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» » » दोस्तों ने रुपए दिए, घर से भागकर मुंबई गए असरानी:पढ़ाई का खर्च उठाने के लिए रेडियो जयपुर में काम किया, पाकिस्तान से आया था परिवार

बॉलीवुड के हास्य अभिनेता असरानी का मुम्बई में निधन हो गया। उनका जीवन संघर्ष, समर्पण और कला के प्रति गहरी लगन की मिसाल रहा है। उनका असली नाम गोवर्धन असरानी था। वे एक मध्यमवर्गीय सिंधी परिवार से थे। उनके पिता भारत विभाजन के बाद पाकिस्तान से जयपुर आ बसे और यहां कालीनों की दुकान खोली। असरानी को एक्टर बनना था, जिसके लिए वो घर से भागकर मुंबई पहुंचे थे। असरानी चार बहनों और तीन भाइयों में चौथे नंबर पर थे। बचपन से ही असरानी को व्यापार में दिलचस्पी नहीं थी। वे गणित में कमजोर थे, लेकिन अभिनय और आवाज के प्रति उनमें गहरी रुचि थी। उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा सेंट जेवियर्स स्कूल जयपुर से पूरी की और राजस्थान कॉलेज से ग्रेजुएशन किया। पढ़ाई के साथ-साथ वे ऑल इंडिया रेडियो, जयपुर में वॉइस आर्टिस्ट के रूप में काम करते थे ताकि अपनी पढ़ाई का खर्च खुद उठा सकें। असरानी अपने मित्रों के बीच 'चोंच' नाम से मशहूर थे। हर माता-पिता की तरह असरानी के पिता भी चाहते थे कि वो अच्छे से पढ़-लिख कर सरकारी नौकरी करें, लेकिन असरानी तो पहले से ही एक्टर बनने का सपना देख चुके थे। इसकी इजाजत उनके पिता ने उन्हें कभी भी नहीं दी थी। बचपन से ही रेडियो से जुड़ गए थे असरानी बचपन से ही जयपुर में रेडियो से जुड़ हुए थे। पढ़ाई खत्म होने के बाद उन्होंने कई सालों तक बतौर रेडियो आर्टिस्ट काम भी किया था। जब उन्होंने मुंबई जाने का फ़ैसला किया तो जयपुर में उनके रंगकर्मी दोस्तों ने उनकी मदद के लिए दो नाटक किए-"जूलियस सीजर' और "अब के मोय उबारो'। इन दोनों नाटकों के टिकट से जो भी थोड़ी-बहुत कमाई हुई, वह असरानी को मुंबई जाने के लिए दे दी गई। बस मौक़ा देखकर एक दिन असरानी अपने घर से भागकर मुंबई जा पहुंचे। अभिनय की राह जयपुर से ही शुरू हुई असरानी ने अपने अभिनय की शुरुआत जयपुर रंगमंच से की। 1960 से 1962 तक असरानी ने साहित्य कलाभाई ठाकोर से अभिनय की बारीकियां सीखीं। यहीं से उन्होंने निश्चय किया कि अभिनय ही उनका जीवन बनेगा। 1962 में वे बड़े सपनों के साथ मुंबई पहुंचे और फिल्मों में मौके तलाशने लगे। 1963 में मशहूर निर्देशक हृषिकेश मुखर्जी से मुलाकात के बाद असरानी को सलाह मिली कि वे अभिनय की विधिवत शिक्षा लें। इसके बाद उन्होंने 1964 में फिल्म इंस्टीट्यूट, पुणे में प्रवेश लिया। 1966 में अभिनय का कोर्स पूरा किया। यहां उनके अभिनय कौशल ने सभी को प्रभावित किया। 1967 में असरानी ने अपने करियर की शुरुआत गुजराती फिल्म से की, जिसमें उनके साथ नई हीरोइन वहीदा थीं। वरिष्ठ रंगकर्मियों ने बताया कि जयपुर की गलियों से निकले असरानी ने अपनी मेहनत और लगन से बॉलीवुड में एक ऐसा मुकाम बनाया, जो आज भी याद किया जाता है। उनकी कला, सादगी और विनम्रता ने उन्हें न सिर्फ एक सफल कलाकार बनाया बल्कि सिनेमा की दुनिया में हास्य का चेहरा भी बनाया। जयपुर के कलाकार कहते हैं कि असरानी सिर्फ बॉलीवुड के नहीं, जयपुर की पहचान थे। जयपुर में फेमस है असरानी का किस्सा जयपुर रंगकर्मियों के बीच असरानी का एक किस्सा बहुत चर्चा में रहा है। यह अन्य कलाकारों के लिए भी प्रेरणा की तरह है। जयपुर के एमआई रोड पर असरानी अपने दोस्त के साथ साइकिल के आगे डंडे पर बैठ हैंडिल के ऊपर से अपना एक पैर लटकाए मस्ती में बातें करते चले जा रहे थे। तभी उसी रोड पर स्थित एक सरकारी मोटर गैराज, जहां अब गणपति प्लाजा है, वहां पहुंचते ही इशारा करके अपने दोस्त से साइकिल रोकने के लिए कहा था। साइकिल से उतर कर सामने लगी एक होर्डिंग के पास जाकर रुक गए थे। इस पर उसी साल रिलीज हुई फिल्म 'मेहरबान' का पोस्टर लगा हुआ था। असरानी ने होर्डिंग की ओर इशारा करके दोस्त से कहा था- इसे देख रहे हो? कभी मेरा भी ऐसा ही पोस्टर लगेगा। दोस्त ने कहा- हां, भाई तेरा भी जल्दी ही लग जाएगा। चिंता मत कर। कुछ ही महीनों बाद, उसी साल, उसी होर्डिंग पर फिल्म 'हरे कांच की चूड़ियां' का पोस्टर लगा, जिसमें बिश्वजीत, नैना साहू, शिव कुमार, हेलन और राजेंद्र नाथ जैसे एक्टर्स के साथ ही एक कोने में असरानी की फोटो भी छपी थी। दरअसल असरानी ज़्यादा दिनों तक जयपुर में रुक नहीं सके थे और वापस मुंबई आ गए थे। मुंबई में जब काम नहीं मिला तो पुणे फिल्म इंस्टीट्यूट में लौटकर एक्टिंग टीचर बन गए। बाद में काफी संघर्षों के बाद धीरे-धीरे काम मिलना शुरू हुआ। असरानी एक्टर बन चुके थे और साइकिल चला रहे उनके बचपन के दोस्त मदन शर्मा आगे चलकर एक प्रसिद्ध नाटककार और जयपुर आकाशवाणी में प्रोग्राम एक्जीक्यूटिव बने। जयपुर के कॉमेडियन एकेश पार्थ ने बताया- मुझे कई बार असरानी साहब के साथ स्टेज शो करने का मौका मिला। असरानी जी बड़े सहज सरल कलाकार थे। उनके अंदर हास्य कूट कूट कर भरा हुआ था। इतने बड़े हास्य अभिनेता होने के बाद भी हमेशा सहज सरल थे और नए युवा कलाकारों को हमेशा प्रोत्साहन देते थे और उनकी एक बात हमेशा याद रहेगी वो बोलते थे कि हास्य अपने भीतर से पैदा करो, उसके लिए आम आदमी से जुड़े और उसको महसूस करना चाहिए।

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