नसीरुद्दीन शाह@76: पाकिस्तानी लड़की से छिपकर शादी की:दोस्त ने जलन में मारा चाकू, मां ने पूछा था- क्या रत्ना मुस्लिम बनेगी?
साल 1960 के दशक की बात है। एक दुबला-पतला लड़का था, जिसे एक्टर बनने के लिए मुंबई जाना था। एक दिन उनके एक दोस्त की गर्लफ्रेंड का पत्र आया कि मुंबई आ जाओ, मेरे पापा फिल्मों में कैरेक्टर आर्टिस्ट हैं, वो तुम्हारी मदद करेंगे। जिसके बाद वो मुंबई के निकल पड़ा। हालांकि जिस लड़की के भरोसे वो मुंबई पहुंचा, वो खुद बेहद साधारण जिंदगी जी रही थी। जिसके बाद उसने कुछ दिन रिश्तेदार के घर गुजारे, फिर वहां से भी जाना पड़ा। जेब खाली हुई तो जरी की फैक्ट्री के हॉल में रातें बिताईं। जहां वो तीस-चालीस लोगों के साथ फर्श पर वो सोया। कई बार लोकल ट्रेन में बिना टिकट सफर किया। बाद में यही लड़का आगे चलकर भारतीय सिनेमा के सबसे शानदार अभिनेताओं में से एक बना। स्पर्श, मासूम, सरफरोश, ए वेडनेसडे और इश्किया जैसी कई फिल्मों में अपने दमदार अभिनय से उसने दर्शकों का दिल जीता। जी हां, हम बात कर रहे हैं नसीरुद्दीन शाह की। आज उनके 76वें जन्मदिन पर जानते हैं उनकी जिंदगी से जुड़े कुछ ऐसे अनसुने किस्से। 16 साल की उम्र में घर छोड़कर मुंबई चले गए थे नसीरुद्दीन शाह अपनी आत्मकथा एंड देन वन डे में लिखते हैं दसवीं की परीक्षा पास करने के बाद उनको ऐसा लगा जैसे जिंदगी का सबसे मुश्किल पड़ाव पीछे छूट चुका हो। उनके पिता चाहते थे कि वो डॉक्टर बनें, अफसर बनें या फौज में जाएं। नेशनल डिफेंस अकादमी का फॉर्म भी भरवा दिया गया। मगर नसीरुद्दीन शाह के दिल में एक ही सपना था- एक्टर बनना और वह सपना मुंबई जाकर ही पूरा हो सकता था। कॉलेज में दाखिला तो हो गया, लेकिन क्लास से ज्यादा वक्त वो सिनेमाघरों में बिताते थे। फीस के पैसे भी फिल्मों पर खर्च होने लगे। इसी दौरान उन्होंने मुंबई में रहने वाली अपने एक दोस्त की गर्लफ्रेंड को पत्र लिखा, जिसके पिता फिल्मों में कैरेक्टर आर्टिस्ट थे। उसका जवाब आया, ‘मुंबई आ जाओ, पापा तुम्हारी मदद करेंगे।’ बस, इतना सुनना था कि नसीरुद्दीन ने फीस के पैसों से ट्रेन का टिकट खरीद लिया, घड़ी और साइकिल बेचने की योजना बनाई और जेब में करीब पांच सौ रुपए लेकर मुंबई के लिए निकल पड़े। हालांकि, जिस लड़की के परिवार के भरोसे वह मुंबई आए थे, वही बेहद साधारण जिंदगी जी रही थी। इसके बाद कुछ दिन वह रिश्तेदार के घर में रहे, लेकिन जब सबको समझ आ गया कि यह लड़का वापस जाने वाला नहीं है, तो वहां से चले गए और एक जरी कढ़ाई की फैक्ट्री के बड़े-से हॉल में रहने लगे। रात में वहीं तीस-चालीस लोग फर्श पर सोते थे। इस दौरान उन्होंने वेटर बनने की कोशिश की और ताज होटल में बेलबॉय की नौकरी के लिए आवेदन दिया, लेकिन हर जगह निराशा ही हाथ लगी। फिर एक दिन एक दलाल उन्हें फिल्मों में एक्स्ट्रा कलाकार का काम दिलाने ले गया। मेहनताना था सिर्फ साढ़े सात रुपए। फिल्म थी अमन, जिसमें राजेंद्र कुमार मुख्य भूमिका निभा रहे थे। अंतिम यात्रा वाले सीन में नसीरुद्दीन भी भीड़ का हिस्सा बने। कैमरे के सामने खड़े होकर उन्हें लगा जैसे उनका सपना पूरा हो गया हो। वहीं, फिल्म आने के बाद वह हंसते हुए कहा करते थे, “दोस्तो, फिल्म में और भी सीन थे, लेकिन वह इसलिए काट दिए गए क्योंकि मेरी एक्टिंग बहुत अच्छी थी।” दिलीप कुमार ने फिल्मों से दूर रहने की सलाह दी घर से बिना बताए मुंबई आए नसीरुद्दीन शाह एक दिन पामपोश रेस्तरां के बाहर फुटपाथ पर बैठे थे। तभी एक लंबी, चमचमाती ग्रे रंग की लिमोजीन उनके सामने आकर रुकी। पीछे का दरवाजा खुला और ऊंची एड़ी की सैंडल पहने एक महिला उतरीं। उन्होंने पूछा, 'क्या तुम्हारा नाम नसीर है?' शाह ने हैरानी में सिर हिलाया। महिला ने बिना समय गंवाए उन्हें कार की आगे वाली सीट पर बैठने का इशारा किया। थोड़ी देर बाद उन्होंने उस महिला को पहचान लिया। वे थीं सईदा खान, दिलीप कुमार की सबसे छोटी बहन। तब नसीरुद्दीन शाह को समझ आया कि आखिर उन्हें ढूंढ़ कैसे लिया गया। उनके पिता अजमेर की उस सूफी दरगाह के प्रशासक रह चुके थे, जहां दिलीप कुमार की एक और बहन सकीना अक्सर आया करती थीं। दो महीने तक उनका कोई पता न मिलने के बाद आखिरकार पिता ने उन्हीं से संपर्क किया और एक पुराने परिचय के सहारे दिलीप कुमार का परिवार शाह तक पहुंचा था। कार दिलीप कुमार के बंगले में दाखिल हुई। ऊपर ले जाकर उनकी मुलाकात सकीना से कराई गई। अजमेर में वे उनसे पहले मिल चुके थे, लेकिन इस बार सकीना बेहद नाराज थीं। उनके सामने वे रो पड़े और माफी मांगने लगे। आखिरकार उन्होंने घर लौटने की हामी भर दी। बंगले के बेसमेंट में उन्हें रहने की जगह दे दी गई। कमरा साधारण था, लेकिन खाने-पीने और नहाने की पूरी व्यवस्था थी। एक दिन उनकी मुलाकात खुद दिलीप कुमार से भी हुई। शाह उनसे काम मांगना चाहते थे, लेकिन हिम्मत जुटा पाते, उससे पहले ही दिलीप कुमार ने उन्हें समझा दिया कि अच्छे परिवारों के लड़कों को फिल्म इंडस्ट्री में नहीं आना चाहिए। कुछ दिनों बाद दिलीप कुमार के परिवार ने शाह को मेरठ भेज दिया। लल्लनटॉप को दिए इंटरव्यू में नसीरुद्दीन शाह ने बताया था कि जब दिलीप कुमार ने उनसे कहा, 'अच्छे घरों के लड़कों को फिल्मों में नहीं आना चाहिए,' तो उस वक्त वो दिलीप कुमार से पूछना चाहते थे, 'अगर ऐसा है, तो फिर आप खुद इस इंडस्ट्री में क्यों आए? आप भी तो एक अच्छे और संभ्रांत परिवार से थे।' हालांकि, उनकी ऐसा कहने की हिम्मत नहीं हुई। 34 साल की पाकिस्तानी औरत से गुपचुप शादी की थी नसीरुद्दीन शाह की पहली शादी परवीन मुराद उर्फ मनारा सीकरी से हुई थी। उनकी मुलाकात अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में हुई थी। परवीन पाकिस्तान की नागरिक थीं और एमबीबीएस के आखिरी साल की छात्रा थीं। उम्र में वह नसीरुद्दीन से 14-15 साल बड़ी थीं। बचपन से कराची में पली-बढ़ीं और अपनी मां के पास अलीगढ़ आई थीं। पढ़ाई के बहाने भारत में ही रुकती चली गईं। दोनों की दोस्ती बहुत जल्दी गहरे रिश्ते में बदल गई। धीरे-धीरे नसीरुद्दीन ने अपने यूनिवर्सिटी के हॉस्टल से ज्यादा वक्त परवीन और उनकी मां के घर बिताना शुरू कर दिया। यह ऐसा दौर था, जब भारत-पाकिस्तान के रिश्ते तनावपूर्ण थे। परवीन का स्टूडेंट वीजा खत्म होने वाला था। अगर वह भारत छोड़तीं, तो शायद दोबारा लौट नहीं पातीं। भारतीय नागरिकता पाने का सबसे आसान रास्ता शादी था। जिसके बाद 1 नवंबर 1969 को दोनों ने गुपचुप शादी कर ली। इस निकाह में गवाह सिर्फ दो महिलाएं थीं- परवीन की मां और उनके एक प्रोफेसर मित्र की पत्नी। नसीरुद्दीन के परिवार का कोई सदस्य मौजूद नहीं था, लेकिन अलीगढ़ जैसे शहर में कोई राज ज्यादा दिन छिप नहीं सकता था। कुछ ही दिनों में पूरी यूनिवर्सिटी में यह खबर फैल गई। फिर यह बात मेरठ और सरधना तक पहुंच गई, जहां नसीरुद्दीन का परिवार रहता था। उनके पिता को जब बेटे की शादी का पता चला, तो उन्हें गहरा झटका लगा। उन्होंने बेटे को पत्र लिखकर भोला और मूर्ख तक कह दिया। मां ने दर्द भरे शब्दों में पूछा, 'अगर तुम हमें बता देते, तो क्या हम मना कर देते?' बेटी के जन्म पर खुश होने के बजाय निराश हुए थे 1969 का साल था। नसीरुद्दीन शाह ने अभी-अभी नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (NSD) में दाखिला लिया था। तभी एक सुबह हॉस्टल में उन्हें एक तार मिला, 'परवीन को प्रसव पीड़ा शुरू हो गई है।' वह बिना देर किए दिल्ली से अलीगढ़ जाने वाली पहली बस में बैठ गए। करीब दोपहर में अस्पताल पहुंचे तो बाहर परवीन की मां खड़ी थीं। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, 'सुबह छह बजे बेटी हुई है।' नसीरुद्दीन शाह ने अपनी आत्मकथा में स्वीकार किया है कि उस पल वह खुश नहीं हुए। उन्हें बेटे की उम्मीद थी। उन्होंने मन ही मन एक बेटे की कल्पना कर रखी थी, जिसे वह क्रिकेट खेलना सिखाएंगे, बंदूक चलाना सिखाएंगे और अपने जैसा बनाएंगे। बेटी की खबर सुनते ही वह बुरी तरह निराश हो गए। उन्हें डर था कि दोस्त उनका मजाक उड़ाएंगे। वहीं, बेटी के जन्म के कुछ समय बाद ही नसीरुद्दीन शाह और परवीन मुराद के रिश्ते में दरार आ गई। हालात ऐसे बने कि दोनों ने अलग होने का फैसला कर लिया। अलगाव के बाद परवीन बेटी हीबा को लेकर पहले लंदन और फिर ईरान चली गईं। बाद में हीबा शाह जब लगभग 12 साल की हुईं, तब अपने पिता के पास लौट आईं। पिता की कब्र के सामने दिल की बातें कही थीं नसीरुद्दीन शाह को जब यह खबर मिली कि उनके पिता का निधन हो गया है और उन्हें आज मेरठ के सरधना में दफनाया जाएगा। उस वक्त उनके पास दिल्ली जाने तक के पैसे नहीं थे। उन्होंने रत्ना पाठक से 500 रुपए उधार लिए और एयरपोर्ट पहुंचे, लेकिन सभी फ्लाइटें फुल थीं। उन्हें सलाह दी गई थी कि पिता के निधन वाला तार दिखाने पर इमरजेंसी सीट मिल सकती है, लेकिन काउंटर पर कर्मचारी के रूड व्यवहार के कारण उन्होंने किसी से मदद नहीं मांगी और वापस लौट आए। इस तरह वह अपने पिता की आखिरी विदाई में शामिल नहीं हो सके। बाद में जब नसीरुद्दीन शाह सरधना पहुंचे, तो पिता की कब्र पर बैठकर उन्होंने अपने दिल की सारी बातें कहीं, जो वह उनके जीते-जी कभी नहीं कह पाए थे। उन्होंने बताया कि उन्होंने एक नई फिल्म की है, जिसमें एक हिंदू पुजारी का किरदार निभाया है। अब 1857 के एक बागी की भूमिका निभाने वाले हैं। यह भी कहा कि उन्हें रत्ना से प्यार हो गया है और अब उनकी कमाई भी पहले से बेहतर है। नसीरुद्दीन शाह को लगा जैसे पिता उनका हर शब्द सुन रहे हों। मां ने पूछा था- क्या रत्ना धर्म बदलेंगी? नसीरुद्दीन शाह और रत्ना पाठक की शादी 1 अप्रैल 1982 को रत्ना की मां के घर पर एक सादे रजिस्टर्ड विवाह के रूप में हुई थी। दोनों की मुलाकात 1975 में 'संभोग से संन्यास तक' नामक नाटक की रिहर्सल के दौरान हुई थी। जब नसीरुद्दीन शाह और रत्ना पाठक ने शादी का फैसला किया, तब नसीरुद्दीन ने एक दिन हिम्मत करके अपनी मां से कहा कि अब वे रत्ना से शादी करना चाहते हैं। मां ने उनकी पूरी बात सुनी। फिर बहुत शांत स्वर में सिर्फ एक सवाल पूछा, 'क्या तुम रत्ना से इस्लाम कबूल करने के लिए कहोगे?' जिस पर नसीरुद्दीन ने बिना किसी झिझक के जवाब दिया, 'नहीं... मैं उनसे ऐसा कभी नहीं कहूंगा।' उन्होंने साफ कर दिया कि अगर शादी होगी, तो रत्ना अपनी पहचान और अपने धर्म के साथ ही इस रिश्ते में आएंगी। वे उन पर किसी तरह का दबाव नहीं डालेंगे। इसके बाद उनकी मां खुद रत्ना के घर पहुंचीं। उन्होंने रत्ना की मां और मशहूर अभिनेत्री दीना पाठक से उनकी बेटी का हाथ मांगा। दोस्त जसपाल ने पीछे से चाकू मारा नसीरुद्दीन शाह ने अपनी आत्मकथा में बताया था कि साल 1977 में फिल्म भूमिका की शूटिंग के दौरान उनके दोस्त राजेंद्र जसपाल ने उन पर चाकू से हमला कर दिया था। बताया जाता है कि जसपाल ने शाह पर उनकी सफलता और करियर में मिल रही कामयाबी से जलन के कारण हमला किया था। उस समय नसीरुद्दीन शाह और ओम पुरी एक रेस्तरां में खाना खा रहे थे। तभी जसपाल वहां पहुंचा और कुछ देर बाद पीछे से नसीरुद्दीन शाह की पीठ पर चाकू से वार कर दिया। ओम पुरी ने तुरंत बहादुरी दिखाते हुए जसपाल को दोबारा हमला करने से रोक लिया। इसके बाद रेस्तरां में अफरा-तफरी मच गई और पुलिस ने जसपाल को गिरफ्तार कर लिया। शाह को अस्पताल में भर्ती कराया गया था। करीब दो दिन जेल में रहने के बाद जसपाल को जमानत मिल गई थी। बाद में एक दिन जसपाल अचानक शाह के घर पहुंचा, लेकिन उसने न माफी मांगी और न ही हमले पर अफसोस जताया। बाद में दोनों अदालत पहुंचे, जहां शाह ने उसके खिलाफ मामला आगे नहीं बढ़ाया। इसके बाद अदालत ने केस बंद कर दिया।
शाहरुख खान को बोरिंग एक्टर और अनुपम खेर को जोकर कहा था नसीरुद्दीन शाह बॉलीवुड के उन गिने-चुने कलाकारों में से हैं, जो अपने बेबाक और बोल्ड बयानों के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने समय-समय पर कई अभिनेताओं की आलोचना की है। उन्होंने शाहरुख खान को बोरिंग एक्टर तो राजेश खन्ना को सीमित और घटिया एक्टर बताया था। वहीं, शाह ने अनुपम खेर को जोकर भी कहा था, जिसका अनुपम खेर ने पलटवार करते हुए जवाब दिया था। दरअसल, शाह ने एक इंटरव्यू में खेर को लेकर कहा था, अनुपम खेर जैसे व्यक्ति काफी मुखर रहे हैं। मुझे नहीं लगता कि उन्हें गंभीरता से लेने की जरूरत है। वह एक जोकर हैं। NSD और FTII में उनके कई समकालीन उनके चापलूस स्वभाव की पुष्टि कर सकते हैं। यह उनके स्वभाव में है। वह इससे खुद को अलग नहीं कर सकते। इसके जवाब में अनुपम खेर ने कहा था, मैं आपको और आपकी बातों को बिल्कुल भी गंभीरता से नहीं लेता। हालांकि मैंने कभी आपकी बुराई नहीं की और न ही आपको भला-बुरा कहा, लेकिन अब जरूर कहना चाहूंगा कि आपने अपनी पूरी जिंदगी, इतनी कामयाबी मिलने के बावजूद, फ्रस्ट्रेशन में गुजारी है। अगर आप दिलीप कुमार साहब, अमिताभ बच्चन साहब, राजेश खन्ना साहब, शाहरुख खान और विराट कोहली जैसे लोगों की भी आलोचना कर सकते हैं, तो मुझे पूरा यकीन है कि मैं भी एक बेहतरीन कंपनी में हूं। इनमें से किसी ने भी आपकी बातों को गंभीरता से नहीं लिया, क्योंकि हम सब जानते हैं कि यह आप नहीं, बल्कि बरसों से जिन पदार्थों का आप सेवन करते रहे हैं, उनका असर है। शायद इसी वजह से आपको सही और गलत के बीच का फर्क समझ नहीं आता। वहीं, हाल ही में अयोध्या राम मंदिर में दान से जुड़े एक बयान को लेकर अनुपम खेर ट्रोल हो रहे थे। इसी दौरान नसीरुद्दीन शाह का बयान और उसके जवाब में अनुपम खेर की प्रतिक्रिया वाले दोनों पुराने वीडियो फिर से वायरल हो गए। इसके बाद अनुपम खेर ने बताया कि कुछ महीने पहले दोनों ने आपसी गिले-शिकवे भुलाकर एक-दूसरे को गले लगा लिया था। …………….. यह खबर भी पढ़ें…. राजेश खन्ना की पुण्यतिथि:मां-बाप पाकिस्तान भागे, रिश्तेदारों ने पाला, आखिरी शब्द-पैकअप टाइम हो गया, बंगले में तोहफों के 65 सूटकेस मिले, जानिए मौत की कहानी 18 जुलाई 2012 दोपहर में खबर आई, सुपरस्टार राजेश खन्ना, 'काका बाबू' अब नहीं रहे। राजेश खन्ना पिछले कुछ दिनों से काफी बीमार थे। फैंस की भीड़ कई दिनों से उनकी सलामती के लिए कार्टर रोड स्थित आशीर्वाद बंगले के बाहर भीड़ लगाकर दुआ कर रहे थे। फिर जैसे ही हर न्यूज चैनल, फेसबुक, ट्विटर में उनकी मौत की खबर आई, जल्द ही आशीर्वाद के सामने मातम मना रहे फैंस का जन सैलाब आ गया। पूरी खबर यहां पढ़ें…
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