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» » » नवाजुद्दीन सिद्दीकी@52:वॉचमैन बने तो मालिक ने कहा- इस मरे हुए को किसने रखा, दोस्त की गुमशुदगी से मिली सरफरोश, सीन कटे तो थिएटर में रोए

उत्तर प्रदेश के बुढ़ाना में जन्में नवाजुद्दीन सिद्दीकी जब 17 साल के हुए तो उनके गांव के एक घर में टीवी आया। एक दिन नवाज की नजर पड़ोस में रहनेवाली लड़की पर पड़ी। पहली नजर में ही उन्हें उस लड़की से प्यार हो गया। वो लड़की रोज टीवी देखने उस घर एक घर में जाती, तो पीछे-पीछे नवाज भी वहीं जाने लगे। दोनों घंटों उस घर में बैठते और कई बार नजरें टकरातीं। एक दिन नवाजुद्दीन ने हिम्मत कर लड़की का हाथ पकड़ लिया और कहा- ‘टीवी मत देखो, मुझे देखो।’ लड़की ने जवाब दिया- 'मैं तो टीवी ही देखूंगी।' इस पर नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने तैश में कहा- ‘देखना, एक दिन मैं भी टीवी पर आऊंगा।’ नवाज को गुस्सा करते देख, लड़की उनका हाथ झटक कर वहां से चली गई। उसने भी एक पल के लिए जरूर सोचा होगा कि एक छोटे से गांव का सांवला, आम सी शक्ल का दुबला-पतला ये लड़का हीरो बनेगा? कुछ साल बाद नवाजुद्दीन ने अपनी कही बात सच कर दिखाई। ये मुमकिन हो सका उनकी लगन, संघर्ष और काबिलियत से, जिसे नवाजुद्दीन ने साल-दर-साल निखारा। इस सफर में नवाजुद्दीन कभी वॉचमैन बने, तो कभी 100 रुपए का नुकसान होने से 19 किलोमीटर पैदल चले। कभी तीन वक्त चाय-बिस्कुल में गुजारा किया, तो कभी स्टूडियो से बेइज्जती कर निकाले गए। कभी टीवी पर वेटर बने, चोर बने, तो कभी गुंडे, लेकिन फिर हुनर की बदौलत उनकी गिनती बॉलीवुड के सबसे मंझे हुए एक्टर्स में की जाने लगी। उनके कहे गए डायलॉग- ‘बाप का, दादा का, भाई का सबका बदला लेगा तेरा फैजल….’, ‘आखिर चाहिए क्या औरत को….’, ‘मैं 15 मिनट तक अपनी सांस रोक सकता हूं, मौत को छू के टक से वापस आ सकता हूं…’, आज भी चाहनेवालों की जुबां पर रटे रहते हैं। वजह है उनका हुनर, कहने का सलीका और दमदार अभिनय। आज नवाजुद्दीन सिद्दीकी 52 साल के हो चुके हैं। उनके जन्मदिन के खास मौके पर जानिए उनकी जिंदगी से जुड़े मजेदार किस्से, जो उनकी शख्सियत को करीब से समझने का मौका देते हैं- किस्सा- 1 चीफ केमिस्ट की नौकरी छोड़ी, फिर वॉचमैन बनने के लिए मां के गहने रखे गिरवी 19 मई 1974 नवाजुद्दीन सिद्दीकी का जन्म उत्तर प्रदेश के बुढ़ाना (मुजफ्फरनगर) में जमींदार के घर हुआ। प्री-मैच्योर नवाज 8 भाई-बहनों में सबसे बड़े थे। घरवाले खेती-किसानी करते थे, लेकिन नवाजुद्दीन को पढ़ाई में दिलचस्पी थी। 10 की उम्र में पिता ने अखाड़े भेजा, लेकिन बार-बार पिटाई होने पर उन्होंने इसे जारी रखने से इनकार कर दिया। शुरुआती पढ़ाई गांव से हुई और फिर पिता ने उनकी रुचि की कद्र करते हुए केमिट्री में ग्रेजुएन करने के लिए उनका दाखिला हरिद्वार के कांगड़ी विश्वविद्यालय में करवा दिया। पढ़ाई के बाद उनकी वडोदरा की केमिकल फेक्ट्री में चीफ केमिस्ट की नौकरी लग गई। नवाज अपने परिवार के इकलौते थे, जिन्होंने ग्रेजुशन किया था। एक महीने में ही नवाज इस काम से ऊब गए और नई नौकरी की तलाश में दिल्ली निकल पड़े। एक दिन मंडी हाउस में दोस्त का प्ले देखने गए नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने खुद भी एक्टिंग करने का फैसला कर लिया। उन्हें महसूस हुआ कि यही वो काम है, जिसे कर वो कभी बोर नहीं हो सकते। उन्होंने नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में दाखिला लेने के लिए एक प्ले ग्रुप जॉइन कर लिया। दरअसल, दाखिले के लिए स्टूडेंट के लिए 10 प्ले करना अनिवार्य होता था। प्ले के दिनों में गुजारा करना मुश्किल होने लगा। एक दिन नई दिल्ली रेल्वे स्टेशन के बाहर बने सुलभ में पेशाब करते हुए नवाजुद्दीन सिद्दीकी की नजर सामने चिपके पैंप्लेट पर पड़ी। लिखा था, 500 सिक्योरिटी गार्ड, 300 वॉचमैन चाहिए। उस कंपनी के शाहदरा ऑफिस पहुंचे, तो कहा गया, नौकरी मिल जाएगी, लेकिन 5 हजार सिक्योरिटी डिपॉजिट देने होंगे। नवाजुद्दीन ने हामी भर दी। वो गांव गए, मां के सोने के गहने गिरवी रखकर पैसे लिए, जिसके डिपॉजिट से उन्हें नोएडा की एक खिलौने बनाने वाली कंपनी में वॉचमैन की नौकरी मिल गई। किस्सा- 2 धूप में बेहोश हुए, तो मालिक ने कहा- इस मरे हुए इंसान को किसने काम दिया नवाजुद्दीन सिद्दीकी सुबह 9 बजे से 5 बजे तक वॉचमैन की नौकरी करते और शाम को सीधे मंडी हाउस पहुंचकर प्ले करते थे। डेढ़ सालों तक ये सिलसिला जारी रहा। वो जिस टॉय कंपनी में काम करते थे,वहां उन्हें कड़ी धूप में 8 घंटे खड़ा रहना पड़ता था, छांव के लिए कोई जगह ही नहीं थी, ऊपर से नवाज एकदम दुबले-पतले थे। कुछ देर में ही धूप और थकान के मारे वो गेट के कोने में बैठ जाते थे। बदकिस्मती से जैसे ही वो बैठते, वैसे ही उनके मालिक आ जाते। 5-6 बार यही हुआ। एक दिन वो धूप में खड़े-खड़े बेहोश हो गए। तभी वहां मालिक पहुंच गए। अगले दिन उन्होंने चिल्लाते हुए कहा- ‘ये मरे हुए आदमी को किसने काम पर रखा। कौन लेकर आया है, हटाओ इसे।’ नवाजुद्दीन ने जब डिपॉजिट वापस मांगा, तो जवाब मिला- ‘गिरे तुम, गलती तुम्हारी, तो हम पैसे नहीं देंगे।’ और इस तरह नवाज के 5000 डूब गए। संघर्ष के दिनों में वो ईस्ट दिल्ली के शकरपुर में किराए के कमरे में रहते थे। तब स्ट्रगल कर रहे एक्टर-कॉमेडियन विजय राज उनके रूम मेट थे। कमरे का किराया 150 रुपए था, तो दोनो 75-75 रुपए देते थे। दोनों तीन वक्त चाय-बिस्कुट खाकर गुजारा करते। कुछ समय बाद उन्हें प्लेज की बदौलत नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में दाखिला मिल गया। वहां रहने और खाने की भी व्यवस्था दी गई। नवाजुद्दीन के प्ले के दिनों की तस्वीरें- किस्सा- 3 100 के 200 करने के लिए चौराहे में धनिया बेची NSD से पढ़ाई पूरी कर नवाजुद्दीन 1999 में बॉम्बे आ गए। एक दिन एक दोस्त ने नवाजुद्दीन सिद्दीकी से कहा, ‘100 रुपए के 200 करने हैं।’ नवाजुद्दीन ने झट से कहा- ‘हां करना है, लेकिन कैसे।’ जवाब मिला- 'धनिया बेचेंगे। चल साथ में।' नवाज दोस्त के साथ लोकल ट्रेन से गोरेगांव से दादर गए। सब्जी मंडी से 400 की थोक में धनिया खरीदी और गड्डियां बनाकर चौराहे में खड़े हो गए। नवाज तो चुप खड़े थे, लेकिन दोस्त जोर-जोर से चिल्ला रहा था- ‘धनिया, 10 की एक गड्डी।’ कोई ग्राहक नहीं आया और एक घंटे में धनिया काली पड़ गई। दोनों सब्जीवाले के पास गए और कहा, ये बिके भी नहीं काले अलग पड़ गए। दुकानवाले ने कहा- ‘अरे इसे हर मिनट पानी देना पड़ता है।’ इस बार नवाज ने गुस्से में कहा- ‘तो ये बात पहले बतानी थी।’ पैसे डबल करने के बदले और कम हो गए। पैसे नहीं थे तो दोनों बिना टिकट दादर से गोरेगांव आए। किस्सा- 4 विजय राज के साथ खाई वजन बढ़ाने की दवा, बिगड़ी बॉडी स्ट्रगल के दिनों में एक्टर विजय राज और नवाजुद्दीन रूम मेट्स थे। कमरे का किराया 150 रुपए था, तो दोनों 75-75 देते थे। दोनों ही दुबले-पतले थे। एक दिन वजन बढ़ाने के लिए परेशान नवाजुद्दीन को देख विजय राज ने कहा- ‘तू एक काम कर, मैं तुझे दवा लिखकर देता हूं, तू वो खा।’ अपनी दवाइयां लिखकर दे दीं। वो भी वजन बढ़ाने के लिए वही दवा लेते थे। एक बार उनका वजन काफी बढ़ गया, लेकिन दवा छोड़ने पर वो फिर पतले हो गए। नवाजुद्दीन ने भी वही दवाइयां लीं। तब उनका वजन 50-51 किलो ही था। एक गोली खाते ही ऐसी भूख लगती थी कि वो घंटों तक खाते रहते थे। दवा लेते ही 15 दिनों में वो 65-67 किलो के हो गए। शरीर ऐसा बिगड़ा कि उन्हें दवा छोड़नी पड़ी और कुछ ही दिनों में वजन फिर घट गया। किस्सा- 5 पैसे बचाने के लिए सब्जीवाले के सामने अंधे बनने की करते रहे एक्टिंग नवाजुद्दीन सिद्दीकी स्ट्रगल के दिनों में पैसे बचाने के लिए हर मुमकिन कोशिश करते थे। वो जहां किराए पर रहते थे, वहां पास में एक सब्जीवाला था। वो रोज, अंधे की एक्टिंग करते हुए सब्जी खरीदने जाते। दया करते हुए सब्जीवाला कम पैसे लेता। ऐसा नवाज ने पूरे 2 सालों तक किया। किस्सा- 6 प्ले में मनोज तिवारी बनते थे भालू, घंटों पेड़ बनकर खड़े रहते थे नवाज थिएटर के दिनों में मनोज तिवारी काफी फेमस हुआ करते थे। उन्हें फिल्म बैंडिट क्वीन मिली थी। तभी नवाजुद्दीन सिद्दीकी और विजय राज को उनके साथ एक प्ले मिला। मनोज उसमें भालू बने थे और नवाजुद्दीन सिद्दीकी को रोल मिला पेड़ का। भालू बने मनोज जानबूझकर, पेड़ के पास आकर बॉडी को रगड़ते और खुजली की एक्टिंग करते थे। प्ले के चक्कर में नवाजुद्दीन सिद्दीकी को घंटों पेड़ बनकर खड़े रहना पड़ता था। किस्सा- 7 दोस्त गायब हुआ तो संयोग से मिला फिल्म सरफरोश में पहला रोल नवाजुद्दीन सिद्दीकी मुंबई में जिस जगह रहते थे, वहां उनकी तरह स्ट्रगल कर रहे कई लोग रहते थे। उनके पास के कमरे में एक लड़का था, जिसका नाम था, निर्मल दास। नवाजुद्दीन उसके अच्छे दोस्त थे। निर्मल दास की उस समय फिल्म सरफरोश में टेररिस्ट का रोल निभाने के लिए बात चल रही थी, लेकिन जिस दिन कास्टिंग वाले उन्हें ढूंढते हुए आए, वो अपने कमरे में ही नहीं थे। नवाजुद्दीन सिद्दीकी वहीं पास में टहल रहे थे। निर्मल दास नहीं मिला तो, कास्टिंग वालों ने नवाजुद्दीन को रोककर पूछा कि क्या आप एक फिल्म के लिए ऑडिशन देंगे। नवाजुद्दीन, जो इस दिन का बेसब्री से इंतजार कर रहे थे, वो इनकार कैसे करते। झट से हां कहा और फिर डायरेक्टर जॉन मैथ्यू के घर उनका ऑडिशन लिया गया और उनका सिलेक्शन हो गया। फिल्म में उन्होंने 1 मिनट से भी कम समय का रोल किया, जिन्हें आमिर खान कस्टडी में लेते हैं। तब तो हर किसी ने उन्हें नजरअंदाज कर दिया, किसी को उनका नाम तक नहीं पता था। लेकिन आज फिल्म देखकर हर कोई वो सीन देख कहता जरूर है- देखो वो नवाजुद्दीन है। जिस निर्मल दास की अचानक गुमशुदगी से नवाजुद्दीन सिद्दीकी को सरफरोश में काम मिला। वो सालों तक गायब रहा। किसी ने उसे नहीं देखा। फिर सालों बाद पता चला कि वो पागल हो चुका है। इसी तरह नवाजुद्दीन ने 2000 में आई फिल्म जंगल में भी काम किया था, लेकिन उनके लगभग सभी सीन काट दिए गए। उन्हें फिल्म की फीस नहीं मिली थी, तो वो रोज सेट पर खाना खाकर फीस वसूलते थे। नवाजुद्दीन सिद्दीकी के चुनिंदा रोल देखिए- किस्सा- 8 दोस्तों के अपनी फिल्म दिखाने पहुंचे, सीन कटे, तो वहीं खड़े रो पड़े मुंबई में लंबी जद्दोजहद करते हुए नवाजुद्दीन सिद्दीकी को आमिर खान की फिल्म सरफरोश में टेररिस्ट का एक छोटा सा रोल मिल गया। उन्होंने सोच लिया कि छोटे-छोटे रोल ही मिल जाएं, तो उनके रहने-खाने का खर्च निकलता रहेगा। थोड़े ही पैसे मिले। इसके बाद उन्हें कमल हासन की फिल्म हे राम में एक अच्छा रोल मिला। फिल्म की स्क्रीनिंग रखी गई, तो नवाजुद्दीन अपने 5 दोस्तों को साथ ले गए। उनके लिए बड़ा रोल मिलना बड़ी बात थी। नवाज पहुंचे, तो डायरेक्टर-प्रोड्यूसर कमल हासन उनके पास आए और कहा- ‘नवाज, अपने दोस्तों को बोल दो कि तुम्हारा रोल कट गया है।’ नवाज घबरा गए और कहा- ‘सर, क्या बात कर रहे हो, मैं अपने दोस्तों को लेकर आया हूं। क्या कुछ हो नहीं सकता। आप एक काम करो, यहां बैठे लोगों को मेरे सीन दिखा दो, बाद में भले ही फिल्म से निकाल देना। प्लीज सर मेरी बहुत बेइज्जती हो जाएगी।’ कमल हासन ने कहा- ‘नहीं ऐसा नहीं हो सकता, फिल्म कल ही रिलीज हो रही है। हम ऐसा नहीं कर सकते, लेकिन तुम दोस्तों से ईमानदारी से बोल दो।’ नवाज जैसे ही दोस्तों के पास पहुंचे, सभी एक्साइटेड होकर पूछने लगे, ‘अरे तुम्हारी डायरेक्टर से क्या बात हुई।’ ये सुनते ही नवाज रो पड़े। उन्होंने रोते हुए दोस्तों से कहा- ‘मेरा रोल कट चुका है। तुम लोग डिसाइड करो, अब फिल्म देखनी है या नहीं।’ सबने तय किया कि आ गए हैं, तो फिल्म देख ही लेते हैं। किस्सा- 9 किराया नहीं था, तो सीनियर ने कुक बनाकर दी घर में जगह छोटे-मोटे रोल से नवाजुद्दीन का गुजारा मुश्किल होने लगा। 2002 में एक समय ऐसा आया, जब उनके पास किराए के पैसे भी नहीं थे। नवाजुद्दीन ने जब एनएसडी के सीनियर्स से रहने के लिए जगह मांगी, तो उन्होंने शर्त रखी की मुफ्त में कमरे में रहने की इजाजत तो दे देंगे, लेकिन इसके बदले तुम्हें सबके लिए खाना बनाना होगा। नवाजुद्दीन मान गए और घर का काम कर वहीं रहते रहे। किस्सा-10 फिल्म में की दोस्त की नकल, फिल दोस्त को ही नहीं मिला काम संघर्ष के दिनों में नवाजुद्दीन सिद्दीकी का एक घनश्याम नाम को दोस्त हुआ करता था। घनध्याम तोतला था और उसकी बॉडी लैंग्वेज भी काफी अलग थी। जब छोटे-मोटे किरदारों के बाद नवाजुद्दीन को लंच बॉक्स में काम मिला, तो उन्होंने घनश्याम की तरह ही उसे निभाया। जब लंच बॉक्स रिलीज हुई, तो नवाजुद्दीन अलग फ्लैट में शिफ्ट हो चुके थे। फिल्म देखने के बाद दोस्त ने मैसेज कर कहा- ‘मैंने लंच बॉक्स देखी थैंक्यू।’ कुछ समय बाद ऐसा हुआ कि जब भी घनश्याम ऑडिशन देने जाते, तो उन्हें ये कहते हुए इनकार किया जाता कि ये रोल तो नवाजुद्दीन करके जा चुके हैं। और वो दोस्त रिजेक्शन के बाद खिजियाकर कहते, ‘नहीं, मैं ऑरिजिनल हूं, वो मेरी कॉपी करता है।’ लेकिन उनकी बात कोई नहीं मानता था और भगा देता था। एक नजर नवाजुद्दीन सिद्दीकी के करियर पर- ……………………………………………………………………………………. फिल्मी हस्तियों से जुड़ी ये स्टोरीज भी पढ़ें- विजय का लेडी लक, जिसके बर्थडे पर चुनाव जीते: तमिलनाडु का रिजल्ट आते ही विजय के घर पहुंचीं तृषा, एक्टर का हो चुका तलाक तमिलनाडु चुनाव में थलापति विजय की पार्टी TVK की जीत में उनकी 'लेडी लक' तृषा कृष्णन को अहम माना जा रहा है। 4 मई को 'लेडी लक' एक्ट्रेस तृषा कृष्णन का जन्मदिन था, जिनका नाम विजय से जुड़ता रहा है। तृषा तमिलनाडु चुनाव का रिजल्ट आने से पहले तिरुमाला मंदिर पहुंचीं, दर्शन किए और फिर विजय के घर पहुंचीं। 51 साल के विजय आज तमिल फिल्मों के सबसे बड़े स्टार हैं तो तृषा कृष्णन क्वीन ऑफ साउथ इंडिया कही जाती हैं। दोनों करीब 5 फिल्मों में साथ नजर आए हैं, जिनमें से 2023 में रिलीज सुपरहिट फिल्म लियो भी शामिल है। यह वही वक्त था जब विजय की पत्नी संगीता सोर्नालिंगम तलाक के लिए कोर्ट में लड़ाई लड़ रही थीं। पूरी खबर पढ़िए… पुण्यतिथि: ऋषि कपूर को सलमान के पिता ने धमकाया:राज कपूर ने सिगरेट पीने पर पीटा, दाऊद के साथ चाय पी, कभी अमिताभ का अवॉर्ड खरीदा 30 अप्रैल 2020, 6 साल पहले सुबह खबर आई कि ऋषि कपूर अब नहीं रहे। कुछ दिन पहले तक वो गंभीर हालत होने के बावजूद हॉस्पिटल स्टाफ को हंसाते तो कभी गाना सुना रहे थे। दैनिक भास्कर से बात करते हुए ऋषि कपूर की इकलौती बेटी रिद्धिमा कहती हैं, ‘सब अचानक हुआ, वो बहुत डरावना दिन था। अचानक एक खालीपन आ गया। एक सूनापन, उनकी जिंदगी उनकी मौजूदगी लार्जर देन लाइफ थी।’ पूरी स्टोरी पढ़ें… ………………………………………………. विनोद खन्ना की पुण्यतिथि, पिता ने पिस्तौल तानी:अमिताभ ने फेंका ग्लास, तो टांके आए: महेश भट्ट को धमकाया, आखिरी ख्वाहिश थी- पाकिस्तान जाना लंबी कद-काठी, गोरी रंगत और गहरी आंखें। 18 साल की उम्र में कॉलेज के दिनों में कई लड़कियां विनोद खन्ना के लुक की तारीफ करती नहीं थकती थीं। सबका एक ही सुझाव था, ‘हीरो जैसे लगते हो, फिल्मों में जाओ’, लेकिन विनोद के पिता चाहते थे कि बेटा पढ़ाई पूरी कर खानदानी टेक्सटाइल बिजनेस संभाले। विनोद का बागी रवैया तभी शुरू हो गया था, जब उन्होंने पिता के कहने पर कॉमर्स के बजाय साइंस चुना। एक रोज उनकी कॉलेज पार्टी में कुछ फिल्मी हस्तियां पहुंचीं, जिनमें उस दौर के नामी हीरो सुनील दत्त और उनकी दोस्त अंजू महेंद्रू भी थीं। वो देखना चाहते थे कि टीनएजर्स किस तरह पार्टी करते थे। पूरी खबर पढ़ें…

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