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ಗುರುವಾರ ಕೇಳಿ ಶ್ರೀ ರಾಘವೇಂದ್ರ ರಕ್ಷಾ ಮಂತ್ರ

Sunday, 3 August 2025

Rare 900-year-old ceramic bowl found at ancient city of Harran

A 900-year-old ceramic ceremonial vessel has been discovered at Harran Archaeological Site in southeastern Turkey. The bowl was fired three times to create a sophisticated multicolored lusterware glaze that gives it a metallic shine. This is the first complete example of lusterware discovered in Harran and represents the peak of medieval Islamic ceramic craftsmanship in the region.

The bowl is about 8 inches deep and was elaborately decorated with Arabic inscriptions on the interior and exterior, including the name of the maker. The largest text is the blue inscription in the interior bottom of the bowl. It reads: “He is the one to whom permanent honor is bestowed.”

Harran is one of the oldest known settlements in the world. Archaeological remains from as far back as the Chalcolithic (late-5th millennium B.C. to the late 4th millennium B.C.) have been found at the site, but it is mentioned by name in texts from the Ebla kingdom in Syria dating to the 24th century B.C. and has been continuously inhabited since before then.

The bowl was found in the excavation of Harran University, the first Islamic institution of higher learning founded in 717 A.D. It drew thousands of students to pursue studies in mathematics, philosophy, medicine, natural sciences, astrology and astronomy. Its rigorous scholarship earned it international renowned, as did the university’s translations of Greek and Syriac ancient sources into Arabic that were instrumental in transmitting the knowledge of classical antiquity through the Middle Ages. It was abandoned in 1271 when Harran was conquered by the Mongol invaders. Ottoman Sultan Selim I (r. 1512–1520) tried to revive the university when he conquered the area, but the second iteration only survived a century.

Archaeologists found the first remains of the university in 2021. The uncovered sections of one of five madrasas that were part of the university campus. This one dated to the 12th century. The team discovered the building had 24 rooms above ground, a monumental door with five rooms, a kitchen with a brick and clay oven and a portico.



* This article was originally published here

प्यार-मोहब्बत के बाद इम्तियाज अली दोस्ती पर फिल्म बनाएंगे:पहली बार अभिषेक बनर्जी, अपारशक्ति खुराना और वरुण शर्मा साथ दिखेंगे

फ्रेंडशिप डे से एक दिन पहले यानी 2 अगस्त को फिल्ममेकर इम्तियाज अली और महावीर जैन ने एक नई फिल्म की घोषणा की है। फिल्म का नाम ‘साइड हीरोज’ है। इस फिल्म में पहली बार अभिषेक बनर्जी, अपारशक्ति खुराना और वरुण शर्मा साथ नजर आएंगे । फिल्म की कहानी एक हल्की-फुल्की और इमोशनल होगी जो बचपन के तीन दोस्तों की है। सालों बाद ये तीनों एक रीयूनियन में मिलते हैं। यहां से कहानी शुरू होती है, जहां दोस्ती, सपने, प्यार और यादों के जरिए ये जिंदगी का असली मतलब फिर से खोजते हैं। अभिषेक बनर्जी, अपारशक्ति खुराना और वरुण शर्मा अपनी कॉमिक टाइमिंग के लिए जाने जाते हैं। मेकर्स का कहना है कि इन तीनों की ऑनस्क्रीन केमिस्ट्री दर्शकों को खूब हंसाएगी। संजय त्रिपाठी फिल्म को डायरेक्ट करेंगे ‘साइड हीरोज’ का डायरेक्शन संजय त्रिपाठी करेंगे। इसकी कहानी सिद्धार्थ सेन और पंकज मट्टा ने लिखी है। फिल्म को इम्तियाज अली, महावीर जैन, मृगदीप सिंह लांबा और रीयान शाह प्रोड्यूस कर रहे हैं। वहीं, फिल्म को लाइका प्रॉडक्शंस और महावीर जैन फिल्म्स, विंडो सीट फिल्म्स के साथ मिलकर प्रेजेंट करेंगे। प्रोड्यूसर महावीर जैन और मृगदीप सिंह लांबा ने कहा, दिल से कही गई कहानियां हमेशा दिल तक पहुंचती हैं। ‘साइड हीरोज’ की स्क्रिप्ट हमें तुरंत छू गई। ये तीन दोस्तों की कहानी है जो अपनी जिंदगी को दोबारा देखते हैं। ये फिल्म हमें पूरी टीम के साथ करने में मजा आने वाला है। फिल्म की शूटिंग जल्द शुरू होगी। यह 2026 की फ्रेंडशिप डे पर रिलीज हो सकती है। बता दें कि अप्रैल 2024 में इम्तियाज अली की फिल्म अमर सिंह चमकीला नेटफ्लिक्स पर रिलीज हुई थी। इसमें दिलजीत दोसांझ और परिणीति चोपड़ा ने लीड रोल निभाया था। इसका म्यूजिक ए.आर. रहमान ने दिया था। वहीं, इम्तियाज एक पीरियड लव स्टोरी भी बना रहे हैं जिसमें दिलजीत, नसीरुद्दीन शाह, वेदांग रैना और शरवरी नजर आएंगे। यह फिल्म 2026 में फ्रेंडशिप डे के मौके पर रिलीज हो सकती है।

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संडे जज्बात-बेटे की मौत पर भगवान की मूर्तियां फेंकी थीं:शेखर सुमन बोले-आज की कॉमेडी में फूहड़ता, बेहूदगी चल रही, बहुत गुस्सा आता है

एक छोटा सा परिचय है मेरा, नाम है शेखर सुमन और मैं एक अभिनेता हूं। मैंने कॉमेडी अच्छे मकसद से की, लेकिन आज की कॉमेडी दिशाहीन है। उसमें छिछोरापन है। चार्ली चैपलिन ने द ग्रेट डिक्टेटर में कॉमेडी की थी, जिसके पीछे एक अच्छा मकसद और संदेश था। सोशल मीडिया पर कोई रोक-टोक नहीं है, जिसका जो मन कर रहा है, वो परोस रहा है। लोग वहां गालियां देते हैं। टीवी डिबेट्स में एंकर कूदते-उछलते हैं। लोगों के साथ बदतमीजी से पेश आते हैं। यह सब देखकर बहुत हैरानी होती है। आखिर समाज किधर जा रहा है? हम गाली-गलौज में ही लगे रहेंगे तो मोहब्बत कब करेंगे? मेरे बेटे आयुष का जब मौत हुई तो मैंने मंदिर जाना बंद कर दिया था, घर में रखी सारी मूर्तियां फेंक दी थीं, लेकिन धीरे-धीरे फिर से ईश्वर में भरोसा पैदा हुआ। दरअसल, मेरी कला की दुनिया दिल्ली के श्रीराम सेंटर से शुरू होती है, जब मैं पटना से वहां आया था। प्रोफेशनल स्टेज आर्टिस्ट था। गुजरे जमाने की एक्ट्रेस शम्मी जी एक फिल्म के लिए दिल्ली में खूबसूरत एक्टर की तलाश कर रही थीं। वह श्रीराम सेंटर आईं। सभी ने कहा कि शेखर को ले जाइए। फिर उनकी फिल्म में मुझे रोल मिला था। मैंने उसी समय शम्मी जी से उनका कॉन्टैक्ट नंबर मांग लिया था। जमीन पर गिरे एक कागज पर नोट करते हुए उनसे कहा था जब भी मुंबई आऊंगा तो आप मेरा फोन जरूर उठा लीजिएगा। मैंने उस कागज को दो साल संभाल कर रखा था। अगर वह खो जाता तो आज जहां हूं, वहां तक न पहुंचता। फिर दिल्ली से 80 के दशक में मुंबई आया और शम्मी जी को कॉल किया। उन्होंने कहा कि मैं आपको शशि कपूर से मिलाती हूं। शशि जी से मुलाकात के बाद लगभग 15 दिन में ही मुझे उत्सव जैसी सुपरहिट फिल्म मिल गई थी। बतौर अभिनेता मेरी खुशकिस्मती रही कि बाकी लोगों की तरह मुझे मुंबई में संघर्ष नहीं करना पड़ा। जैसे कि- मरीन लाइन या रेलवे के प्लेटफॉर्म पर रातें गुजारना या चने खाकर दिन गुजारना। मैं आज भी हैरान होता हूं कि मेरे साथ वह सब कैसे हुआ था। मुझे उत्सव फिल्म का नायक होने का गर्व है। इस फिल्म के लिए एक स्क्रीन टेस्ट हुआ था। पहले तो मुझे लगा था कि उस भूमिका के लिए मैं अकेला टेस्ट देने आया हूं, लेकिन स्क्रीन टेस्ट दिन 150 लड़के आए हुए थे, फिर मैं थोड़ा परेशान हो गया था। हालांकि टेस्ट के बाद फिल्म के निर्देशक गिरीश कर्नाड ने कहा कि सभी ने बहुत अच्छा किया है और अब सभी घर जा सकते हैं, सिवाय शेखर सुमन के। उस समय मेरा दिल धड़क रहा था, लेकिन यकीन हो गया था कि मेरा सिलेक्शन हो गया है। सभी के जाने के बाद गिरीश जी ने मुझसे कहा कि आपने कमाल कर दिया है, लेकिन अभी शशि कपूर और उनकी पत्नी भी इसे देखेंगी और फिल्म की एक्ट्रेस रेखा को भी हां करना है। उसके बाद शशि कपूर जी ने मुझे उत्सव फिल्म ऑफर कर दी। सब कुछ इतना जल्दी हो गया कि मुझे यकीन नहीं हो रहा था। हालांकि एक नए लड़के के लिए उस स्क्रीन टेस्ट की दहलीज तक पहुंचना भी कम नहीं था। उस समय भी मेरे जैसे लाखों, करोड़ों लड़के रहे होंगे जो मुझसे ज्यादा काबिल थे। मगर यही कहूंगा कि वह मेरी किस्मत थी कि मुझे चुना गया। मुझे याद है कि उत्सव फिल्म मिलने के बाद मैं पागलों की तरह मुंबई की सड़कों पर दौड़ रहा था। पृथ्वी थिएटर से सीधे भागते हुए मुंबई के अंधेरी में बहन के घर पहुंचा। उनका घर तीसरी मंजिल पर था, लेकिन खुशी के मारे मैं उस दिन 5वी मंजिल पर चढ़ गया था। दरवाजे की घंटी बजाई और खुलते ही जोर-जोर से कहने लगा कि मुझे फिल्म मिल गई है, तो उस घर में रहने वाले परिवार ने कहा कि आप गलत फ्लोर पर आ गए हैं। फिर मैं वापस तीसरी मंजिल पर गया। मेरी बहन भी खुशी से पागल हो गई थीं। उन्हें भी यकीन नहीं हो रहा था मुंबई आते ही मुझे कैसे इतनी जल्दी फिल्म मिल गई। उत्सव फिल्म में रेखा के साथ काम करना मेरे लिए बड़ी बात थी, जिन्हें स्कूल टाइम से देख रहा था। याद है कि शूटिंग का पहला दिन था। गिरीश कर्नाड ने मेरा हौसला बढ़ाते हुए कहा था कि घबराना नहीं है। सीन में आप और रेखा लेटे हुए बातें कर रहे हैं। आप कैरेक्टर में शेखर सुमन नहीं चारुदत्त हैं और रेखा वसंत सेना। ऐसा मत सोचना कि रेखा को कैसे आगोश में लूं, उनके ऊपर हाथ कैसे रखूं। वह बहुत प्रोफेशनल एक्ट्रेस हैं। फिर जब शूटिंग शुरू हुई तो मैंने रेखा के ऊपर हाथ रखा, रेखा ने गिरीश कर्नाड की तरफ देखा और बोलीं कि यह तो बहुत मंझा हुआ लगता है, इसे जरा भी डर नहीं लग रहा है। गिरीश कर्नाड ने मजाक में कहा- हां यह तकिया लेकर पूरे दिन इस सीन की प्रैक्टिस कर रहा था। उसके बाद तो सिलसिला ऐसा चला कि मैंने अलग-अलग किरदार निभाए। कुछ लोग कहते हैं कि मेरी कोई नकल नहीं करता। दरअसल, मेरी कोई छवि ही नहीं है। जिस दिन किसी कलाकार की छवि बन जाए, वह बतौर कलाकार उसी दिन खत्म हो जाता है। मेरे लिए हर किरदार पुनर्जन्म लेने जैसा होता है। जैसे कि उत्सव के बाद, नाचे मयूरी में मेरी नकारात्मक भूमिका रही, त्रिदेव में पत्रकार और हाल ही में संजय लीला भंसाली की नेटफ्लिक्स सीरीज हीरामंडी में नवाब जुल्फिकार की एक अलग भूमिका में। इन दिनों तो साहिर और अमृता प्रीतम की प्रेम कहानी पर एक नाटक कर रहा हूं। उसमें बेहतरीन उर्दू बोल रहा हूं। लोग देखकर दंग हैं कि आप वही हैं, जिसे मैंने फलां फिल्म में देखा था। दरअसल, इसके लिए बहुत मेहनत करनी पड़ती है। हर किरदार को 100 फीसदी ज्यादा देता हूं। जैसे- टेढ़ी बात प्रोग्राम में मैंने 52 किरदार अदा किए थे। कलाकार की शख्सियत पानी की तरह होनी चाहिए, जिसमें वह मिले, वैसा हो जाए। मैंने मूवर्स एंड शेकर्स शो में लालू जी की खूब मिमिक्री की। लोग कहते थे कि लालू जी आपसे नाराज हो जाएंगे, लेकिन एक शादी में जब लालू जी से मेरी मुलाकात हुई तो उन्होंने मुझे इतनी जोर से गले लगाया, जैसे मेरी सांस ही थम गई हो। लगा कि कहीं वह वाकई बदला तो नहीं ले रहे, लेकिन उन्होंने कहा- आप बोलें उससे पहले मैं ही बोल देता हूं 'एनी पब्लिसिटी इज ए गुड पब्लिसिटी' यानी हर पब्लिसिटी, अच्छी पब्लिसिटी होती है, आप मेरी मिमिक्री करते रहिए मुझे कोई परेशानी नहीं है। हालांकि एक बार बीजेपी नेता प्रमोद महाजन जरूर नाराज हो गए थे। दरअसल, पोल खोल नाम से एक शो करता था। उन्होंने मुझे फोन करके कहा- आप मेरे बारे में क्या बोल रहे? मेरे पॉलिटिकल करियर पर असर पड़ेगा। मैंने उन्हें समझाया था- देखिए मैं कोई नेता या टीवी एंकर नहीं हूं, कलाकार हूं। ये संवाद मेरा लिखा हुआ नहीं होता, मुझे तो यह काम सौंपा गया है और मैं उसे जिम्मेदारी से निभा रहा हूं। अगर इसे मैं नहीं करूंगा तो कोई और आकर करेगा। फिर वह समझ गए। वह शो जारी रहा। उस दौरान एक बार दिल्ली से फ्लाइट से आ रहा था। मेरे पीछे की सीट पर प्रमोद महाजन जी बैठे थे। उन्होंने पीछे से मेरे कंधे पर हाथ रखा। मैं मुड़ा तो वह मुझसे गले मिले और कहने लगे कि मैंने जो कुछ कहा था उसके लिए माफी चाहता हूं। अपने शब्द वापस लेता हूं। उसके बाद उन्हें मूवर्स एंड शेकर्स शो में बुलाया था। उन्होंने शो में बताया कि मैं ड्रम्स बजा लेता हूं। उस दिन उन्होंने शो पर ड्रम बजाकर दिखाया और उनका एक नया रूप देखने को मिला था। आज कॉमेडी देखता हूं तो लगता है कि ये दिशाहीन लोग हैं। ये रातोंरात शोहरत और पैसे के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं। फूहड़ता परोस रहे हैं, बेहूदगी और छिछोरापन चल रहा है। दरअसल, सोशल मीडिया का यही दुखद पहलू है कि यहां हर कोई रातोंरात फेमस होना चाहता है और बस लाइक्स और तारीफ चाहता है। आखिर छिछोरी कॉमेडी से मिली शोहरत बेमानी है। सोशल मीडिया पर वायरल होने का ट्रेंड है। यह वायरल फीवर की तरह है। जो चार-पांच दिन बाद खुद चला जाता है। इसी तरह की इनकी कॉमेडी का असर होता है। ये लोग समाज को क्या से क्या बना रहे हैं। बेशक, जमाना बदला है, नयापन होना चाहिए। मैं नहीं कहता कि आप बाबा बन जाइए, प्रवचन दीजिए, लेकिन भाषा पर नियंत्रण तो होना ही चाहिए। मैंने तो कॉमेडी बस एक प्रयोग के तौर पर की। मैं एक जहीन और गंभीर एक्टर हूं, लेकिन यह देखना चाहता था कि आखिर कॉमेडी का जायका क्या है। कुछ बातें तो हंस खेल कर भी कही जा सकती हैं। कॉमेडी का मकसद सिर्फ हंसाना नहीं है, जिसके लिए आप फूहड़ भी हो जाएं, गंदगी परोसें। यह सब देखकर गुस्सा, बहुत गुस्सा आता है। गंदा बोलना कॉमेडी नहीं होती। कॉमेडी के पीछे भी अच्छा मकसद होता है। उसमें एक एकेडमिक, आध्यात्मिक रिसर्च होनी चाहिए। आखिर आपने जो सोचा, उस सोच के पीछे कोई सोच ही नहीं, तो फिर वह सोच बेकार है। चार्ली चैपलिन भी कॉमेडी करते थे। उनकी कॉमेडी के पीछे भी कोई गहरी बात छिपी होती थी। खासकर, उनका द ग्रेट डिक्टेटर में रोल देखिए। कैसे वह अपने रोल में एक ग्लोब से खिलवाड़ करते हैं, उसे जूते के नीचे रखकर दुनिया को गहरा संदेश देना चाहते हैं। दरअसल, मेरे लिए ऊंचाई का मतलब ही गहराई है। आप जितना गहरा उतरेंगे, उतना ही खुद को ऊंचा पाएंगे। ऊंचाई का मतलब पहाड़ की चोटी पर पहुंचना नहीं होता। जब तक यह सब ध्यान में नहीं रखा जाएगा, गलतियां होंगी। मेरे लिए हंसी मायने नहीं रखती। मैं यह बात सख्ती से कह रहा हूं कि मेरा हंसी से ऐसा नाता है जैसे जमीन का आकाश से, लेकिन चूंकि यह मेरा प्रोफेशन है, इसलिए कॉमेडी करता हूं। मेरा काम हंसना या हंसाना नहीं है। दरअसल, यह किसी भी इंसान का काम नहीं होता। जिंदगी में नौ रस होते हैं, हर रस का स्वाद चखना होता है। कॉमेडी करना मेरी जिंदगी का हिस्सा नहीं था। मुझे पैसे चाहिए थे इसलिए किया। मेरे पास संजीदा काम होता तो कॉमेडी न करता। कॉमेडी बहुत सतही चीज होती है। उसमें गहराई नहीं होती। कई बार कोफ्त होती है। मूवर्स एंड शेकर्स जैसे चलते शो को मैंने छोड़ दिया। मैं हंसाने के लिए नहीं, दूसरे काम के लिए पैदा हुआ हूं। आज सोशल मीडिया पर कुछ भी कहने की छूट है। खुला खेल फर्रुखाबादी है। कोई कुछ भी बोल कर, किसी को गरिया कर चला जाता है। ऐसे लोग खुद को तुर्रम खां समझते हैं। आखिर ट्रोलिंग में क्या ही बहादुरी की बात है? आप गुमनाम चेहरे से आईडी बनाकर किसी को भी आकर गाली देते हैं। इसका मतलब है कि आप जाहिल और अनपढ़ इंसान हैं। इससे तो सिर्फ गाली-गलौज का समाज बनेगा। फिर हम एक-दूसरे से प्यार-मोहब्बत कब करेंगे? हर चीज में तल्खी, कड़वाहट, नफरत क्यों? आखिर हम किधर जा रहे हैं? आज हर जगह आक्रोश, गुस्सा दिख रहा है। टीवी डिबेट्स को देख लीजिए। उसमें एंकर की सबसे बड़ी गलती होती है। अगर वह बदतमीज है, तो सभी बदतमीज हो जाते हैं। वह शालीन रहे तो लोग खुद-ब-खुद शालीन रहते हैं। अगर एंकर ही कुर्सियों से उछल-उछल कर सभी को डांटेगा, जो कि उसका हक नहीं है तो डिबेट कैसे होगी? उसे तटस्थ रहना चाहिए। लेकिन वह लोगों पर चिल्लाए, पक्षपात करे, पूर्वाग्रह से ग्रसित हो तो स्थितियां और बिगड़ती चली जाएंगी। यह सब देखकर हैरानी होती है। खासतौर पर कलाकारों को नसीहत देना चाहूंगा कि आप जो पहनते हैं, बोलते हैं, करते हैं, उसका लोगों पर बड़ा असर होता है। हां मानता हूं कि कभी-कभी गलती हो जाती है, लेकिन पब्लिक के सामने सोच-समझ कर बोलें, वक्त लेकर बोलें। मेरे बड़े बेटे की असमय मौत हो गई। विडंबना है कि उसका नाम आयुष था, जिसका मतलब होता है लंबी आयु, लेकिन वह बहुत जल्दी हमें छोड़कर चला गया। उस वक्त लगा था कि जिंदगी बिखर गई, इसे अब कैसे समेटूंगा। मुझे याद है कि उस दिन मैं उसके बगल में बैठकर उसका हाथ पकड़े हुए था। जब वह दुनिया को अलविदा कहने वाला था तो उसे एक दिव्य रोशनी दिखाई दी, जिसके बारे में वह लगातार बातें कर रहा था। वह 9-10 साल का था। अचानक वह संस्कृत के श्लोक पढ़ने लगा, जो कि उसे आता ही नहीं था। उस समय उसे देखकर सब हैरान थे। जाने से पहले उसने मेरा हाथ पकड़ा और कहा कि पापा मुझे नहीं जाना है। उसे एहसास हो रहा था कि वह जा रहा है। उसने सबको आई लव यू कहा। आप समझ सकते हैं हमारे ऊपर क्या गुजरी होगी। लेकिन प्लीज मैं इन सब के बारे में बात नहीं करना चाहता, यह सब बहुत निजी है। लोग सुन सकते हैं, समझ सकते हैं, लेकिन मेरा दर्द महसूस नहीं कर पाएंगे। दर्द आपको ही सहना होता है। बस बेटे की मधुर स्मृतियां बची हैं। हम हर दिन उससे बात करते हैं। कभी मंदिर में, तो कभी किसी कमरे में। मैं इस वक्त आपके कैमरे की तरफ देख रहा हूं, लेकिन मुझे सिर्फ उसका चेहरा नजर आ रहा है और वह मुस्कुरा रहा है। अब मैं उसे मुस्कुरा कर याद करता हूं। इस तरह की त्रासदी का पहाड़ जब आप पर टूटता है तो सबसे पहले आपका विश्वास भगवान से उठता है। मन में आता है कि भगवान ने मेरे साथ ऐसा क्यों किया, मैंने तो हमेशा उनकी पूजा की है। मैंने सबसे पहले मंदिर जाना बंद कर दिया। घर में भगवान की जो भी प्रतिमा थी, सब फेंक दी। मैंने कहा- जब आप मेरे बेटे को नहीं बचा सके तो आप काहे के भगवान हो। उस समय अंदर बहुत गुस्सा था। मैं महीनों रोता रहा। अपने जज्बात काबू नहीं कर पा रहा था, लेकिन फिर धीरे-धीरे लगा कि मैं इस दुनिया में अकेला नहीं हूं। मेरे जैसे बहुत सारे लोगों के साथ ऐसा हुआ है। मैं तो चाहता हूं कि हम सब एक-दूसरे का साथ दें। एक-दूसरे का सहारा बनें। आखिर सब ऊपर वाला तय करता है। फिर जिंदगी में किरण नजर आई और दोबारा उठ खड़ा हुआ। हमारी आस्था फिर से भगवान में स्थापित हुई है। साहिर साहब ने कहा है न- जो मिल गया उसे ही मुकद्दर समझ लिया, जो खो गया मैं उसको भुलाता चला गया, मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया। दूसरे बेटे अध्ययन सुमन के साथ मेरे बहुत अच्छे रिश्ते हैं। बाप-बेटा हों या बाप-बेटी खूबसूरत रिश्ता होता ही है। वह मेरा बेटा है, दोस्त है, सह कलाकार भी। वह दिल में बसी ताकत, धड़कन है, जिसे हर वक्त महसूस करता हूं। जिस तरह से पत्नी आपको पूरा करती है, वैसे ही बच्चा भी आपको पूरा करता है। हम उसकी खुशी, जद्दोजहद, उसके आगे बढ़ने का हिस्सा होते हैं। उसके दुख में शामिल होते हैं, उसकी खुशी में खुश होते हैं, बदमाशियों पर उसे डांट भी देता हूं। उसके साथ बहुत हसीन सा इश्किया रिश्ता है। बच्चा न हो तो जिंदगी बेमतलब होती है। एक को खो दिया, लेकिन दूसरा उसकी भरपाई कर रहा है। मैं अध्ययन को लेकर बिल्कुल आश्वस्त हूं। वह सफल, प्रतिभावान, मेहनती है। वह एक अच्छा एक्टर, अच्छा बेटा, अच्छा संगीतकार, अच्छा एडिटर, अच्छा निर्देशक है। इसी तरह सभी बच्चों में खूबी होती है। कोई बच्चा खराब नहीं होता। उसे जैसी परवरिश मिलेगी, वैसा बनेगा। बच्चों को कभी सफलता-असफलता के तराजू में नहीं तौलना चाहिए। बतौर एक्टर मैं अध्ययन को लेकर गौरवान्वित हूं। वह तमीज वाला, बड़े दिल वाला लड़का है। एक्टर तो बहुत अच्छे होंगे, लेकिन अच्छे मिजाज वाले इंसान कम होते हैं। मैं तो कहूंगा कि सभी के बेटे तरक्की करें। कोई गरीब, बीमार न हो, किसी को परेशानी न हो, खूबसूरत समाज की कल्पना की जाए। अध्ययन से कहूंगा कि अपना ख्याल रखो, लोगों का भी ख्याल करो। हम अक्सर अपने दायरे में बंध जाते हैं, फिर कोई और दिखाई नहीं देता। एक लाइन है न- प्रभु मुझे इतनी ऊंचाई कभी मत देना कि गैरों को गले न लगा सकूं…। लोग एक्सीडेंट में मर जाते हैं, समुद्र बहा ले जाता है, आप जिंदा हैं यही बड़ी बात है। मैंने जिंदगी को कभी सफलता और असफलता के दायरे में नहीं देखा। अगर आप में हुनर है और आप मेहनत कर रहे हैं तो सफल होंगे ही। दरअसल, एक्टर कभी फ्लॉप नहीं होता, फ्लॉप होती हैं फिल्में। हमेशा प्रोजेक्ट फेल होते हैं, इंसान नहीं। कोई अगर कहे कि आप फेल हो गए, तो निराश नहीं होना चाहिए। असफलता जिंदगी की सीख होती है। जब जिंदगी में भारी सफलता आती है तो हम उसे सेलिब्रेट करते हैं। साहिर जी ने लिखा है- बर्बादियों का सोग मनाना फ़ुज़ूल था, बर्बादियों का जश्न मनाता चला गया। बड़ा परदा, छोटा परदा ये सब बीमार लोगों की सोच है। मैं पहला एक्टर हूं जो बड़े परदे से छोटे परदे यानी टीवी पर आया। बस एक्टर होना ही काफी होता है। जैसे शहर का डॉक्टर हो या गांव का, हर जगह वह एक जैसा इलाज करता है। शाहरुख खान, सुशांत सिंह राजपूत ये सभी टीवी से फिल्मों में गए। एक बार कांग्रेस से चुनाव लड़ा था। मुझे लगा अगर मेरे पास पावर होगी तो ज्यादा लोगों की मदद कर सकूंंगा। हालांकि चुनाव में लड़ना शब्द बेकार लगता है। आखिर लड़ना क्यों, मुझे लड़ाई पसंद नहीं है। फिलहाल मैं चुनाव में शामिल हुआ। दरअसल, समाज में गरीबी, गुरबत, लोगों की परेशानियां, टूटे दिल देखता हूं तो बहुत परेशान होता हूं। उस समय मेरी हालत महात्मा बुद्ध जैसी हो जाती है। कई बार तो लगा कि कह दूं कि यह मेरी जिम्मेदारी नहीं। आप गरीब हैं, आपका दुर्भाग्य है। आपके पास अस्पताल, शिक्षा नहीं है तो ये आपकी किस्मत है? लेकिन ऐसा सोचना सही नहीं है। हम सबको मिलकर चीजें ठीक करनी है। मुझे दुख है कि चुनाव नहीं जीत सका। लोग पार्टियां देखकर वोट देते हैं, इंसान को नहीं। जिस दिन लोग इंसान देखकर वोट देने लगेंगे, सब ठीक हो जाएगा। आज भी बिहार के लिए काम करना चाहता हूं, खासकर शिक्षा, स्वास्थ्य के लिए। बिहार को लेकर बहुत सेंटिमेंटल हूं। मेरी भावनाएं मेरी मां और पिता के लिए जो हैं, वही बिहार के लिए हैं। बिहार की मिट्‌टी में पैदा हुआ, उसी की एक कल्पना हूं- अदना सी छोटा सी। मैं ही क्यों, हर कोई अपनी जगहों को लेकर सेंटिमेंटल होता है। कभी-कभी जब मैं मुखर होकर बोलता हूं तो पत्नी कहती हैं कि क्यों बोल रहे हो? तब मैं सोचता हूं आखिर सभी चुप रहेंगे, तो बोलेगा कौन? फिर समाज में सुधार कैसे होगा? (बॉलीवुड अभिनेता शेखर सुमन ने अपने ये जज्बात भास्कर रिपोर्टर मनीषा भल्ला से साझा किए हैं।) ---------------------------------------------------------------------- 1- संडे जज्बात-मां की जिद पर मैं निर्भया के खिलाफ लड़ा:जानता था बवाल होगा, पर वो कहने लगीं-तुझे 9 महीने मैंने पाला है, दुनिया ने नहीं मैं एडवोकेट एपी सिंह। वही एपी सिंह, जिसने निर्भया के दोषियों का केस लड़ा। पाकिस्तान से आने वाली सीमा हैदर का केस लड़ा। निर्भया केस के बाद देशभर के लोग मुझे जानने लगे। वह केस मैंने मां के कहने पर लड़ा था। मां ने कहा था उन बच्चों की मांओं के लिए तुझे केस लड़ना होगा, जिनके पति आरोपी हैं। पूरी खबर यहां पढ़ें 2 संडे जज्बात-मैंने आतंकियों से कहा-तुम मेरा हौसला नहीं तोड़ पाए:एयरहोस्टेस थी, बम ब्लास्ट में चेहरा बर्बाद हो गया; आज भी छर्रे शरीर में धंसे हैं मेरा नाम निधि खुराना चापेकर है। मैं जेट एयरवेज की एयरहोस्टेस रही हूं। बेल्जियम की राजधानी ब्रसेल्स में हुए आतंकी हमले की सर्वाइवर हूं। उस बम ब्लास्ट में मेरा शरीर बर्बाद हो गया। चेहरा बुरी तरह खराब हो गया है। बम से निकले ब्लेड्स आज भी मेरे शरीर में धंसे हुए हैं, जो निकाले नहीं जा सकते। डॉक्टर कहते हैं इन्हें निकालने से नसें डैमेज हो जाएंगी। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें

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सुनील ग्रोवर@48:मंदिरा बेदी की साड़ी पहनकर रैंप वॉक किया, कभी दिन के ₹20 भी नहीं कमाते थे, आज एक एपिसोड की फीस ₹25 लाख

सुनील ग्रोवर, एक ऐसा नाम हैं, जिनकी एंट्री से ही चेहरे पर हंसी आ जाती है। चाहे टीवी पर उनका 'गुत्थी' का किरदार हो या 'डॉ. मशहूर गुलाटी' का रोल सुनील अपनी एक्टिंग से सबका दिल जीत लेते हैं। उनकी अदाकारी कितनी खास है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि ‘गजनी’ और ‘हीरोपंती’ जैसी फिल्मों में चंद मिनटों के उनके रोल भी लोगों को याद रह जाते हैं। आज सुनील ग्रोवर के बर्थडे के खास मौके पर आइए उनकी जिंदगी को करीब से छूते हैं- सुनील ग्रोवर का जन्म 3 अगस्त 1977 को हरियाणा के सिरसा जिले के मंडी डबवाली कस्बे में हुआ था। सुनील ग्रोवर के पिता जेएन ग्रोवर स्टेट बैंक ऑफ बीकानेर एंड जयपुर में मैनेजर थे। सुनील ने पंजाब यूनिवर्सिटी, चंडीगढ़ से थिएटर में मास्टर्स किया है। वहीं, उनके छोटे भाई अनिल ने भी थिएटर में कोर्स किया है। आज भले ही सुनील ग्रोवर अपनी कॉमेडी से सभी को हंसाते हैं, लेकिन एक समय ऐसा भी था जब उनका सपना एस्ट्रोनॉट बनने का था। हालांकि सुनील हमेशा से ही नकल करने, एक्टिंग करने और लोगों को हंसाने में माहिर थे। बता दें कि 12वीं क्लास में एक नाटक प्रतियोगिता में जब सुनील ने भाग लिया, तो वहां मौजूद चीफ गेस्ट ने मजाक में कहा था कि उन्हें भाग नहीं लेना चाहिए था क्योंकि वो बाकी बच्चों से बेहतर थे। सुनील जब कॉलेज के पहले साल में थे, तब उनको पता चला कि कॉमेडियन जसपाल भट्टी एक शो के लिए ऑडिशन ले रहे हैं। सुनील बिना किसी उम्मीद के सीधे ऑडिशन में पहुंच गए। अंदर जाकर देखा तो खुद जसपाल भट्टी, उनकी पत्नी और डायरेक्टर मौजूद थे। सुनील ने दो-चार परफॉर्मेंस करके दिखाई और जब उन्होंने अपनी तस्वीर दी, तो जसपाल ने तस्वीर के पीछे लिखा था - क्लर्क टाइप रोल के लिए इसको बुलाएंगे। इसके बाद सुनील को मौका मिला और वो जसपाल भट्टी के साथ शो करने लगे। सुनील की पहली टीवी एंट्री शो 'फुल टेंशन' में हुई, जिसमें न्यू ईयर स्पेशल एपिसोड के लिए उनको डाकू का एक छोटा-सा रोल मिला था। मात्र 18 साल की उम्र में टीवी में दिखने वाले सुनील जब मुंबई आए, तो शुरुआत में उन्हें लग रहा था कि सफलता बस आने ही वाली है। सुनील ने 'ह्यूमन्स ऑफ बॉम्बे' को बताया था कि पहले साल उन्होंने ज्यादा वक्त पार्टी करने में बिताया, क्योंकि उन्हें भरोसा था कि चीजें जल्दी ही सही हो जाएंगी। उस वक्त उनकी कमाई महज 500 रुपए महीने थी यानी वो दिन के 20 रुपए भी नहीं कमाते थे। ऐसे समय में वो बाकी खर्चे घर से आए पैसे और सेविंग्स से चलाते थे। धीरे-धीरे सुनील को एहसास हुआ कि मुंबई में कई ऐसे लोग थे जो अपने-अपने शहरों के सुपरस्टार थे, लेकिन यहां सब स्ट्रगलर थे। जब पैसों का कोई सहारा नहीं रहा, तो जिंदगी ने एक कड़वी सच्चाई से सामना करवाया। इस दौरान सुनील ने अपने पिता की कहानी याद की जो रेडियो एनाउंसर बनना चाहते थे और उन्हें ऑफर भी मिला था, लेकिन दादा जी की नापसंदगी के कारण बैंक की नौकरी करनी पड़ी, जिसका उन्हें जीवन भर अफसोस रहा। यही सोचते हुए सुनील ने अपने सपनों का पीछा करना नहीं छोड़ा और फिर से काम की तलाश में जुट गए। सुनील को एक टीवी शो के लिए चुना गया था, 3 दिन की शूटिंग भी हो चुकी थी, लेकिन अचानक उन्हें शो से रिप्लेस कर दिया गया। हालांकि, सुनील को धीरे-धीरे समय वॉयस ओवर का काम मिलना शुरू हुआ। उन्होंने कहा था कि जब टीवी और फिल्मों से रिजेक्शन मिलता था, तो वॉयस ओवर एक सहारा बनता था। सुनील को एक रेडियो शो करने का मौका मिला, जो सिर्फ दिल्ली के लिए था, लेकिन जब शो ऑन एयर हुआ, तो इतना फेमस हुआ कि उसे पूरे देश में चलाया गया। इसके बाद उन्हें लगातार रेडियो, टीवी और फिल्मों में काम मिलने लगा। अपने करियर की शुरुआत में सुनील ने 'प्रोफेसर मनी प्लांट', 'श्श्श्श...कोई है', 'कौन बनेगा चंपू', 'क्या आप पांचवी फेल चंपू हैं?' और 'चला लल्लन हीरो बनने' जैसे शो में काम किया। सुनील ने भारत के पहले साइलेंट कॉमेडी शो 'गुटुर गूं' के शुरुआती 26 एपिसोड में भी काम किया था। 1995 मेंं करियर की शुरुआत करने वाले सुनील की जिंदगी में टर्निंग पॉइंट तब आया जब उन्होंने 2013 में 'कॉमेडी नाइट्स विद कपिल' में ‘गुत्थी’ का रोल प्ले किया। इस शो से वो घर-घर में पहचाने जाने लगे। हालांकि 2014 में सुनील ने कुछ समय बाद 'कॉमेडी नाइट्स विद कपिल' छोड़ दिया। इसके बाद स्टार प्लस पर उनका शो 'मैड इन इंडिया' आया, जिसमें उनका किरदार 'गुत्थी' से मिलता-जुलता था, लेकिन यह शो ज्यादा नहीं चल पाया। फिर वो वापस 'कॉमेडी नाइट्स विद कपिल' में लौटे और कपिल के साथ काम किया। फिर जनवरी 2016 में यह शो कलर्स टीवी पर बंद हो गया। बाद में जब सोनी टीवी पर शो द कपिल शर्मा शुरू हुआ, तो सुनील इसमें शामिल हुए। इस शो में उन्होंने ‘डॉ. मशहूर गुलाटी’ और ‘रिंकू भाभी’ जैसे किरदार निभाए, जो दर्शकों के बीच बेहद लोकप्रिय हो गए और लोगों ने उन्हें खूब पसंद किया। कपिल शर्मा से विवाद के बाद सुनील ने शो छोड़ दिया था फिर सुनील ग्रोवर और कपिल शर्मा के बीच मार्च 2017 में विवाद हुआ था। जो मीडिया में बहुत चर्चा में रहा। इस दौरान हिंदुस्तान टाइम्स जैसे संस्थान की रिपोर्ट्स में कहा गया था कि कपिल ने सुनील पर चिल्लाया और जूता भी फेंका था। इस घटना के बाद कई सालों तक सुनील और कपिल एक दूसरे के साथ नजर नहीं आए। 2017 में बॉलीवुड हंगामा को दिए एक इंटरव्यू में कपिल शर्मा ने झगड़े को लेकर कहा था कि हां, उस वक्त कुछ दिक्कत जरूर हुई थी और मुझे उसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी, लेकिन जो बातें मीडिया में आईं, उनमें काफी बढ़ा-चढ़ाकर और झूठी बातें बताई गईं। कहा गया कि मैंने फ्लाइट में सबसे पहले खाना मांगा, गुस्सा किया और सुनील पर जूता फेंका। ये सारी बातें जूता फेंकने और गुस्सा करने की कुछ डिजिटल मीडिया वालों ने ही फैलाई थीं। इस घटना के बाद कपिल ने सुनील से माफी भी मांगी थी और ट्विटर और फेसबुक पर लंबा पोस्ट लिखकर अपनी भावनाएं जाहिर कीं और कहा था कि वो सुनील को भाई की तरह मानते हैं। वहीं, उस समय सुनील ने कहा था कि कपिल ने उन्हें काफी ठेस पहुंचाई और सलाह दी कि इंसानों की भी इज्जत करें, सिर्फ जानवरों की नहीं। उन्होंने ये भी लिखा था कि अगर कोई आपको सुधार रहा है, तो उसे गालियां न दें। बाद में कपिल ने कहा था कि उन्होंने सुनील से कोई झगड़ा नहीं किया था, असली बहस चंदन प्रभाकर से हुई थी। फ्लाइट से पहले ही उन्हें तनाव था और उसी वजह से उन्होंने चंदन पर गुस्सा निकाल दिया। 2020 में दोनों एक शादी में मिले और साथ में मंच शेयर किया। इसके बाद सुनील ने कपिल को जन्मदिन की बधाई दी थी। धीरे-धीरे दोनों के रिश्ते सुधरे और साल 2024 में सुनील ने कपिल के शो में सात साल बाद वापसी की। फिलहाल, दोनों 'द ग्रेट इंडियन कपिल शो' में साथ काम कर रहे हैं। सुनील ग्रोवर और कपिल शर्मा की सुलह में सलमान खान की भूमिका 2017 में झगड़े के बाद सुनील और कपिल ने साथ काम करना बंद कर दिया था। जिसके बाद सलमान खान ने दोनों को फिर से मिलाने की कोशिश की थी। 2018 में सलमान ‘द कपिल शर्मा शो’ के प्रोड्यूसर बने। उन्होंने चाहा था कि सुनील शो में फिर से वापसी करें। दिसंबर 2018 में सुनील ग्रोवर ने इस बात को कन्फर्म किया था कि सलमान ने उनसे इस बारे में बात की थी। सुनील ने PTI को बताया था कि वो सलमान की फिल्म ‘भारत’ और टीवी शो ‘कानपुर वाले खुरानाज’ में काम कर रहे हैं, इसलिए उनके पास कपिल के शो में काम करना का समय नहीं है। मार्च 2019 में भी एशियन एज की रिपोर्ट में एक सूत्र के हवाले से कहा गया था कि सलमान ने फिर कोशिश की थी कि सुनील शो में वापसी करें। इसके बाद 22 दिसंबर 2019 को सोहेल खान की बर्थडे पार्टी में सुनील और कपिल एक साथ नजर आए। दोनों ने सलमान खान के साथ फोटो खिंचवाई, जिसे कपिल ने इंस्टाग्राम पर शेयर किया था। सुनील ने 'तांडव' और 'सनफ्लावर' जैसी वेब सीरीज में दमदार एक्टिंग की जब सुनील कपिल के शो में नजर नहीं आए, उस दौरान उन्होंने 'कानपुर वाले खुरानाज' और 'गैंग्स ऑफ फिल्मिस्तान' जैसे कॉमेडी शो में काम किया, जो ज्यादा दिन नहीं चले। 2021 में सुनील वेब सीरीज 'तांडव' में गुरपाल चौहान के रोल में नजर आए। इसमें सैफ अली खान, कुमुद मिश्रा, मोहम्मद जीशान अय्यूब जैसे कलाकार शामिल थे। उसी साल उन्होंने वेब सीरीज 'सनफ्लावर' में सोनू सिंह का किरदार निभाया। इस रोल के लिए उन्होंने लगभग 8 किलो वजन घटाया था। सुनील ने मंदिरा बेदी की साड़ी पहनकर रैंप वॉक किया था साल 2015 में मंदिरा बेदी ने अपनी डिजाइन की हुई साड़ियों का फैशन शो आयोजित किया। इस शो में प्रोफेशनल मॉडल्स के बजाय गुत्थी यानी सुनील ग्रोवर शोस्टॉपर बने थे। यह वाकया मिंत्रा फैशन वीक में हुआ था, जहां सुनील ने स्पोर्ट्स शूज के साथ गुलाबी और सुनहरी साड़ी पहनी थी। सुनील की पर्सनल लाइफ की बात करें तो उनकी पत्नी का नाम आरती ग्रोवर है और उनके एक बेटा है। सुनील के मुताबिक, वह कहीं भी परफॉर्म करने से पहले अपने सारे जोक बीवी आरती को सुनाते हैं। अगर वह हंस पड़ीं तो सुनील उन जोक्स पर परफॉर्म करते हैं और अगर वो नहीं हंसी तो समझ लेते हैं कि वो जोक ऑडियंस के सामने नहीं चलेगा। साल 2022 में सुनील को दिल का दौरा पड़ा था, जिसके बाद उनकी चार बायपास सर्जरी हुई थीं। डॉक्टरों ने उन्हें एक महीने का आराम दिया, लेकिन वे केवल 25 दिन में ही काम पर लौट आए थे। टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार, सुनील की नेटवर्थ करीब ₹21 करोड़ है और वे मुंबई में एक शानदार डुप्लेक्स घर के मालिक हैं। इकोनॉमिक टाइम्स और कोईमोई की रिपोर्ट्स के मुताबिक, द ग्रेट इंडियन कपिल शो के सीजन 3 के लिए सुनील ग्रोवर की फीस लगभग 25 लाख रुपए प्रति एपिसोड है। हालांकि दैनिक भास्कर इस जानकारी की पुष्टि नहीं करता है। --------------------------------- बॉलीवुड की यह खबर भी पढ़ें.. मृणाल ठाकुर @33, सुसाइड का ख्याल आया:बॉडी शेमिंग की शिकार हुईं, सलमान की फिल्म से निकाली गईं; बॉलीवुड से साउथ तक छाईं टीवी की दुनिया से बॉलीवुड तक अपनी दमदार एक्टिंग और काबिलियत के बल पर अपनी एक अलग पहचान बना चुकीं एक्ट्रेस मृणाल ठाकुर के लिए यह सफर आसान नहीं था। करियर के शुरुआती दौर में उन्हें डिमोटिवेटिंग और नकारात्मक अनुभवों का सामना करना पड़ा था। यहां पूरी खबर पढ़ें।

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Saturday, 2 August 2025

Ancient Egyptian handprint found under clay “soul house”

A complete handprint has been discovered on the base of a clay funerary model house in the collection of the Fitzwilliam Museum in Cambridge. It was left by the potter who crafted the miniature clay building between 3,400 and 4,000 years ago, likely by accident when the artifact was moved from the workshop to a dry out before being fired in the kiln. Ancient fingerprints and paw prints left in clay are not uncommon, but a complete handprint is exceedingly rare, and this is the first one found on an Egyptian artifact.

Known as a “soul house,” the model features two levels with supporting pillars and two curving staircases on the front left leading to the second floor and the roof. Little clay offerings are embedded in the floor of the courtyard of the house, and what looks like an entrance walkway with walled edges is believed to have been used as a spout to pour libations.

It was discovered in a rock-carved tomb at Deir Rifa, a village about 175 miles north of Luxor that was the capital of the 11th Upper Egyptian province during Egypt’s First Intermediate Period and Middle Kingdom (2055-1650 B.C.). William Flinders Petrie unearthed a number of these model dwellings in burials of commoners from this period in his 1907 excavation at Rifa. He is the one who coined the term “soul houses.”

Egyptologists believe the houses may have been used to leave food offerings. They were placed on top of the burial shaft, which suggests they may have been inexpensive representations of chapels built in the tombs of the wealthy. They could also by symbols of the souls returning to their homes in the afterlife.

Curators found the handprint while examining the soul house before its inclusion in the museum’s Made in Ancient Egypt exhibition this fall. Fitzwilliam Museum Egyptologists determined that the two-story structure was built on a framework of wooden sticks coated with clay. The steps of the staircase were formed by pinching the wet clay. The wooden framework was incinerated during the firing process, leaving hollow pillars and empty spaces behind.

Unlike many other ancient Egyptian crafts, relatively few details of potters at work survive which makes the discovery of a complete handprint even more important. The ready availability and generally low value of pottery, as well as the fact that potters worked with clay, may have affected their status.

Clay was a commonly found material, either deposited by the Nile as silt, or as shale – a stone that occurred under or between the layers of limestone rock in the desert. The shale would be processed to make a clay known as marl by soaking it in water before kneading by hand or underfoot.

The lives and histories of Egyptian rulers have received a great deal of attention but the makers of the artefacts themselves are often overlooked. Made in Ancient Egypt will show who those people were, how they thought of themselves and what other Egyptians thought of them.



* This article was originally published here

Lumpy Skin Disease: Animal Infection Spreading Rapidly In India- Do We Need To Be Worried?

These days, a disease is spreading rapidly among animals in many states of India. The name of this disease is Lumpy Skin Disease. This disease is affecting cows and buffaloes the most. This disease is also spreading rapidly from one animal to another.

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Breakthrough In Liver Cirrhosis Treatment: Indian Scientists Develop New Approach

A team of Indian scientists has developed a groundbreaking treatment for liver cirrhosis by targeting damaged lymphatic vessels in the liver and intestine. Using nanocarriers loaded with the VEGF-C protein, researchers were able to restore lymphatic drainage, reduce fluid buildup, and lower portal pressure in animal models. This novel oral therapy may revolutionise how advanced cirrhosis is treated in the future.

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खुद की किताब पढ़कर भावुक हुए डब्बू मलिक,:बोले- कई बार पन्नों पर आंसू टपके, दिल का बोझ कम हुआ, हर चैप्टर एक संपूर्ण कहानी है

एक्टर, सिंगर कंपोजर और डायरेक्टर डब्बू मलिक ने एक किताब ‘नेवर टू लेट’ लिखी है। इस किताब में उन्होंने अपनी जिंदगी के अनुभवों को समेटा है। इस किताब के पन्नों में उनकी जिंदगी के ऐसे अनुभव हैं, जो बताते हैं कि उनकी जिंदगी में सक्सेस और फेलियर चाहे जैसे भी रहे हों, लेकिन उनकी कभी ना हार मानने वाली जिद लोगों को इंस्पायर करेगी। हाल ही डब्बू मालिक ने दैनिक भास्कर से बातचीत के दौरान अपनी किताब के बारे में बात की। जिंदगी का सारांश है किताब में बातचीत के दौरान डब्बू मलिक ने बताया कि उन्होंने जो किताब लिखी है। उसमें उनकी जिंदगी का सारांश है। उन्होंने कहा- अगर किताब के पन्नों को खोलेंगे तो एक चैप्टर में मेरी जिंदगी की पूरी कहानी मिलेगी। इस किताब को बहुत ही साधारण तरीके से लिखा है, जिसे बड़ी आसानी से पढ़ा जा सकता है। हर चैप्टर एक संपूर्ण कहानी है डब्बू मलिक ने बताया- इस किताब को क्रमानुसार पढ़ने की जरूरत नहीं है। कहीं से कोई भी पेज पढ़ें, उसमें एक अलग कहानी मिलेगी। हर चैप्टर अपने आप में एक सम्पूर्ण कहानी है। मैंने कहानी के साथ प्रमाण के तौर पर अपनी कुछ तस्वीरें डाली हैं, जिससे कहानी को तस्वीरों के माध्यम से समझा जा सके। इसमें 35 साल से लेकर 70 साल पुरानी तस्वीरें हैं। दिल की गहराइयों से किताब लिखी डब्बू मलिक ने अपनी किताब को दिल की गहराइयों के साथ लिखा है। उन्होंने बताया कि यह किताब क्यों लिखनी पड़ी? डब्बू मलिक कहते हैं- यह किताब इसलिए लिखनी पड़ी ताकि मेरे दिल की गहराइयों की बोझ हल्का हो जाए। मैंने इस किताब को पचास बार पढ़ा है। हर चैप्टर पढ़ने के बाद मन में एक सवाल आता है कि क्या यह सत्य है? जो मैंने लिखा है, क्या उसमें सचमुच में विश्वास करता हूं? मेरा दिल मानता है कि मैंने जो भी लिखा है, उसे कोई झुठला नहीं सकता। किताब के पन्नों पर आंसू टपके डब्बू मलिक अपनी किताब पढ़कर खुद कई बार भावुक हुए। वह कहते हैं- मैंने बार-बार हर पन्ने पर सवाल किया। कई बार मेरे आंसू उन पन्नों पर गिरे हैं। मुझे इस बात का एहसास हुआ कि अच्छा हुआ कि मैं लिख रहा हूं। अपनी सच्चाई का सामना खुद कर रहा हूं। मेरे बच्चे जब भी किसी पन्ने को पढ़ेंगे तो उनको एहसास होगा कि उनके पिता ने इन चीजों को देखा है। नए कलाकारों को मौका देना चाहते हैं डब्बू मलिक कहते हैं- हर चैप्टर अपने आप में एक कहानी है, जो जीवन के अलग-अलग पड़ावों पर लोगों को प्रेरित करेगी। मैं अपनी कम्युनिटी लेबल एमडब्ल्यूएम के जरिए नए कलाकारों को मौका देना चाहता हूं। मेरा मानना है कि हर दशक में इंसान को खुद को फिर से निखारना चाहिए और अपनी स्थिति का मूल्यांकन करना चाहिए।

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सिंगापुर मॉडल फहमीना चौधरी, जिनकी पाकिस्तान में सड़ती मिली लाश:गुमशुदा हुईं फिर किडनैपर ने मांगे 2 करोड़, प्रॉपर्टी खरीदने का झांसा देकर इस्लामाबाद बुलाया था

ये कहानी है सिंगापुर-पाकिस्तान की सुपरमॉडल फहमीना चौधरी की जो एक नई उम्मीद के साथ पाकिस्तान पहुंची थीं, लेकिन फिर अचानक लापता हो गईं। उनकी किडनैपिंग हुई, जिसके बाद उनकी लाश इस्लामाबाद के बाहरी इलाके में सड़ी-गली हालत में मिली थी। आज अनसुनी दास्तान के 2 चैप्टर्स में पढ़िए कहानी सुपरमॉडल फहमीना चौधरी की गुमशुदगी, हत्या और तफ्तीश की कहानी- अक्टूबर 2013 की बात है सिंगापुर में रहने वालीं मशहूर सुपरमॉडल फहमीना चौधरी काम के सिलसिले में पाकिस्तान आई हुई थीं। वो कराची के एक रईस परिवार से ताल्लुक रखती थीं, हालांकि शादी के बाद वो सिंगापुर में बस चुकी थीं। पिता के निधन के बाद मां नाशीदा तस्कीम अकेले कराची के घर में रहती थीं और फहमीना अक्सर उनसे मिलने आया करती थीं। अक्टूबर 2013 में उन्होंने तय किया कि वो मां के लिए एक बड़ी जमीन खरीदेंगी और पाकिस्तान में ही एक बड़ी एक्टिंग और फैशन एकेडमी शुरू करेंगी। अक्टूबर के पहले हफ्ते में वो पाकिस्तानी आईं, लेकिन मां के पास कराची जाने के बजाय इस्लामाबाद के ही एक होटल में ठहर गईं। उन्होंने अपनी मां से कॉन्टैक्ट किया और बताया कि वो इस्लामाबाद से काम खत्म कर एक-दो दिन में उनके पास पहुंचेंगी। 10 अक्टूबर को उन्होंने मां से कॉल पर बात की और कहा कि वो एक जमीन देखने जाने वाली हैं। इसके बाद से ही उनका बेटी से संपर्क टूट गया। शाम होते ही फहमीना का नंबर बंद हो गया। मां को लगा कि शायद किसी वजह से मोबाइल बंद हो गया होगा, लेकिन अगली सुबह भी फहमीना ने न कॉल किया और न ही उनका नंबर चालू हुआ। वो बेटी के लिए फिक्रमंद ही थीं कि अचानक उनके नंबर पर एक मैसेज आया, जिसमें लिखा था कि उनकी बेटी फहमीना किडनैप हो चुकी है, अगर उसकी सलामती चाहिए तो जल्द से जल्द 2 करोड़ रुपए दिए जाएं। साथ ही ये भी लिखा गया था कि अगर एथॉरिटी को खबर दी तो फहमीना का कत्ल कर दिया जाएगा। घबराकर फहमीना की मां नाशीदा तुरंत इस्लामाबाद पहुंचीं और पुलिस को इसकी जानकारी दी। ये एक हाईप्रोफाइल मामला था तो पुलिस ने बिना समय गंवाए तहकीकात शुरू कर दी। जांच की शुरुआत फहमीना की लोकेशन से की गई। इस्लामाबाद के कई होटलों में फहमीना के बारे में पता किया गया, लेकिन उनकी कोई जानकारी नहीं मिली। इसी बीच उनके कॉल रिकॉर्ड्स की रिपोर्ट आई। इसके अनुसार, उन्होंने आखिरी कॉल माज वकार को किया था। जब ये बात फहमीना की मां को बताई गई तो उन्होंने पुलिस से कहा कि वो माज को जानती हैं। माज और फहमीना की दोस्ती सिंगापुर से है और वो उन्हें यहां प्रॉपर्टी दिलाने में मदद कर रहा था। उसी के कहने पर मॉडल इस्लामाबाद आई थीं। फहमीना की मां के मुताबिक, उनके पास 4 लाख रुपए के गहने और 1 लाख रुपए कैश थे। जब पुलिस ने माज की जानकारी जुटाई तो सामने आया कि वो एक प्रॉपर्टी डीलर था। उसकी अक्सर फहमीना से बातचीत होती थी। पुलिस ने बिना समय गंवाए माज की तलाश शुरू कर दी। अगले दिन 13 अक्टूबर को आबपारा पुलिस ने माज की गिरफ्तारी कश्मीर हाईवे के मारगल्ला होटल से की। पूछताछ में उससे फहमीना से जुड़े सवाल किए गए, लेकिन वो बस यही दोहराता रहा कि वो फहमीना को जानता था और 10 अक्टूबर को उन्हें प्रॉपर्टी दिखाने ले गया था, लेकिन बात नहीं बनी और वो वहां से निकल गईं। उसके बयानों में पुलिस को कई बातें खटक रही थीं, यही वजह रही कि पुलिस ने उससे इस बार सख्ती से पूछताछ की। इस बार वो टूट गया और गुनाह कबूल कर लिए। पुलिस को लगा कि सुपरमॉडल फहमीना चौधरी की किडनैपिंग की गुत्थी अब सुलझ गई, लेकिन जब माज ने सच्चाई बताई तो हर कोई सिहर उठा। माज ने बताया कि फहमीना अब इस दुनिया में नहीं हैं, वो उनका कत्ल कर चुका है, वो भी उसी दिन, जिस दिन वो गुमशुदा हुई थीं। ये खबर पूरे पाकिस्तान में आग की तरह फैली। अब बस पुलिस को उनकी लाश की तलाश थी। 14 अक्टूबर को माज पुलिस को इस्लामाबाद के बाहरी इलाके के बानी गाला एरिया के पास कोरांग नदी के किनारे लेकर गया। उसकी निशानदेही पर पुलिस एक खेत के पास बनी एक खाई तक पहुंचीं, जहां पहुंचते ही सड़न की बू आने लगी। माज ने वहां पड़े एक कंबल की तरफ इशारा किया, जिसके आसपास मक्खियां और कीड़े थे। अब पुलिस के सामने एक सड़ी हुई लाश थी। माज ने बताया कि इस कत्ल में उसका दोस्त आरिफ महमूद भी शामिल था, जिसकी तलाश शुरू कर दी गई। अब पुलिस को हत्या का मोटिव जानना था। माज के इकबाल-ए-जुर्म के अनुसार, उसकी सिंगापुर में फहमीना से मुलाकात हुई थी। माज सिंगापुर के मॉडलिंग से जुड़े हुए कुछ प्रोजेक्ट का हिस्सा था। काम के सिलसिले में हुई मुलाकात जल्द ही दोस्ती में बदल गई थी। एक रोज फहमीना ने उसे बताया कि वो पाकिस्तान में कुछ प्रॉपर्टी में इन्वेस्ट करना चाहती हैं और वो यहां फैशन और एक्टिंग एकेडमी शुरू करना चाहती हैं। माज एक प्रॉपर्टी ब्रोकर था, तो उसने फहमीना को कुछ प्रॉपर्टीज की जानकारी दी। साथ ही उसने ये भी कहा कि फैशन एकेडमी में वो उनके साथ पार्टनरशिप करेगा। दोनों ने तय किया कि वो अक्टूबर के पहले हफ्ते में इस्लामाबाद जाकर प्रॉपर्टी देखेंगे। माज पहले ही सिंगापुर से इस्लामाबाद पहुंच गया और फिर 10 अक्टूबर को फहमीना यहां पहुंचीं। माज ने उनका किसी होटल की जगह प्राइवेट गेस्ट हाउस में ठहरने का इंतजाम करवाया था। दोनों ने 10 अक्टूबर की शाम को इस्लामाबाद की प्रॉपर्टी देखी। इससे ठीक पहले फहमीना ने अपनी मां से बात की थी। माज द्वारा दिखाई गई प्रॉपर्टी की कीमत 2 करोड़ थी, जो फहमीना को खास पसंद नहीं आई थी। अगर ये डील होती तो माज को लाखों मिलते, लेकिन फहमीना ने उसे खरीदने से साफ इनकार कर दिया। नुकसान होता देख माज भड़क गया, लेकिन उसने ठान ली कि वो किसी भी सूरत में इसकी भरपाई जरूर करेगा। प्रॉपर्टी देखने के बाद फहमीना गेस्ट हाउस पहुंच गईं। कुछ देर बाद उनके पास माज का कॉल आया। उसने कहा कि उसकी पहचान के एक शख्स को एक बड़े प्रोजेक्ट के लिए मॉडल की जरूरत है और उसने फहमीना का नाम सुझाया है। फहमीना पाकिस्तान में ही थीं, तो उन्होंने सोचा कि अगर काम मिल जाए तो क्या हर्ज है। उन्होंने इसके लिए हामी भर दी। बातचीत में ही तय हुआ कि माज आज ही फहमीना की मुलाकात उस शख्स से करवाएगा। माज ने अपने एक दोस्त के साथ जाकर फहमीना को पिक किया और इस्लामाबाद के बाहरी इलाके में ले गया। कुछ ही देर में फहमीना को माज पर शक होने लगा तो वो सवाल करने लगीं, लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। दोनों ने कार में ही फहमीना की चाकू मारकर हत्या कर दी और फिर उनकी लाश ठिकाने लगाई। कत्ल के बाद दोनों ने फहमीना के मोबाइल से मां का नंबर निकाला और किडनैपिंग की कहानी बनाकर फिरोती की मांग की। माज के कबूलनामे के बाद पुलिस ने जल्द ही वो कार भी ढूंढ निकाली, जिसका इस्तेमाल इस कत्ल में हुआ था। साथ ही माज के दोस्त आसिफ महमूद को भी गिरफ्तार कर लिया गया। कातिल को दी गई सजा-ए-मौत फहमीना चौधरी हत्याकांड का मामला 3 साल तक पाकिस्तान में चला। आखिरकार साल 2016 में पाकिस्तानी कोर्ट ने माज वकार को कत्ल करने के आरोप में फांसी की सजा सुनाई। वहीं उसका साथ देने वाले दोस्त आसिफ महमूद के लिए उम्रकैद की सजा मुकर्रर की गई। साथ ही दोनों पर 3-3 लाख रुपए का फाइन भी लगाया गया। कौन थीं फहमीना चौधरी? फहमीना चौधरी कराची, पाकिस्तान के एक रईस खानदान से ताल्लुक रखती थीं। महज 18 साल की उम्र में फहमीना की शादी सिंगापुर के एक बिजनेसमैन से हुई थी। शादी के बाद फहमीना सिंगापुर में बस गईं, जहां उन्हें दो बच्चे हुए थे। वो एक बैंक में जॉब करने लगीं। इसी दौरान उन्हें अपनी एक रिश्तेदार के लिए चैरिटी फंक्शन में काम करने का मौका मिला। चैरिटी फंक्शन में ही फहमीना के लुक से इम्प्रेस होकर कुछ लोगों ने उन्हें मॉडलिंग प्रोजेक्ट्स ऑफर कर दिए। शुरुआत में उन्होंने शौकिया तौर पर मॉडलिंग की, लेकिन बढ़ती पॉपुलैरिटी के साथ ही उन्होंने बैंक की नौकरी छोड़ दी और फुल टाइम मॉडलिंग शुरू कर दी। इसके साथ ही उन्हें छोटे-मोटे टीवी शोज में भी काम मिलने लगा था। 2012 में फहमीना ने मिसेज एशिया इंटरनेशनल में हिस्सा लिया, जहां उन्होंने पाकिस्तान को रिप्रेजेंट किया था। उन्होंने इस पेजेंट में जीत हासिल की थी। इसके अलावा वो पाकिस्तान में ट्रांसपेरेंसी क्वीन इंटरनेशनल, मिस पर्सनैलिटी क्वीन और मिस चैरिटी के टाइटल्स भी हासिल कर चुकी थीं। उन्हें असल पहचान सिंगापुर फैशन वीक से मिली थी। वो पाकिस्तान और इंडियन शोज के लिए भी रैंपवॉक करती थीं। उन्होंने इंडिया में भी कई मॉडलिंग प्रोजेक्ट्स किए थे। 2013 में उन्हें बेस्ट एक्ट्रेस ऑनरेबल अचीवमेंट अवॉर्ड भी मिला था। इसके अलावा उन्हें सिंगापुर एक्सीलेंस अवॉर्ड में भी नॉमिनेशन मिला था।

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Friday, 1 August 2025

Remains of Ottoman, Genoese forts found in Odessa

Archaeologists have discovered the long-sought remains of an 18th century Ottoman fortress on top of artifacts from the 14th century Genoese fortress on the Primorsky Boulevard in the historic center of Odessa, Ukraine. Its location has been debated for 200 years, even though it only disappeared when Imperial Russian troops blew it up in 1789. There were no reliable maps or written sources documenting its exact location, and since the stones that survived the blast were recycled for new construction, no traces of it remained visible on the landscape.

Archaeologists from the South Ukrainian National Pedagogical University and the Institute of Archaeology of the National Academy of Sciences of Ukraine found the remnants of Khadzhibey Castle between the boulevard and the bronze statue of the Duc de Richelieu in the middle of the semicircular plaza overlooking the city’s Black Sea port.

In two excavations and two pits, we found the front wall of the artillery coastal battery, which was added to the castle from the shore, as well as traces of the dismantling of the curtains. We managed to record the angular intersection of this wall with the side wall, which covered the battery from the southeast. The structure is present on various plans and images of the castle of the late 18th century. It is distinguished by its unique structural features and the specific location near the cliff. The attribution is facilitated by the accompanying finds of ceramics and bronze products of Ottoman origin. The battery was an open area, fenced by a wall up to 1.5 m high and 90 cm thick. It held a low earthen embankment on the front, on which cannons were placed, directed towards the sea.

The base of the castle battery wall is embedded in the antique layer of the 5th century BC. This is the first time that it has been possible to trace the cultural layers of the ancient Greek settlement of Istrian Harbor within its northern border. Previously, it was assumed that its border lay somewhere in the Duka area. But now we can say for sure that it was defined by a small ancient ravine, which we managed to record in one of the excavations of 2021 in the northern part of the semicircular area. This natural barrier also formed protection from the north-western, ground-level side for Hadzhibey Castle, determining the choice of its location.

Ivan Liptuga, Director of the Department of Culture of the Odessa City Council, has proposed a plan to install glass over the excavated remains instead of covering them back up with pavers, so visitors can view the archaeological layers of the city as they wander. The wider outline of the fortress structure could be marked on the plaza with pavers of a different color.

What would become Odessa was founded no later than 6th century B.C. as a Greek colony on the western coast of the Black Sea. Turkic nomadic peoples took over the territory by the end of the 4th century, and it would be absorbed into the Golden Horde, the Mongol empire ruled by the descendants of Genghis Khan, in the mid-13th century. It was eclipsed by a different kind of power: the Republic of Genoa, a major maritime power in medieval and early modern Europe, that established colonies and trade outposts throughout the Mediterranean, Tyrrhenian, Aegean and Black Seas. From the 13th through the late 15th century, Genoa’s commercial empire dominated the Black Sea. Every current port city on the Black Sea today was once a colony of Genoa, and Odessa is no exception. Genoa built the fortress of Ginestra there, as documented on Italian maritime maps of the 14th century.

A settlement at the site first appears in historical records in 1415 as the port of Kotsiubijiv in the Grand Duchy of Lithuania, but it was small and depopulated a few decades later. The territory was conquered by the Ottoman Empire in the 1530s and they repopulated the settlement in the middle of the 18th century, just in time for Imperial Russia to capture it in 1789 during the Russian-Turkish War.

It was under Catherine the Great that the modern town of Odessa began to take shape. She ordered construction of a military harbor and commercial port buildings, and in 1795, the town was named Odessa after the Greek colony of Odessos that was believed to have been founded there. It was still a small town at this point, with a population of less than 3,500 people when the first census was taken in 1797. It didn’t even have a bank until 1801. The Duc de Richelieu changed all that. 

The duke, a great-great-great-nephew of the famous cardinal, fled Revolutionary France with a bounty on his head and settled in Russia. He volunteered to join Imperial Russian Army, ultimately achieving the rank of Major General. Tsar Alexander I appointed him governor of Odessa in 1803. He held the office for 11 years, transforming the small town into a well-planned, fully-developed, economic and cultural center to rival any city in Europe. He built its modern port which would become known as the Pearl of the Black Sea. By the time he returned to France in 1814, Odessa had grown into the third largest city by population in the Russian Empire. Even though his family estates, confiscated during the Revolution, were never returned to him, he was just as successful in France as he had been as an émigré, becoming Prime Minister of France pretty much as soon as he hit the ground in Paris in 1815, serving until 1818, and then for a second term lasting 10 months in 1821. He died of a stroke in 1822.

He remained very much beloved in Odessa. The bronze statue of the duke clad in an incongruous toga was commissioned in 1828 and placed at the top of the stairs leading down to the port he built. In 1905, a general strike and violent suppression of striking workers in Odessa resulted in days of rioting and fire. The workers were supported by the mutineer crew of the Russian battleship Potemkin docked at the port. A fictionalized account of this uprising is the plot of Sergei Eisenstein’s ground-breaking 1925 silent movie masterpiece, Battleship Potemkin. The famous scene of citizens being massacred while a baby carriage careens down the steps was set on the very staircase leading to the port that is at the feet of the Duc de Richelieu monument. You can even see the back of it when the crowds rush down the stairs fleeing the advancing troops.



* This article was originally published here

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Thursday, 31 July 2025