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ಗುರುವಾರ ಕೇಳಿ ಶ್ರೀ ರಾಘವೇಂದ್ರ ರಕ್ಷಾ ಮಂತ್ರ

Saturday, 3 January 2026

EastEnders actor 'grateful' to avoid driving ban for speeding

Colin Salmon was shown leniency by the court because he cares for his seriously ill wife and daughter.

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सिंगर जिसके 4 करीबियों ने की आत्महत्या:पूर्व पति-बॉयफ्रेंड ने गोली मारकर दी जान, डिप्रेशन में एक्ट्रेस ने भी खुदकुशी की, लिखा- जिंदगी असहनीय हो गई

“मेरे लिए जिंदगी असहनीय हो गई है। मुझे माफ करना।” ये आखिरी शब्द थे इटालियन सिंगर और एक्ट्रेस डालिडा के। इस वाक्य में न कोई आरोप था, न कोई शिकवा-शिकायत। सिर्फ थकान थी, वो भी सालों की। डालिडा देखने में जितनी खूबसूरत थीं, जितनी उनकी पॉपुलैरिटी थी, उतनी ही बदसूरत थी उनकी निजी जिंदगी। ये कोई संयोग की बात नहीं थी कि उनकी जिंदगी में अलग-अलग समय में 4 शख्स आए, उन्होंने हर किसी को अपनी जिंदगी माना, लेकिन हर रिश्ते का अंजाम मौत रहा। किसी ने खुद को गोली मार ली, तो किसी ने ऊंची बिल्डिंग से छलांग लगाकर आत्महत्या कर ली। आज अनसुनी दास्तानें के 3 चैप्टर्स में पढ़िए इटालियन एक्ट्रेस की जिंदगी की दर्दनाक कहानी- इओलांडा क्रिस्टीना गिग्लियोटी फ्रांस की मशहूर सिंगर थीं, जिन्हें डालिडा नाम से जाना जाता था। छोटे-मोटे एक्टिंग रोल करने के बाद उन्होंने सिंगिंग करियर शुरू किया और कामयाबी हासिल की। 1956 में उनका गाया हुआ गाना बाम्बिनो जबरदस्त हिट रहा, जिससे डालिडा को स्टारडम हासिल हुआ। इस समय रिकॉर्ड लेबल में काम करने वाले ल्यूसिन मोरिस, डालिडा के साथ बतौर प्रमोटर काम करते थे। समय के साथ दोनों एक-दूसरे को पसंद करने लगे और दोनों की नजदीकियां बढ़ने लगीं। साल 1961 में डालिडा ने ल्यूसिन से शादी कर ली। शुरुआत में खूबसूरत लगने वाला ये रिश्ता जल्द ही आए दिन के लड़ाई-झगड़ों में बदलने लगा और डालिडा ने शादी के महज एक साल बाद ही 1962 में ल्यूसिन से तलाक ले लिया। हालांकि दोनों इसके बाद भी साथ काम करते रहे। डालिडा हिट पर हिट गाने देते हुए स्टार बन गईं। दुनियाभर में उनके कई कामयाब म्यूजिकल टूर हुए। एक टूर के दौरान उनकी मुलाकात सिंगर लुइगी टेंको से हुई। दोनों ने कई गाने साथ गाए और सीक्रेट रिलेशनशिप में आ गए। लुइगी टेंको तलाकशुदा थे और उनकी एक्स वाइफ के साथ प्रोफेशनली जुड़े हुए थे। टूर के दौरान ही डालिडा के मैनेजर ने उन्हें सैनरेमो म्यूजिक फेस्टिवल में लुइगी टेंको के साथ हिस्सा लेने का सुझाव दिया। वो पहले इस फेस्टिवल का ऑफर ठुकरा चुकी थीं, लेकिन इस बार वो लुइगी के लिए मान गईं और फिर आई वो भयावह रात। 27 जनवरी 1967। डालिडा ने बॉयफ्रेंड लुइगी के साथ सैनरेमो म्यूजिक फेस्टिवल में हिस्सा लिया। दोनों ने फ्रांस के हिट गाने Ciao Amore Ciao (बाय बाय) में अलग-अलग परफॉर्मेंस दीं। डालिडा की परफॉर्मेंस को स्टैंड-अप ओवेशन मिली, हालांकि लुइगी की खराब परफॉर्मेंस के चलते दोनों को कॉम्पिटिशन से बाहर कर दिया गया। उसी शाम लुइगी, डालिडा, पूर्व पत्नी और कुछ दोस्तों के साथ एक रेस्टोरेंट गए। सभी ने डिनर किया, लेकिन लुइगी थकान का हवाला देकर बाकियों से पहले ही होटल लौट गए। डिनर खत्म कर देर रात करीब 2 बजे डालिडा होटल पहुंचीं। वो लुइगी के साथ रूम नंबर 219 में रुकी थीं। जैसे ही उन्होंने दरवाजा खोला लुइगी खून से लथपथ फर्श पर पड़े थे। सासें थम चुकी थीं और माथे पर गोली का निशान था। डालिडा बुरी तरह टूट गईं। वो काफी देर तक लाश को गले लगाए वहीं बैठी रहीं। बाद में उनकी चीखें सुनकर बाकी लोग पहुंचे। जांच में सामने आया कि लुइगी लंबे समय से एंग्जाइटी और डिप्रेशन का शिकार थे। उस रोज परफॉर्मेंस से पहले भी उन्होंने कुछ दवाएं ली थीं। लुइगी की मौत तक दुनिया उनके और डालिडा के रिश्ते से अनजान थी, लेकिन फिर 7 फरवरी 1967 को डालिडा एक टीवी शो में पहुंचीं। उन्होंने वही ड्रेस पहन रखी थी, जो उन्होंने लुइगी की लाश को गले लगाते हुए पहनी थी। लुइगी को याद कर वो लाइव टीवी शो में खूब रोईं। इस इंटरव्यू से साफ था कि डालिडा डीप डिप्रेशन में हैं। कुछ दिनों बाद 26 फरवरी को डालिडा ने नींद की दवाइयों का ओवरडोज लेकर आत्महत्या की कोशिश की। उन्हें तत्काल हॉस्पिटलाइज किया गया, जहां वो 5 दिनों तक कोमा में रहीं। इस हादसे से रिकवरी में 5 महीने लगे। जैसे-तैसे वो इस सदमे से निकलीं और उन्होंने अक्टूबर में टूर से प्रोफेशनल कमबैक किया। लगातार हिट देते हुए डालिडा फिर एक बार टॉप सिंगर्स में शामिल हुईं। साल के अंत तक डालिडा के जिंदगी में 22 साल के एक इटालियन स्टूडेंट आए। दोनों साथ रहा करते थे। इस समय डालिडा गर्भवती हो गईं और उन्हें अबॉर्शन करवाना पड़ा। अबॉर्शन के बाद उन्हें डॉक्टर्स ने बताया कि अब वो कभी मां नहीं बन सकतीं। उन्होंने ये रिश्ता भी खत्म कर दिया। 11 सितंबर 1970। डालिडा को एक और झकझोर कर रख देने वाली खबर मिली। उनके पूर्व पति लूसियन मोरिस ने अपने ही अपार्टमेंट में नींद की गोलियों का ओवरडोज लेकर आत्महत्या कर ली। वजह थी अकेलापन और डालिडा से अलगाव। डालिडा के जीवन में यह दूसरी बार था जब किसी बेहद करीबी व्यक्ति ने अपनी जान ली। डिप्रेशन चरम पर था, लेकिन ट्रीटमेंट की मदद और प्रोफेशनल करियर में व्यस्त रहना इस बार कारगर रहा। 1970 में डालिडा अपने करियर के शिखर पर थीं। इसी बीच उनकी मुलाकात सिंगर रिचर्ड शान्फ्रे से हुई। दोनों ने साथ मिलकर कई हिट गाने दिए। कमबैक के बाद डालिडा की फ्रेंच सिंगर माइक ब्रेंट से गहरी दोस्ती हो गई। दोनों के कई गाने भी रिलीज हुए। साथ समय बिताना और कॉन्सर्ट करना आम बात थी। माइक 70 के दशक में पॉपुलर सिंगर थे। सालाना उनके करीब 250 कॉन्सर्ट होते थे। बेहतरीन आवाज से माइक कॉन्सर्ट में 10 हजार फैंस को इकट्ठा कर लिया करते थे, लेकिन दूसरी तरफ वो डिप्रेशन का शिकार होते जा रहे थे। 22 नवंबर को जेनेवा के एक म्यूजिकल टूर के दौरान उन्होंने अपने मैनेजर के होटल रूम से कूदकर आत्महत्या का प्रयास किया। इससे उनके शरीर के कई पार्ट फ्रैक्चर हो गए। दो लाइफ पार्टनर्स को खोने के बाद डालिडा पर इसका बुरा असर पड़ा। कुछ महीने बीते ही थे कि माइक ने 25 अप्रैल 1975 को अपार्टमेंट से कूदकर आत्महत्या कर ली। ये तीसरी बार था, जब डालिडा के किसी करीबी ने मौत को गले लगाया। हालांकि इस समय उन्हें बॉयफ्रेंड रिचर्ड शान्फ्रे का सहारा था। हालांकि उन्होंने भी साल जुलाई 1983 को रेनॉल्ट कार में गैस लीक कर मौत को गले लगा लिया। इस हादसे से डालिडा फिर एक बार पूरी तरह अकेली पड़ गईं। साल 1985 में लगातार कॉन्सर्ट करते हुए तेज रोशनी से उनकी आंखों पर बुरा असर पड़ा। उन्होंने 2 मेजर सर्जरी करवाईं, लेकिन कोई फायदा नहीं मिला। यही वजह रही कि उन्होंने कॉन्सर्ट और स्टेज शोज करना छोड़ दिया। इससे पहले तक उनके सभी म्यूजिकल वर्ल्ड टूर सोल्ड आउट हुआ करते थे। सिंगिंग से ब्रेक लेकर उन्होंने कुछ फिल्मों में छोटे-मोटे रोल भी किए थे। 1987 आते-आते डालिडा का डिप्रेशन बढ़ने लगा। बावजूद इसके वो हर ग्लैमरस फिल्म इवेंट में अपीयरेंस दिया करती थीं। वो कई टीवी टॉक शोज में बतौर गेस्ट भी शामिल होती रहीं। 29 अप्रैल 1987 को डालिडा ने टर्की में नेशनल टेलीविजन ऑफ टर्की टीवी चैनल के लिए परफॉर्मेंस दी। परफॉर्मेंस के बाद पेरिस लौट आईं। 2-3 मई को वो घर पर अकेली थीं। 2-3 मई 1987 की दरमियानी रात उन्होंने एक पेपर में लिखा, La vie m'est insupportable. Pardonnez-moi. (जिंदगी मेरे लिए असहनीय हो गई है, मुझे माफ करना)। ये लिखते ही उन्होंने नींद की गोलियों का ओवरडोज ले लिया। अगली सुबह उनकी लाश उनके घर पर काम करने वालों को मिलीं। तब से लेकर अब तक डालिडा की जिंदगी पर 5 फिल्में 2 टीवी शोज बन चुके हैं। उनके गाए हुए कई गाने रिमिक्स किए गए, जो आज भी फ्रांस में मशहूर हैं। कैसे डालिडा का जुड़ा म्यूजिक से नाता 17 जनवरी 1933 में डालिडा का जन्म इजिप्ट के कायरो शहर में हुआ था। गरीब परिवार से ताल्लुक रखने वालीं डालिडा को महज 10 माह की उम्र में उन्हें आंखों का इन्फेक्शन हुआ, जिससे उन्हें 40 दिनों तक आंखों में पट्टी बांधे रहना पड़ा। 3 साल की उम्र में उनकी आंखों की 2 सर्जरी हुईं। कम उम्र से ही डालिडा की रुचि एक्टिंग और मॉडलिंग में रही। उनके अंकल एक लोकल सिनेमा के प्रोजेक्शनिस्ट हुआ करते थे। वो कई बार डालिडा को साथ सिनेमा देखने ले जाया करते थे। सिनेमा से इंस्पायर होकर डालिडा ने स्कूल में होने वाले कल्चरल प्रोग्राम में हिस्सा लेना शुरू किया। पढ़ाई पूरी कर डालिडा घर खर्च के लिए छोटे मोटे काम करने लगीं। इसी समय उनकी दोस्त मिरांडा ने उन्हें मिस ओनडाइन मॉडलिंग कॉम्पिटिशन में हिस्सा लेने का सुझाव दिया। मिरांडा खुद भी इसका हिस्सा थीं। डालिडा को डर था कि उनके घरवाले इसके खिलाफ होंगे। ऐसे में उन्होंने चोरी-छिपे इस कॉम्पिटिशन में हिस्सा लिया। बेहतरीन परफॉर्मेंस की बदौलत डालिडा ने इस ब्यूटी कॉन्टेस्ट में दूसरा स्थान हासिल किया और उनकी दोस्त मिरांडा तीसरे स्थान पर रहीं। अगले दिन ले जर्नल डी एजिप्ट नाम के अखबार में ब्यूटी कॉन्टेस्ट के सभी विजेताओं की तस्वीर छपी। बदकिस्मती से वो अखबार डालिडा की मां के हाथ लगा और गुस्से में उन्होंने डालिडा के पूरे बाल काट दिए। ब्यूटी कॉन्टेस्ट जीतने के बाद उन्हें एजिप्ट की बड़ी मॉडलिंग कंपनी डोना में काम मिला। इस समय डालिडा ने परिवार के खिलाफ जाकर नौकरी छोड़ी और बतौर मॉडल करियर की शुरुआत की। एजिप्ट में बढ़ती पॉपुलैरिटी के साथ ही डालिडा एजिप्ट छोड़कर 1945 में पेरिस आकर बस गईं। मॉडलिंग में कामयाबी मिलने के बाद उन्होंने बतौर एक्ट्रेस करियर की दूसरी पारी शुरू की। कुछ फिल्मों में काम करने के बाद उन्होंने सिंगिंग शुरू की, जिससे उन्हें स्टारडम मिला।

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Matthew Rhys to play 'soft and cowardly' mayor of cursed island

The Welsh actor will play Tom Loftis, a "soft and cowardly" mayor desperate to revive his struggling community.

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The Welsh actor will play Tom Loftis, a "soft and cowardly" mayor desperate to revive his struggling community.

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Friday, 2 January 2026

Largest Roman shoe ever found to go on display

The largest Roman shoe ever discovered, found in 2025 at the ancient fort of Magna on Hadrian’s Wall in northern England, will be going on display at the Vindolanda Trust’s Roman Army Museum in Brampton, Cumbria. It will be joined by some of the other large footwear unearthed at Magna Roman Fort at a new exhibition opening February 7th.

Magna was a smaller fort about seven miles west of the major fort of Vindolanda just south of Hadrian’s Wall. Unlike Vindolanda, which has been excavated regularly for decades, Magna has only been archaeologically excavated since 2023. Last summer’s excavation uncovered 34 shoes in a variety of sizes from children’s to adults. Eight of them were much bigger than average size, starting at 11.8 inches long. The largest of them was 12.8 inches long, the equivalent of a US men’s size 14. Michael Jordan wears a size 13.5, just to give you an idea of how huge these shoes are.

It’s a statistically significant proportion of shoes of unusual size. Almost 24% of the shoes discovered so far at Magna are extra large. Meanwhile, of the 5,000 shoes unearthed over 55 years of excavations at Vindolanda, only four or five of them are in the extra large category.

[Archaeologist Rachel Frame] said that while it was clear the leather shoes belonged to tall people, the mystery over why the individuals were stationed at the fort remained.

“We know that certain parts of the Roman world would have specialist regiments recruited into the army because they have a particular skillset – whether that’s in horse riding or archery,” she said.

“So potentially we’ve got a more specialist unit at the site [for whom] it was advantageous to be taller,” she said.

Archaeologists hope that when excavations resume in April, artifacts are unearthed that may explain this intriguing clodhopper cluster. For example, if altars dedicated to deities, funerary reliefs and inscriptions emerge that identify the legions stationed at the fort, it could clarify why they may have been recruited for above-average height.



* This article was originally published here

Female artists (and Oasis) drove UK music sales in 2025

Taylor Swift was the biggest-seller, with Olivia Dean and Sabrina Carpenter also topping the charts.

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EastEnders actor 'grateful' to avoid driving ban for speeding

Colin Salmon was shown leniency by the court because he cares for his seriously ill wife and daughter.

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Female artists (and Oasis) drove UK music sales in 2025

Taylor Swift was the biggest-seller, with Olivia Dean and Sabrina Carpenter also topping the charts.

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Thursday, 1 January 2026

Sèvres snuffbox with French princess’ royal pets bought for Versailles

A gold and porcelain snuffbox made by Sèvres for Madame Adélaïde, the daughter of King Louis XV, will return to the Palace of Versailles for the first time since the French Revolution. Beautifully painted on the outside of the lid, inside of the lid and on the bottom with portraits of royal dogs and cats, it is one of only four Sèvres snuffboxes depicting the pets of the French royal family known to have been made. Only three of them survive today, and only one of the three belonged to another royal princess (Adélaïde’s younger sister Madame Victoire). The other belonged to the king’s mistress Madame de Pompadour.

The box has an extraordinary and well-documented ownership history. The Royal Sèvres Porcelain Manufactory made the oval porcelain snuffbox with a bleu-lapis ground in its hallmark deep blue shade and a chased and engraved gold mount by royal goldsmiths Charles Ouizille and Pierre-François Drais in 1785.

Madame Adélaïde (1732-1800), the formidable daughter of Louis XV and Queen Marie Leszczyńska, commissioned the paintings of her four dogs and one cat, starring her white barbet Vizir with his distinctive lion cut on the lid. One of Sèvres’ finest painters, Nicolas-Pierre Pithou the Younger, created the miniature portraits. The lid depicts Vizir and a pug playing in a garden; on the bottom a greyhound and spaniel frolic in a wooded landscape. The interior cover features a fluffy black and white cat wearing a pink ribbon on a cushion with a garland of flowers, a pair of lanterns on a stick and a dog collar inscribed “Adelaid.” The cat is pawing at a ring toy that looks like something you could get from a pet store today.

The Sèvres sales records document the stages of this creation, culminating in an entry on January 19, 1786: “delivered to Madame Adélaïde: 1 blue snuffbox mounted in gold and painted with dogs and a cat.” The princess had three years to enjoy her snuff out of this box before the Fall of the Bastille on July 14, 1789, and less than two years after that, she and her sister Victoire fled France for Rome, escaping with their lives, an entourage of 80 and a baggage train full of valuables and cash. They had to flee again when Revolutionary France invaded Italy in 1796, this time finding refuge in Naples. In 1799, France invaded Naples. The sisters fled yet again, first to Corfu, then to Trieste. Adélaïde died there on February 27, 1800.

At what point Adélaïde had to let go of her doggie snuffbox is unknown. It is next documented in the collection of Baron Gustave de Rothschild (1829-1911), who inherited his father Baron James de Rothschild’s collection of porcelains, so it was likely acquired by James (1792-1868). It could have entered the objets d’art market after Adélaïde’s death, but she could also have sold the snuffbox herself during her time in Italy. An English travel writer from the period describes her and Victoire selling their jewels to support emigrées.

The snuffbox has been in the Rothschild family be descent since the 1800s. The last inheritor of it put it under the hammer at Bonham’s London on December 2nd. It sold for £190,900 ($257,000), a new world record for a Sèvres box. The non-profit Society of the Friends of Versailles acquired it for the national collection.

This snuffbox is thus an extraordinary example of a royal personal object whose history is fully documented, making it a privileged testimony to the art of living at Versailles in the 18th century .

With this acquisition, the Palace of Versailles enriches an already remarkable collection of artifacts dedicated to Madame Adélaïde and the daughters of Louis XV. Highly sought after on the market, royal snuffboxes of this quality – often dismantled to recover the mounts and precious stones – are almost impossible to identify.

The arrival of such a prestigious and intimate object in the collections of the Palace of Versailles represents an exceptional opportunity.



* This article was originally published here

Discount tickets turned away at Jurassic World exhibit

The company behind the experience said it is doing a review to ensure this does not happen again.

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फिल्म रिव्यू- इक्कीस:शोर से दूर युद्ध की सच्चाई, धर्मेंद्र और जयदीप अहलावत की खामोश ताकत, अगस्त्य नंदा की ईमानदार शुरुआत

इक्कीस एक ऐसी वॉर ड्रामा फिल्म है जो शोर, नारेबाजी और भारी भाषणों से दूर रहकर युद्ध को एक मानवीय अनुभव के रूप में देखती है। श्रीराम राघवन यहां देशभक्ति को दिखावे में नहीं, बल्कि खामोशी, यादों और भावनाओं में पिरोते हैं। यह फिल्म युद्ध जीतने से ज्यादा उस कीमत की बात करती है जो इंसान को चुकानी पड़ती है। इसी वजह से इक्कीस धीरे चलती है, मगर भीतर तक असर छोड़ती है। कहानी फिल्म सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल की सच्ची कहानी से प्रेरित है, जो 1971 के युद्ध में भारत के सबसे कम उम्र के परमवीर चक्र विजेता बने। कहानी दो टाइमलाइन में आगे बढ़ती है।पहली टाइमलाइन 1971 के बसंतर युद्ध की है, जहां 21 साल का अरुण अपनी टैंक रेजिमेंट का नेतृत्व करता है। युद्ध को यहां रोमांच या तमाशे की तरह नहीं, बल्कि डर, दबाव और अचानक मिली जिम्मेदारी के रूप में दिखाया गया है। दूसरी टाइमलाइन 2001 में सेट है, जहां लड़ाई खत्म हो चुकी है, लेकिन उसके निशान अब भी जिंदा हैं। यही हिस्सा फिल्म को भावनात्मक गहराई देता है और कहानी को सिर्फ वॉर फिल्म नहीं रहने देता। अभिनय अगस्त्य नंदा अपने डेब्यू में सच्चे और सहज लगते हैं। वह अरुण को किसी सुपरहीरो की तरह नहीं, बल्कि एक जिम्मेदार, आदर्शवादी और जोशीले युवा अफसर के रूप में पेश करते हैं। उनकी बहादुरी भाषणों में नहीं, बल्कि फैसलों में नजर आती है।जयदीप अहलावत बेहद सधी हुई परफॉर्मेंस देते हैं। उनका किरदार शांत है, लेकिन हर सीन में उसका अनुभव और वजन महसूस होता है। धर्मेंद्र के साथ उनके दृश्य फिल्म के सबसे प्रभावशाली पल बनते हैं। धर्मेंद्र की मौजूदगी फिल्म को भावनात्मक मजबूती देती है। दशकों तक सिनेमा में ऊर्जा और ताकत का प्रतीक रहे धर्मेंद्र यहां एक ऐसे पिता के रूप में दिखते हैं जो कम बोलता है, लेकिन जिसकी खामोशी में दर्द, गर्व और अधूरी तसल्ली साफ झलकती है, और यही उनकी परफॉर्मेंस को यादगार बनाती है।सिमर भाटिया का रोल छोटा है, लेकिन वह कहानी में भावनात्मक संतुलन लाती हैं और उस जिंदगी की झलक दिखाती हैं जो अरुण जी सकते थे। डायरेक्शन और तकनीकी पहलू श्रीराम राघवन का निर्देशन बेहद कंट्रोल में है। वह युद्ध को भव्य तमाशा नहीं बनाते, बल्कि उसके असर पर फोकस रखते हैं। कई जगह खामोशी संवाद से ज्यादा असर करती है।टैंक युद्ध सीन, साउंड डिजाइन और VFX जरूरत भर के हैं और रियल लगते हैं। कैमरा वर्क और एडिटिंग फिल्म की गंभीर और सधी हुई गति बनाए रखते हैं। फिल्म की रफ्तार कुछ दर्शकों को धीमी लग सकती है। कुछ हिस्सों में कहानी और ज्यादा कसाव मांगती है, खासकर दूसरे हाफ में।म्यूजिक बैकग्राउंड स्कोर सीमित लेकिन असरदार है। म्यूजिक कभी सीन पर हावी नहीं होता, बल्कि भावनाओं को सपोर्ट करता है। कई अहम पलों में सन्नाटा ही सबसे बड़ा प्रभाव छोड़ता है। फाइनल वर्डिक्ट इक्कीस एक संवेदनशील, गंभीर और सोचने पर मजबूर करने वाली वॉर ड्रामा फिल्म है। यह जंग को ग्लैमर नहीं बनाती, बल्कि उसके मानवीय असर को सामने रखती है। मजबूत अभिनय, सधा निर्देशन और ईमानदार ट्रीटमेंट इसकी ताकत हैं, जबकि इसकी धीमी रफ्तार इसकी सीमा बनती है।अगर आप शोर से दूर, असर वाली और भावनात्मक फिल्मों को पसंद करते हैं, तो इक्कीस एक बार जरूर देखी जा सकती है।

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'घर कब आओगे' सॉन्ग कंट्रोवर्सी पर अनु मलिक बोले:मुझे बेहद सम्मान के साथ क्रेडिट मिला, गाने को लेकर मेरे बारे में चल रहीं रिपोर्ट्स गलत

हाल ही में म्यूजिक कंपोजर अनु मलिक को लेकर खबरें आईं कि वो बॉर्डर-2 के गाने ‘घर कब आओगे’ में क्रेडिट नहीं मिलने से नाराज हैं। पीटीआई के हवाले से उनका एक इंटरव्यू सामने आया था, जिसमें उन्होंने क्रेडिट की मांग की थी। अब अनु मलिक ने इस पूरे विवाद पर अपनी सफाई दी है। उन्होंने अपने इंस्टाग्राम स्टोरी पर इसके बारे में लिखा है। वो लिखते हैं- ‘मैं ये साफ करना चाहता हूं कि घर कब आओगे गाने में भूषण जी ने मुझे पहले ही बेहद सम्मान और गर्मजोशी के साथ क्रेडिट दिया है। ये एक अनोखा कौलेबेरेशन है, जिसका मुझे बहुत गर्व है। मैंने अपने विचार सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर भी साझा कर दिए हैं। कोई भी अन्य रिपोर्ट जो भी दावा करती है, वो सारे ही गलत हैं। मैं इस कौलेबेरेशन के साथ गर्व और आभार के साथ खड़ा हूं।’ ‘घर कब आओगे’ सॉन्ग कि बात करें तो टी-सीरीज ने इसका टीजर 29 दिसंबर को जारी किया था। टीजर में अनु मलिक का नाम सॉन्ग क्रेडिट में सबसे पहले आता है। उनके साथ गीतकार जावेद अख्तर का नाम भी शामिल है, जिन्होंने ओरिजनल गाने को लिखा है। इसके अलावा सॉन्ग डिस्क्रिप्शन में भी दोनों का नाम शामिल किया गया है। बता दें कि ‘घर कब आओगे’ सॉन्ग 2 जनवरी को ग्रैंड तरीके से लॉन्च किया जाना है, जिसमें फिल्म की पूरी स्टारकास्ट मौजूद रहेगी। वहीं, ये गाना 28 साल पहले रिलीज हुई बॉर्डर के गाने ‘संदेशे आते हैं’ का रिक्रिएशन है। उस गाने में सोनू निगम के साथ रूप कुमार राठौड़ ने अपनी आवाज दी थी। गाने के बोल जावेद अख्तर ने लिखे थे और म्यूजिक अनु मलिक का था। नए गाने ‘घर कब आओगे’ में मिथुन को सॉन्ग रिक्रिएशन, मनोज मुंतशिर को नए लिरिक्स का क्रेडिट मिला है। वहीं, ‘घर कब आओगे’ को सोनू निगम के साथ, अरिजीत सिंह, विशाल मिश्रा और दिलजीत दोसांझ ने आवाज दी है। अनु मलिक ने 7 मिनट में कंपोज किया था ये गाना अनु मलिक ने एक इंटरव्यू में बताया था कि एक रोज साउंड स्टूडियो में बैठे हुए एक धुन सूझी। उन्होंने ये धुन जावेद अख्तर को सुनाई और जावेद साहब ने वही धुन उस समय बॉर्डर बना रहे जेपी दत्ता को। जेपी दत्ता को धुन पसंद आई और उनके कहने पर जावेद अख्तर ने पहले 3 अंतरे लिखे और फिर लिरिक्स से नाखुश होकर उन्होंने ऐ गुजरने वाली हवा वाला पैराग्राफ भी जोड़ दिया। लिरिक्स पूरी होते ही जेपी दत्ता और जावेद साहब, अनु मलिक की मौजूदगी में बैठे ये तय कर रहे थे कि महज 3 दिनों में गाना कैसे कंपोज किया जाए। ये चर्चा करीब 7 मिनट चली, इतनी देर में अनु मलिक ने पूरे गाने का कंपोज कर दिया।

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असरानी की 85वीं बर्थ एनिवर्सरी:इंदिरा गांधी से शिकायत के बाद मिलने लगा काम, जया–अमिताभ की शादी में बने दुल्हन के भाई

असरानी ऐसे एक्टर थे, जिनका नाम आते ही चेहरे पर मुस्कान आ जाती थी। शोले के जेलर हों, चुपके चुपके के धीरेंद्र बोस या फिर धमाल और खट्टा मीठा जैसी फिल्मों में उनके किरदार, आज भी लोगों को याद हैं। जयपुर में एक नॉन-फिल्मी परिवार में जन्मे असरानी ने मुंबई आकर फिल्मों से अपनी अलग पहचान बनाई। यह रास्ता आसान नहीं था। हालांकि संघर्ष, ट्रेनिंग और लगातार मेहनत के दम पर उन्होंने हिंदी सिनेमा में अपनी अलग छाप छोड़ी। असरानी की आज 85वीं बर्थ एनिवर्सरी है। इस मौके पर आइए, उनकी जिंदगी से जुड़े कुछ किस्से जानते हैं। असरानी का असली नाम गोवर्धन असरानी था। उनके पिता की जयपुर में कार्पेट की दुकान थी। परिवार चाहता था कि असरानी आगे चलकर यही कारोबार संभालें, लेकिन उनका मन फिल्मों और एक्टिंग में लगता था। असरानी ने जयपुर के राजस्थान कॉलेज से ग्रेजुएशन किया। पढ़ाई के दौरान खर्च चलाने के लिए उन्होंने ऑल इंडिया रेडियो में वॉयस आर्टिस्ट के तौर पर काम भी किया। असरानी ने डीडी नेशनल को दिए इंटरव्यू में बताया था कि कॉलेज के दिनों में उनकी तस्वीरें कॉलेज मैगजीन में छप जाया करती थीं। वो कॉलेज के स्टेज प्ले और रेडियो में बच्चों के प्रोग्राम करते थे। असरानी को पड़ोसी कहते थे, "लड़का अच्छा एक्टर है।" रिश्तेदारों की तारीफ भी लगातार मिलती रहती थी। लोग कहते थे कि यह लड़का कुछ कर जाएगा। इन तारीफों ने उनके मन में भरोसा पैदा कर दिया कि फिल्मों की दुनिया में कदम रखना चाहिए। जयपुर में असरानी के मोहल्ले के एक चाचा के रिश्तेदार मशहूर म्यूजिक डायरेक्टर नौशाद अली थे। उसी रिश्ते के सहारे चाचा ने नौशाद को एक चिट्ठी लिखी। चिट्ठी में लिखा था, "इस लड़के की आवाज अच्छी है, कॉमेडी भी अच्छी करता है।" नौशाद के नाम की चिट्ठी लेकर मुंबई पहुंचे मैट्रिक की पढ़ाई करने के बाद असरानी नौशाद के नाम की चिट्ठी को लेकर जयपुर से मुंबई निकल पड़े। उन्हें लगा कि नौशाद साहब का नाम है, तो काम आसानी से मिल जाएगा। मुंबई पहुंचकर उन्होंने पहली बार बड़े शहर की चमक देखी। चौड़ी सड़कें, ऊंची इमारतें, तेज रफ्तार जिंदगी। उन्होंने घर चिट्ठी लिख दी कि अब तीन-चार दिन में काम मिल जाएगा, लेकिन हकीकत बिल्कुल उलट थी। नौशाद का पता ढूंढते-ढूंढते एक महीना निकल गया। जब नौशाद का 'आशियाना' नाम का बंगला मिला, तो वहां के वॉचमैन से मुलाकात हुई। असरानी ने कहा कि वह जयपुर से नौशाद के नाम की चिट्ठी लेकर आए हैं और एक्टर बनना चाहते हैं। वॉचमैन ने साफ शब्दों में कहा, "यह गलतफहमी दूर कर लो। नौशाद साहब बहुत बिजी हैं। उनसे मिलने में वक्त लगेगा। बेहतर है चिट्ठी छोड़ जाओ और एक महीने बाद आना।" असरानी को लगा कि अब तो रास्ता खुल गया है, लेकिन धीरे-धीरे भ्रम टूटने लगा। एक साल तक वो काम ढूंढते रहे। आखिरकार नौशाद साहब के भांजे ने दया खाकर उन्हें एक फिल्म में गेस्ट रोल दिलाया। फिल्म थी खोटा पैसा। इस रोल में उन्हें फिल्म के एक पार्टी सीन में लाइन में खड़े रहना था। फिल्म के इस रोल के लिए सूट चाहिए था, लेकिन असरानी के पास सूट तक नहीं था। मजबूरी में साढ़े पांच फीट लंबे असरानी को अपने छह फीट के मामा का बड़ा सूट पहनना पड़ा था। मूवी के लिए आठ दिन तक लाइन में खड़े रहने के बाद असरानी को समझ आ गया कि फिल्मों का रास्ता इतना आसान नहीं है। नशा उतर चुका था। आखिरकार वह एक साल बाद मुंबई से लौटकर जयपुर आ गए। जयपुर लौटने पर घर वालों ने कहा, "शाबाश बेटे, अब कार्पेट की दुकान संभालो।" लेकिन उसी टूटे सपने ने असरानी को सिखाया कि बिना तैयारी और ट्रेनिंग के सिर्फ सपने लेकर मुंबई आना सबसे बड़ी भूल होती है। यही सीख आगे चलकर उनके संघर्ष की नींव बनी। FTII में अभिनय की बारीकियां सीखीं इसके कुछ समय बाद असरानी को पता चला कि पुणे में फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (FTII) में पहली बार एक्टिंग का प्रोफेशनल कोर्स शुरू होने वाला है। असरानी को लगा कि अगर सच में एक्टर बनना है, तो पहले सही तरीके से एक्टिंग सीखना जरूरी है। इसी सोच के साथ वह पुणे पहुंचे और इंस्टीट्यूट में दाखिले के लिए आवेदन किया। चयन प्रक्रिया के बाद उनका सिलेक्शन भी हो गया। FTII में पढ़ाई के दौरान असरानी ने अभिनय की बारीकियां सीखीं, लेकिन कोर्स खत्म होने के बाद भी उनकी राह आसान नहीं हुई। पढ़ाई के साथ-साथ संघर्ष लगातार जारी रहा। वह पुणे और मुंबई के बीच आते-जाते रहते थे। कभी ऑडिशन देते, कभी प्रोडक्शन ऑफिसों के चक्कर लगाते और कभी छोटे-मोटे किरदारों की तलाश करते। इस दौरान उन्हें कुछ छोटे रोल जरूर मिले, लेकिन स्थायी काम हाथ नहीं लगा। बॉलीवुड ठिकाना को दिए इंटरव्यू में असरानी ने बताया था कि FTII से पढ़ाई पूरी करने के बाद वह अपना सर्टिफिकेट लेकर प्रोडक्शन ऑफिसों में जाते थे, लेकिन अक्सर उन्हें लौटा दिया जाता। लोग तंज कसते हुए कहते, "क्या एक्टिंग सर्टिफिकेट से होती है? यहां बड़े-बड़े स्टार्स हैं जिन्होंने कोई ट्रेनिंग नहीं की है।" फिल्मों को लेकर इंदिरा गांधी से शिकायत की थी एक दिन इंदिरा गांधी पुणे आईं। उस वक्त वह सूचना और प्रसारण मंत्री थीं। असरानी और उनके साथियों ने उनसे शिकायत की और कहा कि सर्टिफिकेट होने के बावजूद उन्हें कोई काम नहीं देता। इंदिरा गांधी ने बात गौर से सुनी। बाद में मुंबई आकर इंदिरा गांधी ने प्रोड्यूसर्स से कहा कि FTII के ट्रेंड कलाकारों को मौका दिया जाए। यहीं से असरानी की किस्मत बदली। कुछ दिन बाद उन्हें और जया भादुड़ी (बच्चन) को फिल्म गुड्डी मिली। इस फिल्म में असरानी का रोल छोटा था, लेकिन फिल्म सुपरहिट हुई तो उन्हें कई फिल्में मिल गईं। शोले असरानी की सबसे चर्चित फिल्मों में एक रही असरानी ने अपने करियर के दौरान 300 से ज्यादा फिल्मों में काम किया। इनमें फिल्म शोले उनकी सबसे चर्चित फिल्मों में से एक रही, जिसमें उन्होंने अंग्रेजों के जमाने के जेलर का किरदार निभाया था। दैनिक भास्कर को दिए अपने आखिरी इंटरव्यू में असरानी ने बताया था कि उन्होंने इस रोल को निभाने की तैयारी कैसे की थी। असरानी ने बताया था कि जब उन्हें शोले के रोल के लिए खार स्थित ऑफिस बुलाया गया, तो उन्हें लगा कि रोज की तरह एक सामान्य मीटिंग होगी, लेकिन अंदर पहुंचते ही माहौल कुछ अलग लगा। एक छोटे से कमरे में सलीम खान, जावेद अख्तर और रमेश सिप्पी बैठे थे। सबके हाथ में बस दो-चार पन्नों की स्क्रिप्ट थी। जावेद अख्तर ने पढ़ना शुरू किया, “अटेंशन… अटेंशन… हम अंग्रेज के जमाने के…” असरानी चौंक गए। तभी उन्हें समझाया गया कि यह किरदार बड़ा शो-ऑफ करने वाला है, थोड़ा बेवकूफ है, लेकिन खुद को दुनिया का सबसे समझदार आदमी समझता है। यही उसका असली एटीट्यूड है और इसी को पकड़ना है। इसके बाद सलीम-जावेद ने उन्हें वर्ल्ड वॉर सेकेंड की एक किताब दी, जिसमें हिटलर के 12–13 पोज थे। बताया गया कि हिटलर पब्लिक में आने से पहले अपने कमरे में रिहर्सल करता था पूरी ड्रेस पहनकर, फोटोग्राफर के सामने अलग-अलग पोज देता था और उनमें से कुछ पोज चुनकर जनता के सामने जाता था। उसी पल असरानी को समझ आ गया कि इस किरदार की ताकत उसका एटीट्यूड है, जब यह आदमी बोलता है, तो सामने वाले को भड़का देता है। रोल की तैयारी के लिए असरानी ने हिटलर पर बनी कुछ फिल्में भी देखीं थी, जिसमें चार्ली चैपलिन की द ग्रेट डिक्टेटर भी शामिल थी। बाद में असरानी ने रोल के लिए मुंबई के मोहन स्टूडियो में पूरी वर्दी और मूंछ लगाकर अपनी चाल दिखाई और फिल्म के लिए सेलेक्ट हुए। असरानी का सीन काट दिया गया था हालांकि असरानी ने बताया था कि एक समय ऐसा आया, जब फिल्म शोले की लंबाई ज्यादा होने के कारण उनका सीन काट दिया गया था। उन्हें इसकी खबर तक नहीं थी, क्योंकि शूटिंग पूरी कर वे लौट चुके थे। मेकर्स को लगा कि इतनी लंबी फिल्म थिएटर में नहीं चलेगी। बाद में पता चला कि मुंबई के 70 एमएम प्रिंट में उनका सीन मौजूद है, जबकि दूसरे प्रिंट्स में नहीं। साउंड रिकॉर्डिस्ट मंगेश देसाई ने इसे फिल्म का अहम हिस्सा बताया और चेतावनी दी कि इसे काटना गलती होगी। फिर नागपुर में एक जर्नलिस्ट की पहल पर आखिरकार उनका सीन दोबारा जोड़ा गया और यह किरदार हिंदी सिनेमा के सबसे यादगार रोल्स में शामिल हो गया। जया-अमिताभ की शादी में भाई बने थे असरानी और जया बच्चन ने कई फिल्मों में साथ काम किया, लेकिन उनका रिश्ता सिर्फ सह-कलाकारों तक सीमित नहीं था। यह रिश्ता गुरु-शिष्य का था और समय के साथ इसमें भाई-बहन जैसा अपनापन भी जुड़ गया। FTII में असरानी जया के टीचर थे। वहीं उन्होंने जया को एक्टिंग की बारीकियां सिखाईं। असरानी ने बताया था कि अमिताभ बच्चन से उनकी मुलाकात जया के जरिए हुई। जया उनके नीचे वाले फ्लोर पर रहती थीं। अमिताभ अक्सर उनसे मिलने आया करते थे। कई बार ऐसा होता कि जया के घर प्रोड्यूसर बैठे होते, तो अमिताभ चुपचाप असरानी के घर आकर बैठ जाते थे। जया और अमिताभ की शादी में असरानी दुल्हन के चार भाइयों में से एक थे। उनके साथ गुलजार, रमेश बहल और एक रिश्तेदार भी थे। फिल्मों में बड़ा नाम कमाने के बाद भी जया असरानी को सम्मान से सर कहकर बुलाती थीं। लोगों ने नेगेटिव रोल न करने की सलाह दी थी असरानी को लोग हमेशा उनकी जबरदस्त कॉमिक टाइमिंग के लिए जानते रहे। पर्दे पर आते ही हंसी बिखेर देना उनकी पहचान बनी, लेकिन असरानी ने अपने करियर में अब क्या होगा, चैताली, प्रेम नगर और तेरी मेहरबानियां जैसी फिल्मों में गंभीर और नेगेटिव रोल भी निभाए। ऐसा ही एक रोल फिल्म कोशिश में था। साल 1972 में गुलजार के निर्देशन में बनी फिल्म कोशिश में असरानी ने कानू का किरदार निभाया। फिल्म में उनका किरदार लालची और पूरी तरह नेगेटिव था। इस फिल्म में उनका किरदार अपनी गूंगी-बहरी बहन और उसके पति का फायदा उठाता है। फिल्म रिलीज हुई तो लोगों ने उनकी अदाकारी की तारीफ की, लेकिन साथ ही कई लोग उनसे कहने लगे, “ऐसे नेगेटिव रोल मत किया करो।” डीडी नेशनल के कार्यक्रम कोशिश से कामयाबी तक में असरानी ने बताया था फिल्म देखने के बाद लोगों ने कहा था, “यार ऐसे रोल मत किया करो, तुम्हारे हाथ से बच्चा मर जाता है। नेगेटिव रोल मत किया करो।” असरानी को सूट में देख धर्मेंद्र हैरान हो गए थे साल 1975 में रिलीज हुई फिल्म चुपके चुपके की शूटिंग के दौरान असरानी को अपने किरदार के लिए सूट पहनना था। यह बात उनके लिए थोड़ी अजीब थी, क्योंकि आमतौर पर उन्हें फिल्मों में सूट पहनने वाले रोल कम ही मिलते थे। सीन समझने के लिए वह डायरेक्टर ऋषिकेश मुखर्जी के पास पहुंचे, मगर किसी ने उन्हें कुछ नहीं बताया। ऋषिकेश मुखर्जी उस वक्त लेखक राही मासूम रजा के साथ शतरंज खेल रहे थे। आसपास चार-पांच अस्सिटेंट डायरेक्टर भी बैठे थे। असरानी बार-बार सीन पूछते रहे, मगर हर तरफ खामोशी थी। वह सूट पहनकर शूटिंग के लिए वहीं खड़े रहे। तभी अचानक धर्मेंद्र वहां ड्राइवर की ड्रेस में दाखिल हुए। उन्होंने हैरानी से असरानी से पूछा, “मैं तेरा ड्राइवर बना हूं?” धर्मेंद्र को लगा कि कहीं कुछ गड़बड़ है। उन्होंने असरानी से कई सवालों की बौछार कर दी जैसे सीन क्या है, सूट कहां से मिला और मुझे ड्राइवर क्यों बना दिया गया? इतने में ऋषिकेश मुखर्जी ने यह हलचल देख ली। वह झल्लाकर बोले, “ऐ धरम! तुम असरानी से सीन क्यों पूछ रहे हो?” फिर बोले, “अगर तुम्हें सीन की इतनी समझ होती, तो तुम एक्टर नहीं होते।” आज असरानी की फिल्म इक्कीस रिलीज हो रही है 20 अक्टूबर 2025 को असरानी के निधन के बाद उनकी फिल्म किस किसको प्यार करूं 2 रिलीज हुई थी। वहीं आज उनकी बर्थ एनिवर्सरी के दिन उनकी एक और फिल्म इक्कीस रिलीज हो रही है, जिसमें दिवंगत धर्मेंद्र भी नजर आएंगे। यह धर्मेंद्र की आखिरी फिल्म है। इसके अलावा दिवंगत असरानी निर्देशक प्रियदर्शन की आने वाली फिल्मों भूत बंगला और हैवान में भी दिखाई देंगे। इन फिल्मों के 2026 में रिलीज होने की उम्मीद है। ..................................... बॉलीवुड से जुड़ी ये खबरें भी पढ़ें.... दिलीप कुमार की 103वीं बर्थ एनिवर्सरी:पोस्टर देखकर पिता को पता चला बेटा हीरो बना, आधी उम्र की लड़की से शादी की 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