... जुबीन डेथ केस- सिंगापुर पुलिस 10 दिन में सबूत देगी: असम SIT को CCTV फुटेज और गवाहों के बयान भेजेगी; अब तक 7 की गिरफ्तारी हुई सिंगर जुबीन गर्ग की मौत के मामले में जांच कर रही असम पुलिस की विशेष जांच टीम (SIT) ने बताया कि सिंगापुर पुलिस अगले 10 दिनों में अहम सबूत भारत को सौंपेगी। इसमें CCTV फुटेज और गवाहों के बयान शामिल हैं। पूरी खबर पढ़ें...

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Only known wood carving of Wolsey’s coat of arms rediscovered

A polychrome oak panel relief of Cardinal Thomas Wolsey’s coat of arms has been identified as the only surviving wood-carved sculpture of his arms made in the cardinal’s lifetime. It is one of only two sculptures of Wolsey’s coat of arms known to survive. The other is a terracotta relief fixed to the wall of the center yard at Hampton Court Palace.

It is composed of two panels from the same Baltic oak tree mounted in an oak frame. Dendrochronological analysis found the three was felled in around1520. At that time, Wolsey was at the peak of his power and his rapid downfall still a decade away. Born in a family of merchants, Thomas Wolsey was royal chaplain to King Henry VII in 1507, and by 1515 was a Cardinal and Lord Chancellor to King Henry VIII.

His arms were granted to him in 1525. As a cardinal, he was entitled to use the red galero cardinalizio, the broad-brimmed hat with red cords and 15 tassels on each side that was the symbol of his clerical office, on his coat of arms. This version only had 10 tassels per side, perhaps in reference to his archbishoprics, just as the cross topping the escutcheon is an archiepiscopal cross. The heraldry on the shield is a silver cross with a red lion center and four blue leopards’ faces. The top field of the shield features a red Tudor rose flanked by two Cornish choughs, black birds also known as “beckets,” that symbolize Wolsey’s namesake St. Thomas Becket.

The panel is expertly carved in relief. It is evidently not the work of a provincial artisan, rather the creation of a skilled sculptor, and something intended to be displayed in opulent surroundings. Although it might have, at some point, been set into a wainscot, the panel functions as a singular artwork. This would have raised its status as an artwork in its own right (as opposed to an element in a decorative architectural scheme) and as a moveable object, undoubtedly ensured its survival. Its high status is again demonstrated by the care the sculptor has taken in including the two attending griffins, whose claws hold up the capello romano and touch the escutcheon. These details set the panel apart from other, more perfunctory carvings which no doubt existed in the Cardinal’s day.

Contemporary accounts and inventories record dozens of objects — tapestries, quilts, chairs, andirons — decorated with Wolsey’s arms, all of which disappeared after his precipitous fall from grace in 1529 and death from dysentery less a year later. Henry VIII made a point of covering Wolsey’s arms at Hampton Court Palace. The only other known sculpture of his coat of arms survived incognito under a masonry relief of the royal arms with an iron crown covering the galero of the original terracotta relief. Henry covered it when he took possession of the palace in 1531, and the original was only rediscovered when Henry’s heraldic device was removed for conservation in 1845.

The traceable ownership history of the object goes back to the 18th century. On the back is a handwritten note that reads: “Arms of Cardinal Wolsey of Christ Church Oxford, 29th November 1530.” It is signed P.B. D. Cooke, marking it as having belonged to Philip Bryan Davies Cooke (1793 – 1853) of Gwynsaney Hall, North Wales, and Owston Hall in Yorkshire. The panel was sold earlier this year in an auction of Gwynsaney Hall art and interiors. It was billed as a “Victorian carved, painted and gilt rectangular wood panel.” The pre-sale estimate was £300-500 ($400-665), but clearly someone suspected this more than a 19th century replica because the hammer price was £13,000 ($17,300).

Art dealer Simon Dickinson acquired the panel from the private collector who bought it at the Gwynsaney Hall auction. His team researched the history of the piece and performed the scientific studies that discovered its real age. They also have a theory about whose hands kept it safe was in when all the other Wolsey coats of arms were destroyed.

Wolsey’s most famous and consequential disciple, and the man who would ultimately replace him as Henry’s chief minister, was Thomas Cromwell. Cromwell was a merchant, lawyer and parliamentarian. In 1524 he entered Wolsey’s household, initially as his lawyer. By 1527 he was one of Wolsey’s personal councillors. We can see in an inventory of Thomas Cromwell’s household effects, dated 26th June 1527, that Cromwell prominently displayed his connection to his cardinal patron, then at the apex of his power and influence. In his parlour, probably at Austin Friars (the house is not specified), Cromwell had a ‘table of my lorde cardynalls Armes paynted and gylted’, and in his hall ‘my lorde cardynalls armes gylted in canaus’.[5] These two items were, in modern English, a wooden panel (table) depicting the Cardinal’s arms, painted and gilded, and a canvas painted with Wolsey’s arms. It is impossible to know from this perfunctory description whether this ‘table’ is the same as our panel. What it does demonstrate, however, is that Cromwell owned two coats of arms, one sounding identical to ours, that were displayed publicly in his home.



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Sabotage, Claudia's ire and the chess board is back as things heat up on The Traitors

It was another night of mounting tension as the faithfuls hoped to finally catch a traitor.

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'पीयूष पांडे के जाने से हम अनाथ महसूस कर रहे':इला अरुण बोलीं- भाई ने देश का नाम रोशन किया; प्रह्लाद कक्कड़ ने भी सुनाए किस्से

एड गुरु पद्मश्री पीयूष पांडे का 23 अक्टूबर को 70 साल की उम्र में निधन हो गया। राजस्थान से आने वाले पीयूष अपने कल्चर को लेकर बेहद सजग थे और उनकी एड कैंपेन में भी इसकी झलक देखने को मिलती थीं। पीयूष को हर कोई अपने तरीके से याद कर रहा है। दिग्गज एड फिल्ममेकर प्रह्लाद कक्कड़ ने कहा पीयूष पांडे जैसी शख्सियत के बारे में बात करना मेरे लिए हमेशा गर्व की बात रहा है। मुझे पूरा विश्वास है कि पीयूष जी एड इंडस्ट्री में वह क्रांतिकारी बदलाव लाए, जिसके बाद आज भारत में 98% विज्ञापन क्षेत्रीय भाषाओं (Regional Languages) में दिखते हैं। वह सिर्फ एक क्रिएटिव नहीं थे, वह हिंदी और क्षेत्रवाद के सच्चे पैरोकार थे। आगे उन्होंने उनसे जुड़ी कई बातें बताईं। अंग्रेजी से हिंदी की ओर: पीयूष ने लाया बड़ा बदलाव मैं आपको बताता हूं, पीयूष जिस बड़े बदलाव के जनक थे, वह था अंग्रेजी भाषा के प्रोफेशनल ऐड को बदलना। वो विज्ञापन उस वक्त देश की केवल 2% आबादी तक ही पहुंच पाते थे! पीयूष ने कमलेश पांडे संग मिलकर न केवल विज्ञापनों को हिंदी में बदला, बल्कि उसे और आगे ले जाते हुए क्षेत्रीय भाषाओं से जोड़ा। चूंकि पीयूष का अपना क्षेत्र राजस्थान था, इसलिए उनके विज्ञापनों में राजस्थानी रंग स्पष्ट दिखता था। फेविकोल के जो आइकॉनिक ऐड थे—जिनमें लोग ट्रकों और बसों से चिपके रहते थे—उनमें शुद्ध राजस्थानी फ्लेवर और संगीत का प्रभाव साफ़ था। पीयूष वह व्यक्ति थे, जो एडवरटाइजिंग में यह बड़ा बदलाव लाए। आज भारत में 98% विज्ञापन क्षेत्रीय भाषाओं में हैं, जिनमें से अधिकांश हिंदी और बाकी अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में होते हैं। क्लाइंट के सामने अड़े रहने का 'जिगर' पीयूष के व्यक्तित्व की एक और खास बात थी, क्लाइंट्स के सामने अपनी रचनात्मक विचारों के लिए अड़े रहने का उनका गजब का 'जिगर'। वह क्लाइंट्स के साथ इस हद तक बहस करते थे कि एक बार तो उन्होंने यह कहने से भी गुरेज नहीं किया कि "सॉरी, मैं आपके लिए काम नहीं करूँगा।" वह इसलिए कि उन्हें अपने ज्ञान पर इतना भरोसा था कि वह क्लाइंट्स को सीधे कहते थे: "आप अंग्रेजी बोलते हैं, आप शहर के हैं, आपको जमीनी हकीकत नहीं पता। अगर आप मुझे एक पेशेवर के तौर पर पैसा दे रहे हैं, तो मेरी सलाह मानिए।" मैं याद करता हूँ अरुण नंदा जैसे दिग्गजों को भी, जो क्लाइंट्स से कह देते थे कि अगर वे विशेषज्ञ की सलाह नहीं मानेंगे तो वह बिज़नेस छोड़ देंगे। थर्ड क्लास डब्बे में मिली शिक्षा पीयूष की रचनात्मकता का राज उनके सफर में छिपा था। जब वह राजस्थान के लिए रणजी ट्रॉफी खेलते थे, उस समय टीम थर्ड क्लास के डब्बे में सफर करती थी, क्योंकि तब रणजी में उतना पैसा नहीं था, जितना आज है। उनके लिए वही थर्ड क्लास डब्बा उनके देश के बारे में सबसे बड़ी शिक्षा था। उनके मुताबिक, "जो उन्होंने उस डब्बे में सीखा, वह न कॉलेज में सीखा, न स्कूल में।" वहाँ उन्होंने जीवन को पास से देखा. लोगों की आदतें, उनकी नजाकत, उनके विचार. उन्होंने वहाँ बोलना नहीं, बल्कि सुनना सीखा, और यही अवलोकन उनके विज्ञापनों का संदर्भ बिंदु बना। 30 सेकंड का विज़न और मूंछें पीयूष अपने अंदाज के लिए भी खास थे। वह राजपूत थे, और उनकी घनी मूंछें उनके 'राजपूत' होने का प्रतीक थीं। रचनात्मकता की बात करें तो पीयूष जी पूरी तरह से 'आउट एंड आउट एड मैन' थे। वह फिल्म मेकर नहीं थे। उनका जीवन 30 सेकंड के फॉर्मेट को समर्पित था, जहाँ उन्हें अपनी पूरी कहानी प्रभाव के साथ कहनी होती थी। हंसी की जुगलबंदी और विरासत हम दोनों बहुत हँसते थे! वह इंडस्ट्री में शायद अकेले ऐसे व्यक्ति थे, जो मेरी हँसी को मैच कर पाते थे, और हमारे बीच हँसी की 'जुगलबंदी' चलती थी। पीयूष का विज़न खुद तक सीमित नहीं था। उनका मानना था, "मैंने जो किया है, अब मुझे अपने नीचे और लोगों को तैयार करना है ताकि वे इस विरासत को आगे बढ़ा सकें।" इसीलिए, आज एडवरटाइज़िंग की दुनिया के 80% से ज़्यादा बड़े क्रिएटिव्स कहीं न कहीं पीयूष पांडे के मार्गदर्शन से होकर गुजरे हैं। वह न केवल महान एड क्रिएटर थे, बल्कि महान क्रिएटिव लोगों को बनाने वाले भी थे। वह वाकई में एक जिंदादिल इंसान थे, जिन्होंने जीवन को पूरा निचोड़ कर जिया। उनके जैसा दिल खोलकर हंसने वाला, और बिना हिचकिचाए अपनी बात रखने वाला व्यक्ति मिलना मुश्किल है। वहीं, अपने भाई पीयूष पांडे को याद करते हुए उनकी बहन सिंगर और एक्ट्रेस इला अरुण ने कहा… पीयूष पांडे उन चंद ऐड मेकर्स में से थे, जिन्होंने सही मायनों में इंडिया का नाम रोशन किया, वह देश के 'ऐड गुरु' थे।क्रिकेटर जो ऐड गुरु बना: वह जयपुर में सात बहनों के भाई और पांडे खानदान के कुलदीपक थे। प्रतिष्ठित सेंट स्टीफंस कॉलेज के भी वह पास आउट रहे। वह एक बेहतरीन रणजी प्लेयर और क्रिकेट कैप्टन भी थे। यही वजह थी कि वह हमेशा अपने ऐड और बातचीत में कहते थे, "फ्रंट फुट से खेलो" और "टीम इज़ मोर इम्पोर्टेन्ट दैन दी कैप्टन।" उनका यही टीम-स्पिरिट उनके काम में भी नज़र आता था। विज्ञापन की दुनिया में 'कॉमन मैन' की क्रांति: पीयूष पांडे के आने से पहले भारत में विज्ञापन का काम मुख्य रूप से अंग्रेजी भाषा में हुआ करता था। लेकिन पांडे जी ने भारतवर्ष की मानसिकता को समझा। उन्होंने माना कि जब चीजें गाँव-गाँव में बिकती हैं, तो उनके लोगों की सोच को समझना ज़रूरी है। उन्होंने जोर देकर बताया कि उनके एड (जैसे 'मेरा वाला ब्लू' पेप्सी का ऐड या फेविकोल) में कोई फिल्मी स्टार नहीं होता था, बल्कि अधिकतर 'कॉमन मैन' होते थे, ताकि आम आदमी उनसे जुड़ाव महसूस करे। बाद में एक अकाउंट्स एग्जीक्यूटिव के तौर पर शुरुआत करने वाले व्यक्ति को 'ऐड गुरु' कहलाने का श्रेय उनके इसी जमीनी जुड़ाव को जाता है। संस्कृति और जड़ों से गहरा लगाव: इला अरुण ने कहा कि पीयूष पांडे की कला में उनके माता-पिता और परिवार के सांस्कृतिक मूल्यों की छाप थी। चाहे एशियन पेंट्स का प्रसिद्ध विज्ञापन हो या उनकी कोई अन्य रचना, वह हमेशा संस्कृति से जुड़े रहने की बात करते थे। 'हर घर कुछ कहता है' लाइन का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा कि पीयूष पांडे हमेशा मानते थे कि घर दीवारों से नहीं, बल्कि व्यक्तियों से बनते हैं। मूंछें थी आन-बान-शान: पीयूष पांडे एक योद्धा की तरह थे, रोमांटिक नहीं। उनके लिए मूछें उनकी आन, बान और शान थीं और वह राजस्थान के नाम के साथ जुड़े 'मूंछ मोस्ट पर्सन' के तौर पर जाने जाते थे। उनके जीवन में मां का बहुत गहरा असर था। 30 सेकंड का आदमी: पीयूष पांडे कभी भी फिल्म मेकर नहीं थे, जैसा कि उनके छोटे भाई प्रसून पांडे हैं। पीयूष पांडे सोते-उठते-बैठते आउट एंड आउट एड मैन थे। उनका जीवन 30 सेकंड के फॉर्मेट के लिए समर्पित था, जहाँ उन्हें अपनी पूरी कहानी कहनी होती थी। वह 30 सेकंड का आदमी था। आज, पीयूष पांडे के जाने से हमारा परिवार खुद को अनाथ महसूस कर रहा है, लेकिन उनका जीवन एक प्रेरणा है। उन्होंने हमेशा "झंडे गाड़ते चलो, कल्चर से जुड़े रहो" का संदेश दिया। अपने जीवनकाल में उन्होंने जयपुर फुट जैसे सामाजिक कार्यों के लिए गुमनाम रूप से कई डोनेशन किए, क्योंकि वह बेहद विनम्र और लो-प्रोफाइल व्यक्ति थे।

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Educated Slaves in Ancient Rome

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अनन्या पांडे के घर हुई दिवाली पार्टी की इनसाइड तस्वीरें:बेस्टफ्रेंड सुहाना खान, नव्या नंदा पहुंचीं, इंडस्ट्री से कई सेलेब्स भी बने ग्लैमरस पार्टी का हिस्सा

अनन्या पांडे की मां भावना पांडे ने दिवाली के खास मौके पर अपने ङर में शानदार दिवाली पार्टी का आयोजन किया था। इस पार्टी में चंकी पांडे, भावना पांडे और अनन्या पांडे के दोस्त और करीबी शामिल हुए हैं। एक नजर पांडे परिवार की दिवाली पार्टी की इनसाइड तस्वीरों पर-

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‘शाहरुख खान बोरिंग एक्टर हैं’:नसीरुद्दीन शाह का पुराना वीडियो वायरल, वहीं एक्टर ने अक्षय कुमार की एक्टिंग की की थी तारीफ

एक्टर नसीरुद्दीन शाह का एक पुराना इंटरव्यू सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। इस इंटरव्यू में उन्होंने शाहरुख खान को बोरिंग एक्टर कहा था। इंटरव्यू में नसीरुद्दीन शाह से पूछा गया कि क्या कुमार, खान जैसे एक्टर्स की एक्टिंग उन्हें पसंद है। जिस पर उन्होंने जवाब दिया, “नहीं, मैं खुद से फिल्में देखने की कोशिश नहीं करता। मैंने कई लोगों के साथ काम किया है, लेकिन किसी ने मुझे ज्यादा प्रभावित नहीं किया, लेकिन अक्षय कुमार एक ऐसे एक्टर हैं जिन्हें मैं सच में पसंद करता हूं। बिना किसी गॉडफादर या मदद के उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई है। अब उनकी एक्टिंग में काफी निखार दिख रहा है। मैंने उनके साथ बहुत पहले काम किया था, अब वो एक अच्छे एक्टर बन गए हैं।” इसी बातचीत में जब उनसे पूछा गया कि शाहरुख खान ने भी तो बिना गॉडफादर के अपनी पहचान बनाई, तो नसीरुद्दीन शाह ने कहा, “यह बात मैं मानता हूं, लेकिन एक्टर के तौर पर वो बोरिंग हैं।” नसीरुद्दीन शाह ने अक्षय और शाहरुख दोनों के साथ कई फिल्मों में काम किया है। उन्होंने अक्षय के साथ मोहरा और शाहरुख के साथ कभी हां कभी ना, चमत्कार और मैं हूं ना में काम किया था। फिल्म 'मैं हूं ना' में नसीरुद्दीन शाह ने ब्रिगेडियर शेखर शर्मा का किरदार निभाया था, जो एक आर्मी ऑफिसर थे। शाहरुख खान ने मेजर राम प्रसाद शर्मा का किरदार निभाया था, जो ब्रिगेडियर शेखर शर्मा के बेटे थे।

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श्याम बेनेगल की फिल्म से लॉन्च हुईं रूपल पटेल:बेटे के लिए छोड़ी इंडस्ट्री, पीएम का पत्र देख घबराईं, दृष्टिहीन फैन से मिलीं, छलके आंसू

मुंबई में जन्मी और पली-बढ़ी अभिनेत्री रूपल पटेल ने एनएसडी से निकलने के बाद श्याम बेनेगल की फिल्मों से करियर शुरू किया और सादगी, ईमानदारी व अनुशासन को हमेशा अपना बल माना। जॉइंट फैमिली की परवरिश से मिली संवेदनशीलता के चलते उन्होंने बेटे की परवरिश के लिए अभिनय से 10 साल का ब्रेक लिया, पर किस्मत ने उन्हें दोबारा चमकाया — जब एक पुराने स्पॉट बॉय का कॉल उनके करियर की नई शुरुआत बन गया। ‘साथ निभाना साथिया’ में कोकिलाबेन का रोल उन्हें घर-घर में प्रसिद्ध कर गया। एक बार एक अंधे प्रशंसक ने केवल उनकी आवाज से उन्हें पहचाना, जिससे रूपल भावुक हो उठीं। वहीं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से स्वच्छ भारत अभियान के लिए मिला सम्मान उन्हें गर्व और जिम्मेदारी दोनों का एहसास दिलाता है। आज की सक्सेस स्टोरी में रूपल पटेल की जीवन यात्रा से जुड़े कुछ अनसुने पहलुओं के बारे में जानिए अभिनय मेरी ‘सात्विक खुशी’, मुंबई मेरी जन्मभूमि और कर्मभूमि रूपल पटेल कहती हैं, "अभिनय मेरी सात्विक खुशी है — दिखावे से परे एक सच्ची अनुभूति।” परिवार में कोई कलाकार न होते हुए भी अभिनय का बीज उनमें बचपन से ही अंकुरित हुआ। कहानी सुनाने की कक्षाओं और संस्कृत-हिंदी के अध्ययन ने उनकी अभिव्यक्ति को निखारा। रूपल अभिनय को सत्य, सरलता और ईमानदारी का साधन मानती हैं — जहां व्यक्ति अहं से मुक्त होकर किरदार जीता है। संयुक्त परिवार में पली-बढ़ीं रूपल बताती हैं कि 15-20 लोगों के साथ रहकर साझा जीवन ने उन्हें अनुशासन, आदर और संतोष सिखाया। बचपन में राजश्री फिल्मों और धार्मिक कथाओं से उन्होंने पारिवारिक मूल्यों की अहमियत जानी। रूपल कहती हैं — “मुंबई ही मेरी जन्मभूमि और कर्मभूमि है।” पिता की सीख ने बदल दी रूपल पटेल की जिंदगी रूपल पटेल कहती हैं— पिता ने सिखाया था, “निर्णय लो और पीछे मत देखो।” यही बना उनके जीवन का सिद्धांत। अभिनय को पेशा बनाने की ठानी तो पिता की सलाह पर NSD में दाखिला लिया और पहले ही प्रयास में सफलता मिली। दिल्ली का NSD उनके जीवन का टर्निंग पॉइंट रहा, जहां मुंबई के सुरक्षित घेरों से निकल उन्होंने संघर्ष, अनुशासन और आत्मनिर्भरता सीखी। उनके मुताबिक अभिनय केवल कला नहीं, एक साधना है। जिसमें ईमानदारी और आस्था ही असली पूंजी है। श्याम बेनेगल के प्रोत्साहन से मिली पहचान एनएसडी से निकलने के बाद रूपल पटेल ने श्याम बेनेगल को फोन किया। वे करती हैं कि उस समय उनका आत्मविश्वास और सरलता ही उनकी पहचान थी। श्याम बेनेगल ने उनसे फोटो मांगी तो उन्होंने ईमानदारी से कहा कि उनके पास सिर्फ एनएसडी में खिंचाई हुई एक ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीर है। बेनेगल जी के प्रोत्साहन से उन्हें काम मिला और वहीं से उनका फिल्मी सफर शुरू हुआ। ‘अंतरनाद’ की शूटिंग के दौरान उन्होंने ओम पुरी, शबाना आजमी और कुलभूषण खरबंदा जैसे कलाकारों से बहुत कुछ सीखा। एनएसडी में उनके सीनियर राधा कृष्ण दत्त रहे, जिनसे नजदीकियां बढ़ीं और बाद में वही उनके पति बने। रूपल आज भी मानती हैं कि सादगी और सीखने की भावना ही उनका सबसे बड़ा बल है। एनएसडी की पढ़ाई के दौरान शुरू हुआ प्यार, फिर एक छोटे घर से शुरू हुआ था वैवाहिक सफर एनएसडी में दाखिला लेते वक्त रूपल पटेल को एक फॉर्म में ‘लोकल गार्जियन’ का नाम भरना था। वह मदद के लिए स्टूडेंट यूनियन लीडर आर. के. दत्त(राधा कृष्ण दत्त) के पास गईं। दत्त ने अपने पिता से रूपल को मिलवाया, जिन्होंने कहा – “आई विल बी योर लोकल गार्जियन।” वहीं से दोनों की पहचान शुरू हुई। उस दौर में मोबाइल नहीं था, पोस्टकार्ड के जरिए संवाद होता था और हर छोटी जरूरत पर रूपल, राधा कृष्ण दत्त से मदद लेतीं। वे नाटक के जूनियर कलाकारों में हिस्सा लेतीं – "गोल खोपड़ी नुकीली खोपड़ी" जैसे प्ले में गांव वाले या भीड़ का किरदार निभातीं। एक साल बाद राधा कृष्ण दत्त ने गंभीरता से कहा – “हम एक ही फील्ड के हैं, तो लाइफ पार्टनर बन सकते हैं।” रूपल को पहले तुरंत बात समझ नहीं आई, पर बाद में उनका प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। दोनों परिवार मिले और तय हुआ कि दोनों अपनी पढ़ाई पूरी करें, फिर शादी करेंगे। एनएसडी के बाद राधा कृष्ण दत्त को “टीपू सुल्तान” सीरियल मिला और उन्होंने पहली कमाई से रूपल के लिए एक छोटा घर लिया। वहीं से उनका वैवाहिक सफर शुरू हुआ—एक वन रूम किचन से, पर प्रेम और सम्मान से भरा हुआ। मां बनने की जिम्मेदारी निभाने के लिए दस साल का ब्रेक लिया रूपल कहती हैं- मैं जॉइंट फैमिली से हूं, जहां परिवार को सबसे पहले रखा जाता है। मैंने अपनी मम्मी, दादी और काकी को देखा कि कैसे वे घर और रिश्तों को संभालती थीं। मुझे हमेशा लगा कि अगर परिवार में एक व्यक्ति पहले से काम कर रहा है और सब ठीक चल रहा है, तो बच्चे को समय देना भी उतना ही जरूरी है। मां बनना जिम्मेदारी है। बच्चे को संस्कार और प्यार देना माता-पिता का कर्तव्य है। इसलिए मैंने 10 साल का ब्रेक लिया ताकि बेटे को पूरा समय दे सकूं। आज भले वह अमेरिका में है, लेकिन हमारी बॉन्डिंग बहुत गहरी है। मुझे लगता है मां बनने से इंसान और संवेदनशील हो जाता है, जो आगे चलकर प्रोफेशन में भी मदद करता है। 10 साल के बाद वापसी/पुराने स्पॉट बॉय ने दी नई जिंदगी का रोल रूपल ने 10 साल का ब्रेक लेने के बाद जब दोबारा काम शुरू करने का निर्णय लिया, तभी एक अप्रत्याशित कॉल आया — एक पुराने स्पॉट बॉय का, जिसे वह 1997 में सेट पर हमेशा हौसला देती थीं। वही स्पॉट बॉय अब एक प्रोडक्शन हेड बन चुका था और उसने उन्हें नए शो के लिए बुलाया। उस शो का दो ढाई महीने का रोल दो साल तक चला। रूपल ने इसे ईश्वर का आशीर्वाद और अपनी सकारात्मक सोच का परिणाम बताया। उन्होंने कहा, “अच्छाई हमेशा लौटकर आती है।” आज वे सोशल मीडिया से दूर हैं, फिर भी दर्शक उन्हें याद रखते हैं और उनके पुराने दृश्यों को पसंद करते हैं। वह मानती हैं कि यह निस्वार्थ दर्शक-प्रेम और प्रभु की कृपा का प्रमाण है। दर्शकों के प्यार ने कोकिलाबेन को बना दिया मील का पत्थर ‘साथ निभाना साथिया’ के बारे में बात करते हुए रूपल कहती हैं- मुझे बिल्कुल अंदाजा नहीं था कि ये इतना बड़ा और मजबूत रोल बन जाएगा। शुरुआत में टीम को भी नहीं पता था कि कहानी किस दिशा में जाएगी, क्योंकि डेली सोप में सब कुछ टीआरपी और दर्शकों के प्यार पर निर्भर करता है। उस वक्त 7 बजे का टाइम स्लॉट था, इसलिए कई लोग सोचते थे शो ज्यादा नहीं चलेगा, लेकिन मैंने बस सोचा—रोल अच्छा है, तो करना चाहिए। शुरुआत में बस टाइम स्लॉट दे दिया गया था, किसी को उम्मीद नहीं थी क्या होगा। पर दर्शकों के प्यार से शो ने कमाल किया। ‘साथिया’ के बाद पीछे मुड़कर नहीं देखा। इस सफर में स्टार टीम, रश्मि मैम, पवन सर, को-आर्टिस्ट और टेक्नीशियनों—सबका बड़ा योगदान रहा। कोई भी बड़ी सफलता अकेले नहीं मिलती। आखिरी कतार से आगे की पंक्ति तक, मेहनत ने दिलाया सम्मान एक बार उनके शो "साथ निभाना साथिया" की टीम को स्टार परिवार अवॉर्ड्स में आखिरी कतार में बैठाया गया था। उस समय उन्हें दुख हुआ, लेकिन उन्होंने खुद को साबित करने का फैसला किया। अगले साल उनके शो ने इतनी सफलता पाई कि वे सबसे आगे बैठे। उनका मानना है कि ईमानदार मेहनत करने वालों को समय आने पर सम्मान जरूर मिलता है। 'रसोड़े में कौन था?’ कोविड में खूब वायरल हुआ ‘साथ निभाना साथिया’ में रूपल पटेल का किरदार कोकिलाबेन खूब लोकप्रिय हुआ। इसके डायलॉग 'रसोड़े में कौन था’ के खूब मीम्स बने। उनका डायलॉग 'रसोड़े में कौन था?' कोविड के समय यशराज मुखाटे के म्यूजिक रीमिक्स के बाद वायरल हो गया। रूपल ने बताया कि उन्हें इसका पता उनकी दोस्त चारुल मलिक से चला, क्योंकि वो सोशल मीडिया पर एक्टिव नहीं रहतीं। जब उन्होंने यशराज को फोन कर धन्यवाद दिया तो वो पहले डर गए कि शायद वह नाराज होंगी। लेकिन रूपल ने कहा, “मैं एक कलाकार हूं, अगर मेरी वजह से लोग मुस्कुराते हैं तो यही मेरे लिए सबसे बड़ा इनाम है।” फॉलोअर्स से नहीं, दर्शकों के प्यार से मिलती है असली सफलता रूपल पटेल कहती हैं कि आजकल लोग यह देखते हैं कि किसके कितने फॉलोअर्स हैं, लेकिन उनके पास सोशल मीडिया प्रेजेंस न होने के बावजूद दर्शकों का स्नेह और दीवानगी मिलना उनके लिए प्रभु का आशीर्वाद है। वह अपने दर्शकों, मीडिया और करीबी मित्र चारुल मलिक की आभारी हैं जो उन्हें समय-समय पर अपडेट देती रहती हैं। रूपल बताती हैं कि उनके अंदर लालच नहीं है। उनका मानना है कि "जिसका काम उसी को साजे।" अभिनय उनका कार्य है, इसलिए वह सिर्फ अपने किरदार पर ध्यान देती हैं, बाकी समय परिवार के साथ बिताती हैं। चारुल मलिक उन्हें हमेशा खुद के लिए समय निकालने की सलाह देती हैं। वह अपने जीवन में पेशेवर और निजी पक्ष के बीच संतुलन बनाए रखने में विश्वास रखती हैं। रूपल स्वीकार करती हैं कि कई बार लोगों ने उनसे पूछा कि वह सोशल मीडिया पर क्यों नहीं हैं या उनके कितने फॉलोअर्स हैं, लेकिन उन्हें फर्क नहीं पड़ता। वह कहती हैं, "अगर फॉलोअर्स ही सब कुछ होते तो शो क्यों बंद हो जाते?"  उनके लिए असली सफलता है चरित्र को ईमानदारी, मेहनत और लगन से निभाना और दर्शकों के दिल में जगह बनाना। तैयारी ही बनाती है कलाकार को यादगार टीवी इंडस्ट्री में आजकल स्क्रिप्ट पर निर्भरता बढ़ गई है, लेकिन कुछ कलाकार अपने किरदार में अपना अनुभव और सोच भी जोड़ते हैं। जब रूपल से सवाल किया गया कि उनके निभाए किरदार इतने सालों बाद भी दर्शकों को क्यों याद रहते हैं, तो उन्होंने कहा- ‘’मैं अपने को-आर्टिस्ट्स का धन्यवाद करती हूं क्योंकि जब मैं इम्प्रोवाइज करती थी, उन्होंने हमेशा साथ दिया। हम रिहर्सल्स करते थे, पर अब रिहर्सल्स कम और प्रॉम्प्टिंग ज्यादा हो गई है। अब लोग मानते हैं कि बस शो चल गया तो स्टार बन गए, लेकिन असली मेहनत तो तैयारी में होती है।” गोपी बहू के बदलने पर टूट गई थीं रूपल रूपल इस बात की भी चर्चा करती हैं कि जब उनकी को-स्टार गोपी बहू को बदल दिया गया था। तब वो समय उनके लिए काफी मुश्किल था। वो कहती हैं- पहले जिया मानेक के साथ अच्छा कनेक्शन बन गया था, तो अचानक देवोलीना भट्टाचार्जी को उसी रोल में देखना आसान नहीं था। लेकिन धीरे-धीरे हमने साथ काम किया और तालमेल बिठा लिया। लेकिन जब देवोलीना आईं, तो शुरू में उनके साथ प्रोमो शूट करना मेरे लिए मुश्किल था, क्योंकि जिया के साथ गहरा जुड़ाव था। शो के डायरेक्टर पवन सर ने मेरे इमोशंस समझे और समय दिया। बाद में देवोलीना ने भी उस किरदार को बहुत मेहनत से निभाया, क्योंकि पहले से स्थापित किरदार को दोबारा निभाना आसान नहीं होता। धीरे-धीरे हमारी केमिस्ट्री लोगों को पसंद आने लगी और दर्शकों ने देवोलीना को भी उतना ही प्यार दिया, जितना जिया को। तब समझ आई एक्टिंग की असली शक्ति एक बार स्टार प्लस की टीम रूपल को बड़ौदा लेकर गई, जहां उन्हें एक विशेष फैन से मिलने का अवसर दिया गया। यह फैन दृष्टिहीन थे, लेकिन उनका जुड़ाव कोकिलाबेन के किरदार से इतना गहरा था कि वे सिर्फ आवाज सुनकर उन्हें पहचान लेते थे। हर शाम 7 बजे, उनके लिए कोकिलाबेन की आवाज सुनना एक आध्यात्मिक अनुभव था। जब वह फैन उनसे मिले, तो बस इतना कहा- “आज मेरी जिंदगी का सबसे अच्छा दिन है, क्योंकि मैंने आपको सुना।” इस एक वाक्य ने रूपल के दिल को छू लिया। उनकी आंखों में आंसू आ गए। उस पल उन्हें एहसास हुआ कि अभिनय सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि जीवन को छूने की शक्ति रखता है। पीएम मोदी का लेटर आया तो डर गईं रूपल पटेल स्वच्छ भारत अभियान में ब्रांड एंबेसडर के रूप काम कर चुकी हैं। जिसके लिए उन्हें दो बार सम्मानित किया जा चुका है। रूपल कहती हैं- प्रधानमंत्री जी और उनकी टीम ने मुझे चुना, यह मेरा सौभाग्य है। जब उनका लेटर आया तो मैं डर गई थी, मैंने अपने पति से कहा कि वे घर आकर खोलें। पत्र पढ़कर बहुत गर्व हुआ और मैंने मोदी जी व उनकी टीम का धन्यवाद किया। आज भी मैं स्वच्छता अभियान से जुड़े काम करती रहती हूं और आगे भी जुड़ना चाहूंगी। हालांकि मोदी जी से नहीं मिली, लेकिन मुझे कभी ऐसा नहीं लगा कि मैं उनसे नहीं मिली। वह जो देश के लिए इतना अच्छा काम कर रहे हैं, जो विकास और प्रगति हो रही है, उसे देखकर लगता है कि हम सब उनसे जुड़े हुए हैं। दर्शकों ने दी पहचान, लेकिन इंडस्ट्री ने नहीं दी बधाई रूपल कहती हैं कि कैसे उनके काम को दर्शकों और मीडिया ने पहचाना, लेकिन इंडस्ट्री के कुछ लोगों ने उनकी सफलता पर खुलकर बधाई नहीं दी। इससे उन्हें दुख हुआ, लेकिन वे आज भी दूसरों की तारीफ करती हैं, क्योंकि उनका मानना है कि अच्छाई मानवता की पहचान है। रूपल पटेल ने कहा— अगर टीवी कलाकार छोटे हैं तो फिल्म स्टार यहां क्यों आते हैं? रूपल ने बताया कि टीवी के मंच ने उन्हें दर्शकों से जुड़ने का अवसर दिया। फिल्मों में उन्हें मजबूत किरदार नहीं मिले, इसलिए उन्होंने टीवी पर ध्यान केंद्रित किया। वे मानती हैं कि टीवी एक शक्तिशाली माध्यम है और इसमें काम करने वाले कलाकारों को भी सम्मान मिलना चाहिए। वे हैरान हैं कि फिल्म स्टार टीवी पर क्यों आते हैं, अगर वे टीवी कलाकारों को कम मानते हैं। उन्होंने बताया कि एक डेली सोप में व्यस्तता के कारण उन्हें कई फिल्मों के ऑफर ठुकराने पड़े। लेकिन वे अपनी प्रतिबद्धता को निभाना जरूरी समझती हैं। उनका मानना है कि ईमानदारी, अनुशासन और फोकस ही सफलता की कुंजी है। ईमानदारी को कमजोरी नहीं, ताकत मानती हैं उनके लिए सबसे बड़ा संघर्ष अपने सपने को पूरा करना था, लेकिन परिवार और NSD ने उनका पूरा समर्थन किया। वे मानती हैं कि उनकी सफलता में भगवान का आशीर्वाद, दर्शकों का प्यार और अच्छे लोगों की दुआएं महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। कई बार लोग उनकी ईमानदारी और मजबूत पर्सनैलिटी को गलत समझते हैं। वे कहती हैं कि लोग उनके अंदर की कोमलता और ईमानदारी नहीं देख पाते, जिससे कुछ लोगों में असुरक्षा पैदा होती है। लेकिन जो लोग उनके करीब हैं, वे उन्हें असली रूप में जानते हैं। उनके लिए सफलता का मतलब है — दिल, जुबान और कर्म एक होना। वे मानती हैं कि झूठ और बुराई के बीच भी अपनी अच्छाई बनाए रखना ही सच्ची सफलता है। उनका लक्ष्य अच्छा इंसान बने रहना, अच्छा काम करते रहना और अच्छे लोगों के साथ जुड़े रहना है। रूपल अपने प्रशंसकों के लिए चारुल मलिक के साथ मिलकर 'रूपचा' नाम से रील्स बना रही हैं। इनमें वे अलग-अलग कॉमिक किरदार निभा रही हैं, जो उनकी असली पर्सनैलिटी से अलग हैं। वे चाहती हैं कि लोग उन्हें नए रूप में भी देखें। ________________________________________ पिछले हफ्ते की सक्सेस स्टोरी पढ़िए... ट्रेड पेपर ने ‘शोले’ को डिजास्टर बताया था:फिर सफलता बनी बोझ; ‘बुनियाद’ से रमेश सिप्पी ने फिर रचा इतिहास, साबित किया जज्बा जिंदा है रमेश सिप्पी भारतीय सिनेमा के उन दिग्गज निर्देशकों में से हैं जिन्होंने कराची से मुंबई तक का सफर तय करते हुए फिल्म जगत की विरासत को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। पूरी खबर पढ़ें...

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The Worlds at the Earth’s Core

The Worlds at the Earth’s Core JamesHoare

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UK gambling ads with Lewis Hamilton and Chelsea logo banned over influence on children

UK's ad watchdog warns the betting companies not to include any character who has a strong appeal to viewers under the age of 18.

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UK's ad watchdog warns the betting companies not to include any character who has a strong appeal to viewers under the age of 18.

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5th c. mosaic floor found at Urfa Citadel

A 5th century mosaic floor has been uncovered in an excavation at Urfa Citadel in Şanlıurfa, Turkey. The mosaic is composed of black, white and red tesserae and features animals, botanical motifs and a Greek inscription. A medallion containing representations of the four cosmic elements of air, water, earth and fire is in one corner of the floor. Such a medallion was likely placed in each of the other three corners of the room, and its unusual iconography may lend new insight into the religious practices of Late Antiquity in the region.

Archaeologists believe the building was a small church, chapel or a martyr’s shrine. The inscriptions includes names and titles of religious officials who sponsored the construction of the building. Written in the epigraphic formula of the early Byzantine Empire, the inscription calls for the protection of “Count Anakas and his family.” The formula was used to invoke the intercessory prayer of a saint for the main donor who funded the construction of the structure.

The inscription mentions Bishop Kyros of the region, Elyas (Ilyas in Turkish) serving as the head priest, and Rabulus, who held the rank of deacon, a position assisting in churches where deacons held the rank of principal reader. […]

Medallion with references to the elements. Photo courtesy Andalou Agency.Religious personnel who served in the structure appear to have been buried at the site.

“Similar to the rock-cut tombs we found both on the southern slope of the castle and in the Kizilkoyun necropolis, we see evidence of burials here. We have found at least three, but work on these will continue next year,” Kozbe said.

“This is an important discovery. Similar floor examples exist in the southeast and other regions of Anatolia. These names provide important clues about who held religious responsibility in this area and about the religious practices and rituals of the elite class, including a local commander,” Kozbe added.

Animal and botanical motif. Photo courtesy Andalou Agency.Archaeologists have been excavating the historic castle for five years. Most of the surviving citadel was built by the Abbasid caliphs during the 9th century A.D., but site has archaeological evidence of occupation going back to the Neolithic era. The mosaic was found in the interior of the upper citadel.



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